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Showing posts from July, 2017

फिल्‍म समीक्षा : मुबारकां

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फिल्‍म रिव्‍यू मजेदार मनोरंजक फिल्‍म मुबारकां -अजय ब्रह्मात्‍मज पिछले कुछ सालों में कॉमेडी ने डबल मीनिंग डॉयलॉग,यौनाचार की मुद्राओं और देहदर्शन का रूप ले लिया है। निर्माता सेक्‍स कॉमेडी की हद तक गए,जिन्‍हें दर्शकों ने ही दरकिनार कर दिया। गोविंदा की लोकप्रियता के दिनों में ऐसी फिल्‍मों का एक दौर था, जब डेविड धवन,अनीस बज्‍मी और रुमी जाफरी ने मिलकर दर्शकों को खूब हंसाया। उनकी फिल्‍में शुद्ध हास्‍य को लकर चलती थीं और स्‍थानों,स्थितियों और किरदारों की दिलचस्‍प भिड़तों से हंसी के फववारे छोड़ती थीं। दर्शक भी भगते और लोटपोट होते रहते थे। फिर एक ऐसा दौर आया कि इनकी ही फिल्‍मों में द्विअर्थी संवाद घुस आए और संकेतों में सेक्‍स की बातें होने लगीं। और लोकप्रियता की लकीर पर चलते हुए कुछ निर्माता-निर्देशक सेक्‍स कॉमेडी की गलियों में भटक गए। एक अंतराल के बाद अनीस बज्‍मी की वापसी हुई है। वे नानसेंस ड्रामा लेकर आए हैं,जिसमें हास्‍यास्‍पद स्थितियां बनती हैं और हम फिर से ठहाके लगाते हैं। हिंदी फिल्‍मों की यह लोकप्रिय मनोरंज‍क धारा सूख सी गई थी। अनीस बज्‍मी ने अपने पुराने दोसत और भरोसेमंद अभिनेता अनिल कपूर के …

फिल्‍म समीक्षा : इंदु सरकार

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फिल्‍म रिव्‍यू इंदु सरकार -अजय ब्रह्मात्‍मज शाह कमीशन की रिपोर्ट और भारत सरकार के तमाम विभागों के सहयोग और इनपुट के साथ बनी मधुर भंडारकर की ‘इंदु सरकार’ देश आपात्‍काल के समय और दुष्‍परिणामों को नहीं पेश कर पाती। फिल्‍म में लंबा डिसक्‍लेमर है कि ‘फिल्‍म में दिखाए सभी पात्र और घटनाएं पूरी तरह से काल्‍पनिक हैं,वास्‍तविकता से कोई समानता होती है,तो वह मात्र एक संयोग होगा। कोई भी समानता,चाहे वह किसी व्‍यक्ति (मृत या जीवित),पात्र या इतिहास से हो,पूरी तरह काल्‍पनिक है।‘ इस डिसक्‍लेमर के बाद कुछ किरदारों का संजय गांधी,इंदिरा गांधी,कमलनाथ,जगदीश टाइटलर की तरह दिखना कांग्रेस के शासन में लगे आपातकाल का संकेत तो देता है,लेकिन बगैर नाम के आए इन चेहरों से फिल्‍म का प्रभाव पतला हो जाता है। संदर्भ और विषय की गंभीरता नहीं बनी रहती। हालांकि फिल्‍म में किशोर कुमार,तुर्कमान गेट और नसबंदी जैसे वास्‍तविक आपातकालीन प्रसंग आते हैं। 20 सूत्री कार्यक्रम और पांच सूत्री कार्यक्रम का जिक्र आता है,फिर भी फिल्‍म आपातकाल के दौर में घुसने से बचती है। यह फिल्‍म आपातकाल के हादसों और फैसलों से रोंगटे नहीं खड़ी करती,क्‍योंकि …

रोज़ाना : रिलीज तक व्‍यस्‍त रहते हैं निर्देशक

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रोज़ाना रिलीज तक व्‍यस्‍त रहते हैं निर्देशक -अजय ब्रह्मात्‍मज पिछले दिनों रणबीर कपूर के पिता ऋषि कपूर ‘जग्‍गा जासूस’ के निर्देशक अनुराग बसु पर भड़के हुए थे। उन्‍होंने अनुराग बसु की लेट-लतीफी की खिंचाई की। बताया कि फिल्‍म की रिलीज के दो दिन पहले तक वे पोस्‍ट प्रोडक्‍शन में लगे हुए थे। उन्‍होंने फिल्‍म किसी को नहीं दिखाई। और फिल्‍म रिलीज हुई तो ऋषि कपूर समेत कई दर्शकों को पसंद नहीं आई। ऋषि कपूर की शिकायत का आशय यह था कि अगर वक्‍त रहते शुभचिंतक फिल्‍म देख लेते तो वे आवश्‍यक सुधार की सलाह देते। तब शायद फिल्‍म की ऐसी आलोचना नहीं होती। कहना मुश्किल है कि क्‍या होता? अगर रिलीज के पहले दिखा और ठोक-बजा कर रिलीज की सारी फिल्‍में सफल होतीं तो ऋषि कपूर की कोई भी फिल्‍म फ्लॉप नहीं हुई होती। फिल्‍मों की सफलता-असफलता बिल्‍कुल अलग मसला है। उस मसले से इतर यह आज की सच्‍चाई है कि तकनीकी सुविधाओं के चलते निर्देशक और उनकी तकनीकी टीम अंतिक क्षणों तक फिल्‍म में तब्‍दीलियां करती रहती हैं। उनकी यही मंशा रहती है कि कोई कमी या कसर ना रह जाए। मुमकिन है इससे फिल्‍म को संवारने में मदद मिलती हो। फिलम को अंतिम रूप देने …

सात सवाल : तिग्‍मांशु धूलिया

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सात सवाल तिग्‍मांशु धूलिया -अजय ब्रह्मात्‍मज तिग्‍मांशु धूलिया ने आईएनए ट्रायल पर ‘राग देश’ फिल्‍म निर्देशित की है। यह फिल्‍म लाल किले में सहगल,ढिल्‍लों औौर शाहनवाज पर चले मुकदमे का पर आधारित है। राज्‍य सभा टीवी ने इसका निर्माण किया है। -राज्‍य सभा टीवी के लिए ‘राग देश’ बनाने का संयोग कैसे बना? 0 ऐसी कोई फिल्‍म मेरे एजेंडा में नहीं थी। राज्‍य सभा टीवी के गुरदीप सप्‍पल मेरे पास दो प्रोजेक्‍ट लेकर आए- एक सरदार पटेल और दूसरा आईएनए ट्रायल। उन्‍होंने पूछा कि बनाना चाहोगे क्‍या? मैंने तुरंत कहा कि सरदार पटेल तो मैं कर चुका हूं। आईएनए ट्रायल पर काम करूंगा। मेरी इतिहास में थोड़ी रुचि है। और फिर मुंबई के सेटअप में मुझे ऐसी फिल्‍म बनाने के लिए कोई णन देता नहीं। - आप ने इसे किस तरह शूट किया। फार्मेट का चुनाव कैसे किया? 0 हम ने स्क्रिप्‍ट तो 6 घंटों के 6 एपीसोड के हिसाब से लिखी थी। शूट भी वैसे ही किया। एडिट पर हम ने यह फिल्‍म निकाली। -यह हमारे निकट अतीत की बात है,जिसके साक्ष्‍य मौजूद हैं। फिल्‍म के रूप में लाने की कैसी चुनौतियां रहीं? 0 फिल्‍म के 99 प्रतिशत दृश्‍य दस्‍तावेज के रूप में मौजूद हैं। पीरियड फि…

दरअसल : ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत

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दरअसल... ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत -अजय ब्रह्मात्‍मज
आए दिन रिलीज हो रही फिल्‍म के निर्माता और अन्‍य संबंधित निर्देशक व कलाकार सोशल मीडिया पर बताते रहते हैं कि उनके ट्रेलर और गानों को इतने लाख और करोड़ व्‍यूज मिले। तात्‍पर्य यह रहता है कि उक्‍त ट्रेलर या गाने को संबंधित स्‍ट्रीमिंग चैनल पर उतनी बार देखा गया। ज्‍यादातर स्‍ट्रीमिंग यूट्यूब के जरिए होती है। व्‍यूज यानी दर्शकता बताने का आशय लोकप्रियता से रहता है। यह संकेत दिया जाता है कि रिलीज हो रही फिल्‍म के ट्रेलर और गानों को दर्शक पसंद कर रहे हैं। इससे निर्माता के अहं की तुष्टि होती है। साथ ही फिल्‍म के पक्ष में माहौल बनाया जाता है। दर्शकों को तैयार किया जाता है। लुक,टीजर,ट्रेलरऔर गानों को लकर ऐसे दावे किए जाते हैं। आम दर्शकों पर इसका कितना असर होता है? क्‍या वे इसके दबाव में फिल्‍म देखने का मन बनाते हैं? अभी तक कोई स्‍पष्‍ट अध्‍ययन या शोध उपलब्‍ध नहीं है,जिससे व्‍यूज और दर्शकों का अनुपात तय किया जा सके। सफलता का अनुमान किया जा सके। टीजर,ट्रेलर या गाने आने के साथ फिल्‍म से जुड़े सभी व्‍यक्ति सोशल मीडिया पर एक्टिव हो जाते हैं। वे…

फिल्‍म समीक्षा : पर्दे पर इतिहास के पन्‍ने

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फिल्‍म रिव्‍यू पर्दे पर इतिहास के पन्‍ने राग देश -अजय ब्रह्मात्‍मज
तिग्‍मांशु घूलिया की ‘राग देश’ का बनना और सिनेमाघरों में रिलीज होना ही एक घटना है। राज्‍य सभा टीवी की इस पहल की तारीफ करनी चाहिए कि उन्‍होंने समकालीन इतिहास के एक अध्‍याय को फिल्‍म के रूप में पेश करने के बारे में सोचा। तिग्‍मांशु धूलिया ने आजाद हिंदी फौज के मेजर जनरल शाहनवाज खान,लेफिटनेंट कर्नल गुरबख्‍श सिहं ढिल्‍लों और लेफिटनेंट कर्नल प्रेम सहगल पर लाल किले में चले मुकदमे पर ही फिल्‍म केंद्रित की है। उस मुकदमें के बहाने आजादी की लड़ाई सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की भूमिका से भी हम परिचित होते हैं। इतिहास के पन्‍ने दृश्‍यों में सज कर पर्दे पर आते हैं और हम उस दौर की घटनाओं को देख पाते हें। तिग्‍मांशु धूलिया ने मुख्‍य रूप से वास्‍तविक किरदारों और मुकदमें के इर्द-गिर्द ही कहानी रखी है। उन्‍होंने कथा बुनने के लिए कुछ किरदार जोड़े हैं। उन पर अधिक फोकस नहीं किया है। द्वितीय विशव युद्ध में जापना और जर्मनी की हार और ब्रिटेन की जीत के बाद आजाद हिंद फौज के सैनिकों को समर्पण करना पड़ा था। युद्धबंदी के तौर पर उन सैनिकों को देश के…

एक म्‍यूजिकल स्‍केच है जग्‍गा जासूस

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एक म्यूज़िकल स्केच है 'जग्‍गा जासूस'
-अनुराग आर्य


कहानियोमें दिलचस्पी पिता के एक दोस्तनेकिताबे गिफ्ट कर के डाली। फिर कहानिया ढूंढ ढूंढ कर पढ़ने का शौक चढ़ा फिरकहानिया देखने का। उम्र कम थी और समांनातर सिनेमा के कुछ फिल्मे बच्चो केलिए वर्जित। दूरदर्शन ही एक खिड़की था उस दुनिया का.शहर में लिमिटेड सिनेमाहाल थे। पर जहाँ मौका लगताफिल्मे देखते। पिता अनुशासन वाले रहे फिल्मो सेदूर फिर भी देहरादून स्कूलिंग ने नए दोस्त जोड़े और उनके जरिये नयी फिल्मे।मेडिकल कॉलेज एडमिशन गुजरात के सूरत में हुआ जहाँ इंग्लिश फिल्मो के दोसिनेमाघर होते , और एक थियेटर हॉस्टल के लड़को के मुफीद। तब तक शयाम बेनेगल,मणि कॉल ,गोविन्द निहालिनी ,सत्यजीत रे ,गुरुदत्त ,चेतन आनद और राज कपूरके सिनेमा से वाकिफ हो चुके थे। सुधीर मिश्रा ,केतन मेहता भी इम्प्रेस करनेलगे। सूरत के एक पिक्चर हॉल पर कभी कभी ओल्ड क्लासिक दिखलाता। मदर इण्डियाभी वही देखी। हॉस्टल के दोस्तों ने कई इंग्लिश क्लासिक से इंट्रोडक्शनकरवाया ,और एक दोस्त ने ईरानी फिल्मो से।तब लगा कैमरे के जरिये कहानीकहने में कितनी ताकत है दूसरी जबान का आदमी भी वो समझ लेता है जो आप कहना…

रोज़ाना : देओल परिवार की दिक्‍कतें

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रोज़ाना देओल परिवार की दिक्‍कतें -अजय ब्रह्मात्‍मज देओल परिवार के धर्मेन्‍द्र और उनके बेटों सनी और बॉबी देओल से दर्शक प्‍यार करते हैं। खास कर पंजाब और उत्‍तर भारत के दर्शक तो उन पर मर-मिटने का तैयार रहते हैं। धर्मेन्‍द्र अपे समय के पॉपुलर और संवेदनशील स्‍आर रहे। उनकी फिल्‍मों में गजब की वैरायटी मिलती है। हालांकि ढलती उम्र में उन्‍होंने कुछ फालतू फिल्‍में की,लेकिन उनकी बेहतरीन फिल्‍मों की संख्‍या कम नहीं है। आज के दर्शक भी उन्‍हें प्‍यार और आदर से याद करते हैं। उनकी बातें सुनना चाहते हैं। णमेंन्‍द्र इन दिनों बातें करते हुए यादों में खो जाते हैं। शायद उन्‍हें बीते साल किसी रील की तरह बातचीत करते समय दिखाई पड़ते हों। उनकी यादें ताजा है। उन यादों में बसी भावनाओं में एक युवक के सपनों की गूंज आज भी बाकी है। लंबे करिअर और कामयाबी के बावजूद धर्मेन्‍द्र सुना ही देते हैं... नौकरी करता सायकिल पर आता-जाता फिल्‍मी पोस्‍टर में अपनी झलक देखता अनहोने ख्‍वाब सजाता और सुबह उठ कर आइने से पूछता मैं दिलीप कुमार बन सकता हूं क्‍या? धर्मेन्‍द्र के सारे ख्‍वाब पूरे हो गए,लेकिन कोई कसक है। वह उनकी बातों और यादों में चु…

रोज़ाना : नए मिजाज की फिल्‍म!

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रोज़ाना नए मिजाज की फिल्‍म! -अजय ब्रह्मात्‍मज
अनुराग बसु की ‘जग्‍गा जासूस’ रिलीज हो चुकी है। हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक दर्शकों और कुछ समीक्षकों ने इसे नापसंद किया है। यह फिल्‍म कुछ दर्शकों और बहुत कम समीक्षकों को पसंद आई है। मुझे लगता है कि नापसंदगी की एक बड़ी वजह फिल्‍म को सही संदर्भ में नहीं समझ पाना है। यह भी हो सकता है कि रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ से वे किसी और तरह की फिल्‍म उम्‍मीद कर रहे हों और उन्‍हें उत्‍तेज‍क रोमांटिक दृश्‍यों में नहीं देख कर उन्‍हें निराशा हुई हो। हिंदी फिल्‍मों की एक सामान्‍य सीमा तो यही है कि हर तरह की फिल्‍म में रोमांस और खुलेआम रोमांस की जरूरत पड़ती है। नए निर्देशक हिंदी फिल्‍मों की इस सीमा से जूझ रहे हैं। ने रोमांस और प्रेम कहानियों से निकलना चाह रहे हैं। वे घिसे‍-पिटे दृश्‍यों और किरदारों से उकता चुके हैं। कमी नए निर्देशकों में भी है। वे अपनी परंपरा को अपनी जरूरतों के हिसाब से साध नहीं पर रहे हैं। उनके और दर्शकों के बीच फांक रह जाती है। ‘जग्‍गा जासूस’ एक बेहतरीन फिल्‍म है। शैली और शिल्‍प के स्‍तर पर यह मुग्‍ध करती है। अनुराग बसु ने अपनी फिल्‍म के लिए बिल्…

रोज़ाना : पूरी हो गई मंटो की शूटिंग

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22 जुलाई,2017 रोज़ाना पूरी हो गई मंटो की शूटिंग -अजय ब्रह्मात्‍मज नंदिता दास ने ‘मंटो’ की शूटिंग पूरी कर ली। अब वह एडीटिंग में जुटेंगी। खुशखबर का यह एक रोचक पड़ाव है। फिल्‍म पूरी होने और रिलीज होने के पहले ऐसे अनेक पड़ावों से गुजरना पड़ता है। ‘मंटो’ जैसी फिल्‍म हो तो हर पड़ाव के बाद आगे का मोड अनिश्चित दिशा में होता है। अंदाजा नहीं रहता कि सब कुछ ठीक तरीके से आगे बढ़ रहा है या रास्‍ते में कहीं भटक गए और फिल्‍म रिलीज तक नहीं पहुंच सकी। इन आशंकाओं में समाज और सिनेमा के कथित ठेकेदार भी होते हैं,जो आपत्तियों की लाठी भंजते रहते हैं। उन्‍हें हर प्रकार की क्रिएटिविटी से दिक्‍कत होती है। नंदिता दास संवेदनशील और जागरूक अभिनेत्री व निर्देशक हैं। अभी का समाज जागरुकों से कुछ ज्‍यादा ही खफा है। बहराहाल,शूटिंग पूरी होने की शुभकामनाओं के साथ नंदिता दास को बधाइयां कि वह ऐसे वक्‍त में मंटो को लेकर आ रही हैं,जो भीतरी तौर पर पार्टीशन के मरोड़ से गुजर रहा है। संदेह का धुंआ उठता है और हर छवि धुंधली हो जाती है। आकृतियां लोप होने लगती हैं। केवल शोर सुनाई पड़ता है। एक भीड़ होती है,जो सूजन और सामयिक सोच के खिलाफ…