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दरअसल : छपनी चाहिए स्क्रिप्ट

-अजय ब्रह्मात्मज
देश भर से परिचित लेखकों और मित्रों की फिल्मी लेखक बनने की जिज्ञासाएं मिलती रहती हैं। सुदूर इलाकों में बैठे महत्वाकांक्षी लेखक मेल, फोन और सोशल मीडिया के जरिए यह जानने की चाहत रखते हैं कि कैसे उनकी कहानियों पर फिल्में बन सकती हैं। इस देश में हर व्यक्ति के पास दो-तीन कहानियां तो होती ही हैं, जिन्हें वह पर्दे पर लाना चाहता है। अगर लिखना आता है और पत्र-पत्रिकाओं में कुछ रचनाएं छप गई हों तो उन्हें यह प्रवेश और आसान लगता है। ज्यादातर लोग एक कनेक्शन की तलाश में रहते हैं। उस कनेक्शन के जरिए वे अपनी कहानी निर्देशक-निर्माता या स्टार तक पहुंचाना चाहते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। प्रतिभा है तो अवसर मिलना चाहिए। मैंने कई बार मदद की करने की कोशिश में पाया कि अधिकांश लेखकों के पास फिल्म लेखन का संस्कार नहीं होता। किसी भी पॉपुलर फिल्म को देखने के बाद वे उसी ढर्रे पर कुछ किरदारों को जोड़ लेते हैं और एक नकल पेश करते हैं। जिनके पास मौलिक कहानियां व विचार हैं, वे भी उन्हें स्क्रिप्ट में नहीं बदल पाते। दरअसल फिल्म लेखन एक क्राफ्ट है और यह क्रिएटिव लेखन से बिल्कुल अलग है।
    स्क्रिप्ट ले…