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Saturday, July 18, 2009

फ़िल्म समीक्षा:जश्न


सपनों और रिश्तों के बीच

-अजय ब्रह्मात्मज


भट्ट कैंप की फिल्मों का अपना एक फार्मूला है। कम बजट, अपेक्षाकृत छोटे और मझोले स्टार, इमोशनल कहानी, म्यूजिकल सपोर्ट, गीतों व संवादों में अर्थपूर्ण शब्द। इस फार्मूले में ही विशेष फिल्म्स की फिल्में कभी कमाल कर जाती हैं और कभी-कभी औसत रह जाती हैं। जश्न कमाल कर सकती है। भट्ट बंधु ने सफलता के इस फार्मूले को साध लिया है। उनकी जश्न के निर्देशक रक्षा मिस्त्री और हसनैन हैदराबादवाला हैं।
जश्न सपनों और आकांक्षाओं की फिल्म है। इसे हर जवान के दिल में पल रहे नो बडी से सम बडी होने के सपने के तौर पर प्रचारित किया गया है। फिल्म का नायक आकाश वर्मा सपनों के लिए अपनों का सहारा लेता है। लेकिन असफल और अपमानित होने पर पहले टूटता, फिर जुड़ता और अंत में खड़ा होता है। सपनों और आकांक्षाओं के साथ ही यह शहरी रिश्तों की भी कहानी है। हिंदी फिल्म के पर्दे पर भाई-बहन का ऐसा रिश्ता पहली बार दिखाया गया है। बहन खुद के खर्चे और भाई के सपने के लिए एक अमीर की रखैल बन जाती है। भाई इस सच को जानता है। दोनों के बीच का अपनापा और समर्थन भाई-बहन के रिश्ते को नया आयाम देता है। सारा आज की बहन है और आकाश भी आज का भाई है। रिश्तों के नंगे सच को लेखक-निर्देशक ने कोमलता से उद्घाटित किया है।
पाकिस्तानी एक्टर हुमायूं सईद ने अमन बजाज के शातिर, स्वार्थी, अहंकारी और लंपट किरदार को प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया है। सिर्फ आंखों, होठों और चेहरे के भाव से कैसे दृश्य को खास और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। हिंदी फिल्मों के ढेर सारे स्टार हुमायूं सईद के निरीक्षण से सीख सकते हैं। चूंकि वे किसी हिंदी फिल्म में पहली बार दिखे हैं, इसलिए किरदार के ज्यादा करीब लगते हैं। शहाना गोस्वामी दृश्य चुरा लेती हैं। सामान्य दृश्यों में भी उनका सहज अभिनय स्वाभाविक लगता है। हालांकि जश्न में सारा का किरदार जटिल नहीं था, पर साधारण किरदार को रोचक बना देना भी तो खासियत है। अध्ययन सुमन को नाटकीय और भावुक दृश्य मिले हैं। वे निराश नहीं करते। उन्हें अपने बालों को निखारने-संवारने पर ध्यान देना चाहिए। वह उनके अभिनय के आड़े आता है।
संगीत फिल्म के थीम के मुताबिक एक संगीतकार की भावनाओं को शब्दों और ध्वनि से व्यक्त करता है। गीतों पर आज की संगीत शैली का पूरा असर है। अध्ययन ने उन गीतों को पर्दे पर जोश और जरूरी एक्सप्रेशन के साथ परफार्म किया है। और अंत में पटकथा और संवाद के लिए शगुफ्ता रफीक की तारीफ करनी होगी। इन दिनों फिल्मों के संवाद दृश्यों को भरने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उनमें न तो शब्दों की कारीगरी रह गई है और न भाव की गहराई। शगुफ्ता रफीक के संवादों में रवानी है। वे सटीक, चुस्त और दृश्यों के अनुकूल हैं।
रेटिंग : ***

Tuesday, March 24, 2009

फ़िल्म समीक्षा:फ़िराक

अस्मिता व विश्वाद्य से टकराती सच्चाइयां
थिएटर और अलग किस्म की फिल्मों से पहचान बना चुकी नंदिता दास ने निर्देशन में कदम रखा तो स्वभाव के मुताबिक गंभीर सामाजिक मुद्दा चुना। फिराक का विचार उनके व्यक्तित्व से मेल खाता है। फिराक में मनोरंजन से अधिक मुद्दे पर ध्यान दिया गया है।
गुजरात के दंगों के तत्काल बाद के अहमदाबाद में छह कथा प्रसंगों को साथ लेकर चलती पटकथा एक-दूसरे का प्रभाव बढ़ाती है। नंदिता ने मुश्किल नैरेटिव चुना है, लेकिन कैमरामैन रवि चंद्रन और अपने संपादक के सहयोग से वह धार्मिक अस्मिता, दोस्ती, अपराध बोध, खोए बचपन व विश्वास को ऐसे टटोलती हैं कि फिल्म खत्म होने के बाद सभी किरदारों के लिए हमें परेशानी महसूस होती है। यह फिल्म तकनीशियनों के सामूहिक प्रयास का सुंदर उदाहरण है। नंदिता दास ने फिल्म शुरू होने पर तकनीशियनों की नामावली पहले देकर उन्हें यथोचित सम्मान दिया है। नीम रोशनी और अंधेरे के बीच चलती फिल्म के कई दृश्य पारभासी और धूमिल हैं। रवि चंद्रन ने फिल्म में प्रकाश संयोजन से कथा के मर्म को बढ़ाया है। फिल्म में कुछ भी लकदक और चमकदार नहीं है। दंगे के बाद की उदासी महसूस होती है। सांप्रदायिकता का डर उभरता है और अस्मिता के प्रश्न से किरदार टकराते हैं। फिल्म का पाश्‌र्र्व संगीत भी उल्लेखनीय है।
फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और रघुवीर यादव की मौजूदगी आनंदित करती है। मामूली दृश्यों को भी उत्तम अभिनेता कारगर व प्रभावी बना देते हैं। शहाना गोस्वामी व संजय सूरी अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं।