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Tuesday, December 3, 2019

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों में पंजाबी गाने


सिनेमालोक
हिंदी फिल्मों में पंजाबी गाने
-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्मों की कहानियां हिंदी प्रदेशों में जा रही हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार के साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की कहानियां हिंदी फिल्मों में आने लगी हैं. हिंदी फिल्मों का यह शिफ्ट नया और सराहनीय है. लंबे समय तक हिंदी फिल्मों ने पंजाब की सैर की. पंजाब आज भी हिंदी फिल्मों में आ रहा है, लेकिन अब वह यश चोपड़ा वाला पंजाब नहीं रह गया है. युवा फिल्मकार किसी फिल्म में उनसे आगे तो किसी फिल्म में उनसे पीछे दिखाई पड़ते हैं. सच्ची और सामाजिक कहानियां भी बीच-बीच में आ जाती हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में पंजाब का प्रभाव रच-बस गया है. फिल्म कलाकार पंजाब से आते हैं. फिल्मों के किरदारों के सरनेम पंजाबी होते हैं. पंजाबी रीति-रिवाज और संगीत भी हिंदी फिल्मों में पसर चुका है. किसी समय यह नवीनता बड़ा आकर्षण थी. अब इसकी अधिकता विकर्षण पैदा कर रही है. हिंदी प्रदेशों की कहानियों में जब अचानक पंजाबी बोल के गाने सुनाई पड़ते हैं तो खटका लगता है. कई फिल्मों में खांटी पटना, लखनऊ, कानपुर, भोपाल और इलाहाबाद के किरदार पंजाबी गीत गाते सुनाई पड़ते हैं, किसी शोधार्थी को इस विषय पर शोध करना चाहिए कि क्यों और कैसे हिंदी फिल्मों में पंजाबी गानों का चलन बढ़ा? यह शोध का रोचक विषय हो सकता है.
देश विभाजन के पूर्व हिंदी फिल्मों के आरंभिक काल में मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर में भी हिंदी फिल्में बन रही थीं.मुंबई के समकक्ष तो नहीं, लेकिन लेकिन उल्लेखनीय संख्या में बंगाल पंजाब की प्रतिभाएं हिंदी फिल्मों में योगदान कर रही थीं. आकार ले रही हिंदी फिल्मों के संवाद की भाषा में स्थानीय भाषाओं का प्रभाव था, लेकिन वह मुख्य रूप से हिंदी-उर्दू की मिश्रित हिंदुस्तानी का रूप ले रही थी. कोलकाता की हिंदी फिल्मों में बांग्ला भाषा और संस्कृति का ठोस प्रभाव दिखाई पड़ता था. वैसे ही लाहौर में बन रही हिंदी फिल्मों में पंजाबी भाषा और संस्कृति का पुट रहता था. खास कर संगीत में यह पुट और स्पष्ट तरीके से परिलक्षित होता था. गीत-संगीत में इस प्रभाव से विविधता भी आ रही थी. इधर मुंबई की हिंदी फिल्में स्थानीय मराठी संगीत और संस्कृति के प्रभाव से निकलकर अखिल भारतीय स्वरूप ले रही थीं. आजादी के पहले और उसके बाद के दशकों में पंजाबी संगीत का प्रभाव हिंदी फिल्मों में मजबूत हुआ. संगीतकार और गीतकार भी पंजाब से आए. नतीजा हुआ कि हिंदी फिल्मों के संगीत और धुनों पर पंजाब का रंग रहा. पंजाब के रंग के साथ ही पुरबिया संगीत के साथ बोली भी हिंदी फिल्मों में सुनाई पड़ती रही.भोजपुरी और अवधी के शब्द सुनाई पड़ते रहे.
इधर दो दशकों से हिंदी फिल्मों में पंजाबी संगीत का असर तेजी से बढ़ा है. धीरे-धीरे पंजाबी गीत-संगीत ने राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया है. ना सिर्फ फिल्म... हिंदी समाज के दैनंदिन जीवन (शादी और दूसरे पारिवारिक समारोह) में पंजाबी गीतों का चलन बढ़ा है. बारात में डीजे पंजाबी गीत बजाते हैं और हिंदी समाज के युवा बाराती उन धुनों पर खूब नाचते हैं. अनायास और अप्रत्यक्ष रूप से पंजाबी गीत-संगीत की लोकप्रियता इस कदर फैली है कि उनके बिना हर समारोह अधूरा और उदास लगता है. पंजाबी गीत-संगीत के साथ पांव उछलने और शरीर मचलने लगता है. क्या पंजाबी गीतों की धुन में ऐसी जबरदस्त थिरकन है या हमने बाकी गीत-संगीत को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है.
ट्रेड के लोग बताते हैं कि अभी टी सीरीज म्यूजिक कंपनी के तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय है. इन दिनों वे फिल्म निर्माण में भी आ गए हैं. उनके पास पंजाबी गीतों का खजाना है. उस खजाने में से एक-दो लोकप्रिय धुनों को वे नई फिल्म के हिसाब से चुनते हैं और जरूरत नहीं होने पर भी फिल्मों में डाल देते हैं. कई बार फिल्म की थीम से उन गानों की संगति नहीं होती, लेकिन जबरदस्त प्रचार और प्रमोशन से वे गाने पॉपुलर हो जाते हैं. दावा तो यह भी किया जाता है कि फिल्म की सफलता में इन पंजाबी गीतों का योगदान होता है. कमाई और लाभ के हिसाब से यह ठीक हो सकता है, लेकिन हिंदी फिल्मों में पंजाबी गीत-संगीत की मौजूदगी स्थानीयता को खत्म करती है. परोक्ष रूप से ही यह फिल्म के प्रभाव को भी कमजोर करती है.


Thursday, November 28, 2019

सिनेमालोक : सेंसर नहीं होगी वेब सीरीज


                                                                                                           
सिनेमालोक
सेंसर नहीं होगी वेब सीरीज
-अजय ब्रह्मात्मज
ऑनलाइन स्ट्रीमिंग की तकनीक के प्रसार और ओटीटी प्लेटफॉर्म के पॉपुलर होने के साथ नैतिकता, राष्ट्रीयता और शुद्धता के पहरुए जाग गए हैं. लगातार सरकार पर दबाव डाला जा रहा है कि वेब सीरीज और दूसरे मनोरंजक स्ट्रीमिंग कंटेंट की निगरानी की जाए. उनका आग्रह है कि वेब सीरीज में गाली-गलौज और अश्लीलता बढ़ती जा रही है. राष्ट्रीय हितों का ख्याल नहीं रखा जा रहा है. दक्षिणपंथी सोच के स्तंभकार और लेखक-पत्रकार चाहते हैं कि वेब सीरीज को भी सेंसरशिप के घेरे में लाया जाए. उनकी आपत्ति है कि कई बार इन वेब सीरीज में राष्ट्र विरोधी बातें होती है. उनकी बातों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि वे सत्ताधारी पार्टी की सोच की विरोधी टिप्पणी और विचार पर पाबंदी चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि सरकार विरोधी बातों पर आधारित संवाद हो.
मामला कोर्ट में भी गया है. कोर्ट ने भी पाबंदी या सेंसरशिप से  सहमति नहीं दिखाई. पिछले दिनों चल रहे विचार-विमर्श में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चाएं हुईं. शुद्धतावादियों के आग्रह को स्वीकार नहीं किया गया. पिछले दिनों एक ज़िम्मेदार सरकारी अधिकारी ने बताया कि फिलहाल ओटीटी प्लेटफॉर्म के कार्यक्रमों को सेंसरशिप के दायरे में लाने की जरूरत नहीं है. हाँ, कुछ नियम और शर्तें जरूर होनी चाहिए, जिनका सभी पालन करें. जैसे भारत का गलत मानचित्र नहीं दिखाया जाए. राष्ट्रीय झंडे का अपमान नहीं हो. औरतों को अश्लील तरीके से पेश करने पर भी आपत्ति रही है. सरकारी अधिकारी ने सेल्फ सेंसरशिप की बात जरूर कही है. सेल्फ सेंसरशिप के मुद्दे पर ओटीटी प्लेटफार्म के एक संगठन ने पहले ही अपने लिए कुछ नियम तय कर लिए हैं. अमेजॉन अभी तक सेल्फ सेंसरशिप के तर्क से सहमत नहीं है.
दर्शकों का बड़ा हिस्सा और वेब सीरीज से जुड़े निर्माता, निर्देशक और कलाकारों में से अधिकांश किसी प्रकार की सेंसरशिप नहीं चाहते. हिंदी फिल्मों में जिस तरह की अघोषित सेंसरशिप चलती है, वैसी सेंसरशिप की भी हिमायत कोई नहीं करता. वास्तव में फिल्मों के लिए भी सेंसरशिप नहीं है. हम जिसे सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, वह वास्तव में सीबीएफ़सी(सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) है. इस बोर्ड का काम फिल्म देख कर यू,ए या यूए प्रमाण पत्र देना है. अगर निर्माता ए प्रमाण पत्र मिली फिल्म के लिए यू या यूए प्रमाण पत्र चाहता है तो बोर्ड के सदस्य कुछ दृश्यों को काटने या छोटा करने की सलाह देते हैं.  पहलाज निहलानी जब सेंसर बोर्ड के प्रमुख थे तब इस तरह की सेंसरशिप पर कई विवाद हुए. अभी प्रसून जोशी सीबीएफसी के उच्च अधिकारी हैं. उनके नेतृत्व में बोर्ड के सदस्य शुद्धतावादियों की तरह कार्य नहीं करते हैं. वे केवल राजनीतिक खासकर सत्ताधारी पार्टी की राजनीति के हितों का जरूर ख्याल रखा जाता हैं.
वैसे भी वेब सीरीज के प्रसार के इस दौर में फिल्मों का असर तेजी से हुआ है. ओरिजिनल वेब सीरीज तो गिनती के ही बने हैं. ज्यादातर पोपुलर वेब सीरीज विदेशी हैं या विदेशों के पॉपुलर वेब सीरीज का भारतीयकरण हो रहा है. इन दिनों हिंदी फिल्मों में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ज्वर और ज्वार चढ़ा हुआ है. वेब सीरीज भी इससे अप्रभावित नहीं रहे. रोमांच के साथ राष्ट्रवाद का अच्छा मेल हो जाता है. वेब सीरीज के निर्देशन में आ रहे निर्देशकों के लिए यह युक्ति काम की होती है. वे ऐसे विषयों की खोज और चुनाव में लगे हैं, जिनमें राष्ट्रीय भावना पर पारोसी जा सके. गाली-गलौज और अश्लीलता तो दर्शकों को रिझाने का आसान तरीका हो गया है. अब तो नाटकों और साहित्य में भी धड़ल्ले से गालियां दी जा रही है और अश्लीलता परोसी जा रही है. यह भी एक फेज है, जो कुछ समय के बाद खुद ही उतर या बदल जाएगा


Tuesday, November 19, 2019

सिनेमालोक : आ रहीं ऐतिहासिक फिल्में


सिनेमालोक
आ रहीं ऐतिहासिक फिल्में  
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले शुक्रवार को यशराज फिल्म्स की डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बन रही ‘पृथ्वीराज’ की पूजा के साथ विधिवत शुरुआत हो गई. इस फिल्म में अक्षय कुमार और मानुषी छिल्लर मुख्य भूमिकायें निभा रहे हैं. उनके साथ संजय दत्त, आशुतोष राणा, मानव विज और अन्य कलाकार हैं. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी को हम सभी टीवी धारावाहिक ‘चाणक्य’ के उल्लेखनीय निर्देशन के लिए जानते हैं. उन्होंने अभी तक ‘पिंजर’, ‘जेड प्लस’ और ‘मोहल्ला अस्सी’ फिल्मों के निर्देशन से अपनी एक पहचान बना ली है. खासकर भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी उनकी फिल्म ‘पिंजर’ की विशेष चर्चा होती है. यह फिल्म अमृता प्रीतम के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की पहले की तीनों फिल्में किसी न किसी सहितियिक कृति पर आधारित है.’ पृथ्वीराज’ के लिए भी उन्होंने चंदबरदाई की ‘पृथ्वीराज रासो’ से कथासूत्र लिए हैं और फिल्म के रूप में उनका विस्तार किया है. अगर ‘पृथ्वीराज’ योजना के मुताबिक बन गई तो ऐतिहासिक फिल्मों के संदर्भ में यह नए मानक मानक गढ़ेगी.
वास्तव में डॉ. चंद्रप्रकाश द्वेदी अपनी फिल्मों में काल और परिवेश पर विशेष ध्यान देते हैं. उनकी पहली फिल्म ‘पिंजर ने विभाजन के समय के भारत को पेश किया था. ‘जेड प्लस’ में आज का राजस्थान था तो ‘मोहल्ला अस्सी’ में पिछली सदी के नौवें और अंतिम दशक का बनारस... बनारस में भी अस्सी घाट था. मुंबई में स्थित फिल्मसिटी में इस फिल्म के सेट को देखकर ‘काशी का अस्सी’ के लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह और उनके बड़े भाई मशहूर आलोचक नामवर सिंह चौक गए थे. दोनों की राय में डॉ. द्विवेदी ने अस्सी घाट की गली और पप्पू की दुकान को हूबहू मुंबई में गढ़ लिया था. इसी प्रकार ‘पिंजर’ में विभाजन के समय के भारत को उन्होंने मुंबई की फिल्मसिटी में तैयार किया था. ‘पृथ्वीराज’ के लिए भी मुंबई के यशराज स्टूडियो में सेट लगाए गए हैं. फिल्म की प्रगति के साथ सेट बदले जाएंगे.
आज यानी मंगलवार को ओम राउत निर्देशित ‘तानाजी’ का ट्रेलर आया है. ‘तानाजी’ छत्रपति शिवाजी के मित्र और किलेदार थे. शिवाजी ने उन्हें मुगलों के अधीन एक गढ़ को अपने कब्जे में लेने के लिए भेजा था. इस गढ़ का रणनीतिक महत्व था. शिवाजी के आदेश पर तानाजी ने बहादुर सैनिकों की मदद से इस किले को जीता. हालांकि गढ़ जीतने की लड़ाई में घायल तानाजी शहीद हो गए थे. उनकी शहादत पर दुखी होकर छत्रपति शिवाजी ने कहा था ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’. उन्होंने तानाजी को सिंह कहा था और कोंडाना गढ़ को नया नाम सिंहगढ़ दिया था. सिंहगढ़ की लड़ाई पर मराठी साहित्यकार हरिनारायण आप्टे ने छत्रपति शिवाजी महाराज की उक्ति को ही अपने उपन्यास का शीर्षक बना दिया था.. ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’. इस उपन्यास पर पहले बाबूराव पेंटर ने 1923 में ‘सिंहगढ़’ फिल्म का निर्देशन किया. बाद में 1933 में प्रभात चित्र कंपनी के लिए वी. शांताराम ने ‘सिंहगढ़’ का निर्देशन किया. इसमें तानाजी की भूमिका मास्टर विनायक ने निभाई थी. नई फिल्म ‘तानाजी’ में अजय देवगन तानाजी की शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं. उनके साथ सैफ अली खान और काजोल मुख्य भूमिकाओं में हैं.
ऐतिहासिक फिल्मों के इस उभार में आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ का उल्लेख आवश्यक है. ‘जोधा अकबर’ और  ‘मोहनजोदाड़ो’ जैसी ऐतिहासिक फिल्में बना चुके आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ वास्तव में पानीपत में हुए तीसरे युद्ध की पृष्ठभूमि पर है. इस युद्ध में अफगानी बादशाह अहमद शाह अब्दाली और मराठा पेशवा सदाशिव राव भाऊ के बीच हुए निर्णायक युद्ध का बैकड्राप है. इसे पानीपत का तीसरा युद्ध भी कहते हैं. आशुतोष गोवारिकर की पानीपत में अर्जुन कपूर सदाशिवराव भाऊ और संजय दत्त अहमद शाह अब्दाली की भूमिका निभा रहे हैं. कृति सैनन ने पार्वती बाई की भूमिका निभाई है. उनके अलावा जीनत अमान, पद्मीनी कोल्हापुरे, कुणाल कपूर आदि मुख्य भूमिकाओं में हैं.
इन तीनों फिल्मों के निर्माण और दर्शकों के रिस्पांस से 21वीं सदी में ऐतिहासिक फिल्मों की दिशा तय होगी. तकनीक और  वीएफएक्स के विकास से निर्माता-निर्देशक को भारी मदद मिलेगी. एक संकेत मिल रहा है कि तीनों फिल्मों में अलग-अलग संदर्भ के साथ राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बातें होंगी. देखना यह होगा कि तीनों निर्देशक और उनके लेखक अतीत की इन कहानियों और चरित्रों को आज के हिसाब से कितना सामयिक और प्रासंगिक बना कर पेश कर पाते हैं.


Tuesday, November 12, 2019

सिनेमालोक : उभरे कलाकार की फीस


सिनेमालोक
उभरे कलाकार की फीस
अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों एक प्रोडक्शन हाउस में बैठा हुआ था. उनकी नई फिल्म की योजना बन रही है. इस फिल्म में एक जबरदस्त भूमिका पंकज त्रिपाठी को ध्यान में रखकर लिखी गई है. चलन के मुताबिक वे लीड में नहीं है, लेकिन उनका रोल हीरो के पैरेलल है. उनके होने से फिल्म के दर्शनीयता बढ़ जाएगी. पंकज अपनी फिल्मों में एक रिलीफ के तौर पर देखे जाते हैं. उनकी मौजूदगी दर्शकों का इंटरेस्ट बढ़ा देती है. कई बार अनकहा दारोमदार उनके ऊपर होता है. जाहिर सी बात है कि उभरी पहचान और जरूरत से उनकी मांग बढ़ी है. हफ्ते के सात दिन और दिन के चौबीस घंटों में ही उन्हें फिल्मों के साथ अपनी तकलीफ ,तफरीह और परिवार के लिए भी जरूरी समय निकालना पड़ता है. मांग और आपूर्ति के पुराने आर्थिक नियम से पंकज त्रिपाठी के भाव बढ़ गए हैं. पंकज के भाव का बढ़ना ही इस प्रोडक्शन हाउस की मुश्किलों का सबब बन गया है.
बात चली कि आप तो उन्हें जानते हैं? हां में सिर हिलाने के बाद आग्रह होता है, उनसे एक बार बात कीजिए ना! बताइए उन्हें हमारे बारे में और फिल्म के बारे में. निजी तौर पर मैं इस तरह की बैठकोण और मुलाकातों को प्रश्रय नहीं देता, लेकिन फिल्म बिरादरी से संपर्क और मेलजोल की वजह से कई बार निर्माता और निर्देशक नए कलाकारों, लेखकों और तकनीशियनों के बारे में पूछते रहते हैं. उस समय जिस किसी में भी संभावना दिख रही होती है और अगर वह उत्तर भारत का होता है तो मैं सहज ही बता देता हूं. स्पष्ट कर दूं कि कभी किसी की सिफारिश नहीं करता. जिनके बारे में कभी बताया या संस्तुति की. उन्हें भी नहीं बताता. कई से तो परिचय भी नहीं रहता. मुझे याद है कि कुछ जगहों पर पंकज त्रिपाठी का जिक्र करने पर नाक-भौं सिकोड़ने और उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज करने वाले मिल जाते थे. वे उनकी मार्किट वैल्यू की बातें करने लगते थे. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का दस्तूर है. यहां पहला मौका देने की हिम्मत पारखी ही कर पाते हैं. वे दांव लगाते हैं`. जरूरी नहीं कि उनके दांव हमेशा सही हों,लेकिन वे नई प्रतिभाओं को परखने और अवसर देने का काम करते हैं. कभी महेश भट्ट ऐसा करते थे. फिर रामगोपाल वर्मा आए और अभी अनुराग कश्यप हैं. और भी निर्माता-निर्देशक होंगे. बड़ी संख्या उन निर्माता-निर्देशकों की है जो किसी प्रतिभा के चमकते ही लपकते हैं. उसे अग्रिम राशि देकर साइन कर लेते हैं और मुनाफे का ध्यान रखकर प्रोजेक्ट तैयार करते हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यही चलता रहता है. इसी प्रक्रिया में कुछ  नयी प्रतिभाएं आती हैं. कुछ टिकती हैं और कुछ चार दिनों की चमक के बाद खो जाती हैं. पिछले कुछ सालों में उभरे कलाकारों में रसिका दुग्गल, राधिका मदान, सीमा पाहवा, संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी आदि का नाम लिया जा सकता है.
इन दिनों पंकज त्रिपाठी का जलवा है. उनके साथ आए और संघर्ष के दिनों के उनके साथी लेखक, निर्देशक और निर्माता बन रहे हैं. उन सभी की ख्वाहिश रहती है कि लोकप्रियता में आगे बढ़ चुके पंकज त्रिपाठी सरीखे कलाकार उनकी फिल्मों में आ जाएंगे तो उन्हें भी कुछ कर दिखाने का मौका मिल जाएगा. मैंने देखा है कि ग्रामीण और कस्बाई पृष्ठभूमि से आई प्रतिभाएं अपने साथियों की तरक्की का ख्याल भी करती हैं, लेकिन ज्यादातर मौकों पर पैसों को लेकर बात अटक जाती हैं. पुराने साथियों को यही उम्मीद रहती है कि उभर रहा या उभर चुका कलाकार कम पैसों में उनके साथ काम कर लेगा. उन्हें सहयोग देगा. लोलुप निर्माता भी चाहता है कि संघर्षशील लेखक और निर्देशक अपने पुराने साथी को कम पैसों में काम करने के लिए राजी कर ले.वास्तव में मुनाफाखोर निर्माता पुराने साथियों के भावनात्मक रिश्ते का आर्थिक दोहन करना चाहता है. कुछ निर्माता इस उद्देश्य में सफल भी हो जाते हैं.
पहली फिल्म के बाद ‘इनसाइडर’ या कथित हीरो अपना पारिश्रमिक बढ़ाए या पहली बड़ी कामयाबी के बाद पारिश्रमिक तिगुना कर दे तो भी कोई दिक्कत नहीं होती. निर्माता ख़ुशी-ख़ुशी बढ़ी कीमत के लिए तैयार हो जाते हैं. पारिश्रमिक में ऐसी ही बढ़ोतरी कोई ‘आउटसाइडर’ या सहयोगी कलाकार करे तो उसके बारे में कानाफूसी चालू हो जाती है... भाव बढ़ गया है.. बदल गया है...ऐंठ  आ गई है... उड़ रहा है. ऐसी टिप्पणियां करते समय सभी भूल जाते हैं कि अपनी बढ़ती लोकप्रियता के अनुपात में उसकी मांग उचित है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कोई स्टैंडर्ड रेट कार्ड तो है नहीं कि कलाकार किस दर से अपने पैसे बढ़ाए और कितनी रकम उसके लिए उचित मानी जाए?


Tuesday, November 5, 2019

सिनेमालोक : अब की पति पत्नी और वो


सिनेमालोक
अब की पति पत्नी और वो
-अजय ब्रह्मात्मज
41 साल पहले 12 मई 1978 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ की रीमेक 6 दिसंबर 2019 को रिलीज होगी. सामाजिक विषयों पर गंभीर और उत्तेजक फिल्मों के निर्देशन-निर्माण के लिए मशहूर बीआर चोपड़ा ने अपनी मुख्य शैली से विक्षेप लेकर ‘पति पत्नी और वो’ का निर्माण और निर्देशन किया था. आज के दर्शकों को मालूम नहीं होगा कि इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने लिखा था. कमलेश्वर ने पुरुष के जीवन में पत्नी के अलावा वो की कल्पना से इस कॉमिक सिचुएशन की फिल्म सोची थी. सामाजिक सच्चाई तो यही है कि समाज में ऐसे किस्से’सुनते को मिलते रहते हैं और वो की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है.
कमलेश्वर ने पुरुष की फितरत के रूप में वो की कल्पना की थी. मूल फिल्म में पहले एक एनिमेशन आता है, जिसमें आदम और हव्वा को दिखाया गया है. आदम और हव्वा निषिद्ध सेव खाते हैं और उनके अंदर कामेच्छा जगती है. इसकी वजह से उन्हें स्वर्ग से निकालकर धरती पर धकेल दिया जाता है. कहते हैं आदम और हव्वा धरती पर रहते हैं और कभी-कभी उनकी जिंदगी में वह निषिद्ध फल वो की तरह आ ही जाता है. फिल्म की शुरुआत किशोर कुमार की आवाज में आदम-हव्वा की कहानी के गीत से होती है, जो आज के संजीव कुमार(रंजीत चड्ढा) और विद्या सिन्हा(शारदा चड्ढा) के परिचय साथ पूरी होती है. साइकिल की टक्कर से दोनों में प्यार होता है. शादी होती है और एक बच्चा भी हो जाता है. दोनों की शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही है. इस बीच रंजीत का प्रमोशन होता है. उन्हें एक सेक्रेटरी रंजीता कौर(निर्मला देशपांडे} मिल जाती है. इसके बाद सारे समीकरण बदलते हैं और हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं.
2019 की ‘पति पत्नी और वो’ कानपुर शिफ्ट हो गई है. अब पति का नाम चिंटू उर्फ़ अभिनव त्यागी(कार्तिक आर्यन) हो गया है. उनकी पत्नी वेदिका त्यागी(भूमि पेडणेकर) हैं और वो के रूप में तपस्या सिंह(अनन्या पांडे) आती हैं. शहर कानपुर होने से परिवेश और पृष्ठभूमि बदली है. 2019 की कहानी होने से काल बदल गया है चिंटू त्यागी पिता के दबाव में रहता है और शहर में ही छोटी-मोटी नौकरी कर लेता है. मूल फिल्म में रंजीत चड्डा का दोस्त अब्दुल करीम दुर्रानी(असरानी) है. रीमेक में भी पति चिंटू त्यागी का दोस्त मुसलमान है. उसका नाम रिज़वी(अपारशक्ति खुराना) हो गया है. वह वास्तव में चिंटू त्यागी का फ्रेंड,फिलोस्फर और गाइड है.
मूल फिल्म कमलेश्वर ने लिखी थी. रीमेक फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज ने लिखी है. मुदस्सर की फिल्मों में गजब की कॉमिक टाइमिंग और पंच लाइनें रहती है. रीमेक का ट्रेलर देख चुके पाठक मानेंगे कि इस बार आज के हिसाब से पंच लाइनें हैं और उनमें कानपुर का लहजा भी है. मुदस्सर अज़ीज़ ने कार्तिक आर्यन के लुक पर मेहनत की है. कार्तिक आर्यन के बाल ‘शॉकड’ स्टाइल में बिखरे और खड़े रहते हैं. इस फिल्म में मांग निकालकर करीने से संवारे गए हैं. कुछ-कछ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के सीधे-सादे शाह रुख खान की याद आती है. मुदस्सर की भाषा पर अनोखी पकड़ है, जो इस फिल्म के संवादों में झलकती है. हालांकि अभी ट्रेलर ही आया है, लेकिन उम्मीद बनती है कि कुछ हल्का-फुल्का मजेदार  मनोरंजन मिलेगा.
फिल्म की घोषणा के समय मुझे भी लगा था कि संजीव कुमार की भूमिका कार्तिक आर्यन कैसे निभा पाएंगे? लेकिन ट्रेलर से यूं लगा कि मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म की थीम तो ‘पति पत्नी और वो’ की ही रखी है, लेकिन प्रस्तुति पूरी तरह बदल दी है. उसे आज के मिजाज और अंदाज में ढाला है. हाँ,ट्रेलर में रंजीत और शारदा का बिटवा नहीं दिखा है. हो सकता है, उसे गायब ही कर दिया गया हो. कार्तिक आर्यन के साथ भूमि पेडणेकर पत्नी और अनन्या पांडे वो की भूमिका में हैं. मूल फिल्म के गीत रीक्रिएट नहीं किए गए हैं. पता चला कि चिंटू त्यागी ‘ठंडे ठंडे पानी’ से गुनगुनाते रहते हैं.
बीआर चोपड़ा की बहू रेणु चोपड़ा और पोते जोनी चोपड़ा ने रीमेक का निर्माण किया है.



Tuesday, October 29, 2019

सिनेमालोक : बड़े सितारों की चूक


सिनेमालोक
बड़े सितारों की चूक
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते आई साजिद नाडियाडवाला की  फिल्म 'हाउसफुल 4' ने दर्शकों और समीक्षकों को निराश किया. इसकी वजह से फिल्म का कारोबार अपेक्षा से बहुत कम रहा. निर्माता को उम्मीद थी की दिवाली के मौके पर रिलीज हो रही यह फिल्म पहले 3 दिनों में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी. ट्रेड पंडितों का अनुमान था कि पहले दिन ही फिल्म का कारोबार 25 से 35 करोड़ के बीच होगा. अक्षय कुमार  समेत तीन अभिनेताओं और कृति ससैनन समेत तीन अभिनेत्रियों की यह फिल्म रिलीज के पहले से तहलका मचा रही थी.  एक गीत 'बाला बाला बाला शैतान का साला' विचित्र नृत्य मुद्राओं की वजह से लोकप्रिय हो गया था.बाला चैलेंज के तहत फिल्म बिरादरी के सदस्य और आम प्रशंसक हास्यास्पद वीडियो सोशल मीडिया पर डाल रहे थे. उन्हें निर्माता रिट्वीट कर रहे थे. यूँ लग रहा था कि फ़िल्म को इस श्रेणी की पुरानी फिल्मों की तरह भारी कामयाबी मिलेगी.
ऐसा नहीं हो सका. अक्षय कुमार की लोकप्रियता से पहले दिन थोड़े दर्शक आये,लेकिन अगले दिन दर्शक ससससससZकम हो गए. कामयाब फिल्मों का एक ट्रेंड है कि शनि और रविवार को उनके कलेक्शन में 20 से 30 प्रतिशत का इजाफा होता है. इस फ़िल्म का कलेक्शन अगले दिन घट गयाससस्वस्स्ज़ज़्ज़और अब बढ़ने की उम्मीद भी नहीं है. बेहतरीन फिल्में तारीफ से दर्शक बटोरती हैं तो बुरी फिल्में निंदा से दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पातीं. यही 'हाउसफुल 4' के साथ हुआ. आम दर्शकों के साथ बैठ करफ़िल्में देखने से उनकी प्रतिजरियासमझ में आ जाती हैं. निर्माताओं ने तो सोचा था कि दिवाली का वी ।केंड उनके लिए फायदेमंद होगा.
'हाउसफुल 4' का निर्देशन पहले साजिद खान कर रहे थे। उनके 'मी टू' विवाद में फंसने के बाद फ़िल्म की शूटिंग रोक दी गई थी. कलाकारों में भी फेरबदल हुई थी. बाद में फरहाद - शामजी को ज़िम्मेदारी दी गई. फूहड़ और मज़ाकिया संवादों के लिए मशहूर निर्देशक द्वय को निर्देशन की कागज़ी ज़िम्मेदारी दी गई. यह नहीं बताया गया कि साजिद खान ने कितनी गिलम शूट कर ली थी? और फरहाद - शामजी ने कितना किया? यूँ दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा था कि निर्देशन की कमान तो साजिद नाडियाडवाला के हाथों में ही थी. खानापूर्ति के लिए फरहाद-शामजी का नाम दिया गया. इस फ़िल्म की कहानी साजिद नाडियाडवाला की ही है. उन्हें पुनर्जन्म की यह अजीबोगरीब कहानी सूझी,जिसे शूट करने में भारी खर्च भी किया गया. यह बात फैलाई गई कि फ़िल्म की लागत 80 करोड़ ही है. और कलेक्शन पर भी विवाद हुआ कि उसे बढ़ा- चढ़ा कर बताया जा रहा है.
स्थिति जो भी हो,इस तथ्य से इनकार नहीं जिया जा सकता कि अक्षय कुमार औरसजिद नाडियाडवाला सेभरी चूक हुई. जिस मसालेदार युक्ति पर उन्हें विश्वास और भरोसा था,वह काम नहीं आया. पुनर्जन्म जैसी धारणा को इस तरीके से पेश करना दर्शकों के पल्ले नही पड़ा. बाकी कलाकारों की छवि में तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,लेकिन अक्षय कुमार की लोकप्रियता को बट्टा लाह. उनकी पिछली कुछ फिल्में कंटेंट और राष्ट्रवाद के नारों की वजह से चलीं. अभी के दौर में वे भरोसेमंद स्टार माने जाते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि छोटी सी चूक के भी परिणाम बड़े होते हैं. उनके पास कुछ बेहतरी  फिल्में हैं. सचमुच उन्हें ऐसी फूहड़ फिल्मों से किनारा कर लेना चाहिए.


Tuesday, October 22, 2019

सिनेमालोक : गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में

सिनेमालोक
गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों आमिर खान, शाह रुख खान,राजकुमार हिरानी और एकता कपूर समेत फ़िल्म बिरादरी के 45-50 सदस्य प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. छन्नू लाल मिश्र और एक-दो शास्त्रीय गायक भी इस मुलाकात में शामिल थे. सेल्फी सक्रिय फ़िल्म बिरादरी ने मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर प्रधान मंत्री के पहल और सुझाव की तारीफ की झड़ी लगा दी. प्रधानमंत्री ने उनके ट्वीट के जवाब दिए और उनके प्रयासों की सराहना की. सभी ने अलग-अलग शब्दों और बयानों में मोदी जी की बात दोहराई और जुछ ने महात्मा गांधी की प्रासंगिकता की भी बात कही। इस साल 2 अक्टूबर से गांधी की 150वीं जयंती की शुरुआत हो चुकी है. सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने गंफ़ही जयंती पर कोई खास सक्रियता नहीं डिझायी है. खबर तो यह थी कि दो साल पहले ही एक समिति बनी थी,जिसे 150 वीं जयंती की रणनीति तय करनी थी। क्या रणनीति बनी?
बहरहाल, प्रधान मंत्री से फ़िल्म बिरादरी के सदस्यों की मुलाक़ात और विशेष बैठक उल्लेखनीय है. इसका महत्व तब और बढ़ जाता है,जब हम देखते हैं कि कुछ सालों पहले भक्तों के निशाने पर आएआमिर खान और शाह रुख खान इस बैठक में मौजूद रहे. उन्होंने मोदी जी के साथ सेल्फ़ी निकाली. उस सेल्फी में मोदी जी मुस्कुरा रहे थे. शायद भक्तों तक यह संदेश गया हो कि नाम से खान दोनों लोकप्रिय कलाकार गद्दार और देशद्रोही नहीं हैं. खान के अलावा फिल्म बिरादरी के महिला सदस्यों(कलाकार और निर्माता) ने अलग से प्रधान मंत्री के साथ तस्वीरें और सेल्फी लीं. एकता कपूर ने महिला सशक्तिकरण की पहचान की बात की,जिसे बाद में स्वयं प्रधान मंत्री ने रिट्वीट कर दोहराया. याद होगा कि फ़िल्म बिरादरी और प्रधान मंत्री की मुलाकातें लगातार खबरें बन रही हैं.हालांकि यह पता नहीं चल पा रहा है कि उनके प्रभाव और प्रेरणा से क्या नई गतिविधियां आरम्भ हुई हैं?
इस बार की मुलाक़ात से भगवा भक्तों और खान द्वय के प्रशंसकों को आश्चर्य भी हुआ. कहीँ कोई और कारण या दबाव तो काम नहीं कर रहा? यह भी हो सकता है कि भाजपा के दूसरी बार सत्ता में आने से विरोधी और आलोचनात्मक आवाज़ों को लग रहा हो कि सरकार और प्रधान मंत्री के साथ रहने में ही भलाई है. यह भी हो सकता है कि भाजपा की तरफसे ऐसी कोशिशें हो रही हों. गौर कर सकते हैं कि इस बार की मुलाक़ात में कोई घोर समर्थक कलाकार नहीं दिखा. एक कंगना रनोट ही थीं,जो पूरी तरह से समर्थन में बोलती नज़र आती है. किसी भी आशंका या स्किम से परे हम तो यही उम्मीद करेंगे कि फ़िल्म बिरादरी गांधीवाद की फिल्मी अभिव्यक्ति को लेकर मुखर हो.
पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक सत्ता और फ़िल्म बिरादरी की नज़दीकियों को ध्यान से देखा जा सकता है. फिल्मों में नेहरू युग का व्यापक प्रभाव रहा है. खास कर राज कपूर की लोकप्रिय गिल्मों में...उस दौर के बाकी फिल्मकारों ने भी देश के नव निर्माण की कहानियां दिखाईं. सामंती सामजिक सोच और सरंचना को प्रेम के बहाने तोड़ा. आज़ादी के बाद के रूढ़ियों में जकड़े समाज में प्रेम बाद प्रतिरोध था. शास्त्री जी के आह्वान पर मनोज कुमार ने 'जय जवान,जय किसान' की थीम पर फ़िल्म बनाई और भारत कुमार के नाम से मशहूर हुए.
गांधीवाद पर फिल्में बनाने बेहतर है. विश्व शांति और भाईचारे के लिए यह ज़रूरी है. अभी तो 'राष्ट्रवाद के नवाचार' के फैशन में जबरदस्ती फिल्मों में नारेबाजी चल रही है. संकीर्णता और असहिष्णुता के प्रकोप में गांधीवाद से प्रेरित फ़िल्में विकल्प बन सकती है. दो-चार भी बन जाएं तो काफी है. राजकुमार हिरानी ने नामाकन पेश किया,जिसमें गांधी के विचारों के बीज शब्दों की बात की. पर्दे पर उन्हें लोकप्रिय सितारों ने पेश किया।

Tuesday, October 15, 2019

सिनेमालोक : मामी फिल्म फेस्टिवल


सिनेमालोक
मामी फिल्म फेस्टिवल
-अजय ब्रह्मात्मज  
मामी (मुंबई एकेडमी ऑफ मूवी इमेजेज) के नाम से मशहूर मुंबई का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल पिछले 20 सालों में फिल्मों के चयन, प्रदर्शन और विमर्श से ऐसे मुकाम पर आ गया है कि देश भर के सिनेप्रेमी सात दिनों के लिए मुंबई पहुंचते हैं. देश में और भी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हैं. छोटे शहरों और कस्बों से लेकर मीडिया घरानों तक के अपने-अपने फेस्टिवल चल रहे हैं और कमाल है कि सभी इंटरनेशनल हैं. इनके आयोजन और लोकप्रियता से बढ़ती फिल्मों की समझदारी के बावजूद देश में ‘वॉर’ और ‘कबीर सिंह’ जैसी हिंदी फिल्में अपार कामयाबी हासिल कर लेती हैं.
पिछले सालों में देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में देखने का सिलसिला बढ़ा है. लेकिन हम या तो विदेशियों को सिखा-बता रहे हैं या उनसे ही सीख-समझ रहे हैं. देश की भाषाओँ में बनी फिल्मों की हमें खास जानकारी नहीं रहती. मुझे लगता है कि फिलहाल देश में एक राष्ट्रीय यानि कि नेशनल फेस्टिवल की जरूरत है. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय और एनएफडीसी पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की मदद से पहल कर सकते हैं. हाल ही में चीन के फिंगयाओ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भारत के ‘नया सिनेमा’ पर केन्द्रित आयोजन हुआ. यहां दिखाई गई फिल्मों के साथ बड़े पैमाने पर भारतीय फिल्मों के फेस्टिवल आयोजित किए जा सकते हैं. सिनेमा की लोकप्रियता और स्वीकृति को देखते हुए जरूरी हो गया है.
मामी ने पिछले कुछ सालों में रूप और स्वरूप बदला है. अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के आने के बाद पिछले पांच सालों में मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के  लोकप्रिय चेहरे इससे जुड़े. इनके जुड़ाव से आम युवा दर्शक फिल्म फेस्टिवल के प्रति आकर्षित हुआ है. इस पर बहस हो सकती है कि वर्तमान प्रबंधन समिति की कार्यशैली फेस्टिवल की प्रकृति के अनुकूल है या नहीं? मामी मेला और मास्टर क्लास में हिंदी और मुख्य भारतीय भाषाओं के परिचित चेहरों को बुलाने से उन्हें देखने-सुनने के लिए भीड़ उमड़ती है. उनमें से कुछ बेहतरीन फिल्मों के देखने के के साथ सुधि और सिद्ध दर्शकों में बदलते हैं. दर्शकों को जुटाने और उन्हें कलात्मक बेहतरीन फिल्मों के प्रति संवेदनशील बनाने का यह तरीका सही है.
पिछले रविवार को मुंबई के बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित मूवीमेला एक आकर्षक आयोजन था. इस मेले के चार सेशन में दीपिका पादुकोण, राधिका मदान, मृणाल ठाकुर, अनन्या पांडे, जान्हवी कपूर, अविनाश तिवारी, श्रीराम राघवन, कोंकणा सेन शर्मा, अमर कौशिक, सिद्धार्थ आनंद, अमित शर्मा, मेघना गुलजार, आलिया भट्ट, करीना कपूर खान और करण जौहर शामिल हुए. आलिया भट्ट और करीना कपूर खान से करण जौहर ने सवाल किए. बाकी सभी सेशन अनुपमा चोपड़ा और राजीव मसंद ने संचालित किए. यह आयोजन दर्शकों को शहद चटाने की तरह था. मीठे आयोजन के बाद के सात दिनों के फेस्टिवल में हर विधा और रस की कलात्मक फिल्में दिखाई जाएंगी. पिछले 20 सालों में मैंने देखा है कि यह फेस्टिवल व्यवस्थित होने के साथ ही दर्शकों के अनुकूल हुआ है.
मामी समेत हमारे देश के अधिकांश फेस्टिवल सितंबर के बाद होते हैं. तब तक सनडांस, लोकार्नो, कान,बर्लिन.वेनिस,टोरंटो,बुशान,पेइचिंग आदि शहरों में फेस्टिवल हो चुके होते हैं. नतीजा यह होता है कि इन फेस्टिवल में दिखाई और चर्चित हो चुके फिल्में ही आ पाती हैं. हां, कभी-कभी कोई नई फिल्म वर्ल्ड प्रीमियर के लिए मिल जाती है, लेकिन अधिकांश फिल्में किसी और फेस्टिवल से होकर यहां पहुंचती हैं. फिर भी दर्शकों के लिए राहत और खुशी की बात होती है कि उन्हें चर्चित फिल्में मुंबई में देखने को मिल जाती हैं. मामी में भारत में बनी फिल्मों को भी प्रतिनिधित्व और पुँरास्कर मिलने लगा है. उत्सुकता और भागीदारी बढ़ी है. भारतीय कलाकारों और फिल्मकारों की निगाहें भी मामी पर टिकी रहती हैं.
लेकिन...मामी समेत तमाम भारतीय फिल्म फेस्टिवल में पिछले सालों में अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ा है. सब कुछ अंग्रेजी में ही दिखाया-बताया जाता है. विडंबना यह है कि हिंदी फिल्मों में सक्रिय कलाकारों और फिल्मकारों की भी पहली भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. भारत में आयोजित फिल्म फेस्टिवल भारत के गैरअंग्रेजी भाषी दर्शकों की बिल्कुल परवाह नहीं करते. हिंदीभाषी इलाकों में महत्वाकांक्षी कलाकारों और फिल्मकारों को लंबा संघर्ष करना पड़ता है. मालूम नहीं, कोलकाता और तिरुअनंतपुरम के फेस्टिवल में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता है या नहीं? मुंबई में तो सब कुछ अंग्रेजी में ही चल रहा है.
बहरहाल, मामी में इस साल 53 देशों की 49 भाषाओं में 190 फिल्में प्रदर्शित होंगी.


Tuesday, October 8, 2019

सिनेमालोक : अपने-अपने अमिताभ


सिनेमालोक
अपने-अपने अमिताभ 
पिछले 50 सालों में अमिताभ बच्चन ने ‘सात हिंदुस्तानी’(1969) से लेकर ‘बदला’(2019) तक के फिल्मी सफर में हर रंग,भाव,विधा और शैली की फिल्मों में काम किया है. ‘जंजीर’ से मिली एंग्री यंग मैन की छवि उनके साथ ऐसी चिपकी की उसने उनकी एक्टिंग के अन्य आयामों को धूमिल कर दिया. ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि की फिल्मों को जबरदस्त लोकप्रियता मिली. उन्हें बार-बार देखा गया,उन लिखा गया. देश की सामाजिक और राजनीती हलचलों से जोड़ कर उन पर विमर्श हुआ. हिंदी फिल्मों के इतिहास का यह महत्वपूर्ण अध्याय है और उसके अमिताभ बच्चन नायक हैं. आने वाले सालों में भी उनकी चर्चा चलती रहेगी.
पिछले 50 वर्षों में अमिताभ बच्चन ने अनेक पीढ़ियों का मनोरंजन किया है. उन्हें प्रभावित किया है और अपना मुरीद बना दिया है. मंचों और टीवी शो में सबसे ज्यादा उनकी नकल की जाती है. आवाज को भारी कर उनके मशहूर संवाद बोलते ही हर प्रशंसक खुद में अमिताभ बच्चन को महसूस करता है...हें. वास्तव में यह एक महान अभिनेता के अभिनय की सरलता है कि कोई भी उसके नकल कर लेता है. अमिताभ बच्चन प्रशिक्षित अभिनेता नहीं है. उन्होंने स्कूल के दिनों में जितना थिएटर किया था, उतना अनगिनत लोग करते हैं. उल्लेखनीय है कि फिल्मों में आने का इरादा करने के बाद उन्होंने खुद को कैसे संवारा. आरंभिक नकार के बाद भी डटे रहे और फिर कुछ ऐसा संयोग बना कि वे सभी के चहेते बन गए. उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि पिछली सदी में उन्हें ‘वन मैन इंडस्ट्री’ और ‘मिलेनियम स्टार’ के खिताब दिए गए.
हर प्रशंसक और दर्शक के अपने अमिताभ हैं. उन्हें उनकी कुछ फिल्में ज्यादा पसंद हैं.देश के हर फिल्म प्रेमी दर्शक की पसंदीदा फिल्मों की फेहरिस्त दूसरों से अलग होगी. उनमें 8-10 फिल्मों की समानता मिल सकती है, लेकिन सुधि दर्शकों के फेहरिस्त अलहदा मिलती है. उनकी बातें करो तो वे अपने पसंद की फिल्मों की वजह बताने के साथ तारीफ करने लगते हैं. मेरे एक मित्र को अमिताभ बच्चन की ‘नमक हलाल’ सबसे ज्यादा पसंद है. कारण है फिल्म में एक के बाद एक हंसोड़ प्रसंगों का होना. अमिताभ बच्चन ने हरियाणवी अंदाज़ पकड़ते हुए ठेठ देसी मुहावरों का बेहद प्रभावशाली इस्तेमाल किया है. सहर आये एक गंवाई की नैतिकता उसे ऊंचा स्थान दे जाती है. अमिताभ बच्चन कॉमिकल फिल्मों में अपने खिलंदड़े अंदाज से खूब गुदगुदी लगाते हैं. वास्तव में हिंदी पर उनकी पकड़ से यह संभव हुआ है. वह लहजे की लोच,ठहराव और बारीकियों को समझते हैं और हर शब्द को उसके अर्थ के साथ ध्वनित करते हैं.
अगली छुट्टियों में मौका निकाल कर आप हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में आए उनकी फिल्मों को किसी भी क्रम में देख लें. उन फिल्मों में एक अलग अमिताभ बच्चन मिलते हैं. ‘आनंद’, ‘नमक हराम’,’मिली’,’अभिमान’,’चुपके चुपके’,’बेमिसाल’ और ‘जुर्माना’ में उनके अभिनय के विविध आयामों को देखा और समझा जा सकता है. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की तरह हृषिकेश मुखर्जी ने उनकी छवि को बार-बार नहीं भुनाया. वे अपनी हर फिल्म में उन्हें एक अलग अंदाज में पेश करते रहे. कुछ पाठक चौंक सकते हैं कि अमिताभ बच्चन ने सबसे ज्यादा फिल्में हृषिकेश मुखर्जी के साथ की हैं. हम इस धारणा में रहते हैं कि यह श्रेय प्रकाश महरा और मनमोहन देसी को जाता है.
उम्र के इस पड़ाव पर भी वे सक्रिय हैं और सचेत तरीके से फिल्मों का चुनाव कर रहे हैं. पिछले डेढ़ दशकों में उन्होंने ज्यादातर युवा और नए निर्देशकों के साथ ही काम किया है. उनकी सक्रियता और स्वीकृति का ही नतीजा है कि उनकी उम्र और शैली के अनुसार भूमिकाएं लिखी जा रही हैं. वे हर फिल्म में एक नया जादू बिखेर देते हैं. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में उनके ओजस्विता,विनम्रता और मृदुलता देखते ही बनती है. उनके आलोचक इसे उनकी एक्टिंग कहते हैं, लेकिन यह सहजता अभिनय में आसानी से नहीं आती. उनके करीबी बताते हैं बताते हैं कि वे अनुशासित तरीके से हर नए प्रोजेक्ट में संलग्न होते हैं. आज के युवा कलाकार को उनकी लगन और तत्परता देख कर चकित रहते हैं.



Thursday, October 3, 2019

सिनेमालोक : कुछ फिल्में गांधी की


सिनेमालोक 
कुछ फिल्में गांधी की 
-अजय ब्रह्मात्मज 
भक्त विदुर (1921) - निर्देशक कांजीलाल राठौड़ ने कोहिनूर फिल्म कंपनी के लिए 'भक्त विदुर' का निर्देशन किया था. फिल्म के निर्माता द्वारकादास संपत और माणिक लाल पटेल थे. दोनों ने फिल्म में क्रमशः विदुर और कृष्ण की भूमिकाएं निभाई थीं. इस फिल्म में विदुर ने गांधी टोपी और खद्दर धारण किया था. यह मूक फ़िल्म दर्शकों को भा गई थी. इतनी भीड़ उमड़ी थी कि पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा. इस फिल्म को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. आदेश में लिखा था, 'हमें पता है कि आप क्या कर रहे हैं? यह विदुर नहीं है, यह गांधी है और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे.' 'भक्त विदुर' भारत की पहली प्रतिबंधित फ़िल्म थी.
महात्मा गांधी टॉक्स(1931) – अमेरिका की फॉक्स मूवीटोन कंपनी ने गांधी जी से बातचीत रिकॉर्ड की थी. इसके लिए वे बोरसाद गांव गए थे. गांधी जी की आधुनिक तकनीकी चीजों में कम रूचि थी, फिर भी उन्होंने इसे रिकॉर्ड की अनुमति दी. वैसे उन्होंने कहा भी कि ‘मैं ऐसी चीजें पसंद नहीं करता, लेकिन मैंने खुद को समझा लिया है.
महात्मा गांधी 20 वीं सदी का मसीहा(1937) - एक के चेट्टियार ने गांधी जी पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया था. इस डॉक्यूमेंट्री में तमिलनाडु के तिरुपुर में सूत कातती 200 महिलाएं नजर आती हैं. पीछे से कर्नाटक के गायक डीके पटेल की आवाज में आडू राति(चरखे को चलने दो) गीत सुनाई पड़ता है. तमिल में बनी इस फिल्म को बाद में तेलुगू और हिंदी में भी डब किया गया. कुल 50000 फीट के फुटेज को एडिट कर 12000 फीट की फिल्म बनी थी.
महात्मा/धर्मात्मा(1935) - वी शांताराम निर्देशित यह फिर मराठी और हिंदी में प्रदर्शित हुई थी. इसमें बालगंधर्व ने अभिनय किया था. संत तुकाराम के जीवन पर आधारित इस फिल्म का शीर्षक अधिकारियों को गांधीजी के संबोधन से मिलता-जुलता लगा था.इसलिए विशेष आदेश देकर फिल्म का शीर्षक बदला गया. वी. शांताराम ने फिर ‘धर्मात्मा’ शीर्षक से इसे रिलीज किया.
गांधी(1982) - रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ महात्मा गांधी के जीवन पर सर्वाधिक चर्चित और देखि गयी फिल्म है. भारत सरकार के सहयोग से निर्मित इस फिल्म को देश-विदेश में प्रशंसा मिली. महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रयोगों को समेटती यह फिल्म  स्वतात्न्त्रता आन्दोलन की भी झलक देती है. शीर्षक चरित्र महात्मा गांधी इस आंदोलन के प्रभावी नेता के रूप में दिखते हैं. गांधी के व्यक्तित्व-कृतित्व को समझने के लिए यह बेहतरीन फिल्म है. इसमें गांधी की भूमिका गुजराती मूल के बेन किंग्सले ने निभाई थी. इसे ऑस्कर के कई पुरस्कार मिले थे.
द मेकिंग ऑफ महात्मा(1996) - निर्देशक श्याम बेनेगल की ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ गांधी के महात्मा बनने की कहानी है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के 20 वर्षों के प्रवास और अनुभवों को समेटती यह फिल्म बताती है कि कैसे एक महत्वाकांक्षी बैरिस्टर ने ज़ुल्म और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और महसूस किया कि उन्हें भारत में आकर देश के आजादी के लिए काम करना चाहिए. दक्षिण अफ्रीका में ही गांधीवादी मूल्यों और सिद्धांतों के बीज पड़े थे. युवा गांधी की भूमिका राजित कपूर ने निभाई थी.
गांधी माय फादर(2017) - फिरोज फिरोज खान निर्देशित ‘गांधी माय फादर’ गांधी और उनके बेटे हरिलाल के तनावपूर्ण संबंध की कहानी है. इस फिल्म में हम देखते हैं कि देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व कर रहा शखस  अपने सिद्धांतों और मूल्यों की वजह से गलतफहमी का शिकार होता है. ऐसा लगता है कि गांधी हरिलाल के लिए आदर्श पिता नहीं थे..  पारिवारिक द्वंद्व में फंसे गांधी का मानवीय पहलू नज़र आता है. जहाँ वे एक कमज़ोर,विवश और लाचार पिता के रूप में दिखते हैं.
इन सभी फिल्मों के अलावा कुछ ऐसी भी फिल्में हैं, जिनमें फोकस गांधी पर नहीं है, वे इन फिल्मों में सहयोगी और खास चरित्र के रूप में दिखते हैं. ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘डॉ बाबासाहेब आंबेडकर’, ‘सरदार’, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस – द फॉरगोटन हीरो’ और वीर सावरकर जैसी फिल्मों में हम उन्हें एक अलग छवि में देखते हैं. इन फिल्मों के लेखको और निर्देशकों ने गांधी से संबंधित पॉपुलर शिकायतों का इस्तेमाल किया है. ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘रोड टू संगम’ और ‘गांधी टू हिटलर’ में गांधी के आदर्शों और प्रयोगों का प्रासंगिक उपयोग हुआ है.
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर आप इन फिल्मों को खोज कर देख सके तो फिल्मों के माध्यम से उन्हें अच्छी तरह समझ सकेंगे.