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Tuesday, January 7, 2020

सिनेमालोक : भाए न रंग सांवला


सिनेमालोक
भाए न रंग सांवला
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सांवले रंग के प्रति गहरी अरुचि और एलर्जी  है .शुरू से ही फिल्म के हीरो-हीरोइन और अन्य चरित्रों के लिए गौर वर्ण के कलाकारों की मांग रही है. हिंदी सिनेमा के विकास के साथ राजा रवि वर्मा द्वारा चित्रित आकृतियां और रूपाकार ही फिल्मों के किरदारों के आदर्श बने. राजा रवि वर्मा ने जब देवी-देवताओं के काल्पनिक पोर्ट्रेट तैयार तो उनके रंग, कद, काठी और एपीयरेंस पर खास ध्यान दिया. गौर वर्ण, सुतवां नाक,उन्नत ललाट,नीली-भूरी आंखें, घनी-टेढ़ी भौहें में और सीधे लहराते बाल... बाद में फिल्मों में भी उन्हें अपनाया गया. धीरे-धीरे अघोषित रुढ़ि बन गयी. खास कर हीरो-हीरोइन के लिए गौर वर्ण अनिवार्य हो गया. हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय कलाकारों में शायद ही कोई श्याम वर्ण का मिले. दो-चार अपवाद हो सकते हैं.
मनोरंजन की दुनिया में गौर वर्ण के दबाव का सबसे बड़ा उदाहरण माइकल जैक्सन हैं. लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्हें गोरे होने की धुन चढ़ी. अमेरिका में ‘अश्वेत’ होने का खास राजनीतिक निहितार्थ है/ तमाम मुश्किलों और अवरोधों को पार कर माइकल जैकसन ने शोहरत और हैसियत हासिल कर ली, लेकिन गौर वर्ण की ग्रंथि से नहीं निकल सके. उन्होंने अपनी त्वचा का रंग बदला. उसकी वजह से उन्हें ताजिंदगी परेशानी झेलनी पड़ी. गौर वर्ण ने उन्हें शारीरिक तकलीफ भी दी. फिर भी... भारत में गौर वर्ण के प्रति सामाजिक झुकाव और दबाव इतना ज्यादा है कि अनेक फार्मास्यूटिकल कंपनियां ‘गोरे होने की क्रीम’ बेच रही हैं और भरी मुनाफा कम रही हैं. हालांकि इनके खिलाफ अभियान भी चलते हैं, लेकिन ‘गोरे होने की क्रीम’ का कारोबार बढ़ता ही जा रहा है. कुछ सालों पहले तक अखबारों के वैवाहिक विज्ञापनों में गौर वर्ण की वधु की ही मांग रहती थी. माताएं(सास) खुद किसी भी रंग की हों,लेकिन बहू गौर वर्ण की ही होनी चाहिए. गौर वर्ण की ग्रंथि का एक पहलू सवर्ण(उच्च जाति) से संबंधित है. माना जाता है कि कथित ऊंची जाति के लोग गोरे होते हैं.
पिछले दिनों मैंने मराठी अभिनेत्री उषा जाधव का इंटरव्यू किया. महाराष्ट्र के कोल्हापुर से आई उषा जाधव ने प्रतिभा और मेहनत के दम पर प्रतिष्ठा हासिल की है. उन्हें 2017 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार और 2019 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का इफ्फी पुरस्कार मिल चुका है. उन्होंने अपनी बातचीत में बताया कि रंग की वजह से उन्हें कई बार रिजेक्शन झेलना पड़ा. शुरू में तो रंग को लेकर कास्टिंग डायरेक्टर या डायरेक्टर सीधे कह भी देते थे. इधर थोड़ा बदलाव आया है. सीधे मना नहीं किया जाता, लेकिन उनके मनाही की भाषा से स्पष्ट हो जाता है कि कारण ‘सांवलापन’ है. एनएसडी के स्नातक दिब्येंदु भट्टाचार्य प्रभावशाली कलाकार हैं, लेकिन उन्हें उनकी प्रतिभा के मुताबिक काम नहीं मिले.उनके बारे में कुछ निर्देशकों को कहते सुना है... यार कलाकार तो उम्दा है, लेकिन उसका रंग गाढ़ा(सांवला) है.
हाल ही में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने यह बात दोहरायी है. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि रंग और वर्ण की वजह से उन्हें भी रिजेक्शन झेलना पड़ा है. लंबे संघर्ष के बाद उन्हें कामयाबी और पहचान मिल गई है, लेकिन अभी तक फिल्मों की मुख्य भूमिकाओं के लिए उन्हें काबिल नहीं समझा जाता है. उन्हें मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों में केंद्रीय भूमिकाओं का इंतजार है. उन्हें इंतजार है कि कुछ निर्देशक आयें और बतौर हीरो उन्हें फिल्मी दें. उन्हें केंद्रीय भूमिका में खास तरह की फिल्में ही मिल पाती हैं.
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में रंग और वर्ण का मसला गहरा और गंभीर है. ऐसा लग नहीं रहा है कि इस मानसिकता से जल्दी निजात मिलेगी, हां, यह बदलाव तब आसान और मुमकिन होगा, जब फिल्मों के नायक-नायिका बदलें अभी हिंदी फिल्मों के नायक-नायिका जिस तबके के चुने और लिखे जाते हैं, उनके लिए कलाकारों का चुनाव करते समय गौर वर्ण का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव काम करता रहता है. नायक-नायिका की पृष्ठभूमि बदलेगी तो उनका रंग भी बदलेगा.


Tuesday, December 31, 2019

सिनेमालोक : विदा 2019


सिनेमालोक
विदा 2019
अजय ब्रह्मात्मज
2019 का आखिरी दिन है आज. पिछले हफ्ते रिलीज हुई राज मेहता की फिल्म ‘गुड न्यूज़’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को कामयाबी का शुभ समाचार दे गई. अक्षय कुमार. करीना कपूर खान. दिलजीत दोसांझ और कियारा आडवाणी की यह फिल्म पहले वीकेंड में 60 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर चुकी है. जाहिर सी बात है कि अक्षय कुमार की फिल्म 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगी.’केसरी’, ‘मिशन मंगल’. ‘हाउसफुल 4’ और ‘गुड न्यूज़’ की भरपूर कमाई से अक्षय कुमार सफल सितारों की अगली कतार में सबसे आगे खड़े हैं. उन्हें रितिक रोशन की वाजिब मुकाबला दे रहे हैं. ‘सुपर 30’ और ‘वॉर’ की कामयाबी ने उन्हें अगली कतार में ला दिया है. कुछ और सितारे भी जगमगाते रहे कुछ की चमक बढ़ी और कुछ की धीमी पड़ी. बकामयाबी के दूसरे छोर पर आयुष्मान खुराना भी तीन फिल्मों की सफलता के साथ मुस्कुरा रहे हैं. इन दोनों छोरों के बीच कार्तिक आर्यन हैं, जो धीमे से अपनी धमक बढ़ाने में आगे रहे. कामयाब रणवीर सिंह भी रहे.
अभिनेत्रियों की बात करें तो तापसी पन्नू और भूमि पेडणेकर के लिए 2019 विविधता लेकर आया. दोनों अभिनेत्रियों ने बढ़त हासिल की और जाहिर किया कि वे हर तरह की भूमिकाओं में सक्षम हैं. दोनों कंगना रनोट के साथ अगली कतार में हैं. कंगना रनोट ‘मणिकर्णिका’ और ‘जजमेंटल है क्या’ से साबित करती हैं कि वह इस दौर की समर्थ अभिनेत्री हैं. पिछले साल की चर्चित और कामयाब अभिनेत्रियां इस साल कम रिलीज और गौण भूमिकाओं की वजह से अगली कतार से खिसक गयीं. कियारा आडवाणी की फिल्में कामयाब रहीं, लेकिन फिल्मों की सफलता का सेहरा अभिनेताओं को मिला. कियारा आडवाणी का हाल कहीं सोनाक्षी सिन्हा सरीखा ना हो जाए जो तमाम बेहतर कमाई की फिल्मों की नायिका तो रहीं लेकिन उनके हिस्से कामयाबी नहीं आई.
अभिनेता-अभिनेत्रियों के उल्लेख के बाद 10 सफल फिल्मों की सूची कलेक्शन के हिसाब से बनाएं तो रितिक रोशन और टाइगर श्रॉफ की सिद्धार्थ आनंद की ‘वॉर’ सबसे आगे रही है. उससे यशराज फिल्म्स को निश्चित ही बड़ी राहत और ताकत मिली है. दूसरे नंबर की कामयाब फिल्म ‘कबीर सिंह’ है. ‘कबीर सिंह’ की लोकप्रियता बताती है कि हिंदी फिल्मों के दर्शक किस प्रकार के नायक से अभिभूत होते हैं. बाकी सात फिल्मों में ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘भारत’. ‘मिशन मंगल’, ‘हाउसफुल 4’, गली ब्वॉय’, ‘टोटल धमाल’, ‘छिछोरे’ और ‘सुपर 30’ हैं. इन फिल्मों से आम दर्शकों की पसंद की जानकारी मिलती है. ‘टोटल धमाल’ और ‘हाउसफुल 4’ की जबरदस्त कामयाबी सुधि समीक्षकों को चौकाती है, लेकिन इस सच्चाई से कैसे इनकार किया जा सकता है कि आम दर्शक ऐसी फिल्मों में भी रुचि लेता है. वह सीमित संख्या में ‘आर्टिकल 15’. सेक्शन 375 और ‘सोनी’ जैसी फिल्में भी पसंद करता है ,लेकिन उन्हें सिर-माथे पर नहीं उठाता.
2019 के अपनी पसंद के सार्थक फिल्मों की बात करूं तो उनमें कुछ ऐसी फिल्में होंगी जो दर्शकों तक ढंग से पहुंची नहीं सकीं. उनका हश्र अफसोसनाक है. फिल्मों की वितरण प्रणाली की पेंच में ये फ़िल्में उलझ गयीं. उन्हें बॉक्स ऑफिस पर पर्याप्त समय और ध्यान नहीं मिला, जिसकी वजह से उनकी उड़ान संतोषजनक नहीं दिखती. इस संदर्भ में इवान आयर की ‘सोनी’ और जैगम इमाम की ‘नक्काश’ का विशेष उल्लेख जरूरी होगा. दोनों ही फिल्में कंटेंट और परफॉर्मेंस के लिहाज से आला दर्जे की हैं. समय के साथ दोनों की दर्शकता बढ़ेगी. उनका जिक्र होता रहेगा. ‘आर्टिकल 15 दर्शकों और समीक्षकों की पसंद बनी. ‘गोन केश’, ‘मर्द को दर्द नहीं होता’.’सोनचिरिया’, ‘द स्काई इज पिंक’, ‘हामिद’ और ‘बोम्बरिया’ जैसी फिल्मों ने भी दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान खींचा. ये फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए.
और अंत में ‘पानीपत’ का उल्लेख करूंगा. आशुतोष गोवारिकर की ऐतिहासिक फिल्म अर्जुन कपूर की अपकीर्ति की शिकार हुई. इस फिल्म को न तो दर्शक मिले और ना ही समीक्षक, जबकि पूर्वाग्रहों से परे होकर देखें तो आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘राष्ट्रवाद’ की चपेट में आने से बची. फिल्म में इतिहास को सम्यक नजरिए से पेश किया गया. अभी चल रही भगवा लहर के ‘राष्ट्रवाद’ से अनेक फिल्में प्रभावित दिखीं, जिनमें बेवजह ‘देशभक्ति का उद्घोष’ सुनाई पड़ता रहा. कुल मिला कर यह साल मिश्रित संतोष ही दे सका.


Tuesday, December 24, 2019

सिनेमालोक : फाल्के पुरस्कार और अमिताभ बच्चन


सिनेमालोक
फाल्के पुरस्कार और अमिताभ बच्चन
-अजय ब्रह्मात्मज
कल दिल्ली में 2018 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वितरित किए गए. विभिन्न श्रेणियों में देश की सभी भाषाओं की प्रतिभाओं को सम्मानित करने का यह समारोह पुरस्कार प्रतिष्ठा और प्रभाव के लिहाज से देश में सर्वश्रेष्ठ है. इन दिनों अनेक मीडिया घरानों और संस्थानों द्वारा हिंदी समेत तमाम भाषाओं में फिल्म पुरस्कार दिए जा रहे हैं. इन पुरस्कारों की भीड़ में यह अकेला अखिल भारतीय फिल्म पुरस्कार है, जिसमें देश की सभी भाषाओं के बीच से प्रतिभाएं चुनी जाती हैं. निश्चित ही इस पुरस्कार का विशेष महत्व है. फीचरफिल्म, गैरफीचर फिल्म और फिल्म लेखन की तीन मुख्य श्रेणियों में ये पुरस्कार दिए जाते हैं. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के साथ ही दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी दिया जाता है. यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा के विकास और संवर्धन में अप्रतिम योगदान के लिए किसी एक फिल्मी व्यक्तित्व को सौंपा जाता है. इस साल यह पुरस्कार अमिताभ बच्चन को दिया गया है
पुरस्कार की पूर्व संध्या को अमिताभ बच्चन ने ट्वीट कर अपने प्रशंसकों को सूचना दी... वह बुखार में हैं. उन्हें यात्रा करने से मना किया गया है, इसलिए दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय पुरस्कार में वे शामिल नहीं हो सकेंगे... दुर्भाग्य है मेरा... अफसोस.’ अमिताभ बच्चन इस खास अवसर पर समारोह में उपस्थित नहीं हो सके. उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू ने उनके सम्मान में कहा कि अमिताभ बच्चन स्वयं में एक संस्थान हैं. पिछले पांच दशकों से वे देश-विदेश के दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं. उन्होंने एंग्री यंग मैन से लेकर वृद्ध पिता तक की अपनी भूमिकाओं से पूरे देश की फिल्म इंडस्ट्री को प्रेरित किया है. उन्होंने पूरे मिशन और पैशन के साथ यह सब किया है.
66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के अंतर्गत 50वें दादा साहब फाल्के पुसे सम्मानित अमिताभ बच्चन की फ़िल्मी सक्रियता का भी यह पचासवां साल है. अमिताभ बच्चन ने 1969 में ‘सात हिंदुस्तानी’ से फिल्मी कैरियर की शुरुआत की थी. मशहूर  निर्देशक ख्वाजा मतलब अब्बास ने उन्हें पहला मौका दिया था. उनकी आखिरी रिलीज फिल्म ‘बदला’ है, जिसे सुजॉय घोष ने निर्देशित किया है. अभिनय के साथ अमिताभ बच्चन ने कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया है. टीवी पर जारी उनका शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ भारतीय परिदृश्य में एक अनोखा और लोकप्रिय शो है. 77 साल के हो चुके अमिताभ बच्चन की निरंतर सक्रियता चकित करती है. अच्छी बात है कि उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से भूमिकाएं मिल रही हैं. लेखक उनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखते हुए स्क्रिप्ट लिखते हैं और निर्देशक हर फिल्म में उनकी प्रतिभा के नए आयाम उद्घाटित करते हैं. वे देश के अनोखे और अलहदा अभिनेता हैं, जो इस उम्र में भी सार्थक रूप से सक्रिय हैं.
दैनंदिन जीवन में उनकी सक्रियता का अंदाजा उनकी गतिविधियों से लगाया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर वह सुबह सवेरे स्टूडियो में हाजिर मिलते हैं. शूटिंग और जिम्मेदारियों से फ्री होने के बाद सोशल मीडिया पर उनकी एक्टिविटी चालू होती है. सोशल मीडिया पर उनकी नियमित मौजूदगी भी हैरान करती है. ट्विटर और ब्लॉग पर अमिताभ बच्चन का एक विस्तारित परिवार भी है. अपने फ़ॉलोअर को वे इसी नाम से बुलाते हैं. वे उनसे बातें करते हैं. उन्हें पूरा सम्मान देते हैं. उनकी कोशिश रहती है कि वे विस्तारित परिवार की खुशी में वे शामिल रहें. अपने हर ट्विट और ब्लॉग को वह क्रमिक संख्या देते हैं. उनके ट्विट और ब्लॉग लेखन का अध्ययन और शोध होना चाहिए. उन्होंने अपने जीवन, कैरियर और जिंदगी की बाकी चीजों पर जमकर लिखा है.
इधर वे थोड़े अस्वस्थ चल रहे हैं. उनकी बीमारियों और अस्पताल में भर्ती होने की खबरें आती रहती हैं. अमिताभ बच्चन अपनी बीमारियों को धत्ता देकर पहली फुर्सत में सेट और स्टूडियो में आ जाते हैं. सेट पर लंबे डग भरते हुए उनका आना ही सभी में स्फूर्ति का संचार कर देता है. उनके सहयोगी कलाकारों ने बार-बार बताया है कि वह दो शॉट के बीच में कभी भी वैनिटी में नहीं जाते, वे सेट पर रहना चाहते हैं. सहयोगी कलाकारों की मदद करते हैं. उनसे बातें करते हैं. इस बातचीत में उनकी वरिष्ठता कभी आड़े नहीं आती. सेट पर निर्देशक का आदेश ही उनके लिए सर्वोपरि होता है. अमिताभ बच्चन को कभी किसी ने नखरे दिखाते हुए नहीं देखा या भड़कते हुए भी नहीं देखा. काम के प्रति उनका लगाव और अनुशासन अनुकरणीय है. समय की उनकी पाबंदी के तो आने किस्से हैं. अभिनय में प्रखर अमिताभ बच्चन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर मुखर नहीं रहते. उनकी चुप्पी खलती है, लेकिन यही उनका स्वभाव है. वे शायद ही कभी किसी के विरोध में नजर आए हों. उनके व्यक्तित्व का यह पहलू रहस्यपूर्ण है. क्या यह लोकप्रिय होने की मजबूरी है या कुछ और?


Tuesday, December 17, 2019

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन की बढ़ी लोकप्रियता


सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन की बढ़ी लोकप्रियता
-अजय ब्रह्मात्मज
मुदस्सर अजीज की ‘पति पत्नी और वो’ अभी तक सिनेमाघरों में चल रही है। इस फिल्म की कामयाबी से कार्तिक आर्यन की लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई है। ट्रेड पंडितों की राय में कार्तिक आर्यन भरोसेमंद युवा स्टार के तौर पर उभरे हैं। उनकी लोकप्रियता नई पीढ़ी के दूसरे अभिनेताओं से अलग और विशेष है। पिछले दो-तीन सालों में कार्तिक आर्यन, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना और विकी कौशल ने अपनी फिल्मों से दमदार दस्तक दी है। इन चारों में कार्तिक आर्यन को शेष तीन की तरह विषय प्रधान फिल्में नहीं मिलीं। बतौर एक्टर उन्हें बड़ी सराहना भी नहीं मिली, बल्कि कुछ समीक्षकों की राय में कार्तिक आर्यन को अभी समर्थ अभिनेता की पहचान बनाने में थोड़ा वक्त और लगेगा। समीक्षकों की उपेक्षा और आलोचना के बीच कार्तिक आर्यन ने दर्शकों के बीच लोकप्रियता हासिल की। फिल्म दर फिल्म उनकी स्थिति मजबूत होती गई है। इम्तियाज अली की उनकी फिल्म पूरी हो चुकी है, जो अगले साल फरवरी में रिलीज होगी।
कार्तिक आर्यन 2011 शुरुआत की। ‘प्यार का पंचनामा’ उनकी पहली फिल्म थी। इस फिल्म के बाद उन्हें ‘आकाशवाणी’ और ‘कांची’ जैसी फिल्में मिलीं. ‘कांची’ के निर्देशक सुभाष घई थे। इन दोनों फिल्मों को दर्शकों ने अधिक पसंद नहीं किया था। जाहिर सी बात है कि ठोस मौजूदगी ना हो तो पिछली फिल्मों की असफलता कैरियर के लिए ग्रहण बन जाती है। रोशन हो रही राह में अंधेरा छाने लगता है। आसपास के लोग कन्नी काटने लगते हैं और कामयाबी के ककहरे पर चलने वाली फिल्म इंडस्ट्री के लिए आप कम प्रयोग में आने वाले अक्षर बन जाते हैं। ठीक-ठाक सी शुरुआत के बाद मिले ऐसे अंधेरों से डर लगता है कि कहीं कैरियर की गति पर स्थाई विराम न लग जाए? कार्तिक आर्यन भी छोटे कैरियर में उदास दिनों से गुजर चुके हैं। उनकी घबराहट और छटपटाहट भी देखी है मैंने।
फिर फिल्में चलनी शुरू हुईं और राह में रोशनी लौटी। ‘प्यार का पंचनामा 2 और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी ने’ जरूरी कामयाबी दी। उत्तरोत्तर मिल रही सफलता में कार्तिक ने संयम से काम लिया। वह सधे कदमों से सीढ़ियां चढ़ते रहे। ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ की सफलता ने उनके लिए फिल्म इंडस्ट्री के दरवाजे का एक पल्ला खोल दिया। कार्तिक आर्यन ने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया और ढंग से फिल्मों का चुनाव किया और कैरियर की लॉन्चिंग की। नतीजा सभी के सामने है। ‘लुकाछिपी’ और ‘पति पत्नी और वो’ ने उनके दर्शक और प्रशंसक बढ़ा दिए। उनकी आरंभिक कामयाबी में लव रंजन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनकी फिल्मों से ही कार्तिक आर्यन को आवश्यक पहचान मिली। अदायगी की कुछ विशेषताएं उनके साथ जुड़ीं। इसके बाद ‘लुकाछिपी’ और ‘पति पत्नी और वो’ ने उनकी स्थिति काफी मजबूत कर दी है। इन दोनों फिल्मों की रिलीज के पहले वे इम्तियाज अली की फिल्म साइन कर चुके थे, जिसमें उनकी हीरोइन सारा अली खान हैं।
इस फिल्म के शुरू होने से पहले एक टॉक शो में सारा अली खान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह कार्तिक आर्यन के साथ डेट पर जाना चाहेंगी। सैफ अली खान की बेटी सारा का यह उद्घाटन कार्तिक आर्यन के लिए कारगर साबित हुआ। टॉक शो के आने के पहले ही उनकी चर्चा होने लगी और गूगल पर भारी सर्च हुआ। कुछ समय के बाद इम्तियाज अली ने कार्तिक आर्यन और सारा अली खान को लेकर फिल्म की घोषणा कर दी। यह कहीं न कहीं कार्तिक आर्यन की बढ़ती लोकप्रियता पर एक सफल फिल्मकार की मुहर थी।
कार्तिक आर्यन के व्यक्तित्व में स्टारडम की बात करें तो वह मिलेनियल पीढ़ी के शहरों और कस्बाई युवकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी खास स्टाइल है, जो युवक-युवतियों को पसंद आती है। बिखरे-खड़े बाल और हल्की दाढ़ी के साथ ज्यादाटार जैकेट और हुडी में नजर आने वाले कार्तिक आर्यन धीरे-धीरे फैशन आइकन के तौर पर उभरे हैं। जिस मात्र और प्रकार से कंज्यूमर प्रोडक्ट उनका उपयोग कर रहे हैं, उससे जाहिर है कि बाजार में उनकी मांग बढ़ी है। इधर फिल्में कामयाब हो ही रही है। 2019 हर लिहाज से उनके लिए सार्थक साबित हुआ है। यह 2020 और आगे का संकेत भी दे रहा है।


Tuesday, December 3, 2019

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों में पंजाबी गाने


सिनेमालोक
हिंदी फिल्मों में पंजाबी गाने
-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्मों की कहानियां हिंदी प्रदेशों में जा रही हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार के साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की कहानियां हिंदी फिल्मों में आने लगी हैं. हिंदी फिल्मों का यह शिफ्ट नया और सराहनीय है. लंबे समय तक हिंदी फिल्मों ने पंजाब की सैर की. पंजाब आज भी हिंदी फिल्मों में आ रहा है, लेकिन अब वह यश चोपड़ा वाला पंजाब नहीं रह गया है. युवा फिल्मकार किसी फिल्म में उनसे आगे तो किसी फिल्म में उनसे पीछे दिखाई पड़ते हैं. सच्ची और सामाजिक कहानियां भी बीच-बीच में आ जाती हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में पंजाब का प्रभाव रच-बस गया है. फिल्म कलाकार पंजाब से आते हैं. फिल्मों के किरदारों के सरनेम पंजाबी होते हैं. पंजाबी रीति-रिवाज और संगीत भी हिंदी फिल्मों में पसर चुका है. किसी समय यह नवीनता बड़ा आकर्षण थी. अब इसकी अधिकता विकर्षण पैदा कर रही है. हिंदी प्रदेशों की कहानियों में जब अचानक पंजाबी बोल के गाने सुनाई पड़ते हैं तो खटका लगता है. कई फिल्मों में खांटी पटना, लखनऊ, कानपुर, भोपाल और इलाहाबाद के किरदार पंजाबी गीत गाते सुनाई पड़ते हैं, किसी शोधार्थी को इस विषय पर शोध करना चाहिए कि क्यों और कैसे हिंदी फिल्मों में पंजाबी गानों का चलन बढ़ा? यह शोध का रोचक विषय हो सकता है.
देश विभाजन के पूर्व हिंदी फिल्मों के आरंभिक काल में मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर में भी हिंदी फिल्में बन रही थीं.मुंबई के समकक्ष तो नहीं, लेकिन लेकिन उल्लेखनीय संख्या में बंगाल पंजाब की प्रतिभाएं हिंदी फिल्मों में योगदान कर रही थीं. आकार ले रही हिंदी फिल्मों के संवाद की भाषा में स्थानीय भाषाओं का प्रभाव था, लेकिन वह मुख्य रूप से हिंदी-उर्दू की मिश्रित हिंदुस्तानी का रूप ले रही थी. कोलकाता की हिंदी फिल्मों में बांग्ला भाषा और संस्कृति का ठोस प्रभाव दिखाई पड़ता था. वैसे ही लाहौर में बन रही हिंदी फिल्मों में पंजाबी भाषा और संस्कृति का पुट रहता था. खास कर संगीत में यह पुट और स्पष्ट तरीके से परिलक्षित होता था. गीत-संगीत में इस प्रभाव से विविधता भी आ रही थी. इधर मुंबई की हिंदी फिल्में स्थानीय मराठी संगीत और संस्कृति के प्रभाव से निकलकर अखिल भारतीय स्वरूप ले रही थीं. आजादी के पहले और उसके बाद के दशकों में पंजाबी संगीत का प्रभाव हिंदी फिल्मों में मजबूत हुआ. संगीतकार और गीतकार भी पंजाब से आए. नतीजा हुआ कि हिंदी फिल्मों के संगीत और धुनों पर पंजाब का रंग रहा. पंजाब के रंग के साथ ही पुरबिया संगीत के साथ बोली भी हिंदी फिल्मों में सुनाई पड़ती रही.भोजपुरी और अवधी के शब्द सुनाई पड़ते रहे.
इधर दो दशकों से हिंदी फिल्मों में पंजाबी संगीत का असर तेजी से बढ़ा है. धीरे-धीरे पंजाबी गीत-संगीत ने राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया है. ना सिर्फ फिल्म... हिंदी समाज के दैनंदिन जीवन (शादी और दूसरे पारिवारिक समारोह) में पंजाबी गीतों का चलन बढ़ा है. बारात में डीजे पंजाबी गीत बजाते हैं और हिंदी समाज के युवा बाराती उन धुनों पर खूब नाचते हैं. अनायास और अप्रत्यक्ष रूप से पंजाबी गीत-संगीत की लोकप्रियता इस कदर फैली है कि उनके बिना हर समारोह अधूरा और उदास लगता है. पंजाबी गीत-संगीत के साथ पांव उछलने और शरीर मचलने लगता है. क्या पंजाबी गीतों की धुन में ऐसी जबरदस्त थिरकन है या हमने बाकी गीत-संगीत को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है.
ट्रेड के लोग बताते हैं कि अभी टी सीरीज म्यूजिक कंपनी के तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय है. इन दिनों वे फिल्म निर्माण में भी आ गए हैं. उनके पास पंजाबी गीतों का खजाना है. उस खजाने में से एक-दो लोकप्रिय धुनों को वे नई फिल्म के हिसाब से चुनते हैं और जरूरत नहीं होने पर भी फिल्मों में डाल देते हैं. कई बार फिल्म की थीम से उन गानों की संगति नहीं होती, लेकिन जबरदस्त प्रचार और प्रमोशन से वे गाने पॉपुलर हो जाते हैं. दावा तो यह भी किया जाता है कि फिल्म की सफलता में इन पंजाबी गीतों का योगदान होता है. कमाई और लाभ के हिसाब से यह ठीक हो सकता है, लेकिन हिंदी फिल्मों में पंजाबी गीत-संगीत की मौजूदगी स्थानीयता को खत्म करती है. परोक्ष रूप से ही यह फिल्म के प्रभाव को भी कमजोर करती है.


Thursday, November 28, 2019

सिनेमालोक : सेंसर नहीं होगी वेब सीरीज


                                                                                                           
सिनेमालोक
सेंसर नहीं होगी वेब सीरीज
-अजय ब्रह्मात्मज
ऑनलाइन स्ट्रीमिंग की तकनीक के प्रसार और ओटीटी प्लेटफॉर्म के पॉपुलर होने के साथ नैतिकता, राष्ट्रीयता और शुद्धता के पहरुए जाग गए हैं. लगातार सरकार पर दबाव डाला जा रहा है कि वेब सीरीज और दूसरे मनोरंजक स्ट्रीमिंग कंटेंट की निगरानी की जाए. उनका आग्रह है कि वेब सीरीज में गाली-गलौज और अश्लीलता बढ़ती जा रही है. राष्ट्रीय हितों का ख्याल नहीं रखा जा रहा है. दक्षिणपंथी सोच के स्तंभकार और लेखक-पत्रकार चाहते हैं कि वेब सीरीज को भी सेंसरशिप के घेरे में लाया जाए. उनकी आपत्ति है कि कई बार इन वेब सीरीज में राष्ट्र विरोधी बातें होती है. उनकी बातों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि वे सत्ताधारी पार्टी की सोच की विरोधी टिप्पणी और विचार पर पाबंदी चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि सरकार विरोधी बातों पर आधारित संवाद हो.
मामला कोर्ट में भी गया है. कोर्ट ने भी पाबंदी या सेंसरशिप से  सहमति नहीं दिखाई. पिछले दिनों चल रहे विचार-विमर्श में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चाएं हुईं. शुद्धतावादियों के आग्रह को स्वीकार नहीं किया गया. पिछले दिनों एक ज़िम्मेदार सरकारी अधिकारी ने बताया कि फिलहाल ओटीटी प्लेटफॉर्म के कार्यक्रमों को सेंसरशिप के दायरे में लाने की जरूरत नहीं है. हाँ, कुछ नियम और शर्तें जरूर होनी चाहिए, जिनका सभी पालन करें. जैसे भारत का गलत मानचित्र नहीं दिखाया जाए. राष्ट्रीय झंडे का अपमान नहीं हो. औरतों को अश्लील तरीके से पेश करने पर भी आपत्ति रही है. सरकारी अधिकारी ने सेल्फ सेंसरशिप की बात जरूर कही है. सेल्फ सेंसरशिप के मुद्दे पर ओटीटी प्लेटफार्म के एक संगठन ने पहले ही अपने लिए कुछ नियम तय कर लिए हैं. अमेजॉन अभी तक सेल्फ सेंसरशिप के तर्क से सहमत नहीं है.
दर्शकों का बड़ा हिस्सा और वेब सीरीज से जुड़े निर्माता, निर्देशक और कलाकारों में से अधिकांश किसी प्रकार की सेंसरशिप नहीं चाहते. हिंदी फिल्मों में जिस तरह की अघोषित सेंसरशिप चलती है, वैसी सेंसरशिप की भी हिमायत कोई नहीं करता. वास्तव में फिल्मों के लिए भी सेंसरशिप नहीं है. हम जिसे सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, वह वास्तव में सीबीएफ़सी(सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) है. इस बोर्ड का काम फिल्म देख कर यू,ए या यूए प्रमाण पत्र देना है. अगर निर्माता ए प्रमाण पत्र मिली फिल्म के लिए यू या यूए प्रमाण पत्र चाहता है तो बोर्ड के सदस्य कुछ दृश्यों को काटने या छोटा करने की सलाह देते हैं.  पहलाज निहलानी जब सेंसर बोर्ड के प्रमुख थे तब इस तरह की सेंसरशिप पर कई विवाद हुए. अभी प्रसून जोशी सीबीएफसी के उच्च अधिकारी हैं. उनके नेतृत्व में बोर्ड के सदस्य शुद्धतावादियों की तरह कार्य नहीं करते हैं. वे केवल राजनीतिक खासकर सत्ताधारी पार्टी की राजनीति के हितों का जरूर ख्याल रखा जाता हैं.
वैसे भी वेब सीरीज के प्रसार के इस दौर में फिल्मों का असर तेजी से हुआ है. ओरिजिनल वेब सीरीज तो गिनती के ही बने हैं. ज्यादातर पोपुलर वेब सीरीज विदेशी हैं या विदेशों के पॉपुलर वेब सीरीज का भारतीयकरण हो रहा है. इन दिनों हिंदी फिल्मों में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ज्वर और ज्वार चढ़ा हुआ है. वेब सीरीज भी इससे अप्रभावित नहीं रहे. रोमांच के साथ राष्ट्रवाद का अच्छा मेल हो जाता है. वेब सीरीज के निर्देशन में आ रहे निर्देशकों के लिए यह युक्ति काम की होती है. वे ऐसे विषयों की खोज और चुनाव में लगे हैं, जिनमें राष्ट्रीय भावना पर पारोसी जा सके. गाली-गलौज और अश्लीलता तो दर्शकों को रिझाने का आसान तरीका हो गया है. अब तो नाटकों और साहित्य में भी धड़ल्ले से गालियां दी जा रही है और अश्लीलता परोसी जा रही है. यह भी एक फेज है, जो कुछ समय के बाद खुद ही उतर या बदल जाएगा


Tuesday, November 19, 2019

सिनेमालोक : आ रहीं ऐतिहासिक फिल्में


सिनेमालोक
आ रहीं ऐतिहासिक फिल्में  
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले शुक्रवार को यशराज फिल्म्स की डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बन रही ‘पृथ्वीराज’ की पूजा के साथ विधिवत शुरुआत हो गई. इस फिल्म में अक्षय कुमार और मानुषी छिल्लर मुख्य भूमिकायें निभा रहे हैं. उनके साथ संजय दत्त, आशुतोष राणा, मानव विज और अन्य कलाकार हैं. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी को हम सभी टीवी धारावाहिक ‘चाणक्य’ के उल्लेखनीय निर्देशन के लिए जानते हैं. उन्होंने अभी तक ‘पिंजर’, ‘जेड प्लस’ और ‘मोहल्ला अस्सी’ फिल्मों के निर्देशन से अपनी एक पहचान बना ली है. खासकर भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी उनकी फिल्म ‘पिंजर’ की विशेष चर्चा होती है. यह फिल्म अमृता प्रीतम के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की पहले की तीनों फिल्में किसी न किसी सहितियिक कृति पर आधारित है.’ पृथ्वीराज’ के लिए भी उन्होंने चंदबरदाई की ‘पृथ्वीराज रासो’ से कथासूत्र लिए हैं और फिल्म के रूप में उनका विस्तार किया है. अगर ‘पृथ्वीराज’ योजना के मुताबिक बन गई तो ऐतिहासिक फिल्मों के संदर्भ में यह नए मानक मानक गढ़ेगी.
वास्तव में डॉ. चंद्रप्रकाश द्वेदी अपनी फिल्मों में काल और परिवेश पर विशेष ध्यान देते हैं. उनकी पहली फिल्म ‘पिंजर ने विभाजन के समय के भारत को पेश किया था. ‘जेड प्लस’ में आज का राजस्थान था तो ‘मोहल्ला अस्सी’ में पिछली सदी के नौवें और अंतिम दशक का बनारस... बनारस में भी अस्सी घाट था. मुंबई में स्थित फिल्मसिटी में इस फिल्म के सेट को देखकर ‘काशी का अस्सी’ के लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह और उनके बड़े भाई मशहूर आलोचक नामवर सिंह चौक गए थे. दोनों की राय में डॉ. द्विवेदी ने अस्सी घाट की गली और पप्पू की दुकान को हूबहू मुंबई में गढ़ लिया था. इसी प्रकार ‘पिंजर’ में विभाजन के समय के भारत को उन्होंने मुंबई की फिल्मसिटी में तैयार किया था. ‘पृथ्वीराज’ के लिए भी मुंबई के यशराज स्टूडियो में सेट लगाए गए हैं. फिल्म की प्रगति के साथ सेट बदले जाएंगे.
आज यानी मंगलवार को ओम राउत निर्देशित ‘तानाजी’ का ट्रेलर आया है. ‘तानाजी’ छत्रपति शिवाजी के मित्र और किलेदार थे. शिवाजी ने उन्हें मुगलों के अधीन एक गढ़ को अपने कब्जे में लेने के लिए भेजा था. इस गढ़ का रणनीतिक महत्व था. शिवाजी के आदेश पर तानाजी ने बहादुर सैनिकों की मदद से इस किले को जीता. हालांकि गढ़ जीतने की लड़ाई में घायल तानाजी शहीद हो गए थे. उनकी शहादत पर दुखी होकर छत्रपति शिवाजी ने कहा था ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’. उन्होंने तानाजी को सिंह कहा था और कोंडाना गढ़ को नया नाम सिंहगढ़ दिया था. सिंहगढ़ की लड़ाई पर मराठी साहित्यकार हरिनारायण आप्टे ने छत्रपति शिवाजी महाराज की उक्ति को ही अपने उपन्यास का शीर्षक बना दिया था.. ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’. इस उपन्यास पर पहले बाबूराव पेंटर ने 1923 में ‘सिंहगढ़’ फिल्म का निर्देशन किया. बाद में 1933 में प्रभात चित्र कंपनी के लिए वी. शांताराम ने ‘सिंहगढ़’ का निर्देशन किया. इसमें तानाजी की भूमिका मास्टर विनायक ने निभाई थी. नई फिल्म ‘तानाजी’ में अजय देवगन तानाजी की शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं. उनके साथ सैफ अली खान और काजोल मुख्य भूमिकाओं में हैं.
ऐतिहासिक फिल्मों के इस उभार में आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ का उल्लेख आवश्यक है. ‘जोधा अकबर’ और  ‘मोहनजोदाड़ो’ जैसी ऐतिहासिक फिल्में बना चुके आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ वास्तव में पानीपत में हुए तीसरे युद्ध की पृष्ठभूमि पर है. इस युद्ध में अफगानी बादशाह अहमद शाह अब्दाली और मराठा पेशवा सदाशिव राव भाऊ के बीच हुए निर्णायक युद्ध का बैकड्राप है. इसे पानीपत का तीसरा युद्ध भी कहते हैं. आशुतोष गोवारिकर की पानीपत में अर्जुन कपूर सदाशिवराव भाऊ और संजय दत्त अहमद शाह अब्दाली की भूमिका निभा रहे हैं. कृति सैनन ने पार्वती बाई की भूमिका निभाई है. उनके अलावा जीनत अमान, पद्मीनी कोल्हापुरे, कुणाल कपूर आदि मुख्य भूमिकाओं में हैं.
इन तीनों फिल्मों के निर्माण और दर्शकों के रिस्पांस से 21वीं सदी में ऐतिहासिक फिल्मों की दिशा तय होगी. तकनीक और  वीएफएक्स के विकास से निर्माता-निर्देशक को भारी मदद मिलेगी. एक संकेत मिल रहा है कि तीनों फिल्मों में अलग-अलग संदर्भ के साथ राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बातें होंगी. देखना यह होगा कि तीनों निर्देशक और उनके लेखक अतीत की इन कहानियों और चरित्रों को आज के हिसाब से कितना सामयिक और प्रासंगिक बना कर पेश कर पाते हैं.


Tuesday, November 12, 2019

सिनेमालोक : उभरे कलाकार की फीस


सिनेमालोक
उभरे कलाकार की फीस
अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों एक प्रोडक्शन हाउस में बैठा हुआ था. उनकी नई फिल्म की योजना बन रही है. इस फिल्म में एक जबरदस्त भूमिका पंकज त्रिपाठी को ध्यान में रखकर लिखी गई है. चलन के मुताबिक वे लीड में नहीं है, लेकिन उनका रोल हीरो के पैरेलल है. उनके होने से फिल्म के दर्शनीयता बढ़ जाएगी. पंकज अपनी फिल्मों में एक रिलीफ के तौर पर देखे जाते हैं. उनकी मौजूदगी दर्शकों का इंटरेस्ट बढ़ा देती है. कई बार अनकहा दारोमदार उनके ऊपर होता है. जाहिर सी बात है कि उभरी पहचान और जरूरत से उनकी मांग बढ़ी है. हफ्ते के सात दिन और दिन के चौबीस घंटों में ही उन्हें फिल्मों के साथ अपनी तकलीफ ,तफरीह और परिवार के लिए भी जरूरी समय निकालना पड़ता है. मांग और आपूर्ति के पुराने आर्थिक नियम से पंकज त्रिपाठी के भाव बढ़ गए हैं. पंकज के भाव का बढ़ना ही इस प्रोडक्शन हाउस की मुश्किलों का सबब बन गया है.
बात चली कि आप तो उन्हें जानते हैं? हां में सिर हिलाने के बाद आग्रह होता है, उनसे एक बार बात कीजिए ना! बताइए उन्हें हमारे बारे में और फिल्म के बारे में. निजी तौर पर मैं इस तरह की बैठकोण और मुलाकातों को प्रश्रय नहीं देता, लेकिन फिल्म बिरादरी से संपर्क और मेलजोल की वजह से कई बार निर्माता और निर्देशक नए कलाकारों, लेखकों और तकनीशियनों के बारे में पूछते रहते हैं. उस समय जिस किसी में भी संभावना दिख रही होती है और अगर वह उत्तर भारत का होता है तो मैं सहज ही बता देता हूं. स्पष्ट कर दूं कि कभी किसी की सिफारिश नहीं करता. जिनके बारे में कभी बताया या संस्तुति की. उन्हें भी नहीं बताता. कई से तो परिचय भी नहीं रहता. मुझे याद है कि कुछ जगहों पर पंकज त्रिपाठी का जिक्र करने पर नाक-भौं सिकोड़ने और उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज करने वाले मिल जाते थे. वे उनकी मार्किट वैल्यू की बातें करने लगते थे. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का दस्तूर है. यहां पहला मौका देने की हिम्मत पारखी ही कर पाते हैं. वे दांव लगाते हैं`. जरूरी नहीं कि उनके दांव हमेशा सही हों,लेकिन वे नई प्रतिभाओं को परखने और अवसर देने का काम करते हैं. कभी महेश भट्ट ऐसा करते थे. फिर रामगोपाल वर्मा आए और अभी अनुराग कश्यप हैं. और भी निर्माता-निर्देशक होंगे. बड़ी संख्या उन निर्माता-निर्देशकों की है जो किसी प्रतिभा के चमकते ही लपकते हैं. उसे अग्रिम राशि देकर साइन कर लेते हैं और मुनाफे का ध्यान रखकर प्रोजेक्ट तैयार करते हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यही चलता रहता है. इसी प्रक्रिया में कुछ  नयी प्रतिभाएं आती हैं. कुछ टिकती हैं और कुछ चार दिनों की चमक के बाद खो जाती हैं. पिछले कुछ सालों में उभरे कलाकारों में रसिका दुग्गल, राधिका मदान, सीमा पाहवा, संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी आदि का नाम लिया जा सकता है.
इन दिनों पंकज त्रिपाठी का जलवा है. उनके साथ आए और संघर्ष के दिनों के उनके साथी लेखक, निर्देशक और निर्माता बन रहे हैं. उन सभी की ख्वाहिश रहती है कि लोकप्रियता में आगे बढ़ चुके पंकज त्रिपाठी सरीखे कलाकार उनकी फिल्मों में आ जाएंगे तो उन्हें भी कुछ कर दिखाने का मौका मिल जाएगा. मैंने देखा है कि ग्रामीण और कस्बाई पृष्ठभूमि से आई प्रतिभाएं अपने साथियों की तरक्की का ख्याल भी करती हैं, लेकिन ज्यादातर मौकों पर पैसों को लेकर बात अटक जाती हैं. पुराने साथियों को यही उम्मीद रहती है कि उभर रहा या उभर चुका कलाकार कम पैसों में उनके साथ काम कर लेगा. उन्हें सहयोग देगा. लोलुप निर्माता भी चाहता है कि संघर्षशील लेखक और निर्देशक अपने पुराने साथी को कम पैसों में काम करने के लिए राजी कर ले.वास्तव में मुनाफाखोर निर्माता पुराने साथियों के भावनात्मक रिश्ते का आर्थिक दोहन करना चाहता है. कुछ निर्माता इस उद्देश्य में सफल भी हो जाते हैं.
पहली फिल्म के बाद ‘इनसाइडर’ या कथित हीरो अपना पारिश्रमिक बढ़ाए या पहली बड़ी कामयाबी के बाद पारिश्रमिक तिगुना कर दे तो भी कोई दिक्कत नहीं होती. निर्माता ख़ुशी-ख़ुशी बढ़ी कीमत के लिए तैयार हो जाते हैं. पारिश्रमिक में ऐसी ही बढ़ोतरी कोई ‘आउटसाइडर’ या सहयोगी कलाकार करे तो उसके बारे में कानाफूसी चालू हो जाती है... भाव बढ़ गया है.. बदल गया है...ऐंठ  आ गई है... उड़ रहा है. ऐसी टिप्पणियां करते समय सभी भूल जाते हैं कि अपनी बढ़ती लोकप्रियता के अनुपात में उसकी मांग उचित है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कोई स्टैंडर्ड रेट कार्ड तो है नहीं कि कलाकार किस दर से अपने पैसे बढ़ाए और कितनी रकम उसके लिए उचित मानी जाए?


Tuesday, November 5, 2019

सिनेमालोक : अब की पति पत्नी और वो


सिनेमालोक
अब की पति पत्नी और वो
-अजय ब्रह्मात्मज
41 साल पहले 12 मई 1978 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ की रीमेक 6 दिसंबर 2019 को रिलीज होगी. सामाजिक विषयों पर गंभीर और उत्तेजक फिल्मों के निर्देशन-निर्माण के लिए मशहूर बीआर चोपड़ा ने अपनी मुख्य शैली से विक्षेप लेकर ‘पति पत्नी और वो’ का निर्माण और निर्देशन किया था. आज के दर्शकों को मालूम नहीं होगा कि इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने लिखा था. कमलेश्वर ने पुरुष के जीवन में पत्नी के अलावा वो की कल्पना से इस कॉमिक सिचुएशन की फिल्म सोची थी. सामाजिक सच्चाई तो यही है कि समाज में ऐसे किस्से’सुनते को मिलते रहते हैं और वो की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है.
कमलेश्वर ने पुरुष की फितरत के रूप में वो की कल्पना की थी. मूल फिल्म में पहले एक एनिमेशन आता है, जिसमें आदम और हव्वा को दिखाया गया है. आदम और हव्वा निषिद्ध सेव खाते हैं और उनके अंदर कामेच्छा जगती है. इसकी वजह से उन्हें स्वर्ग से निकालकर धरती पर धकेल दिया जाता है. कहते हैं आदम और हव्वा धरती पर रहते हैं और कभी-कभी उनकी जिंदगी में वह निषिद्ध फल वो की तरह आ ही जाता है. फिल्म की शुरुआत किशोर कुमार की आवाज में आदम-हव्वा की कहानी के गीत से होती है, जो आज के संजीव कुमार(रंजीत चड्ढा) और विद्या सिन्हा(शारदा चड्ढा) के परिचय साथ पूरी होती है. साइकिल की टक्कर से दोनों में प्यार होता है. शादी होती है और एक बच्चा भी हो जाता है. दोनों की शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही है. इस बीच रंजीत का प्रमोशन होता है. उन्हें एक सेक्रेटरी रंजीता कौर(निर्मला देशपांडे} मिल जाती है. इसके बाद सारे समीकरण बदलते हैं और हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं.
2019 की ‘पति पत्नी और वो’ कानपुर शिफ्ट हो गई है. अब पति का नाम चिंटू उर्फ़ अभिनव त्यागी(कार्तिक आर्यन) हो गया है. उनकी पत्नी वेदिका त्यागी(भूमि पेडणेकर) हैं और वो के रूप में तपस्या सिंह(अनन्या पांडे) आती हैं. शहर कानपुर होने से परिवेश और पृष्ठभूमि बदली है. 2019 की कहानी होने से काल बदल गया है चिंटू त्यागी पिता के दबाव में रहता है और शहर में ही छोटी-मोटी नौकरी कर लेता है. मूल फिल्म में रंजीत चड्डा का दोस्त अब्दुल करीम दुर्रानी(असरानी) है. रीमेक में भी पति चिंटू त्यागी का दोस्त मुसलमान है. उसका नाम रिज़वी(अपारशक्ति खुराना) हो गया है. वह वास्तव में चिंटू त्यागी का फ्रेंड,फिलोस्फर और गाइड है.
मूल फिल्म कमलेश्वर ने लिखी थी. रीमेक फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज ने लिखी है. मुदस्सर की फिल्मों में गजब की कॉमिक टाइमिंग और पंच लाइनें रहती है. रीमेक का ट्रेलर देख चुके पाठक मानेंगे कि इस बार आज के हिसाब से पंच लाइनें हैं और उनमें कानपुर का लहजा भी है. मुदस्सर अज़ीज़ ने कार्तिक आर्यन के लुक पर मेहनत की है. कार्तिक आर्यन के बाल ‘शॉकड’ स्टाइल में बिखरे और खड़े रहते हैं. इस फिल्म में मांग निकालकर करीने से संवारे गए हैं. कुछ-कछ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के सीधे-सादे शाह रुख खान की याद आती है. मुदस्सर की भाषा पर अनोखी पकड़ है, जो इस फिल्म के संवादों में झलकती है. हालांकि अभी ट्रेलर ही आया है, लेकिन उम्मीद बनती है कि कुछ हल्का-फुल्का मजेदार  मनोरंजन मिलेगा.
फिल्म की घोषणा के समय मुझे भी लगा था कि संजीव कुमार की भूमिका कार्तिक आर्यन कैसे निभा पाएंगे? लेकिन ट्रेलर से यूं लगा कि मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म की थीम तो ‘पति पत्नी और वो’ की ही रखी है, लेकिन प्रस्तुति पूरी तरह बदल दी है. उसे आज के मिजाज और अंदाज में ढाला है. हाँ,ट्रेलर में रंजीत और शारदा का बिटवा नहीं दिखा है. हो सकता है, उसे गायब ही कर दिया गया हो. कार्तिक आर्यन के साथ भूमि पेडणेकर पत्नी और अनन्या पांडे वो की भूमिका में हैं. मूल फिल्म के गीत रीक्रिएट नहीं किए गए हैं. पता चला कि चिंटू त्यागी ‘ठंडे ठंडे पानी’ से गुनगुनाते रहते हैं.
बीआर चोपड़ा की बहू रेणु चोपड़ा और पोते जोनी चोपड़ा ने रीमेक का निर्माण किया है.



Tuesday, October 29, 2019

सिनेमालोक : बड़े सितारों की चूक


सिनेमालोक
बड़े सितारों की चूक
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते आई साजिद नाडियाडवाला की  फिल्म 'हाउसफुल 4' ने दर्शकों और समीक्षकों को निराश किया. इसकी वजह से फिल्म का कारोबार अपेक्षा से बहुत कम रहा. निर्माता को उम्मीद थी की दिवाली के मौके पर रिलीज हो रही यह फिल्म पहले 3 दिनों में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी. ट्रेड पंडितों का अनुमान था कि पहले दिन ही फिल्म का कारोबार 25 से 35 करोड़ के बीच होगा. अक्षय कुमार  समेत तीन अभिनेताओं और कृति ससैनन समेत तीन अभिनेत्रियों की यह फिल्म रिलीज के पहले से तहलका मचा रही थी.  एक गीत 'बाला बाला बाला शैतान का साला' विचित्र नृत्य मुद्राओं की वजह से लोकप्रिय हो गया था.बाला चैलेंज के तहत फिल्म बिरादरी के सदस्य और आम प्रशंसक हास्यास्पद वीडियो सोशल मीडिया पर डाल रहे थे. उन्हें निर्माता रिट्वीट कर रहे थे. यूँ लग रहा था कि फ़िल्म को इस श्रेणी की पुरानी फिल्मों की तरह भारी कामयाबी मिलेगी.
ऐसा नहीं हो सका. अक्षय कुमार की लोकप्रियता से पहले दिन थोड़े दर्शक आये,लेकिन अगले दिन दर्शक ससससससZकम हो गए. कामयाब फिल्मों का एक ट्रेंड है कि शनि और रविवार को उनके कलेक्शन में 20 से 30 प्रतिशत का इजाफा होता है. इस फ़िल्म का कलेक्शन अगले दिन घट गयाससस्वस्स्ज़ज़्ज़और अब बढ़ने की उम्मीद भी नहीं है. बेहतरीन फिल्में तारीफ से दर्शक बटोरती हैं तो बुरी फिल्में निंदा से दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पातीं. यही 'हाउसफुल 4' के साथ हुआ. आम दर्शकों के साथ बैठ करफ़िल्में देखने से उनकी प्रतिजरियासमझ में आ जाती हैं. निर्माताओं ने तो सोचा था कि दिवाली का वी ।केंड उनके लिए फायदेमंद होगा.
'हाउसफुल 4' का निर्देशन पहले साजिद खान कर रहे थे। उनके 'मी टू' विवाद में फंसने के बाद फ़िल्म की शूटिंग रोक दी गई थी. कलाकारों में भी फेरबदल हुई थी. बाद में फरहाद - शामजी को ज़िम्मेदारी दी गई. फूहड़ और मज़ाकिया संवादों के लिए मशहूर निर्देशक द्वय को निर्देशन की कागज़ी ज़िम्मेदारी दी गई. यह नहीं बताया गया कि साजिद खान ने कितनी गिलम शूट कर ली थी? और फरहाद - शामजी ने कितना किया? यूँ दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा था कि निर्देशन की कमान तो साजिद नाडियाडवाला के हाथों में ही थी. खानापूर्ति के लिए फरहाद-शामजी का नाम दिया गया. इस फ़िल्म की कहानी साजिद नाडियाडवाला की ही है. उन्हें पुनर्जन्म की यह अजीबोगरीब कहानी सूझी,जिसे शूट करने में भारी खर्च भी किया गया. यह बात फैलाई गई कि फ़िल्म की लागत 80 करोड़ ही है. और कलेक्शन पर भी विवाद हुआ कि उसे बढ़ा- चढ़ा कर बताया जा रहा है.
स्थिति जो भी हो,इस तथ्य से इनकार नहीं जिया जा सकता कि अक्षय कुमार औरसजिद नाडियाडवाला सेभरी चूक हुई. जिस मसालेदार युक्ति पर उन्हें विश्वास और भरोसा था,वह काम नहीं आया. पुनर्जन्म जैसी धारणा को इस तरीके से पेश करना दर्शकों के पल्ले नही पड़ा. बाकी कलाकारों की छवि में तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,लेकिन अक्षय कुमार की लोकप्रियता को बट्टा लाह. उनकी पिछली कुछ फिल्में कंटेंट और राष्ट्रवाद के नारों की वजह से चलीं. अभी के दौर में वे भरोसेमंद स्टार माने जाते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि छोटी सी चूक के भी परिणाम बड़े होते हैं. उनके पास कुछ बेहतरी  फिल्में हैं. सचमुच उन्हें ऐसी फूहड़ फिल्मों से किनारा कर लेना चाहिए.