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Showing posts from July, 2010

फिल्म समीक्षा : वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई

- ajay brahmatmaj सबसे पहले तो इस फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति की जा सकती है। वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई, इस शीर्षक का आशय कितने हिंदी दर्शक समझ पाएंगे या शीर्षक अब अर्थहीन हो गए हैं। बहरहाल, निर्माता-निर्देशक ने समाज और दर्शकों के बदलते रुख को देखते हुए यही शीर्षक जाने दिया है। यह आठवें दशक की मुंबई की कहानी है, जब अंडरव‌र्ल्ड अपनी जड़ें पकड़ रहा था और अपराध की दुनिया में तेजी से नैतिकता बदल रही थी। हिंदी में गैगस्टर फिल्में घूम-फिर कर मुंबई में सिमट आती हैं। पहले कभी डाकुओं के जीवन पर फिल्में बना करती थीं। फिर स्मगलर आए और अब अंडरव‌र्ल्ड से आगे बढ़कर हम टेररिस्ट तक पहुंच चुके हैं। अपराध की अंधेरी गलियों का रोमांच दर्शकों को हमेशा आकर्षित करता है। वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई में इसी आकर्षण को भुनाने का ध्येय स्पष्ट है। मिलन लुथरिया ने आठवें दशक की कहानी चुनने के साथ परिवेश और शैली में भी आठवें दशक का असर रखा है। एक-दो भूलें भी हैं, जैसे कि कागज के बड़े थैलों का इस्तेमाल या डिजीटल वायरलेस सिस्टम..आठवें दशक में ये चलन में नहीं थे। थोड़ी असावधानी कैसे दृश्य का इंपैक्ट खत्म करत

दरअसल : इंडियन ओशन का संगीत

-अजय ब्रह्मात्‍मज आमिर खान की अनुषा रिजवी निर्देशित पीपली लाइव में एक गीत है जिंदगी से डरते हो..। यह गीत अभी उतना पॉपुलर नहीं हुआ है, लेकिन नून मीम राशिद के बोलों को ध्यान से सुनें, तो इस गाने में जिंदगी की चुनौतियों का सामना करने और उनसे जूझने का जोश और आह्वान स्पष्ट रूप से है। इसे इंडियन ओशन के अशीम चक्रवर्ती ने गाया है। कहते हैं यह उनका गाया आखिरी गीत है। अशीम अब इस दुनिया में नहीं हैं। इडियन ओशन में मुख्य रूप से उनकी आवाज ही गूंजती थी। इंडियन ओशन देश के मशहूर फ्यूजन बैंड का नाम है। फिल्मों में उन्होंने ब्लैक फ्राइडे में संगीत दिया था। उसका एक गीत रुक जा.. काफी पॉपुलर हुआ था। भारत में फ्यूजन बैंड और संगीत मंडलियों की अधिक लोकप्रियता नहीं है। हालांकि पिछले डेढ़-दो दशकों में कई बैंड और मंडलियां आई, लेकिन दो-चार गानों की लोकप्रियता के बाद गुमनाम हो गई। विदेशी तर्ज और हिंदी फिल्मों के पुराने गानों को नए तरीके से पेश कर उन्हें तात्कालिक पहचान तो मिली, पर उनमें मौलिकता और भारतीयता की कमी रही। इस लिहाज से इंडियन ओशन के गीत-संगीत में एक निरंतरता है। यह कभी बहुत ज्यादा पॉपुलर नहीं रहा, लेकि

बी आर चोपड़ा का सफ़र -भाग चार...प्रकाश रे

प्रकाश रे बी आर चोपड़ा पर एक सिरीज लिख रहे हैं... भाग-4 बी आर चोपड़ा का 1955 में अपनी कम्पनी बी आर फ़िल्म्स शुरू करना एक साहसी क़दम था. उनके ख़ाते में बस एक ही हिट फ़िल्म दर्ज़ थी. उस समय फ़िल्म उद्योग स्टार सिस्टम और धनी निर्माताओं के चंगुल में था. इसके अलावा राज कपूर, शांताराम, महबूब ख़ान, बिमल राय, ए आर कारदार, गुरु दत्त आदि कई ऐसे दिग्गज 'निर्माता-निर्देशक' मौजूद थे जो व्यावसायिक तौर पर बड़े सफल तो थे ही, साथ ही अपने सिनेमाई सौंदर्य से 1950 के दशक को हिंदुस्तानी सिनेमा के स्वर्ण-युग के रूप में ढाल रहे थे. बी आर फ़िल्म्स के शुरुआत की कहानी कुछ इस प्रकार है: एक दिन चोपड़ा नई फ़िल्म के सिलसिले में शशधर मुखर्जी से मिलने जा रहे थे. उनकी पत्नी ने पूछा, 'तो फिर आप दूसरे निर्माता के लिये काम करने जा रहे हैं? आप ख़ुद ही फ़िल्म क्यों नहीं बनाते?' चोपड़ा ने कहा कि पैसे तो हैं नहीं. इस पर उनकी पत्नी ने कहा कि उनके पास दस हज़ार रुपये हैं जिसमें से वह पांच हज़ार लेकर काम शुरू कर दें. बाक़ी से वह तीन माह तक घर का खर्च चला लेंगी. इसी पांच हज़ार से इस कम्पनी शुरू की गयी. कहा जा सकत

दरअसल : स्टारहीन फिल्में भी देखते हैं दर्शक

-अजय ब्रह्मात्‍मज पहले लव सेक्स और धोखा, फिर उड़ान और जल्दी ही पीपली लाइव आएगी। तीनों फिल्मों में कुछ जबरदस्त समानताएं देखी जा सकती हैं। इनमें से किसी भी फिल्म में कोई परिचित और पॉपुलर स्टार नहीं है और न ही इनमें हिंदी फिल्मों की प्रचलित चमक-दमक है। दिबाकर बनर्जी की फिल्म लव सेक्स और धोखा के कलाकारों के नाम अब शायद ही याद हों, लेकिन उस फिल्म के किरदारों को हम नहीं भूल सकते। इसी प्रकार उड़ान के बाल और किशोर कलाकारों का नाम फिल्म की रिलीज के पहले कोई नहीं जानता था। यह मुमकिन है कि कुछ महीनों बाद हम उनके नाम फिर भूल जाएं, लेकिन रोहन और अर्जुन को हम नहीं भुला सकते। आमिर खान के होम प्रोडक्शन की फिल्म पीपली लाइव की भी यही विशेषता है। इस फिल्म के कलाकारों में मात्र रघुवीर यादव को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। उनके अलावा कोई भी कलाकार हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों से पूर्व परिचित नहीं है। तीनों स्टारहीन फिल्मों की खासियत है कि इनके विषय स्ट्रांग हैं और सारे कैरेक्टर अच्छी तरह गढ़े गए हैं। इनमें दर्शकों को रिझाने के लिए किसी भी फॉर्मूले का इस्तेमाल नहीं किया गया है। लव सेक्स और धोखा नुकसान में नहीं र

हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्‍य के लिए सही नहीं-डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

(फिल्‍मकार डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत) - हिंदी सिनेमा की वर्तमान स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं ? 0 हिंदी सिनेमा पर गंभीरता से विचार करें तो लंबे समय तक श्याम बेनेगल और गोविंत निहलानी सक्रिय रहे। उनके साथ के फिल्मकारों ने फिल्मों की समानंतर भाषा गढऩे और खोजने की कोशिश की। उनमें से प्रकाश झा को मैं एक ऐसे फिल्मकार के तौर पर देख रहा हूं , जिन्होंने समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा में संयोग और मेल कराने की अच्छी कोशिश की है। गौर करें तो फिलहाल हिंदी सिनेमा में सार्थक सिनेमा के लिए कम जगह रही है। उसके अपने व्यवसायिक कारण हैं। सच्चाई है कि हिंदी सिनेमा ने घोषणा कर दी है कि उसका साहित्य का सार्थकता से कोई संबंध नहीं है। सिनेमा का लक्ष्य और उद्देश्य मनोरंजन करने तक सीमित कर दिया गया है। उसमें लतीफेबाजी और चुटकुलेबाजी आ गई है। फिर सार्थकता कहां से आएगी। अफसोस की बात है कि दर्शकों ने स्वीकार कर लिया है और फिल्मकारों पर मुनाफे का दबाव है। पहले माना जाता था कि सिनेमा कला और व्यवसाय का योग है। अब सिनेमा के कला कहने पर प्रश्न चिह्न लग गया है। अगर यह कला है तो क

समाज का अक्स है सिनेमा - मंजीत ठाकुर

हिंदी सिनेमा पर मंजीत ठाकुर ने यह सिरीज आरंभ की है। भाग-1 सिनेमा , जिसके भविष्य के बारे में इसके आविष्कारक लुमियर बंधु भी बहुत आश्वस्त नहीं थे , आज भारतीय जीवन का जरूरी हिस्सा बना हुआ है। 7 जुलाई 1896, जब भारत में पहली बार किसी फिल्म का प्रदर्शन हुआ था , तबसे आज तक सिनेमा की गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है। हम अपने निजी और सामाजिक जीवन की भी सिनेमा के बग़ैर कल्पना करें तो वह श्वेत-श्याम ही दिखेगा। सिनेमा ने समाज के सच को एक दस्तावेज़ की तरह संजो रखा है। चाहे वह 1930 में आर एस डी चौधरी की बनाई व्रत हो , जिसमें मुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखता था और इसी वजह से ब्रितानी सरकार ने इस फिल्म को बैन भी कर दिया था , चाहे 1937 में वी शांताराम की दुनिया न माने । बेमेल विवाह पर बनी इस फिल्म को सामाजिक समस्या पर बनी कालजयी फिल्मों में शुमार किया जा सकता है। जिस दौर में पाकिस्तान अलग करने की मांग और सांप्रदायिक वैमनस्य जड़े जमा चुका था , 1941 में फिल्म बनी पड़ोसी , जो सांप्रदायिके सौहार्द्र पर आधारित थी। फिल्म शकुंतला के भरत को नए भारत के मेटाफर के रुप में इ