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Showing posts from June, 2008

प्रोड्यूसर आमिर खान काफी एक्टिव हो गए हैं

मैं जाने तू ... का पहला निर्माता नहीं हूं। इसे पहले जामू सुगंध बना रहे थे। मुझे मालूम था कि इमरान अब्बास की फिल्म कर रहे हैं। उस समय मैंने इमरान से केवल इतना ही पूछा था कि क्या आपको अब्बास और फिल्म की कहानी पसंद है? उन्होंने हां कहा तो मैंने कहा कि जरूर करो। उस वक्त जामू सुगंध आर्थिक संकट से गुजर रहे थे। उन्होंने तीन फिल्में की घोषणा की थी। दो की शूटिंग भी आरंभ हो गई थी, लेकिन वे उन्हें बना नहीं पाए। जाने तू ... अभी शुरू नहीं हुई थी। तब अब्बास मेरे पास प्रोजेक्ट लेकर आए और पूछा कि क्या आप इसे प्रोडयूस करना चाहेंगे। मैंने कहानी सुनी तो कहानी अच्छी लगी। तब तक अब्बास फिल्म के चार गाने रहमान के साथ रिकॉर्ड कर चुके थे। वे गाने भी मुझे पसंद आए। फिर मैंने अब्बास से कहा कि पांच-छह सीन शूट कर के दिखाओ। उन्होंने कुछ सीन शूट किए। वे भी मुझे पसंद आए। मुझे विश्वास हुआ कि अब्बास फिल्म कर पाएंगे। फिर मैंने इमरान का स्क्रीन टेस्ट देखा। हर तरह से संतुष्ट हो जाने पर मैंने फिल्म प्रोडयूस करने का फैसला किया। जाने तू ... बनाने का मेरा फैसला पूरी तरह से गैरभावनात्मक था। ऐसा नहीं था कि इमरान के लिए फिल्म बना

किरण राव ने बनायी अलग प्रोडक्शन कंपनी

आमिर खान की पत्नी किरण राव ने सिनेमा 73 नाम से अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बनायी है। वह अपनी पहली फिल्म इसी बैनर तले बनाएंगी। निर्देशन में आशुतोष गोवारीकर की सहायक रह चुकी किरण राव आमिर खान से शादी करने के बाद से सुर्खियों में रही हैं। आमिर खान से उनकी शादी के बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि वह आमिर खान प्रोडक्शन के लिए किसी फिल्म का निर्देशन कर सकती हैं, जिसमें स्वाभाविक रूप से आमिर खान होंगे। आमिर खान ने इन सभी कयासों पर विराम लगाते हुए स्पष्ट कहा कि किरण ने अपनी कंपनी खड़ी कर ली है और वह उसी बैनर से फिल्म बनाएंगी, जिसमें उनके होने की संभावना नहीं है। हैदराबाद में गजनी की शूटिंग कर रहे आमिर खान ने खास बातचीत में किरण की फिल्म की घोषणा के बारे में पूछने पर कहा, किरण ने सिनेमा 73 नाम की कंपनी बनायी है। वह अपने बैनर तले एक छोटी फिल्म बनाना चाहती हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट उन्होंने स्वयं लिखी है और वह खुद इसे निर्देशित करेंगी। मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी है। मुझे वह फिल्म पसंद आई। किरण की फिल्म में स्वाभाविक रूप से आमिर खान तो होंगे ही? इस सवाल पर हंसते हुए आमिर खान ने कहा कि अभी तक तो मैं नहीं ह

ठंडी और सपाट 'वाया दार्जिलिंग'

-अजय ब्रह्मात्मज खुशी इस बात की है एनएफडीसी की फिल्म नियमित सिनेमाघरों में रिलीज हुई, लेकिन गम इस बात का है कि एनएफडीसी की फिल्म अभी तक अपने ढर्रे से बाहर नहीं निकल सकी है। अरिंदम नंदी शिल्प, कथ्य और प्रस्तुति में कला फिल्मों के नाम पर बदनाम हो चुकी शैली में जकड़े हुए हैं। वाया दार्जिलिंग आखिरकार निराश करती है।हनीमून के लिए दार्जिलिंग गए नवदंपती में से पति लौटने के दिन गायब हो जाता है। मामले की तहकीकात कर रहे पुलिस अधिकारी राबिन रहस्य की तह तक नहीं पहुंच पाते। सालों बाद दोस्तों की महफिल में वह उस घटना की बातें करते हैं। वहां मौजूद दूसरे दोस्त उस घटना के कारण और परिणाम की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। एक ही घटना के चार अंत सुनाए और दिखाए जाते हैं।अरिंदम नंदी ने रोशोमन से मशहूर हुई एक कहानी अनेक अंत की शैली तो अपना ली है, लेकिन अपनी अनेकता में वह रोचकता नहीं बनाए रख पाते। हर व्याख्या में कुछ खामियां और कमियां हैं, जिनके कारण रहस्य कौतूहल पैदा नहीं करता। फिल्म की मूल कहानी में गति और रोचकता है, लेकिन व्याख्याओं का चित्रण बिल्कुल ठंडा और सपाट है। केके मेनन, रजत कपूर और विनय पाठक जैसे एक्टर भी

थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक:और परी को प्यार हो गया

थोडा प्यार, थोडा मैजिक चौंके नहीं। पर्दे पर फिल्म का नाम हिंदी में ऐसे ही आता है- थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक। ड के नीचे बिंदी लगाना पब्लिसिटी डिजाइनर भूल गया और हमारे निर्माता-निर्देशकों का हिंदी ज्ञान इतना नहीं होता कि वे ड और ड़ का फर्क समझ सकें। प्रसंगवश पिछले दिनों पांचवी पास के एक इवेंट में किंग खान शाहरुख भी पढ़ो को पढो लिखते पाए गए थे। बहरहाल, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक रोचक फिल्म है। इस तरह की फिल्में हम पहले भी देख चुके हैं। विदेशों में कई फिल्में इस विधा में बनी हैं। उनमें से कुछ के दृश्य तो थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक में भी लिए गए हैं। मौलिकता की शर्त थोड़ी ढीली करने के बाद फिल्म देखें तो मजा आएगा। रणबीर तलवार के जीवन की एक दुर्घटना उनके वर्तमान और भविष्य को बदल देती है। उनकी गलती से एक दंपती की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है। जज महोदय अनोखा फैसला सुनाते हैं, जिसके तहत मृत दंपती के चारों बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी रणबीर को सौंप दी जाती है। रणबीर और चारों बच्चों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। स्थिति यह आती है कि दोनों ही पक्ष भगवान से कुछ करने की गुहार लगाते हैं। थ्री पीस सूट और फ्

वेब दुनिया पर चवन्नी चैप

चवन्नी चैप, फिल्मों पर बढ़िया खेप -रवींद्र व्यास हिंदी में फिल्मों पर बेहतर साहित्य का अभाव है। यदि आप हिंदी पत्रिकाओं-अखबारों पर सरसरी निगाह ही डालेंगे तो पाएँगे कि यहाँ किसी भी फिल्म पर औसत दर्जे के चलताऊ किस्म के लेख ज्यादा मिलेंगे। इनका स्वाद भी कुछ-कुछ चटखारेदार होता है। उसमें फूहड़ किस्म की टिप्पणियाँ होती हैं और जो जानकारियाँ दी जाती हैं उनमें अधिकांश में गॉसिप होते हैं। फिल्म समीक्षाओं का लगभग टोटा है। जो समीक्षाएँ छपती हैं उनमें आधी से ज्यादा जगह कहानी घेर लेती है। बचे हिस्से में कुछ सतही पंक्तियाँ भर होती हैं जैसे- संगीत मधुर है और फोटोग्राफी सुंदर है। अभिनय ठीक-ठाक है। लेकिन इस परिदृश्य में कुछ फिल्मी पत्रकार हैं, जो फिल्मों पर औसत दर्जे से थोड़ा ऊपर उठकर कुछ बेहतर लिखने की कोशिश करते हैं। यदि फिल्मों पर आपको ठीकठाक लेख या टिप्पणियाँ पढ़ना हो तो आपके लिए अजय ब्रह्मात्मज का ब्लॉग चवन्नी चैप एक बेहतर विकल्प हो सकता है। कई लोग उनके इस ब्लॉग का नाम चवन्नी छाप लिखते हैं लेकिन इसकी पोस्ट्स पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कतई चवन्नी छाप नहीं है। फिल्मों में दिलचस्पी रखने वाले

सम्राट अशोक के रूप में दिखेंगे अमिताभ

-अजय ब्रह्मात्मज रिलाएंस बिग एंटरटेनमेंट और बिग बी की कंपनी एबी कॉर्प के बीच हुए 1500 करोड़ केसंयुक्त निर्माण की खबरों में जिन चार निर्देशकों का नाम आया है, उनमें से एक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं। डॉ द्विवेदी अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म में सम्राट अशोक के रूप में पेश करेंगे। पीरियड सीरियल और फिल्म के लिए मशहूर डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने नयी फिल्म केलिए मौर्य काल को चुना है। उनके करीबी सूत्रों के मुताबिक फिल्म में पिता अशोक और पुत्र कुणाल के संबंधों के साथ ही कुणाल की सौतेली मां तिष्यरक्षिता की कहानी रहेगी। डॉ द्विवेदी ने इस फिल्म का लेखन लगभग पांच साल पहले आरंभ किया था,लेकिन बीच में पिंजर में व्यस्त हो जाने के कारण उसे रोक दिया था। डॉ द्विवेदी के एक मित्र के मुताबिक विश्व भर में फैले आतंकवाद, घृणा, युद्ध और हिंसा के माहौल के खिलाफ इस फिल्म की कल्पना की गई थी। सभी जानते हैं कि कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक बौद्ध हो गए थे। इस फिल्म में दया, करुणा, क्षमा और मैत्री के भाव पर जोर है। सम्राट अशोक के जीवन की एक महत्वपूर्ण नाटकीय घटना पर आधारित इस फिल्म की का संदेश आज के लिए प्रासंगिक और उपयु

फिल्मी कारोबार खुले हैं नए द्वार

-अजय ब्रह्मात्मज अभी तक हम यही जानते और मानते हैं कि फिल्में यदि बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करतीं, तो निर्माता घाटे में रहता है और इसीलिए उक्त फिल्म से जुड़े स्टारों का बाजार भाव गिर जाता है। यह सच जरूर है, लेकिन फिल्मों के व्यापक कारोबार का यह पूरा सच नहीं है। इन दिनों फिल्मों की कमाई के कई नए द्वार खुल गए हैं। आमतौर पर हिंदी फिल्मों का निर्माता अगर अपनी फिल्म रिलीज कर लेता है, तो वह नुकसान में नहीं रहता। तत्काल वह फायदे में भले ही नहीं दिखे, लेकिन एक अंतराल में वह निवेशित राशि निकाल ही लेता है। इसीलिए लगातार फ्लॉप हो रहीं फिल्मों के बावजूद निर्माता नई फिल्मों की घोषणाएं करते ही रहते हैं। दरअसल, पहले बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ही फिल्मों की आय का मुख्य जरिया था, क्योंकि फिल्में 25 हफ्तों और 50 हफ्तों तक सिनेमाघरों में टिके रहने के बाद निर्माताओं और स्टारों के चेहरे पर मुस्कान लाती थीं, लेकिन सच तो यह है कि अब चेहरे पर यह मुस्कान 25 और 50 दिनों में ही आ जाती है। कुछ फिल्में तो सप्ताहांत के तीन दिनों में ही फायदा दिखाने लगती हैं। एक सच यह भी है कि लगभग एक हजार प्रिंट एक साथ सिनेमाघरों मे

बॉक्स ऑफिस:२६.०६.२००८

सिनेमाघर खाली...दे ताली पिछले हफ्ते रिलीज हुई दे ताली, हाल-ए-दिल और खुश्बू तीनों फिल्मों के दर्शकों को मिला दें तो भी दर्शकों का प्रतिशत सौ के करीब नहीं पहुंचेगा। सबसे अधिक दर्शक दे ताली को मिले, लेकिन उसके शो में भी सिनेमाघर खाली ही रहे। आरंभिक दिनों में इस फिल्म का कलेक्शन तीस से चालीस प्रतिशत रहा। फिल्म के प्रचार से दर्शकों का आकर्षण बना था, लेकिन पहले ही शो के बाद दर्शक निराश हो गए। हाल-ए-दिल में कुमार मंगत की बेटी लांच हुई हैं। उनके साथ दो नए स्टार अध्ययन सुमन और नकुल मेहता हैं। यह फिल्म अमिता पाठक के लिए बनायी गयी थी, लेकिन वह दर्शकों को पसंद नहीं आई। हां, नकुल और अध्ययन को थोड़ी सराहना जरूर मिल गई। पहलाज निहलानी की खुश्बू में भी नई जोड़ी थी। इस नई जोड़ी को भी दर्शकों ने फिल्म के साथ नकार दिया। तीनों फिल्में पहले ही हफ्ते में फ्लॉप साबित हुई। क्या हो गया है दर्शकों को? न तो वे कॉमेडी पसंद कर रहे हैं और न लव स्टोरी। ट्रेड विशेषज्ञों की राय में तीनों ही फिल्में कहानी, मेकिंग और प्रस्तुति के स्तर पर कमजोर थीं। दर्शक बता रहे हैं कि अब वे साधारण फिल्मों से संतुष्ट नहीं होंगे। देखना ह

25 साल पहले 24 जून को रिलीज हुई थी 'अर्थ'

-अजय ब्रह्मात्मज देश इस समय व‌र्ल्डकप में भारत की जीत की 25वीं वर्षगांठ पर जश्न मना रहा है। जश्न और खुशी के इस माहौल में अगर याद करें तो पच्चीस साल पहले व‌र्ल्ड कप के दिनों में ही महेश भट्ट निर्देशित अर्थ रिलीज हुई थी। स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और कुलभूषण खरबंदा अभिनीत इस फिल्म ने रिलीज के साथ ही दर्शकों को प्रभावित किया था। मुख्यधारा की फिल्म होने के बावजूद समाज के सभी वर्गो में अर्थ की सराहना हुई थी। हिंदी फिल्मों में महिलाओं के चित्रण के संदर्भ में इसे क्रांतिकारी फिल्म माना जाता है। अर्थ की रिलीज की पच्चीसवीं वर्षगांठ के अवसर पर खास बातचीत में महेश भट्ट ने कहा कि मैं आज जो भी हूं, वह इसी फिल्म की बदौलत हूं। पच्चीस सालों के बाद भी अर्थ का महत्व बना हुआ है। मुझे इस फिल्म के लिए ही याद किया जाता है। उन्होंने बेहिचक स्वीकार किया कि अर्थ उनकी और परवीन बॉबी के संबंधों पर आधारित आत्मकथात्मक फिल्म थी। चूंकि विवाहेतर संबंध की परेशानियों को में स्वयं भुगत चुका था, इसलिए शायद मेरी ईमानदारी दर्शकों को पसंद आई। फिल्म के नायक इंदर मल्होत्रा (कुलभूषण खरबंदा)से दर्शकों की कोई सहानुभूति नहीं होती। द

खतरनाक खेल है एक्टर बनना: हरमन बवेजा

-अजय ब्रह्मात्मज हैरी बवेजा के पुत्र हरमन अपनी पहली फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही चर्चा में आ गए है। चर्चा इसलिए भी कि उनकी यह फिल्म भविष्य की प्रेम कहानी पर आधारित होगी। प्रस्तुत है हरमन से बातचीत के अंश आपके बारे में सुनते आए हैं कि पहले आप प्रोडक्शन में जाने वाले थे। एक्टिंग में आने का कब और कैसे इरादा हुआ? मैंने सबसे पहले होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की। दसवीं करके मैं स्वीटजरलैंड चला गया था। होटल मैंनेजमेंट सीखने। वहां पहले साल में सिलवर मेडलिस्ट रहा, लेकिन मुझे उस में मजा नहीं आया । मैं वापस आ गया, तब मैंने डैड से कहा कि डैड मुझे नहीं लगता है कि मुझे ये कंटीन्यू करना है। एक चीज में अगर मेरा दिल नहीं है तो मैं उसको क्यों करता रहूं? मुझे लगता है कि फिल्मों में मेरा मन लगता है। एक्िटग हो, डायरेक्शन हो, इसी फील्ड में कुछ करना है। उन्होंने कहा कि ठीक है। उन्होंने सबसे पहले असिस्टेंट डायरेक्टर बनाया और फिर मुझे सीधे एक प्रोडक्शन की जिम्मेदारी दे दी। एक छोटी सी फिल्म थी ये क्या हो रहा है? 2001 या 2002 में आई थी। चार नए लड़के थे और चार नई लड़कियां थी। पापा ने कहा कि ये पिक्चर तुझे बनानी है। हंस

हाल-ए-दिल:21वीं सदी में आजादी के समय का प्रेम

-अजय ब्रह्मात्मज कई बार फिल्मों के शीर्षक ही उनकी क्वालिटी का अहसास करा देते हैं। 21वीं सदी में हाल-ए-दिल नाम थोड़ा अजीब सा लगता है न? यह फिल्म भी अजीब है। शिमला से मुंबई तक फैली इस कहानी में न तो महानगर मुंबई की आधुनिकता दिखती है और न शिमला की स्थिर भावुकता। फिल्म का बड़ा हिस्सा ट्रेन में है, लेकिन वहां भी जब वी मेट जैसी कहानी और प्रसंगों की छुक-छुक नहीं है। संजना पिछली सदी की यानी आजादी के आसपास की लड़की और प्रेमिका लगती है। रोहित के प्यार में डूबी संजना अंत-अंत तक शेखर की भावनाओं को नजरअंदाज करती है। और फिर रोहित जैसे परिवेश का युवक इस सदी में अपनी प्रेमिका से अलग किए जाने पर भला क्यों नींद की गोलियां खाएगा? कहीं कुछ गड़बड़ है। किरदारों को गढ़ने में लेखक से मूल गलतियां हो गई हैं। उसके बाद जो कहानी लिखी जा सकी, वह विश्वसनीय नहीं लगती। इसके अलावा फिल्म की रफ्तार इतनी धीमी है कि किरदारों से सहानुभूति के बजाय ऊब होने लगती है। युवा धड़कनों की प्रेम कहानी में मन उचाट हो जाए तो लेखक और निर्देशक की विफलता स्पष्ट है। इस फिल्म में तीन नए एक्टर हैं। अमिता पाठक के स्वाभाविक गुणों के अनुरूप संजन

दे ताली: उलझी कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज प्रचार के लिए बनाए गए प्रोमो धोखा भी देते हैं। दे ताली ताजा उदाहरण है। इस फिल्म के विज्ञापनों से लग रहा था कि एक मनोरंजक और यूथफुल फिल्म देखने को मिलेगी। फिल्म में मनोरंजन तो है, लेकिन कहानी के उलझाव में वह उभर नहीं पाता। ईश्वर निवास के पास मिडिल रेंज के ठीक-ठाक एक्टर थे, लेकिन उनकी फिल्म साधारण ही निकली। दे ताली देखकर ताली बजाने का मन नहीं करता। तीन दोस्तों अमु, अभी और पगलू की दोस्ती और उनके बीच पनपे प्यार को एक अलग एंगल से रखने की कोशिश में ईश्वर निवास कामयाब नहीं हो पाए। दोस्ती और प्रेम की इस कामिकल कहानी में लाया गया ट्विस्ट नकली और गढ़ा हुआ लगता है। साथ-साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे के प्रति मौजूद प्यार को न समझ सकने के कारण सारी गलतफहमियां होती हैं। इन गलतफहमियों में रोचकता नहीं है। ईश्वर निवास ने शूल जैसी फिल्म से शुरुआत की थी, लेकिन उसके बाद की अपनी फिल्मों में वह लगातार निराश कर रहे हैं। या तो उन्हें सही स्क्रिप्ट नहीं मिल पा रही है या कुछ बड़ा करने के चक्कर में वह फिसल जा रहे हैं। दे ताली जैसी फिल्म की कल्पना उनकी सीमाओं को जाहिर कर रही है। कुछ नया करने से पहले

श्याम बेनेगल का सम्मान

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-अजय ब्रह्मात्मज थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित 9वें आईफा अवार्ड समारोह के दौरान हिंदी फिल्मों केपुरस्कार समारोह में श्याम बेनेगल को लाइफ टाइम एचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दरअसल, श्याम बेनेगल का नाम फिल्म इंडस्ट्री में आज भी बहुत आदर व सम्मान से लिया जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस अच्छे फिल्मकार के कार्य को अभी तक रेखांकित नहीं किया गया है। चूंकि उनका काम इतना महत्वपूर्ण और स्पष्ट है कि बगैर गहराई में गए ही सभी उनके नाम का उल्लेख करते रहते हैं। गौर करें, तो नामोल्लेख का भी फैशन चलता है। जैसे कि गुरुदत्त, बिमल राय, के.आसिफ जैसे महान फिल्मकारों को बिना देखे ही सिनेप्रेमी महान निर्देशक मान लेते हैं। निश्चित ही वे सभी महान हैं, लेकिन क्या हमने निजी तौर पर उनकी महानता को परखा, देखा और समझा है? आप आसपास पूछ कर देख लें। संभव है, अधिकांश ने उनकी फिल्में देखी भी न हों! ऐसे ही श्याम बेनेगल का नाम हर संदर्भ में लिया जाता है। हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा से दरकिनार कर दिए गए विषयों, चरित्रों और स्थानों को श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में जगह दी। उन्ह

बॉक्स ऑफिस:२०.०६.२००८

मंदा ही रहा धंधा राम गोपाल वर्मा की फिल्म सरकार राज का विज्ञापन आया है कि एक हफ्ते में उसने 50 करोड़ से अधिक की कमाई कर ली है और आगे की कमाई जारी है। जब भी किसी फिल्म का ऐसा विज्ञापन आता है तो ट्रेड के लोग कहने लगते हैं कि सही कमाई का योग विज्ञापन में दी गई राशि से कम ही होगा। इस फिल्म को लेकर बच्चन परिवार और राम गोपाल वर्मा कुछ ज्यादा ही संवेदनशील और आक्रामक हैं। अमिताभ बच्चन और राम गोपाल वर्मा अपने ब्लॉग के जरिए आलोचकों को जवाब दे रहे हैं। बहरहाल, ट्रेड सर्किल में चर्चा है कि यह फिल्म मुंबई और महाराष्ट्र में औसत से बेहतर कारोबार कर लेगी, लेकिन अन्य सर्किट में वितरकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। अन्य राज्यों से संतोषजनक रिपोर्ट नहीं आ रही है। पिछले हफ्ते रिलीज हुई मेरे बाप पहले आप और समर-2007 का बुरा हाल रहा। दोनों ही फिल्मों ने निराश किया और दर्शकों को जुटाने में उनकी असमर्थता पहले दिन से ही जाहिर होने लगी थी। विषय वस्तु की गंभीरता और जटिलता के कारण समर-2007 दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई। मेरे बाप पहले आप से प्रियदर्शन दर्शकों को नहीं हंसा सके। समर-2007 की तुलना में उसे ज्यादा दर्शक

अभिनेत्री करीना कपूर बनाम ब्रांड बेबो

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ताजा खबर है कि करीना कपूर ने एक साबुन के विज्ञापन के लिए करोड़ों की रकम ली है। इस तरह वह विज्ञापन से कमाई करनेवाली महंगी अभिनेत्रियों में से एक हो गई हैं। इन दिनों वह हर तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट के विज्ञापनों में दिख रही हैं। अभिनेत्रियों की मांग कॉस्मेटिक, पर्सनल केयर प्रोडक्ट और ज्वेलरी के विज्ञापनों में ज्यादा रहती है। करीना कपूर इस तरह के विज्ञापनों में आगे हैं। वह लाइफ स्टाइल प्रोडक्ट बेचने के लिए सबसे उपयुक्त एक्ट्रेस मानी जा रही हैं। इन दिनो फिल्म अभिनेत्रियों की कमाई का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है। पॉपुलर एक्टर की तरह पॉपुलर एक्ट्रेस भी इस कमाई पर पूरा ध्यान दे रही हैं। बाजार में करीना कपूर की मांग बढ़ने का एक कारण यह भी है कि पिछले साल उनकी फिल्म 'जब वी मेट' जबरदस्त हिट रही। उनके कुछ प्रशंसकों को लग सकता है कि शाहिद कपूर से अलग होकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। नैतिकता के इस प्रश्न से उनके इमेज पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उल्टा दर्शकों के बीच उनकी चाहत बढ़ गई है। हीरोइनों के सपनों में खोए दीवाने दर्शकों के लिए करीना कपूर ऐसी आइकॉन बन गयी हैं, जो किसी एक सितारे से नहीं बंध

'उत्सुशी-ए' - सिनेमा से पहले मनोरंजन की जापानी लोकशैली

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सिनेमा, फिल्म, मूवी, पिक्चर, चलचित्र ... आप इसे जो नाम दें और जिस अर्थ में समझें, मनोरंजन का सशक्त माध्यम हो गया है। सिनेमा के वजूद में आने के पहले भी तो मनोरंजन के साधन और माध्यम होंगे। हम उन्हें मनोरंजन की लोकशैली कहते हैं। भारत की बात करें तो हर क्षेत्र और प्रदेश की नाट्य एवं नृत्य शैलियां हैं। कठपुतलियों का नृत्य रहा है। छाया और प्रकाश के माध्यम से भी नागरिकों के बहलाने के प्रयास होते रहे । पश्चिमी और योरोपीय देशों में 'फैंटसमैगोरिया' का चलन रहा तो चीन और जापान में छायाचित्रों के माध्यम से गांव-कस्बों में मनोरंजन किया जाता रहा। जापान की एक ऐसी ही मनोरंजक लोकशैली 'उत्सुशी-ए' है। जापानी भाषा, संस्कृति और इतिहास के जानकार चवन्नी और उसके पाठकों की जानकारी में इजाफा कर सकते हैं। चवन्नी को इसके संबंध में जो जानकारी मिली, वह उसे बांटने के लिए तत्पर है। सिनेमा के प्रचलित होने के पहले जापान में उत्सशी-ए के शो काफी पसंद किए जाते थे। अठारहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के अंत तक उत्सशी-ए का बोल बाला रहा। इदो और मेइजी काल में इस शैली का विकास और विस्तार हुआ। उत्सशी-ए में छवियां

शैली और शिल्प में दोहराव: मेरे बाप पहले आप

अजय ब्रह्मात्मज प्रियदर्शन कभी अपनी कामेडी फिल्मों से गुदगुदाया और हंसाया करते थे। अब उनकी शैली और शिल्प के दोहराव से ऊब होने लगी है। यही कारण है कि मेरे बाप पहले आप विषय की नवीनता के बावजूद रोचक नहीं लगती है। विधुर पिता जनार्दन और बेटे गौरव का अजीबोगरीब रिश्ता है। बेटा बाप को बेटा कह कर बुलाता है। वह उन्हें डांटता, फटकारता, धमकाता और पुचकारता है। चूंकि बाप ने दूसरी शादी नहीं की और बेटों को पालने में अपनी जिंदगी निकाल दी, इसलिए अब बेटा उन्हें अपने बेटे की तरह प्यार से पालता है। वह उन्हें बुरी संगत से बचाना चाहता है। फिल्म की नायिका शिखा है। वह किसी पुरानी घटना का बदला लेने के लिए पहले नायक गौरव को तंग करती है और फिर दोस्त बन जाती है। इस दोस्ती के दरम्यान गौरव और शिखा को पता चलता है कि गौरव के पिता और शिखा की आंटी पुराने प्रेमी हैं। वे उन दोनों की शादी करवाने की युक्ति रचते हैं। इस प्रक्रिया में वे खुद भी एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं, लेकिन अपनी शादी से पहले वे बुजुर्गो की शादी करवाते हैं। बेटे से पहले बाप की शादी के कंसेप्ट पर दृश्यों को जोड़-मोड़ कर यह फिल्म बना दी गयी है। अक्षय खन

हाफ टिकट :किशोर कुमार की फ़िल्म

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चवन्नी ने आज ही हाफ टिकट देखी है। किशोर कुमार और मधुबाला की यह फिल्म 1962 में बनी थी। फिल्म के लेखक-निर्देशक कालिदास थे। सलिल चौधरी ने शैलेन्द्र के गीतों को धुनों से सजाया था। इस फिल्म का हर गीत निराला और अपारंपरिक था। 'आ के सीधे दिल पे लगी कटरिया ' युगल गीत है। किशोर कुमार ने सलिल चौधरी को बड़ी मुश्किल से राजी किया था कि स्त्री और पुरुष दोनों ही स्वरों के लिए उन्हीं की आवाज इस्तेमाल की जाए। किशोर कुमार का यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। वे अपने स्टेज प्रोग्राम में इस गीत को अवश्य गाते थे। 'हाफ टिकट' विजय नामक युवक की कहानी है, जो नियमित जिंदगी नहीं जी सकता। उसके फितूरों से परेशान होकर पिता उसे घर से निकाल देते हैं। उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह मंबई का टिकट भी खरीद सके। वह हाफ टिकट लेता है और बारह साल के मोटे-तगड़े लड़के का वस्त्र धारण करता है। वह ऐसा बच्चा, जिसका शरीर बड़ा हो गया है, लेकिन दिमाग किसी बच्चे का ही है। सफर शुरू होने के समय ही एक बदमाश किस्म का व्यक्ति विजय का चाचा बन जाता है और उसकी जेब में दो लाख का हीरा डाल देता है। पुलिस के डर से वह ऐसा करता है। बाद

सामाजिक सरोकार की फिल्म है समर 2007

-अजय ब्रह्मात्मज आयटम सांग, कामेडी, एक्शन और मल्टीस्टारर फिल्मों के इस दौर में सुहैल तातारी ने सामाजिक सरोकार की फिल्म निर्देशित की है। सालों बाद किसी फिल्म में गांव, किसान और किसानों की आत्महत्या के पहलू सामने आए हैं। यह डाक्यूमेंट्री, उपदेशात्मक या महज बोलवचन की फिल्म नहीं है। फिल्म अपनी बात कह जाती है। अगर आप कान एवं ध्यान लगाएं तो बात समझ में भी आती है। अमीर परिवारों के पांच बच्चे कैपिटेशन फी देकर मेडिकल कालेज में दाखिला लेते हैं। उन सभी का ध्यान पढ़ाई से ज्यादा दूसरी चीजों में लगा रहता है। उनकी अपनी एक समृद्ध, काल्पनिक और निरपेक्ष दुनिया है। सच से उनका सामना पहली बार तब होता है, जब छात्र संघ के चुनाव का समय आता है। प्रकाश नाम का छात्र नेता अपने स्वतंत्र सोच से उन्हें चुनौती देता है और राजनीति के लिए उकसाता है। पांचों युवक चुनाव की चपेट में आते हैं और फिर एक दबाव के कारण कैंपस से पलायन करते हैं। वे बचने का आसान रास्ता चुनते हैं और गांव के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र पर सेवा देने के बहाने निकल जाते हैं। गांव पहुंचते ही उनका यथार्थ से साक्षात्कार होता है। कुछ समय तक वे निरपेक्ष और उदास

चार जुलाई को चमकेंगे दो स्टार!

-अजय ब्रह्मात्मज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए पहली छमाही कोई सुखद समाचार नहीं ला सकी। न तो कोई फिल्म जबर्दस्त सफलता हासिल कर सकी और न ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से आए स्टारसन में कोई चमक दिखी। हाल ही में रिलीज हुई वुडस्टॉक विला में आए सिकंदर खेर को ढेर होते हमने देखा। उसके पहले मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह चक्रवर्ती अपनी पहली फिल्म जिम्मी में फुस्स साबित हुए। आश्चर्य की बात तो यह है कि दोनों ही नवोदित स्टारों को दर्शकों ने नोटिस नहीं किया। हालांकि दोनों के पास अभी एक-एक फिल्म है, लेकिन कहना मुश्किल है कि दूसरी फिल्मों में वे कोई जलवा बिखेर पाएंगे! हां, चार जुलाई को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दो स्टार चमकने को तैयार हैं। लव स्टोरी 2050 से हैरी बावेजा के पुत्र हरमन बावेजा और जाने तू या जाने ना से आमिर खान के भतीजे इमरान खान की फिल्मों में एंट्री हो रही है। चार जुलाई को एक साथ रिलीज हो रही इन दोनों फिल्मों के मुख्य कलाकारों को फिलहाल भविष्य के स्टार के रूप में देखा जा रहा है। उनकी पहली फिल्म की रिलीज के पहले ही उनकी आने वाली फिल्में भी लगभग पूरी हो गई हैं। दोनों को लगातार फिल्मों के ऑफर मिल

बॉक्स ऑफिस:१३.०६.२००८

दोनों को पिटा ही मानिए बाक्स आफिस पर भले ही सरकार राज का राज कायम नहीं हो सका, लेकिन राम गोपाल वर्मा के नाम पर आग और अन्य फ्लाप एवं बुरी फिल्मों के कारण जमी धूल थोड़ी साफ हुई। रामू सरकार राज में सरकार से आगे नहीं बढ़ सके। हां, उन्होंने यह जता दिया कि अभी वह चुके नहीं हैं और फिर से लौट सकते हैं। सरकार राज के प्रति फिल्म ट्रेड सर्किल में गर्माहट थी। बच्चन परिवार के तीन सदस्यों के कारण माना जा रहा था कि फिल्म को अच्छी ओपनिंग मिलेगी। पर हकीकत यह रही कि मुंबई में ओपनिंग का प्रतिशत दूसरे शहरों की तुलना में बेहतर रहने के बावजूद उम्मीद से कम था। आरंभिक दिनों में 50-60 प्रतिशत कलेक्शन साधारण फिल्म के लिए बेहतर कहा जा सकता है। सरकार राज के लिए यह प्रतिशत कम है। मुंबई में मानसून की पहली बौछार से भी दर्शकों में कमी आई। अगले दिन शनिवार को दर्शक बढ़े, लेकिन रविवार से गिरावट आरंभ हो गई। फिर भी माना जा रहा है कि फिल्म मुंबई और महाराष्ट्र में औसत व्यापार कर लेगी। राजकुमार गुप्ता की आमिर छोटी फिल्म थी। समीक्षकों ने उसकी खूब सराहना की। निर्माताओं ने फिल्म के प्रचार पर समुचित ध्यान नहीं दिया था, इसलिए दर

प्रचलित परंपरा से जरा हट कर है आमिर

-अजय ब्रह्मात्मज यूटीवी स्पाटब्वाय की पहली फिल्म आमिर हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय परंपरा में नहीं है। यह निर्देशक राज कुमार गुप्ता और अभिनेता राजीव खंडेलवाल की पहली फिल्म है। उन्होंने साबित किया है कि बेहतर फिल्म बनाने के लिए स्टार, नाच-गाने और लटके-झटकों की जरूरत नहीं है। अगर आपका कथ्य मजबूत है और आपके कलाकार उसे सही संदर्भ में अभिव्यक्त कर देते हैं तो फिल्म प्रभावित करती है। आमिर डा. आमिर अली के जीवन के एक दिन की कहानी है। लंदन से तीन साल बाद भारत लौटे डा. आमिर अली का जीवन एयरपोर्ट से निकलते ही एक कुचक्र में फंसता है। उनके परिवार को किसी ने किडनैप कर लिया है और वह व्यक्ति उनसे कुछ ऐसे काम करवाना चाहता है, जिसके लिए वह तैयार नहीं हैं। परिजनों की सुरक्षा के दबाव में वह मजबूरन अनचाहे काम को अंजाम देने के लिए बढ़ते हैं। आखिरकार एक ऐसी घड़ी आती है, जब वह फैसला लेते हैं और वह फैसला उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल देता है। आमिर की पृष्ठिभूमि में मुंबई है, लेकिन यहां न तो ताज होटल है और न गेट वे आफ इंडिया है, न क्वीन नेकलेस और न ही हाजी अली की दरगाह। मुंबई के नाम पर जो प्रतीक हम फिल्मों में देखत

फिर असफल रहे रामू

-अजय ब्रह्मात्मज क्लोज अप, फुसफुसाहट, साजिश, हत्या..सरकार की काली लुंगी, बगैर कालर की काली शर्ट, माथे पर लाल टीका, रीमलेस चश्मा और पूरे माहौल में धुआं-धुआं ़ ़ ़यह सब कुछ हम सभी ने राम गोपाल वर्मा की पिछली फिल्म सरकार में देखा था। इन सब के साथ इस बार थोड़ा बदलाव है। सरकार यानी सुभाष नागरे के बेटे शंकर ने शूट पहन लिया है और विदेश से एक लड़की अनीता राज आ गई है। कहानी मुंबई से पसर कर ठाकुरवाड़ी तक गई और हमने राव साहब के भी दर्शन किए। एक नया किरदार सोम भी आया। कुछ नए खलनायक दिखे- काजी, वोरा, कांगा और पाला बदलता वफादार चंदर ़ ़ ़ रामू ने सरकार की तकनीक ही रखी। उन्होंने अमिताभ, अभिषेक और ऐश्वर्या को भावपूर्ण दृश्य दिए ताकि वे चेहरे और आंखों से अभिनय की बारीकियां प्रदर्शित करें। इस संदर्भ में कई क्लोजअप में बुरे लगने के बावजूद अमिताभ तो भाव प्रदर्शन में सफल रहे, लेकिन अभिषेक और ऐश्वर्या में अपेक्षित ठहराव नहीं दिखा। हां, कैमरे के आगे छोटे कलाकार अवश्य टिके रहे और उन्होंने ही इस फिल्म की नाटकीयता बनाए रखने में मदद की। फिल्म की कहानी राजनीति, विदेशी निवेश, औद्योगिकीकरण की समस्याओं को इंटरवल के

कॉमेडी का कन्फ्यूजन कन्फ्यूजन में कॉमेडी

-अजय ब्रह्मात्मज पिछले कुछ समय से हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का चलन पूरी तरह से बढ़ा है, क्योंकि इसे सफलता का फार्मूला माना जा रहा है। कह सकते हैं कि यही ताजा ट्रेंड है, लेकिन चंद वर्षो और चंद फिल्मों के बाद अब यह ट्रेंड दम तोड़ता नजर आ रहा है। हाल की असफल कॉमेडी फिल्मों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अभी के निर्माता-निर्देशक कॉमेडी के नाम पर पूरी तरह से कंफ्यूजन के शिकार हैं! कॉमेडी फिल्मों का एक इतिहास रहा है। दरअसल, जब शुद्ध रूप से कॉमेडी फिल्में नहीं बनती थीं, तो फिल्मों में कॉमेडी का पैरलल ट्रैक रहता था। दरअसल, एक सच यह भी है कि जॉनी वॉकर और महमूद सरीखे कलाकारों को उन दिनों हीरो जैसा दर्जा हासिल था। उनके लिए गाने रखे जाते थे और कई रोचक प्रसंग भी कहानी में जोडे़ जाते थे। यह सिलसिला लंबे समय तक चला। सच तो यह है कि उन दिनों हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कॉमेडियन की एक अलग जमात हुआ करती थी। अमिताभ बच्चन के आगमन के बाद जिन फिल्मी तत्वों का नुकसान हुआ, उनमें कॉमेडी भी रही। एंग्री यंग मैन के अवसान के बाद फिर से फिल्मों की कहानी बदली और जॉनी लीवर, डेविड धवन और गोविंदा का उदय हुआ। डेविड धवन

ऐश्वर्या राय से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

ऐश्वर्या राय की यह बातचीत उनके व्यक्तित्व के ऐसे पहलुओं को सामने लाती है, जिनकेबारे में वे कम बातें करती हैं। यहां हम एक बेटी, बहू और बीवी ऐश्वर्या राय साथ ही ऐक्ट्रेस ऐश्वर्या राय से मिलते हैं॥ ऐश्वर्या राय की कई पहचान है। वह मिस व‌र्ल्ड रही हैं। एक्ट्रेस हैं। एक ब्रांड हैं। बेटी हैं और अब पत्नी एवं बहू भी हैं। बहू होते ही जब आप नए घर में जाती हैं तो बहुत कुछ छूटता या छोड़ना पड़ता है ़ ़ ़ मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं। उनका आशीर्वाद है। मैं एक घर से ब्याह कर दूसरे घर में आई हूं तो फिर से वही मां-बाप का प्यार, वही अपनापन मिला ़ ़ ़ यह सिर्फ इंटरव्यू के लिए नहीं कह रही हूं। दिल की बात कह रही हूं। अभिषेक और हम हमेशा कहते हैं कि अब हमें दो मां-पिता मिल गए हैं। इसके लिए मैं उन्हें भी धन्यवाद दूंगी, क्योंकि हमारे अंदर अगर यह भावना है तो यह उनकी ही देन है। शायद हमारी परवरिश में ही था। हमें कुछ अलग से नहीं सिखाया गया। हमारे अंदर पहले से ही था। दोनों ही परिवारों में कई संभावनाएं हैं। मैं जिस परिवार से आई और जिस परिवार में व्याही गई-दोनों लगभग एक जैसे ही हैं। किसी भी लड़की के लिए यह बहुत बड़ा ए

बॉक्स ऑफिस:०६.०५.२००८

अगले ही दिन ढेर हुई वुडस्टॉक विला सिर्फ प्रचार से फिल्में चल जातीं तो सिकंदर खेर अभिनीत वुडस्टॉक विला को बॉक्स आफिस पर कीर्तिमान स्थापित करना चाहिए था। सच है कि संजय गुप्ता की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन दम तोड़ दिया। सिकंदर खेर का आकर्षण काम नहीं कर सका। दर्शक नहीं आए और फिल्म अगले ही दिन ढेर हो गयी। वुडस्टॉक विला को आरंभिक दिनों में पंद्रह प्रतिशत दर्शक भी नहीं मिले। दर्शकों के आरंभिकरुझान से ही स्पष्ट हो गया था कि फिल्म सिनेमाघरों में टिक नहीं पाएगी। सोमवार से दर्शकों में भारी गिरावट आयी। हंसते हंसते का प्रदर्शन और भी बुरा रहा। उसे दस प्रतिशत ही दर्शक मिले। हंसते हंसते के निर्माताओं को रोते-रोते अगली फिल्म की तैयारी करनी होगी। ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों ही फिल्में बुरी थीं, इसलिए उनका यह हाल हुआ। ताज्जुब है कि फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवी निर्माता-निर्देशक कैसे इस तरह की फिल्मों को लेकर आश्वस्त रहते हैं और कुछ यों प्रचार करते हैं कि उनकी फिल्म नए मानदंड स्थापित कर देगी। पिछले हफ्तों में फिल्में न चलने की वजह आईपीएल को माना जा रहा है। अब तो आईपीएल खत्म हुआ। देखें, इस

जोधा अकबर के १०० दिन और उसके कटे दृश्य

जोधा अकबर के १०० दिन हो गए.इन दिनों हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में १०० दिनों और ५० दिनों की भी पार्टियाँ होती हैं.पहले फिल्में सिल्वर जुबली और गोल्डेन जुबली मनाती थीं.२१ वीं सदी में सिल्वर और गोल्डेन जुबली सपना हो गई हैं.आजकल तो पहले दिन की अच्छी शुरूआत हो जाए तो अल दिन या रविवार तक सुपर हित के पोस्टर लग जाते हैं.जन्नत के साथ ऐसा हुआ है। बहरहाल,जोधा अकबर के १०० दिन पूरे होने के अवसर पर निर्देशक और निर्माता आशुतोष गोवारिकर ने पार्टी दी.चवन्नी भी वहाँ गया था.इस पार्टी में उन्होंने फ़िल्म के कटे हुए दृश्य दिखाए.आशुतोष ने बताया की उन्होंने पहले सब कुछ स्क्रिप्ट के मुताबिक शूट कर लिया था.बाद में फ़िल्म संपादित करते समय उन्होंने दृश्य काटे. इस मौके पर उन्होंने सारे कटे दृश्य दिखाए.कुछ अत्यन्त मार्मिक और महत्वपूर्ण दृश्य थे,लेकिन फ़िल्म की लम्बाई की वजह से उन्हें रखने का मोह आशुतोष को छोड़ना पड़ा। अकबर के दरबार में बीरबल की एंट्री का दृश्य रोचक और जानदार था.कैसे महेश दास नाम का व्यक्ति अकबर को अपनी हाजिरजवाबी से खुश करता है और दरबार में जगह पाता है.कैसे मुल्ला दो प्याजा उसे दरबार में आने से रोकने

अभिषेक बच्चन से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

अभिषेक बच्चन की पहली फिल्म से लेकर आज तक जितनी भी फिल्में आयीं है सभी में उनका अलग अंदाज देखने को मिला। प्रस्तुत है अभिषेक से बातचीत- अभिषेक इन दिनों क्या कर रहे हैं? शूटिंग कर रहा हूं। दिल्ली-6 की शूटिंग कर रहा था। उसके बाद करण जौहर की फिल्म कर रहा हूं, जो तरूण मनसुखानी निर्देशित कर रहे हैं। फिर रोहन सिप्पी की फिल्म शुरू करूंगा। काम तो है और आप लोगों के आर्शीवाद से काफी काम है। सरकार राज आ रही है। उसके बारे में कुछ बताएं? सरकार राज, सरकार की सीक्वल है। इसमें फिर से नागरे परिवार को देखेंगे। सरकार जहां खत्म हुई थी, उससे आगे की कहानी है इसमें। नयी कहानी है और नयी समस्या है। इसमें ऐश्वर्या राय भी हैं। मैं तो बहुत एक्साइटेड हूं। ऐश्वर्या इस फिल्म में बिजनेस वीमैन का रोल निभा रही हैं। वह नागरे परिवार के सामने एक प्रस्ताव रखती हैं और बाद में उस परिवार के साथ काम करती हैं। द्रोण के बारे में क्या कहेंगे? सुपरहीरो फिल्म है? सब लोग द्रोण को सुपरहीरो फिल्म समझ रहे हैं। वह सुपरहीरो फिल्म नहीं है। हां, मैं फिल्म का हीरो हूं, लेकिन सुपरहीरो नहीं हूं। द्रोण एक फैंटेसी फिल्म है। उस फिल्म का थोड़ा सा