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Friday, September 7, 2018

फिल्म समीक्षा : गली गुलियाँ

फिल्म समीक्षा
गली गुलियाँ
-अजय ब्रह्मात्मज
दिल्ली के चांदनी चौक की तंग गलियों में से एक गली गुलियाँ  से गुजरें तो एक  पुराने जर्जर मकान में खुद्दुस मिलेगा. बिखरे बाल, सूजी आंखें,मटमैले पजामे-कमीज़ में बदहवास खुद्दुस बाहरी दुनिया से कटा हुआ इंसान है. उसने अपनी एक दुनिया बसा ली है. गली गुलियाँ में उसने जहां-तहां सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं. वह अपने कमरे में बैठा गलियों की गतिविधियों पर नजर रखता है. वह एक बेचैनी व्यक्ति है. उसे एक बार पीछे के मकान से मारपीट और दबी सिसकियों की आवाज सुनाई पड़ती है. गौर से सुनने पर उसे लगता है कि बेरहम पिता अपने बेटे की पिटाई करता है. खुद्दुस उसके बारे में विस्तार से नहीं जान पाता. उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है. वह अपनी  बेचैनी को खास दोस्त गणेशी से शेयर करता है. अपने कमरे में अकेली जिंदगी जी रहे खुद्दुस  का अकेला दोस्त गणेशी ही उसकी नैतिक  और आर्थिक मदद करता रहता है. वह उसे डांटता-फटकारता और कमरे से निकलने की हिदायत देता है.खुद्दुस एक बार हाजत में बंद होता है तो वही उसे छुदाता है.पता चलता है कि गली गुलियाँ से निकल चुके अपने ही छोटे भाई से उसकी नहीं निभती.उसकी एक ही चिंता है कि कैसे वह पीछे के माकन के पिटते बच्चे को बचा ले.उसका ज़ालिम पिता कहीं उसकी जान न ले ले.
दीपेश जैन निर्देशित 'गली गुलियाँ' समाज से अलग-थलग पद गए खुद्दुस की कहानी कहती है. दीपेश जैन की यह पहली फिल्म है.उन्होंने किसी पारंगत निर्देशक की सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उनकी तकनीकी टीम का उचित योगदान दीखता है.खास कर कैमरा,पार्श्व संगीत और संपादन में की सुघड़ता प्रभावित करती है.निश्चित ही मनोज बाजपेयी से उन्हें अतिरिक्त मदद मिली है.फिल्म में नाटकीयता नहीं है. एक अकेके व्यक्ति के मानस की खोह में उतरती यह फिल्म एक समय के बाद भावनाओं की आवृति से दर्शकों को भी मथ देती है.दर्शक चाहता है कि खुद्दुस की व्यथा का निस्तार हो ताकि वह स्वयं थोड़ी रहत महसूस करे.बन कमरे और तंग गलियों में तैर रही घबराहट दर्शकों के मन पर हावी होने लगती है.मेरे साथ तो यही हो रहा था.मैं चाहने लगा था की खुद्दुस को मुक्ति मिले.मुझे उसके व्यक्तित्वे से जुगुप्सा सी होने लगी थी.अगर वह बगल की कुर्सी पर आ बैठता तो शायद मैं उठ जाता या बैठे रहने का दवाब होने पर खुद को सिकोड़ लेता.यह दीपेश की खूबी है और मनोज बाजपेयी की खासियत है.
मनोज बाजपेयी इस दौर के बहुआयामी अभिनेता हैं.अभी वह एक तरफ 'सत्यमेव जयते' जैसी घोर कमर्शियल फिल्म के साथ 'गली गुलियाँ' कर रहे हैं.मज़ेदार यह है कि वह दोनों तरह की भूमिकाओं में सराहना पा रहे हैं.ऐसा लगता है कि 'गली गुलियाँ' के लिए उन्हें खास मशक्कत करनी पड़ी होगी.रिलीज के पहले एक बातचीत में उन्होंने ने कहा था कि 'यह मेरे जीवन की सबसे कठिन और जटिल फिल्म है. इसे करते हुए  मैं बहुत परेशान रहा. इस भूमिका ने मेरे अभिनय  की शैली और तकनीक को चुनौती दी. डेढ़ महीनों के अभ्यास में कई बार ऐसा लगा की यह मुझ से नहीं हो पाएगा. कई बार अपने अभिनेता होने पर शक हुआ. ऐसा भी लगा कि मैं जो सोचता हूं,वैसा हूं नहीं.  मुझे नई   युक्ति तलाशनी पड़ी. इस भूमिका के लिए पुरस्कार मिले तो खुद आश्वस्त हुआ यह मेरा बेहतरीन काम है.
 किसी भी भूमिका को निभाने में दो  प्रक्रियायें साथ चलती हैं. एक बाहरी होती है और एक भीतरी. किरदार के द्वंद्व और दुविधा को पकड़ पाने की मानसिक यात्रा... किरदार के सारे तत्वों को जोंड़कर चल पाना... यह एक जटिल प्रक्रिया होती है. किरदार के  मानसिक उथल-पुथल को चेहरे पर लाकर दर्शकों तक पहुंचाना ही असल चुनौती है.  इस फिल्म में संवाद कम है. किरदार खामोश रहता है. उसका संबंध सिर्फ दीवारों और सीसीटीवी मॉनिटर के साथ हैं. कमरे के पुराने पंखे और मकड़ी के जालों के साथ उसका रिश्ता है. वह कमरे में अकेला रहता है. हिंदी  फिल्मों में ऐसे किरदार कम दिखे हैं.'
अवधि :157 मिनट 
**** चार स्टार . .


Thursday, August 16, 2018

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते 

सत्य की जीत 
-अजय ब्रह्मात्मज

शब्दों को ढंग से संवाद में पिरोया जाये तो उनसे निकली ध्वनि सिनेमाघर में ताली बन जाती है.मिलाप मिलन जावेरी की फिल्म 'सत्यमेव जयते' देखते समय यह एहसास होता है कि लेखक की मंशा संवादों से तालियाँ बटोरने की है.मिलाप को 10 में से 5 मौकों पर सफलता मिलती है.

पिछले दिनों एक निर्देशक बता रहे थे कि हिंदी फिल्मों के संवादों से हिंदीपन गायब हो गया है.लेखकों से मांग रहती  है कि वे संवादों में आम बोलचाल की भाषा लिखें.कुछ फिल्मों के लिए यह मांग उचित हो सकती है,लेकिन फिल्में इक किस्म का ड्रामा हैं.उनके किरदार अगर अडोस-पड़ोस के नहीं हैं तो संवादों में नाटकीयता रखने में क्या हर्ज है. 'सत्यमेव जयते' संवादों के साथ ही चरित्र चित्रण और प्रस्तुति में भी नौवें दशक की याद दिलाती है. यह वह समय था,जब खानत्रयी का हिंदी सिनेमा के परदे पर उदय नहीं हुआ था और हिंदी सिनेमा घिसी-पिटी एकरसता से गर्त में जा रही थी. इस फिल्म के प्रीव्यू शो से निकलती एक फिल्म पत्रकार की टिपण्णी थी - बचपन याद आ गया.

'सत्यमेव जयते' हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा की दशकों पुराणी तलछट पर बचे कर्कटों को जुटा कर बनायी गयी फिल्म है.इस फिल्म को देखना किसी नॉसटेलजिक फीलिंग से भर जाना है.थोड़े उम्रदराज दर्शकों को यह उनकी किशोरावस्था और जवानी के दिनों में ले जाएगी तो मिलेनिअल पीढ़ी को पुराने स्वाद से परिचित कराएगी. वे अपने दोस्तों के साथ इस फिल्म का मजाक उड़ाते हुए भी मज़े ले सकते हैं.फिल्म का शिल्प इतना साधारण है कि वह रस देने लगता है.

फिल्म में कानून के साथ और कानून अपने हाथ में लेकर चलने वाले दो किरदार हैं. दोनों आमने-सामने हैं.हम किसी एक को विलेन भी नहीं कह सकते.फिल्म की टैग लाइन 'बेईमान पिटेगा,भ्रष्टाचार मिटेगा' के अनुसार दोनों का मकसद एक ही है लेकिन उनके रास्ते अलग हैं.फिल्म रोचक तरीके से आगे बढती है.लेखक ने दोनों प्रमुख किरदारों की तनातनी को अलग अंदाज में पेश भी किया है,लेकिन जैसे ही उनके रिश्ते की जानकारी मिलती है...कहानी कमज़ोर पड़ जाती है. उसके बाद की कहानी के मोड़ दर्शक भी लिख सकते हैं.हां,यह फिल्म इतनी प्रेडिक्टेबल है. फिर भी दर्शक बंधे हुए बैठे रहेंगे,क्योंकि उनके सामने परदे पर अभिनेता मनोज बाजपेयी हैं.वे अपनी अदाकारी से हिलने नहीं देते.

कई दृश्यों में निर्देशक यूँ लिप्त हुए हैं कि सीन का उद्देश्य पूरा होने के बाद भी कैमरा बंद नहीं करते,उधर दर्शक को होने लगता है कि अब हो न गया...हम समझ गए,अगले सीन पर चलो..और एक्टर को उस सीन में हर कुछ सेकंड के बाद पूरी ऊर्जा से इमोशन के अगले पायदान पर चढ़ना होता है.थक गए होंगे मनोज बाजपेयी. इस फिल्म में  'शूल' के समर प्रताप सिंह की भी याद आती है.

अब तो जॉन अब्राहम भी एक्टिंग करते दिखने लगे हैं. 

अच्छा एक सवाल है कि हिंदी फिल्मों के ईमानदार पुलिस अधिकारी राठोड़ या प्रताप सिंह ही क्यों होते हैं? क्या उस सरनेम से ईमानदारी टपकती है,जो चौधरी,यादव या पासवान सरनेम रखने से नहीं टपकेगी?

अवधि 140 मिनट 
*** तीन स्टार 

Friday, October 27, 2017

पिता-पुत्र के रिश्‍तों का अनूठा ‘रुख’ : मनोज बाजपेयी



पिता-पुत्र के रिश्‍तों का अनूठा रुख’ : मनोज बाजपेयी
कद्दावर कलाकार मनोज बाजपेयी की आज रुखरिलीज हो रही है। मध्‍यवर्गीय परिवार के तानेबाने पर फिल्‍म मूल रूप से केंद्रित है। आगे मनोज की अय्यारीव अन्‍य फिल्‍में भी आएंगी।
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
रुखका परिवार आम परिवारों से कितना मिलता-जुलता है? यह कितनी जरूरी फिल्‍म है?
यह मध्‍य वर्गीय परिवारों की कहानी है। इसमें रिश्‍ते आपस में टकराते हैं। इसकी सतह में सबसे बड़ा कारण पैसों की कमी है। एक मध्‍य या निम्‍नवर्गीय परिवार में पैसों को लेकर सुबह से जो संघर्ष शुरू होता है, वह रात में सोने के समय तक चलता रहता है। ज्यादातर घरों में ये सोने के बाद भी अनवरत चलता रहता है। खासकर बड़े शहरों में ये उधेड़बुन चलता रहता है। इससे रिश्‍ते अपना मतलब खो देते हैं। वैसे दोस्त नहीं रह जाते, जो हमारे स्‍कूल-कॉलेज या फिर एकदम बचपन में जो होते हैं। इनके मूल में जीवन और जीविकोपार्जन की ऊहापोह है। इन्हीं रिश्‍तों और भावनाओं के बीच की जटिलता और सरलता को दर्शाती हुई यह एक ऐसी फिल्‍म है, जिसकी कहानी के केंद्र में एक मृत्‍यु होती है। सारे किरदार उस मौत से जुड़े होते हैं परोक्ष या अपरोक्ष रूप से।
-हिंदी सिनेमा पिता के चित्रण में कितना सही रहा है? जाने-अनजाने ज्यादातर मौकों पर पिता को बतौर विलेन ही पेश किया जाता रहा है?
यह एक पारंपरिक चलन रहा है मध्‍य या निम्‍नमध्‍यवर्गीय परिवार का। इसके कई कारण हैं। उन परिवारों की माएं घर में ही रहती हैं। जन्‍म से लेकर बच्चों के शादी-ब्‍याह होने तक उसकी मूल जरूरतों से लेकर व्‍यावहारिक, सामाजिक और उनके अल्‍हड़पन के सपनों से लेकर हकीकत के धरातल तक सारी जिजीविषाओं का ध्‍यान रखती हैं। तभी वे पूज्‍य भी हैं, क्‍योंकि जननी भी हैं। इसके ठीक उलट पिता उन सारी जरूरतों की पूर्ति के आयामों में उलझा रहता है। लिहाजा वह बच्‍चों को अपना सान्निध्‍य नहीं दे पाता, जो मां देती है। ऐसा हर परिवार में होता है। हमारी फिल्‍म पिता की बाध्‍यताओं को बखूबी पेश करती है।
-आप का अपने पिता के साथ कैसा रिश्‍ता रहा। आप दोनों आपस में कितने करीब और सहज रहे?
इस मामले में मैं बड़ा भाग्‍यवान रहा। मेरे पिता बड़े ही सहज, सरल और खुले विचारों के थे। शायद यही वजह रही है कि मैं अपने पिता को खुद के ज्यादा करीब पाता हूं अपनी मां के बनिस्‍पत। बेशक हम मध्‍यवर्गीय परिवारों में या हमारी पीढ़ी के लोग अपने पिता के सामने या साथ बैठकर शराब, सिगरेट नहीं पीते थे। न सेक्‍स पर कोई चर्चा ही। मुझे लगता है कि यह सब करना खुलेपन का पैमाना भी नहीं है। मेरे पिता अपनी हर समस्या हमसे साझा करते थे। हम भी अपनी समस्‍याओं के समाधान के लिए बेझिझक उनके पास जाते थे। अपना और उनका पक्ष जानते-समझते थे। खुलापन असल में यही है। नजदीकी के मायने भी यही हैं शायद। पिता-पुत्र के ऐसे संबंधों से लैस है हमारी फिल्‍म।
-अब कितने रोचक और अनूठे कंसेप्ट आप लोगों के पास आ रहे हैं? वे सत्‍याके समय से कितने अलग हैं?
देखिए सत्‍याके बाद काफी दिनों तक मैं खाली रहा, क्‍योंकि काम के नाम पर जो मेरे पास आ रहे थे, मैं उन्‍हें करने को तैयार नहीं था। सब एक जैसे काम ही आ रहे थे। मैं अलग-अलग तरीके के प्रयोग और सार्थक कामों का हिमायती हूं। जैसे सत्‍याका भीखू म्‍हात्रेएक अलग किरदार था। अनूठे तेवर और कलेवर वाला। इसी तरह की प्रयोगधर्मी सिनेमा के साथ मैं सदा जीना चाहता हूं।
-रुखजैसी फिल्‍मों के लिए सिने फेस्टिवल संजीवनी बूटी साबित होते हैं। क्‍या मानते हैं आप?
देखिए ये माध्‍यम रुखजैसी धन से गरीब और मन, काया व व्‍यवहार मेरा मतलब कंटेंट से अमीर फिल्‍मों के लिए वाकई संजीवनी का काम करते हैं। वह इसलिए कि ऐसी फिल्‍मों के पास इतना धन नहीं होता कि वह शहर-दर-शहर फिल्‍म के पूरे कुनबे के साथ जा कर अपना प्रचार कर सके। ऐसे में अगर उन माध्‍यमों से इन फिल्‍मों को पहचान मिलती है तो लोगों में जागरूकता के साथ-साथ उत्‍सुकता भी बढ़ती है फिल्‍मों को देखने की। तभी मैं तो इन माध्‍यमों को सार्थक और उपयोगी मानता हूं।
-अय्यारी के बारे में कुछ बताएंगे?
इस वक्‍त तो इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताऊंगा। बस लेखन खासकर पटकथा लेखन के लिहाज से नीरज पांडे ने कमाल का थ्रिलर गढ़ा है। दर्शकों से लेकर फिल्‍म विधा से जुड़े हरेक इंसान को यह बहुत पसंद आएगी। ऐसा मुझे लगता है।
-नीरज पांडे और मनीष मुंद्रा के बारे में क्‍या कहना चाहेंगे?
मैं दोनों ही का ह्रदय से सम्‍मान करता हूं। दोनों अपनी-अपनी जगह अनूठे हैं। दोनों ही मुझे बहुत अधिक सम्‍मान देते हैं। इसके फलस्‍वरूप एक अभिनेता के तौर पर मैं अधिक लालची होकर उनकी हर फिल्‍म का हिस्‍सा होना चाहता हूं।

फिल्‍म समीक्षा : रुख



फिल्‍म रिव्‍यू
भावपूर्ण
रुख
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पहली बार निर्देशन कर रहे अतानु मुखर्जी की रुख हिंदी फिल्‍मों के किसी प्रचलित ढांचे में नहीं है। यह एक नई कोशिश है। फिल्‍म का विषय अवसाद,आशंका,अनुमान और अनुभव का ताना-बाना है। इसमें एक पिता हैं। पिता के मित्र हैं। मां है और दादी भी हैं। फिर भी यह पारिवारिक फिल्‍म नहीं है। शहरी परिवारों में आर्थिक दबावों से उत्‍पन्‍न्‍ स्थिति को उकेरती यह फिल्‍मे रिश्‍तों की परतें भी उघाड़ती है। पता चलता है कि साथ रहने के बावजूद हम पति या पत्‍नी के संघर्ष और मनोदशा से विरक्‍त हो जाते हैं। हमें शांत और समतल जमीन के नीचे की हलचल का अंदाजा नहीं रहता। अचानक भूकंप या विस्‍फोट होने पर पता चलता है कि ाोड़ा ध्‍यान दिया गया होता तो ऐसी भयावह और अपूरणीय क्षति नहीं होती।
फिल्‍म की शुरूआत में ही डिनर करते दिवाकर और पत्‍नी नंदिनी से हो रही उसकी संक्षिप्‍त बातचीत से स्‍पष्‍ट हो जाता है कि दोनों का संबंध नार्मल नहीं है। दोनों एक-दूसरे से कुछ छिपा रहे हैं। या एक छिपा रहा है और दूसरे की उसमें कोई रुचि नहीं है। संबंधों में आए ऐसे ठहरावों को फिल्‍मों में अलग-अलग तरीके से चित्रित किया गया। हिंदी साहित्‍य में नई कहानी के दौर में ऐसे विचलित अौर आत्‍महंता नायकों से हम मिलते रहे हैं। हालांकि समय अभी का है,लेकिन चरित्र चित्रण और प्रस्‍तुति में रुख किसी साहित्यिक रचना की तरह सब कुछ रचती है। यह इस फिल्‍म की खूबी है। रुख किसी कविता की तरह हमारे सामने उद्घाटित होती है। शब्‍दों और पंक्तियों में कहे गए भाव के अतिरिक्‍त भी निहितार्थ हैं,जिन्‍हें दर्शक अपनी समझ और स्थिति के अनुसार ग्रहण कर सकता है।
इस फिल्‍म का मुख्‍य किरदार बेटा ध्रुव है। पिता की आकस्मिक मौत के बर वह घर लौटता है तो उसे संदेह होता कि पिता की मौत किसी दुर्घटना की वजह से नहीं हुई है। उसे आरंभिक संदेह है कि पिता के दोस्‍त(कुमुद मिश्रा) ने ही उनकी हत्‍या करवाई है और उसे एसीडेंट की शक्‍ल दे दी है। निजी तहकीकात से वह पिता और परिवार के सत्‍य से परिचित होता है। हॉस्‍टल में रहने की वजह से वह पारिवारिक संकट से नावाकिफ है। यह फिल्‍म ध्रुव के नजरिए से पिता को समझती और नतीजों पर पहुंचती है। अतानु मुखर्जी ने इसे थ्रिलर का रूप नहीं दिया है। थोड़ी देर के लिए रुख थ्रिलर होने का रोमांच देती है। फिर व‍ि बाहरी घटनाओं से अधिक मानसिक उद्वेलन पर टिकी रहती है। हम दिवाकर के पिता और मां से भी परिचित होती हैं। मां नंदिनी की खामशी और स्थिर आंखें बहुत कुछ बयान करते हैं। अपने पति की हकीकत से वाकिफ होने पर वह भी हैरान होती है। पति के नहीं रहने और सच जानने के आ बेटा उसकी चिंता है,मगर बेटा पिता की मौत के कारणों की तह में पहुंचना चाहता है।
पिता और बेटे के किरदारों में मनोज बाजपेयी और आदर्श गौरव ने निर्देशक अतानु मुखर्जी के अभीष्‍ट को मार्मिक तरीके से प्रस्‍तुत किया है। मनोज बाजपेयी के बारे में अलग से लिखने की जरूरत नहीं है। वे हर किरदार को उसके वास्‍तविक हाव-भाव के साथ पेश करते हैं। हां,आदर्श् गौरव चौंकाते हैं। मां नंदिनी की भूमिका में स्मिता तांबे आवश्‍यक भाव जगाने में सक्षम हैं। उन्‍हें बोलने से अधिक जाहिर करना था। उन्‍हों यह काम बखूबी किया है। कुमुद मिश्रा बड़े ही किफायती एक्‍टर हैा। बिना ताम-झाम और मेलोड्रामा के वे अपने एक्‍सप्रेशन से मिले किरदार को सजीव कर देते हैं।
यहां निर्माता मनीष मुंद्रा की भी तारीफ करनी होगी कि वे एक के बाद एक ऐसी फिल्‍मों में विश्‍वास के साथ निवेश कर रहे हैं।
अवधि 106 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, March 30, 2017

फिल्‍म समीक्षा : नाम शबाना



फिल्‍म रिव्‍यू
दमदार एक्‍शन
नाम शबाना
-अजय ब्रह्मात्‍मज

नीरज पांडेय निर्देशित बेबी में शबाना(तापसी पन्‍नू) ने चंद दृश्‍यों में ही अपनी छोटी भूमिका से सभी को प्रभावित किया था। तब ऐसा लगा था कि नीरज पांडेय ने फिल्‍म को चुस्‍त रखने के चक्‍कर में शबाना के चरित्र विस्‍तार में नहीं गए थे। हिंदी में स्पिन ऑफ की यह अनोखी कोशिश है। फिल्‍म के एक किरदार के बैकग्राउंड में जाना और उसे कहानी के केंद्र में ले आना। इस शैली में चर्चित फिल्‍मों के चर्चित किरदारों के विस्‍तार में जाने लगें तो कुछ दिलचस्‍प फिल्‍में मिल सकती हैं। किरदारों की तैयारी में कलाकार उसकी पृष्‍ठभूमि के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। अगर लेखक-निर्देशक से मदद नहीं मिलती तो वे खुद से उसका अतीत गढ़ लेते हैं। यह जानना रोचक होगा कि क्‍या नीरज पांडेय ने तापसी पन्‍नू को शबाना की पृष्‍ठभूमि के बारे में यही सब बताया था,जो नाम शबाना में है?
नाम शबाना के केंद्र में शबाना हैं। तापसी पन्‍नू को टायटल रोल मिला है। युवा अभिनेत्री तापसी पननू के लिए यह बेहतरीन मौका है। उन्‍होंने लेखक नीरज पांढेय और निर्देशक शिवम नायर की सोच के मुताबिक शबाना को विदाउट मुस्‍कान सख्‍तजान किरदार के रूप में पेश किया है। वह नो नॉनसेंस मिजाज की लड़की है। जिंदगी के कटु अनुभवों ने उसकी मुस्‍कान छीन ली है। सहज इमोशन में भी वह असहज हो जाती है। यहां तक कि अपने प्रेमी तक को नहीं बता पाती कि वह उससे उतना ही प्‍यार करती है। सब कुछ तेजी से घटता है। वह अपने एटीट्यूड की वजह से सुरक्षा एजेंसी की नजर में आ जाती है। वे उसकी मदद करते हैं और बदले में उसका गुस्‍सा और जोश ले लेते हैं।
सुरक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली बहस का विषय हो सकती है। सुरक्षा एजेंसी के अधिकारी स्‍पष्‍ट शब्‍दों में बता देते हैं कि मुस्लिम परिवेश की होने की वजह से शबाना उनके लिए अधिक काम की है। जाहिर है कि मजहब,नाराजगी और प्रतिरोध का फायदा दोनों पक्ष उठाते हैं आतंकवादी और राष्‍ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां। नीरज पांडेय के लेखन में राष्‍ट्रवादी सोच कील झलक रहती है। उनके किरदार देशहित में लगे रहते हैं। वे पुरानी फिल्‍मों के किरदारों की तरह देशभक्ति ओड़ कर नहीं चलते। इसी फिल्‍म में शबाना किडो में इंअरनेशनल अवाड्र लाना चाहती है।
तापसी पन्‍नू फिल्‍म दर फिल्‍म निखरती जा रही हैं। उन्‍हें दमदार भमिकाएं मिल रही हैं और वह किरदारों के अनुरूप खुद को ढाल रही हैं। किरदारों की बारीकियों को वह पर्दे पर ले आती हैं। उनके एक्‍सप्रेशन संतुलित और किरदार के मिजाज में होते हैं। नाम शबाना में उन्‍होंने किरदार की स्‍फूर्ति और हिम्‍मत बनाए रखी है। मनोज बाजपेयी कर्मठ व निर्मम अधिकारी के रूप में जंचे हैं। वे सचमुच बहुरूपिया हैं। जैसा किरदार,वैसी भाव-भंगिमा। उनके पोर-पोर से संजलीदगी टपकती है। अक्षय कुमार ने फिल्‍म की जरूरत के मुताबिक छोटी भूमिका निभाई है,जिसे कैमियो कहा जाता है। लंगे समय के बाद वीरेन्‍द्र सक्‍सेना दिखे और सही लगे।
फिल्‍म में एक ही कमी है कहानी। अगर नीरज पांडेय ने थोड़ा और ध्‍यान दिया होता तो एक बेहतरीन फिल्‍म मिलती। निर्देशक शिवम नायर ने मिली हुई स्क्रिप्‍ट के साथ न्‍याय किया है। उन्‍होंने एक्‍शन,माहौल और प्रस्‍तुति में कोई कोताही नहीं की है। नाम शबाना का एक्‍शन जमीनी और आमने-सामने का है। एक्‍शन में खास कर महिला किरदार के होने की वजह से फिल्‍म अलग हो गई है। तापसी पन्‍नू इस भूमिका में प्रभावित करती हैं।
अवधि 148 मिनट
*** तीन स्‍टार    

Friday, October 14, 2016

फिल्‍म समीक्षा : सात उचक्‍के




गालियां और गलियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
संजीव शर्मा की सात उचक्‍के का सबसे बड़ा आकर्षण मनोज बाजपेयी,के के मेनन और विजय राज का एक साथ एक फिल्‍म में होना है।तीनों थिएटर की पृष्‍ठभूमि से आए अभिनेता हैं। तीनों की शैली में हल्‍की भिन्‍नता है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में तीनों साथ हैं। उन दृश्‍यों में हंसी की स्‍वच्‍छंद रवानी है। वे एक-दूसरे को स्‍पेस देते हुए अपनी मौजूदगी और शैली से खुश करते हैं। अपने निजी दृश्‍यों में उनका हुनर दिखता है। लेखक-निर्देशक संजीव शर्मा तीनों के साथ पुरानी दिल्‍ली की उन गलियों में घुसे हैं,जिनसे हिंदी सिनेमा अपरिचित सा रहा है। पुरानी दिल्‍ली के निचले तबके के सात उचक्‍कों की कहानी है यह।
सात उचक्‍के में पुरानी दिल्‍ली की गलियां और गालियां हैं। गालियों की बहुतायत से कई बार आशंका होती है कि कहीं लेखक-निर्देशक स्‍थानीयता के लोभ में असंयमित तो नहीं हो गए हैं। फिल्‍म के सातों उचक्‍कों का कोई भी संवाद गालियों के बगैर समाप्‍त नहीं होता। भाषा की यह खूबी फिल्‍म के आनंद में बाधक बनती है। हां,पुरानी दिल्‍ली की तंग गलियां इस फिल्‍म में अपनी खूबसूरती के साथ हैं। किरदारों के आपसी संबंधों में राजधानी दिल्‍ली का असर नहीं है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे लुम्‍पेन कैरेक्‍टर खत्‍म हो गए हैं। सात उचक्‍के इस वजह से भी असहज करती है। हमें ऐसे रॉ और निम्‍नवर्गीय कैरेक्‍टर देखने की आदत नहीं रही।
फिल्‍म के सातों किरदार उचक्‍के हैं। अपराध की दुनिया में चोरों से निचले दर्जे के अपराधी होते हैं उचक्‍के। इनका काम सामान छीन कर भागना होता है। टूटपुंजिया अपराधियों की यह जमात फिल्‍म में एकजुट होकर एक बड़ी लूट की कोशिश करती है। इस कोशिश में उनसे गलतियां होती हैं और वे लगातार फंसते चले जाते हैं। उनके निजी हित और स्‍वार्थ छोटे हैं। दरअसल,उचक्‍कों का सरगना प्रेम में पड़ गया है। प्रेमिका की मां के सामने अपनी संपन्‍नता जाहिर करने के लिए वह बड़ा अपराध रचता है।
संजीव शर्मा ने पुरानी दिल्‍ली के आम किरदारों की छोटी ख्‍वाहिशों को लेकर सात उचक्‍के का प्रहसन तैयार किया है,जो लक-दक दिल्‍ली की उन गलियों के दर्शन कराती है जो आधुनिकता से दूर आज भी दशकों पुराने शहर में जी रही है। उनके पास आधुनिक चीजें(मोबाइल फोन,कपड़े और दूसरे सामान) आ गए हैं,लेकिन सोच और समझ के स्‍तर पर वे पुराने समय के भंवर में फंसे हैं। फिल्‍म देखते समय उन किरदारों की मासूमियत पर भी हंसी आती है।
मनोज बाजपेयी ने पहली बार कॉमिकल किरदार को निभाया है। वे अपने किरदार के साथ इन गलियों में रच-बस गए हैं। के के मेनन और विजय राज उनका पूरा साथ देते हैं। फिल्‍म में अन्‍नू कपूर और अनुपम खेर भी विशेष भूमिकाओं में हैं। फिल्‍म में कुछ जोड़े बगैर वे अपने दृश्‍यों को निभा ले जाते हैं।
अवधि- 139 मिनट
ढाई स्‍टार

  

Thursday, October 6, 2016

कॉमेडी की है मेरी अपनी परिभाषा - मनोज बाजपेयी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
मनोज बाजपेयी को हाल ही में 7वें जागरण फिल्‍म फेस्टिवल में अलीगढ़ के लिए श्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार मिला है। उनकी सात उचक्‍के रिलीज पर है। इस साल यह उनकी तीसरी फिल्‍म होगी। तीनों फिल्‍मों में वे बिल्‍कुल भिन्‍न भूमिकाओं में दिखे।
- बधाई। 7वें जागरण फिल्‍म फेस्टिवल में श्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार पाने पर आप की क्‍या प्रतिक्रिया है ?
0 मुझे बहुत अच्‍छा लगा। दैनिक जागरण और जागरण फिल्‍म फेस्टिवल से मैं जुड़ा रहा हूं। बेहतरीन सिनेमा के प्रचार-प्रसार में वे बहुत अच्‍छा काम कर रहे हैं। मेरे लिए अलीगढ़ का पुरस्‍कार खास मानी रखता है। दूसरे पुरस्‍कारों में मेनस्‍ट्रीम की फिल्‍मों पर फोकस रहता है। अलीगढ़ जैसी फिल्‍मों को पहचान और पुरस्‍कार मिले तो अच्‍छा लगता है। अलीगढ़ को फस्टिवल सर्किट में काफी सराही गई है। मुझे मिला पुरस्‍कार एक तरीके से प्रोफेसर सिरस का भी सम्‍मान है।
-इस बीच आप की बुधिया सिंह भी सराही गई,लेकिन वह ढंग से दर्शकों के बीच पहुंच नहीं सकी।
0 मुझे भी लगता है कि बुधिया सिंह को सही बैकअप नहीं मिल पाया। उसकी मार्केटिंग में भी दिक्‍कत रही। अगले ही हफ्ते दो बड़ी फिल्‍मों के आने से उसे थिएटर से निकाल दिया गया।
- अभी सात उचक्‍के आ रही है। इस फिल्‍म की चर्चा आप लगातार करते रहे हैं...आप के उत्‍साह की कोई खास वजह?
0 यह अलग ढंग की फिल्‍म है। कहानी कहने का तरीका बिल्‍कुल अलग है। हिंदी में ऐसी फिल्‍में नहीं लिखी गई हैं। लेखक-निर्देशक खास परिवेश और परवरिश से आएं तभी ऐसी फिल्‍में हो पाती हैं। संजीव शर्मा ने इसे लिखा और निर्देशित किया है। पुरानी दिल्‍ली के बारे में तो ढेर सारी फिल्‍में बनी हैं। संजीव शर्मा ने पुरानी दिल्‍ली को नए अंदाज में देखा और चित्रित किया है। उन्‍होंने वहां के किरदारों को खुद ही अचंभित तरीके से देखा है। सात उचक्‍के अनोखी फिल्‍म है।
-यह तो कॉमेडी फिल्‍म है न?
0 जी,यह कामेडी फिल्‍म है,लेकिन इसमें मुंह बिचकाने या किसी पर हंसने का काम नहीं किया गया है। किसी का मजाक नहीं किया गया है। सात उचक्‍के के किरदार अपनी परिस्थितियों में यूं फंसे हैं कि हंसी आती है। मेरा किरदार कभी दबंग रहा है। अभी वह एक लड़की से प्रेम करने लगा है। उसकी जिंदगी नष्‍ट हो रही है। लड़की से शादी करने की कुछ शर्तें उसे पूरी करनी हैं। उन्‍हें पूरा करने के लिए वह दूसरे उचक्‍कों की मदद लेता है।
- पहली बार दर्शक आप को एक कॉमिक रोल में देखेंगे?
0 मैंने कभी कामेडी करने के लिए कामेडी नहीं की। मैं शुरू से स्‍पष्‍ट था कि मुझे क्‍या करना है। सीरियस भूमिकाओं में भी दर्शकों को हंसाने के सीन मिल जाते हैं। अगर मेरी प्रतिक्रिया से किसी को हंसी आती है तो वह मेरे लिए कामेडी है। मेरे लिए ऊलजुलूल हरकत कामेडी नहीं है। हालांकि दूसरों की ऐसी फिल्‍में मुझे अच्‍छी लगती रही हैं।
- आप की पसंद की कामेडी फिल्‍में और कलाकार...
0 मुझे हीरो नंबर 1 में गोविंदा बहुत अच्‍छे लगे थे। पड़ोसन मेरी प्रिय फिल्‍म है। मुझे जाने भी दो यारो अपनी ब्‍लैक कामेडी की वजह से बेहद पसंद है। अच्‍छी ह्यूमरस फिल्‍म का नमूना है वह। फिर से वैसी फिल्‍म नहीं बनी।
- सात उचक्‍के में आप के साथ अनेक उम्‍दा कलाकार है,जो आप के हमखयाल भी हैं...
0 इस तरह की फिल्‍मों के लिए विजय राज बेहद काबिल कलाकार हैं। उनकी टाइमिंग पकड़ पाना किसी दूसरे कलाकार के लिए मुश्किल काम है। उनसे सिर्फ सीखा जा सकता है। मैंने के के और विजय राज से कुछ-कुछ लिया है। इस फिल्‍म में अन्‍नू कपूर निराले अंदाज में हैं। नई लड़की अदिति शर्मा हैं। साथ ही दिल्‍ली के थिएटर के के कलाकर जतिन,नितिन और विपिन है। सभी मंझे हुए कलाकार हैं। मुझे काफी चौकनना रहना पड़ा।

Friday, August 5, 2016

फिल्‍म समीक्षा : बुधिया : बॉर्न टू रन


कथा और व्‍यथा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मयूर पटेल और मनोज बाजपेयी की फिल्‍म बुधिया : बॉर्न टू रन उड़ीसा के बुधिया और बिरंची की कहानी है। फिल्‍म का शीर्षक बुधिया है। वह शिशु नायक है। बुधिया के साथ-साथ बिरंची की भी कहानी चलती है। दो व्‍यक्तियों के परस्‍पर विश्‍वास और संघर्ष की यह कहानी रोमांचक,प्रेरक और मनोरंजक है। सोमेंद्र पाढ़ी ने इसे बड़ यत्‍न से गूंथा है। बॉयोपिक फिल्‍मों के इस दौर में बुधिया... बेहतरीन उदाहरण है। फिल्‍म में ढलने के बावजूद बुधिया और बिरंची का चरित्र नैसर्गिक और आर्गेनिक रहता है। हालांकि बुधिया... को सर्वश्रेष्‍ठ बाल फिल्‍म का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला है,लेकिन यह फिल्‍म सभी उम्र के दर्शकों के लिए है। इस फिल्‍म का गहन दर्द है कि बुधिया के दौड़ने पर आज भी पाबंदी है। वह 2016 के ओलिंपिक में नहीं जा सका। अगर दबाव बढ़े और आवाज उठे तो इस होनहार धावक की प्रतिभा से विश्‍व परिचित हो और देश का भी गौरव बढ़े।
बुधिया... उड़ीसा के पांच साल के बच्‍चे की कहानी है। वह जन्‍मजात धावक है। बचपन में जूडो कोच बिरंची की पारखी नजर उसे भांप लेती है। बिरंची उसे प्रशिक्षित करते हैं और मैराथन दौड़ने में उसे प्रोत्‍साहित करते हैं। छोटी दूरियों से आरंभ उसकी दौड़ पुरी से भुवनेश्‍वर के बीच के 65 किलोमीटर की दूरी नापने के साथ उत्‍कर्ष पर पहुंचती है। उड़ीसा की राज्‍य सरकार और चाइल्‍ड वेलफेयर कमिटी के लोग बिरंची के प्रयास के खिलाफ हैं। बिरंची का प्रदेश के विपक्ष के नेता के साथ खड़ा होना ही स्थितियों को जटिल बना देता है। कहीं न कहीं सत्‍ता पक्ष को लगता है कि इसके पीछे कोई राजनीतिक महात्‍वाकांक्षा होगी। राजनीति के इस दुष्‍चक्र में बुधिया की नैसर्गिक प्रतिभा कुचली जाती है और उसके कोच बिरंची की हत्‍या तक हो जाती है।
सोमेंन्‍द्र पाढ़ी ने बहुत खूबसूरती से बुधिया और बिरंची के चरित्र को प्रस्‍तुत किया है। वे बुधिया को चमत्‍कार से अधिक प्रशिक्षण और अभ्‍यास के परिणाम के रूप में पेश करते हैं। उन्‍होंने सावधानी से बिरंची को गढ़ा है। बिरंची ने उतनी ही सावधानी से बुधिया को निखारा है। दोनों एक-दूसरे से जोश हासिल करते हैं और लगातार कामयाब होते हैं। बिरंची का सपना था कि बुधिया 2016 के ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्‍व करे। उनका वह सपना आज भी अधूरा है,क्‍योंकि राजनीतिक छल-प्रपंच में बुधिया के पांवों पर पाबंदी है। वह भाग पहीं सकता। वह दौड़ नहीं सकता। देश के लिए वह अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का उपयोग नहीं कर सकता। उसे सीमित कर दिया गया है।
सोमेन्‍द्र पाढ़ी को धन्‍यवाद देना होगा कि उन्‍होंने बुधिया और बिरंची की भूमिका के लिए दो याग्‍य कलाकारों का चुना। बुधिया के रूप में मयूर पटेल पांच साल की उम्र के बच्‍चे की भोली,नटखट और नैचुरल भंगिमाओं के साथ मौजूद है। लगता है कि बुधिया ऐसा ही रहा होगा। बिरंची के रूप में मनोज बाजपेयी फिर से अपनी प्रतिभा के नए पहलू से परिचित कराते हैं। मनोज बाजपेयी के बारे में यह लिखना कि वे उम्‍दा कलाकार हैं भी घिसी-पिटी बात लगती है। हिंदी सिनेमा की इस अनोखी प्रतिभा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे अपने किरदार में ढल जाते हैं। संबंधित किरदार में किसी और की कल्‍पना नहीं की जा सकती। यह अहसास भी नहीं आता कि मनोज बाजपेयी की जगह फलां कलाकार होता तो और बेहतर करता। मनोज बाजपेयी ने बिरंची की व्‍यथा को प्रभावशाली तरीके से पेश किया है। फिल्‍म के निर्माता गजराज राव स्‍वयं समर्थ अभिनेता है। उन्‍होंने इपने भावों से फिल्‍म का प्रभाव बढ़ाया है। सहयोगी भूमिकाओं में आए सभी कलाकारों ने उत्‍तम योगदान किया है।
बुधिया:बॉर्न टू रन 2016 की उल्‍लेखनीय फिल्‍म है। जरूरी है कि यह देश के दर्शकों तक पहुंचे और बुधिया और उस जैसी प्रतिभाओं के प्रति जागरूक करे।
अवधि- 112 मिनट
स्‍टार चार स्‍टार ं   

Friday, May 6, 2016

फिल्‍म समीक्षा : ट्रैफिक



स्‍पीड और भावनाओं का रोमांच
-अजय ब्रह्मात्‍मज

मलयालम और तमिल के बाद राजेश पिल्‍लई ने ट्रैफिक हिंदी दर्शकों के लिए निर्देशित की। कहानी का लोकेशन मुंबई-पुणे ले आया गया। ट्रैफिक अधिकारी को चुनौती के साथ जिम्‍मेदारी दी गई कि वह धड़कते दिल को ट्रांसप्‍लांट के लिए निश्चित समय के अंदर मुंबई से पुणे पहुंचाने का मार्ग सुगम करे। घुसखोर ट्रैफिक हवलदार गोडबोले अपना कलंक धोने के लिए इस मौके पर आगे आता है। मुख्‍य किरदारों के साथ अन्‍य पात्र भी हैं,जो इस कहानी के आर-पार जाते हैं।
मलयालम मूल देख चुके मित्र के मुताबिक लेखक-निर्देशक ने कहानी में काट-छांट की है। पैरेलल चल रही कहानियों को कम किया,लेकिन इसके साथ ही प्रभाव भी कम हुआ है। मूल का खयाल न करें तो ट्रैफिक एक रोमांचक कहानी है। हालांकि हम सभी को मालूम है कि निश्चित समय के अंदर धड़कता दिल पहुंच जाएगा,फिर भी बीच की कहानी बांधती और जिज्ञासा बढ़ाती है। फिल्‍म शाब्दिक और लाक्षणिक गति है। हल्‍का सा रहस्‍य भी है। और इन सब के बीच समर्थ अभिनेता मनोज बाजपेयी की अदाकारी है। मनोज अपनी हर भूमिका के साथ चाल-ढाल और अभिव्‍यक्ति बदल देते हैं। मराठी किरदारों का निभाने में वे पारंगत हो चुके हैं। पिछली फिल्‍म अलीगढ़ में भी उन्‍होंने एक मराठी किरदार ही निभाया था। उसकी पृष्‍ठभूमि अलग थी। हम ने भीखू म्‍हात्रे के रूप में भी उन्‍हें देखा है।
ट्रैफिक में भावनाओं की गतिमान लहरें भी हैं। पॉपुलर फिल्‍म स्‍टार की बेटी और बीवी है। उन्‍हें तकलीफ है कि पिता और पति परिवार को पर्याप्‍त समय नहीं दे रहे। किसी की ख्‍याति के साथ अपराध बोध चिपकाने की मध्‍यवर्गीय मानसिकता से हिंदी फिल्‍मों को निकलना चाहिए। करिअर में उलझा व्‍यक्ति कई बार अपनी प्राथमिकता की वजह से दफ्तर और परिवार में संतुलन नहीं बिठा पाता,लेकिन इसके लिए उसे दोषी ठहराना उचित नहीं है। बहरहाल, इस फिल्‍म में स्टार की बेटी को हर्ट ट्रांसप्‍लांट की जरूरत है। पता चलता है कि मुंबई में एक युवा ब्रेन डेड है। अगर उसके माता-पिता राजी हों और उसका हर्ट समय से पुणे पहुंचा दिया जाए तो लड़की की जान बच सकती है। उनकी सहमति मिलने के बाद ट्रैफिक की समस्‍या है। ढाई घंटे में 160 किलोमीटर जाना है।
ट्रैफिक अधिकारी पर नैतिक और राजनीतिक दबाव डाला जाता है। एक दबाव यह भी है कि वह एक्‍टर की लड़की है। क्‍या किसी चपरासी की लड़की के लिए सांसद,डाक्‍टर और ट्रैफिक अधिकारी इतनी आसनी से तैयार होते और राह सुगम करते? बिल्‍कुल नहीं। फिर तो नाटकीयता भी नहीं आ पाती। सहानुभूति पैदा नहीं होती। हिंदी फिल्‍मों में प्रभावशाली किरदारों और उनकी तकलीफों की ही कहानियां इन दिनों कही जा रही है। फिल्‍म संवेदना के स्‍तर पर टच करती है,क्‍योंकि किसी की जान का माला है। अपना जवान बेटा खोने की घटना है। और भी कथाप्रसंग हैं।
इस फिल्‍म सराहनीय है,क्‍योंकि अलग किस्‍म के विषय को संवेदनशील तरीके से पेश करती है। फिल्‍म में रियल टाइम में ही सारी घटनाएं घटती हैं। इस सिनेमाई रियलिज्‍म से फिल्‍म अपने करीब की लगती है। लेखक और निर्देशक अतिनाटकीयता से बचे हैं। सिनेमैटोग्राफर संतोष थुंडिल ने घटनाओं और भावनाओं की गति को समान स्‍पीड में पेश किया है। हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित लटके-झटकों से अलग ट्रैफिक इमोशनल थ्रिलर है। यह फिल्‍म दो किरदारों को प्रायश्चित करने और दूसरे दो किरदारों को स्थितियों को समझने और स्‍वीकार करने की जमीन देती है।
अवधि-104 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार

Tuesday, May 3, 2016

हारने की हिम्‍मत है - मनोज बाजपेयी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
मनोज बाजपेयी की पिछली फिल्‍म अलीगढ़ से मिल रही तारीफ का सिलसिला अभी खत्‍म भी नहीं हुआ कि उनकी अगली फिल्‍म ट्रैफिक का ट्रेलर आ गया। उन्‍होंने पिछली मुलाकात में कहा था कि उनकी तीन फिल्‍में तैयार हैं। वे रिलीज के विभिन्‍न चरणों में हैं। मनोज बाजपेयी ने अपनी व्‍यस्‍तता और पसंद का तरीका चुन लिया है। वे चुनिंदा फिल्‍मों में काम करते हैं। वे कहते हैं कि कोई भी फिल्‍म करने से बेहतर घर में बेकार बैठना है। यह पूछने पर कि क्‍या यह बात लिखी जा सकती है? वे बेधड़क कहते हैं,क्‍यों नहीं? सच्‍चाई लिख देने में क्‍या दिक्‍कत है?’
हमारी बातचीत ट्रैफिक पर होती है। इस फिल्‍म के ट्रेलर में वे बिल्‍कुल अलग भूमिका में नजर आ रहे हैं। फिल्‍म के बारे में वे बताते हैं, इस फिल्‍म में जीवन बचाने का संघर्ष है। इस संघर्ष के साथ अनेक जिंदगियां जुड़ी हुई हैं। मैं ट्रैफिक में एक र्टैफिक हवलदार का रोल कर रहा हूं। जिंदगी में उसने केवल एक गलती की है,जिसका वह पश्‍चाताप कर रहा है। हिंदी में आ रही यह फिल्‍म पहले मलयालम और तमिल में बन चुकी है। दोनों ही भाषाओं में यह फिल्‍म खूब चली है। फिल्‍म के निर्देशक राजेश पिल्‍लई हैं,जिनका हाल ही में देहांत हुआ। उन्‍होंने मूल मलयालम फिल्‍म का भी निर्देशन किया था।
राजेश पिल्‍लई को याद करते हुए मनोज बाजपेयी अफसोस जाहिर करते हैं, यह फिल्‍म कुछ समय पहले बन कर तैयार हो गई थी। राजेश के जीते जी अगर फिल्‍म रिलीज हो गई होती तो हम सभी को अधिक खुशी होती। किसने साचा था कि उनकी अकाल मृत्‍यु हो जाएगी। राजेश की उम्र अभी केवल चालीस साल थी। वे बहुत ही मिलनसार और काम के लिए तत्‍पर व्‍यक्ति थे। मैंने उन्‍हें आराम करते नहीं देखा। राजेश ही मेरे पास फिल्‍म लेकर आए थे। मैाने इस तरह की फिल्‍म पहले नहीं की थी। मुझे यह आयडिया अच्‍छा लगा कि कई सारे कलाकार रहेंगे। सभी के किरदार महत्‍वपूर्ण होंगे। मैं इसे थ्रिलर नहीं कहूंगा। हां,अगर फिल्‍म देखते हुए रोमांच आए तो अच्‍छा रहेगा। यह देखना है कि चार व्‍यक्तियों की जद्दोजहद एक व्‍यक्ति की जान बचा पाती है कि नहीं? मेरे साथ दिव्‍या,जिमी शेरगिल,प्रसेनजीत चटर्जी,अमोल पाराशर आदि हैं। मूल मलयालम में यह कोच्चि से त्रिवेंद्रम के बीच की कहानी है। हिंदी में इसे पुणे और मुंबई के बीच रखा गया है। क्षेत्र के हिसाब से किरदार भी बदले गए हैं।
अलीगढ़ के लिए मिली तारीफ से संतुष्‍ट मनोज बाजपेयी अपनी खुशी छिपा नहीं पाते। वे बताते हैं, हंसल मेहता ने जिस उद्देश्‍य से फिल्‍म बनाई थी,वह पूरी हुई। इस फिल्‍म ने मुझे किसी और फिल्‍म से ज्‍यादा इज्‍जत दी। परफारमेंस तो अपनी जगह है। यह खास कॉज और पर्सनैलिटी की फिल्‍म थी। सभी ने इसे मेरा और हंसल मेहता का साहसिक कदम कहा। अभिनेता होना अच्‍छी बात है। अच्‍छा अभिनेता होना और भी अच्‍छी बात है,लेकिन मुझे लगता है कि अभिनय के साथ अभिनेता साहसिक कदम उठाएं तो चीजों की रुपरेखा बदलेगी। बने बनाए ढरें पर चलते रहेंगे तो सिनेमा आगे कैसे जाएगा?’
मनोज आगे बताते हैं,कुछ लोग इस बात की तारीफ कर रहे हैं कि मैंने 60 साल के व्‍यक्ति का रोल बहुत अच्‍छी तरह निभाया। मैा बताना चाहूंगा कि थिएटर में 24 साल की उम्र में मैंने 62 साल के बुजुर्ग की भूमिका निभाई थी। उसे सभी ने सराहा था। मैं आने करिअर में हारने के लिए तैयार रहता हूं। मैं साहसी अभिनेता हूं। एक जज्‍बा बरकरार है।मुझे लगता है कि अगर जीवन के अंत में ये सारे मोड़ मेरे नाम से जुड़ेंगे तो मुझे ज्‍यादा संतुष्टि होगी।
ट्रैफिक के निर्देशक राजेश पिल्‍लई को वे याद करते हैं,मैं उन्‍हें बहुत मिस कर रहा हूं। मैं यकीन नहीं कर पा रहा हूं। अजीब सी फीलिंग होती है कि जिस व्‍यक्ति के साथ आप उठते-बैठते हों,वह अचानक उठ जाता है। मैं मान नहीं पा रहा हूं कि वे कभी नहीं दिखेंगे। एक उदासी है। काम के प्रति ईमानदार राजेश में कुछ नया करने की चाहत थी। वह जीवन अचानक कट गया। यह फिल्‍म आठ महीने पहले रिलीज होने वाली थी। यह दुख तो रहेगा कि वे अपनी फिल्‍म थिएटर में नहीं देख पाए। इस फिल्‍म के बारे में डायरेक्‍टर की बात कहीं नहीं छपेगी या दिखेगी। यह बहुत बड़ी कमी रहेगी।
बेलीक चलने की बेचैनी है मनोज बाजपेयी के अंदर। वे लगातार अपने अभिनय से दर्शकों को चौंकाते हैं। उनकी छवि समर्थ अभिनेता की है। इस बेचैनी की वजह बतात हैं मनोज, मैं बचपन से लीक पर नहीं चला हूं। मैंने हमेशा प्रयोग किया। मैंने वही काम किया,जिसके लिए मना किया गया। मेरे अंदर एक बागी है। मैं अपनी बगावत अभिनय के जरिए जाहिर करता हूं। मैं लेखक नहीं हूं। वर्ना शब्‍दों में लिखता। सत्‍या करने के बाद मैाने जैसी फिल्‍में की,उसके लिए मेरी निंदा हुई। फिर भी मैं नई राह चुनता रहा। अभी तो मेरे साथ मेरे सरीखे अभिनेताओं का झुंड है। रामगोपाल वर्मा के बाद आए निर्देशकों ने उन्‍हें काम दिया है। कोई भी कोशिश बेकार नहीं जाती। बदलाव की यह सतत प्रक्रिया है।
मनोज बाजपेयी ने अपनी पीढ़ी के निर्देशकों में इम्तियाज अली और विशाल भारद्वाज के साथ फिल्‍में नहीं कीं। क्‍या वजह हो सकती है? मनोज अपनी बात कहते हैं, इम्तियाज के साथ मैाने सीरियल किया है। वे जिस तरह की फिल्‍में बनाते हैं,उनमें मेरे लिए जगह नहीं हो सकती। वे यंग एक्‍टर के साथ काम करते हैं। विशाल के बारे में क्‍या कहूं? मैं उनके साथ उनकी पहली फिल्‍म बर्फ कर रहा था। तब वे संगीत निर्देशक थे। मैंने उनसे 25 से 40 बार कहा,लेकिन उन्‍होंने अनसुना किया। यही कह सकता हूं कि उनकी इच्‍छा नहीं होती हो मेरे साथ काम करने की। यह भी हो सकता है कि वे कोई फिल्‍म लेकर आ जाएं या बुलाएं। युवा निर्देशकों में मनोज बाजपेयी नीरज घेवन के साथ काम करना चाहते हैं। उनकी पिछली फिल्‍म मसान में संजय मिश्रा वाली भूमिका पहले मनोज ही कर रहे थे,लेकिन प्रोड्यूसर से बात नहीं बनी। उनकी सूची में वासन बाला और देवाशीष मखीजा भी हैं।

Saturday, April 23, 2016

रिश्‍ते संजो कर रखते हैं मनोज बाजपेयी



-अविनाश दास 
हिंदी सिने जगत उन चंद फिल्‍मकारों व कलाकारों का शुक्रगुजार रहेगा, जिन्‍होंने हिंदी सिनेमा का मान दुनिया भर में बढ़ाया है। मनोज बाजपेयी उन्हीं चंद लोगों में से एक है। 23 अप्रैल को उनका जन्‍मदिन है। पेशे से पत्रकार और मशहूर ब्‍लॉग ‘मोहल्ला लाइव’ के कर्ता-धर्ता रह चुके अविनाश दास उन्हें करीब से जानते हैं। अविनाश अब सिने जगत में सक्रिय हैं। उनकी फिल्‍म ‘अनारकली आरावाली’ इन गर्मियों में आ रही है। बहरहाल, मनोज बाजपेयी के बारे में अविनाश दास की बातें उन्हीं की जुबानी :   
-अविनाश दास

1998 में सत्‍या रिलीज हुई थी। उससे एक साल पहले मनोज वाजपेयी पटना गए थे। वहां उनकी फिल्‍म तमन्‍ना का प्रीमियर था। साथ में पूजा भट्ट थीं। महेश भट्ट भी थे। जाहिर है प्रेस कांफ्रेंस होना था। जाड़े की सुबह दस बजे मौर्या होटल का कांफ्रेंस हॉल पत्रकारों से भरा हुआ था। बहुत सारे सवालों के बीच एक सवाल पूजा भट्ट से मनोज वाजपेयी के संभावित रोमांस को लेकर था। लगभग दस सेकंड का सन्‍नाटा पसर गया। फिर अचानक मनोज उठे और सवाल पूछने वाले पत्रकार को एक ज़ोरदार थप्‍पड़ लगा दिया। अफरा-तफरी मच गयी। कांफ्रेंस हॉल दो खेमों में बंट गया। महेश भट्ट ने आगे बढ़ कर मामले को शांत किया। यह पूरा दृश्‍य मेरे ज़ेहन में आज भी तैरता रहता है। आज भी मैं मनोज वाजपेयी के साथ बैठ कर उनका हाथ देखता रहता हूं और सतर्क रहता हूं।

बैंडिट क्‍वीन से अलीगढ़ तक की यात्रा में मनोज वाजपेयी ने फिल्‍मी उतार-चढ़ाव के कई रंग देखे हैं। ये तमाम रंग उनकी शख्‍सियत को उस मूल-मंत्र से डिगा नहीं सके, जो उन्‍हें थिएटर के दिनों में मिला था। वह यह कि अभिनय को उस किसान की तरह देखो, जिसकी आंखों में फसल की उम्‍मीद होती है और पसीने में मेहनत, मिट्टी और नमक की खुशबू।

मनोज बिहार में चंपारण के एक ठेठ गांव में पैदा हुए। वहीं पले-बढ़े भी। गांव के उनके घर से सिर्फ पांच-सात मिलोमीटर की दूरी पर गांधी का भितिहरवा आश्रम है। निजी बातचीत में अक्‍सर मनोज को मैंने मनुष्‍यता की बड़ी परिधि पर सामाजिक-राजनीतिक बातें करते हुए देखा है। उन बातों में गांधीवादी आग्रह की एक बारीक सी परत तैरती रहती है। दो साल पहले मनोज के साथ गांव जब मैं उनके गांव गया, तो लोगों से मिल कर उनकी दुख-तकलीफ में शामिल होने का उनका शगल देखा। यह उनकी जिंदगी का वह पहलू है, जो आमतौर पर सफल अभिनेताओं में देखने को नहीं मिलता।

पहले हमारी मुलाकात अक्‍सर दिल्‍ली में हुआ करती थी, जब मनोज आते थे। मैं टीवी में था। हर बार दो दिनों में दस से अधिक लोगों से मिलने का टार्गेट रहता था। ये वे लोग होते थे, जो थिएटर के दिनों में उनके संगी-साथी थे। जब आप सार्वजनिक जिंदगी में होते हैं, तो रोज़ नये रिश्‍ते बनते हैं। ऐसे में सहज रूप से पुराने रिश्‍ते छूटते चले जाते हैं -लेकिन मनोज को उन रिश्‍तों से अपनी पहचान को अलग करते हुए नहीं देखा। नये-पुराने तमाम रिश्‍तों से संवाद की निरंतरता में उनका भरोसा है। गुलज़ार की इन पंक्तियों की तरह, ‘’हाथ छूटे भी तो रिश्‍ते नहीं छोड़ा करते, वक्‍त की शाख से लम्‍हें नहीं तोड़ा करते।‘’

छोटे शहरों या गांवों से आने वाले तमाम संघर्षशील लोगों के लिए मनोज एक प्रेरक व्‍यक्तित्‍व हैं - लेकिन सिर्फ प्रेरणा ही किसी को मनोज जैसा बनने के लिए आसान राह नहीं दे सकती। बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जो मनोज वाजपेयी हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्‍होंने कितनी हाड़-तोड़ मेहनत की है। जिस नेटुआ नाटक से उन्‍होंने दिल्‍ली में एक समर्थ रंग-अभिनेता के बतौर अपनी पहचान स्‍थापित की, उस नेटुआ की तैयारी का किस्‍सा बताते हुए वे अक्‍सर कहते हैं कि उन दिनों सिर्फ दो-तीन घंटे सोते थे और अठारह-अठारह घंटे नृत्‍य का अभ्‍यास किया करते थे। उनके उन दिनों के मित्र भी इस तथ्‍य की तस्‍दीक़ करते हैं।

हसरतों से भरी हुई झोली लेकर बिहार से मुंबई में आना वाला हर आदमी मदद की भरी-पूरी उम्‍मीद के साथ उनसे मिलना चाहता है। बहुतों की मुलाकात हो जाती है और मैंने अनजान लोगों के लिए काम की संभावनाओं पर बात करते हुए मनोज वाजपेयी को देखा है। न सिर्फ बिहार के लोगों के लिए, बल्कि देश के किसी भी कोने से आने वाले लोगों के लिए।

एक बात, जो मुझे यहां लिखनी चाहिए या नहीं, नहीं जानता, पर बात है तो बतायी जानी चाहिए। मनोज की एक बहन दिल्‍ली में रहती हैं। उन्‍होंने एक बार मुझे फोन किया और कहा कि वे फिल्‍मों में कॉस्‍ट्यूम डिज़ाइनिंग का काम करना चाहती हैं। मैंने मनोज से बात की। उन्‍होंने कहा कि उसे आकर संघर्ष करना चाहिए और अपनी प्रतिभा और अपने हुनर से संघर्ष का सफर तय करना चाहिए। यह बात मनोज ने ऐसे समय में कही, जब परिवारवाद का वर्चस्‍व ज्‍यादातर क्षेत्रों में सर चढ़ कर बोल रहा है।

मनोज के बारे में एक बड़ी अच्‍छी बात मैं बताना चाहता हूं। जब भी कोई निर्देशक उनके पास अपनी फिल्‍म की कहानी लेकर जाता है, वे विनम्रतापूर्वक आग्रह करते हैं कि उन्‍हें पटकथा हिंदी में पढ़ने को दी जाए। हिंदी सिनेमा जगत में आमतौर पर पटकथा अंग्रेज़ी में लिखने का चलन है - लेकिन मनोज के पास मैंने ज़्यादातर पटकथाएं हिंदी में देखी हैं। यह हिंदी के लिए किसी भी किस्‍म के गौरव से ज्‍यादा एक अभिनेता की भाषा के प्रति एक सजग संवेदनशीलता दिखाता है।

नये किस्‍म के प्रयोगों को लेकर वे उत्‍साहित रहते हैं। चाहे ये प्रयोग सिनेमा के मोर्चे पर हो या जीवन के मोर्चे पर हो। पिछले दिनों तीन लघु फिल्‍मों में उन्‍होंने अभिनय किया। वे छोटी जगहों पर भी अच्‍छे विषय पर बातचीत वाली गोष्ठियों में उत्‍साह से जाते हैं और बड़े शहरों के चमकीले सभा-सेमिनारों से कन्‍नी काटते रहते हैं। उनका घर हिंदी-मुस्लिम एकता का खूबसूरत प्रतीक चिन्‍ह जैसा है, जहां एक ही जगह पर हम कुरान और गीता को साथ-साथ रखा हुआ पाते हैं। मनोज अपनी पत्‍नी शबाना रजा और बेटी आवा नायला बाजपेयी के संग खुशहाल जीवन जी रहे हैं। 

Friday, February 26, 2016

फिल्‍म समीक्षा : अलीगढ़



साहसी और संवेदनशील
अलीगढ़
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता की अलीगढ़ उनकी पिछली फिल्‍म शाहिद की तरह ही हमारे समकालीन समाज का दस्‍तावेज है। अतीत की घटनाओं और ऐतिहासिक चरित्रों पर पीरियड फिल्‍में बनाना मुश्किल काम है,लेकिन अपने वर्त्‍तमान को पैनी नजर के साथ चित्रबद्ध करना भी आसान नहीं है। हंसल मेहता इसे सफल तरीके से रच पा रहे हैं। उनकी पीढ़ी के अन्‍य फिल्‍मकारों के लिए यह प्रेरक है। हंसल मेहता ने इस बार भी समाज के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के व्‍यक्ति को चुना है। प्रोफेसर सिरस हमारे समय के ऐसे साधारण चरित्र हैं,जो अपनी निजी जिंदगी में एक कोना तलाश कर एकाकी खुशी से संतुष्‍ट रह सकते हैं। किंतु हम पाते हैं कि समाज के कथित संरक्षक और ठेकेदार ऐसे व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देते हैं। उन्‍हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं। उन्‍हें शर्मसार किया जाता है। प्रोफेसर सिरस जैसे व्‍यक्तियों की तो चीख भी नहीं सुनाई पड़ती। उनकी खामोशी ही उनका प्रतिकार है। उनकी आंखें में उतर आई शून्‍यता समाज के प्रति व्‍यक्तिगत प्रतिरोध है।
प्रोफेसर सिरस अध्‍ययन-अध्‍यापन से फुर्सत पाने पर दो पैग ह्विस्‍की,लता मंगेशकर गानों और अपने पृथक यौन व्‍यवहार के साथ संतुष्‍ट हैं। उनकी जिंदगी में तब भूचाल आता है,जब दो रिपोर्टर जबरन उनके कमरे में घुस कर उनकी प्रायवेसी को सार्वजनिक कर देते हैं। कथित नैतिकता के तहत उन्‍हें मुअत्‍तल कर दिया जाता है। उनकी सुनवाई तक नहीं होती। बाद में उन्‍हें नागरिक अधिकारों से भी वंचित करने की कोशिश की जाती है। उनकी अप्रचारित व्‍यथा कथा से दिल्‍ली का युवा और जोशीला रिपोर्टर चौंकता है। वह उनके पक्ष से पाठकों को परिचित कराता है। साथ ही प्रोफेसर सिरस को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करता है। प्रोफेसर सिरस बेमन से कोर्ट में जाते हैं। तब के कानूनी प्रावधान से उनकी जीत होती है,लेकिन वे जीत-हार से आगे निकल चुके हैं। वे सुकून की तलाश में बेमुरव्‍वत जमाने से चौकन्‍ने और चिढ़चिढ़े होने के बावजूद छोटी खुशियों से भी प्रसन्‍न होना जानते हैं।
पीली मटमैली रोशनी और सांवली छटा के दृश्‍यों से निर्देशक हंसल मेहता प्रोफेसर सिरस के अवसाद को पर्दे पर बखूबी उतारते हैं। उन्‍होंने उदासी और अवसन्‍न्‍ता को अलग आयाम दे दिया है। पहले दृश्‍य से आखिरी दृश्‍य तक की फीकी नीम रोशनी प्रोफेसर सिरस के अंतस की अभिव्‍यक्ति है। हंसल मेहता के शिल्‍प में चमक और चकाचौंध नहीं रहती। वे पूरी सादगी से किरदारो की जिंदगी में उतरते हैं और भावों का गागर भर लाते हैं।दरअसल,कंटेंट की एकाग्रता उन्‍हें फालतू साज-सज्‍जा से बचा ले जाती है। वे किरदार के मनोभावों और अंतर्विरोधों को कभी संवादों तो कभी मूक दूश्‍यों से जाहिर करते हैं। इस फिल्‍म में उन्‍होंने मुख्‍य कलाकारों की खामोशी और संवादहीन अभिव्‍यक्ति का बेहतरीन उपयोग किया है। वे प्रोफेसर सिरस का किरदार गढ़ने के विस्‍तार में नहीं जाते। शाहिद की तरह ही वे प्रोफेसर सिरस के प्रति दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उनके किरदार हम सभी की तरह परिस्थितियों के शिकार तो होते हैं,लेकिन वे बेचारे नहीं होते। वे करुणा पैदा करते हैं। दया नहीं चाहते हैं। वे अपने तई संघर्ष करते हैं और विजयी भी होते हैं,लेकिन कोई उद्घोष नहीं करते। बतौर निर्देशक हंसल मेहता का यह संयम उनकी फिल्‍मों का स्‍थायी प्रभाव बढ़ा देता है।
अभिनेताओं में पहले राजकुमार राव की बात करें। इस फिल्‍म में वे सहायक भूमिका में हैं। अमूमन थोड़े मशहूर हो गए कलाकार ऐसी भूमिकाएं इस वजह से छोड़ देते हेंकि मुझे साइड रोल नहीं करना है। अलीगढ़ में दीपू का किरदार निभा रहे राजकुमार राव ने साबित किया है कि सहायक भूमिका भी खास हो सकती है। बशर्ते किरदार में यकीन हो और उसे निभाने की शिद्दत हो। राजकुमार के लिए मनोज बाजपेयी के साथ के दृश्‍य चुनौती से अघिक जुगलबंदी की तरह है। साथ के दृश्‍यों में दोनों निखरते हैं। राजकुमार राव के अभिनय में सादगी के साथ अभिव्‍यक्ति का संयम है। वे एक्‍सप्रेशन की फिजूलखर्ची नहीं करते। मनोज बाजपेयी ने फिर से एक मिसाल पेश की है। उन्‍होंने जाहिर किया है कि सही स्क्रिप्‍ट मिले तो वे किसी भी रंग में ढल सकते हैं। उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के एकाकीपन को उनकी भंगुरता के साथ पेश किया है। उनकी चाल-ढाल में एक किस्‍म का अकेलापन है। मनोज बाजपेयी ने किरदार की भाव-भंगिमा के साथ उसकी हंसी,खुशी और उदासी को यथोचित मात्रा में इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने अभिनय का मापदंड खुद के साथ ही दूसरों के लिए भी बढ़ा दिया है। उन्‍होंने यादगार अभिनय किया है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में वे कविता की तरह संवादों के बीच की खामोशी में अधिक एक्‍सप्रेसिव होते हैं।
निश्चित ही यह फिल्‍म समलैंगिकता के प्रश्‍नों को छूती है,लेकिन यह कहीं से भी उसे सनसनीखेज नहीं बनाती है। समलैंगिकता इस फिल्‍म का खास पहलू है,जो व्‍यक्ति की चाहत,स्‍वतंत्रता और प्रायवेसी से संबंधित है। हिंदी फिल्‍मों में समलैंगिक किरदार अमूमन भ्रष्‍ट और फूहड़ तरीके से पेश होते रहे हैं। ऐसे किरदारों को साधरण निर्देशक मजाक बना देते हैं। हंसल मेहता ने पूरी गंभीरता बरती है। उन्‍होंने किरदार और मुद्दा दोनों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। लेखक अपूर्वा असरानी की समझ और अपनी सोच से उन्‍होंने समलैंगिकता और सेक्‍शन 377 के प्रति दर्शकों की समझदारी दी है। अलीगढ़ साहसिक फिल्‍म है।
अवधि- 120 मिनट
स्‍टार- साढ़े चार स्‍टार