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Friday, June 29, 2018

फिल्म समीक्षा : संजू


फिल्म समीक्षा
संजय दत्त की निगेटिव छवि और खलनायक मीडिया
संजू
अजय ब्रह्मात्मज
अवधि-161 मिनट
            कुछ दिनों पहले राजकुमार हिरानी से संजूफिल्म के बारे में बातचीत हुई थी. इस बातचीत के क्रम में उनसे मेरा एक सवाल था कि संजय दत्त की पिछली दो फिल्मों मुन्ना भाई एमबीबीएसऔर लगे रहो मुन्नाभाईमें क्रमशः जादू की झप्पीऔर गांधीगिरीका संदेश था. इस बार संजूमें क्या होगा? उनका जवाब था, ‘इस बार कोई शब्द नहीं है. यह है ? ‘(प्रश्न चिह्न)। संजय दत्त के जीवन के कुछ हिस्सों को लेकर बनीं इस फिल्म में यह प्रश्न चिह्न मीडिया की सुखिर्यों और खबरों पर हैं. फिल्म की शुरुआत में और आखिर में इस प्रश्न चिह्नऔर मीडिया कवरेज पर सवाल किए गए हैं. कुछ सुर्खियों और खबरों के हवाले से मीडिया की भूमिका को कठघरे में डालने के साथ निगेटिव कर दिया गया है. इस फिल्म के लिए श्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मीडिया को दिया जा सकता है. संजय दत्त के संदर्भ में मीडिया की निगेटिव छवि स्थापित करने के साथ उसे समय का सत्यबना दिया गया है. संजूफिल्म का यह कमजोर पक्ष है.
            फिल्म के ट्रेलर से ही जाहिर हो गया था कि संजय दत्त पर लगे टेररिस्टके कथित दाग को मिटाने की कोशिश हो सकती है. यह फिल्म तर्कों और साक्ष्यों से यह साबित करती है कि संजय दत्त टेररिस्ट नहीं है. फिर मीडिया पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने कोर्ट के फैसले में संजय दत्त के टेररिस्ट न होने की खबर को प्रमुखता से नहीं छापा. उसे सुर्खियों में नहीं डाला. संजय दत्त की छवि सुधार के प्रति लेखक-निर्देशक की अतिरिक्त सहानुभूति शुरू से लेकर आखिर तक झलकती है. राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने अपने पक्ष को रखने के लिए उनके जीवन के उन्हीं प्रसंगों और तथ्यों को चुना हैजो उनकी प्रस्तावना की मदद करें. स्पष्ट रूप से संजय दत्त की मटमैली और विवादित छवि के लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहराया गया है. बाद में संजय दत्त और रणबीर कपूर मीडिया की बुराई का पूरा गाना गेट हैं. संजय दत्त की करतूतों को मीडिया की निगेटिव छवि या प्रश्न वाचक सुर्खियों की आड़ में नहीं ढका जा सकता. सच्चाई तो यही है कि ड्रग्स की आदत और गन रखने की भूल से उनकी जिंदगी तबाह हुई. दोनों ही मौकों पर पिता ने उन्हें उवारने और रास्ते पर लाने की सफल कोशिश की. फिल्म में मध्यांतर के पहले संजय दत्त एक दृश्य में कहते हैं कि पिता की लिगेसी मेरे ऊपर भार हो गई है. मैं उसे नहीं ढो सकता. वहीं मध्यांतर के बाद वह पिता का सिर ऊंचा रखने के लिए सरकारी गवाह बन कर जेल से छूटने के मौके को हाथ से जाने देते हैं. फिल्म में संजय दत्त की दुविधाओं का सुविधापूर्ण चित्रण किया गया है उनकी सोच में आये परिवर्तन का विकास नहीं दीखता.
            फिल्म के दो हिस्से हैं पहले हिस्से में ड्रग्स की लत के शिकार संजय दत्त हैं. उन्होंने पहली बार इसलिए ड्रग लिया कि पिता से नाराज  थे. दूसरी बार मां बीमार थीं और तीसरी बार तक उन्हें आदत हो गई थी. पिता के साथ संजय दत्त के संबंध की जटिलता और ग्रंथि में निर्देशक गहराई में नहीं उतरे हैं. बहुत कुछ अनकहा रह गया है। शायद सुनील दत्त जीवित रहते तो उसके पहलू खुलते. दूसरे हिस्से में गनका किस्सा है. एक ही घर में रहते हुए पिता और पुत्र के बीच की संवादहीनता की वजह से ही संजय दत्त परिवार की सुरक्षा के लिए गन मंगवा लेते हैं. क्या बाबरी मस्जिद टूटने के बाद मुंबई में हुए दंगों में सुनील दत्त की भूमिका (मुसलमानों के पक्ष में) पर बाप-बेटे के बीच कोई बात नहीं हुई कभी? फिल्म में केवल यह दृश्य आया है कि संजय दत्त धमकी मिलने पर पिता की सुरक्षा के लिए भागते हैं. बहरहाल, गन रखने की वजह से गिरफ्तार होने के बाद संजय दत्त के साथ जो कुछ हुआ, उसके बारे में एक धारणा है कि उन्हें सुनील दत्त की पार्टी (कांग्रेस) के नेताओं का समर्थन नहीं मिला था। इस प्रसंग के विस्तार में जाने पर कुछ भेद खुलते। साथ ही सुनील दत्त और बाला साहेब ठाकरे की मुलाकात के महत्व और प्रभाव को भी फिल्म नहीं छूती। दोनों ही प्रसंग राजनीतिक हैं और संजय दत्त की स्थिति के लिए महत्वपूर्ण हैं.
            यह फिल्म संजय दत्त और सुनील दत्त के बीच व्यक्त-अव्यक्त पिता-पुत्र संबंधों का भावनात्मक और नाटकीय चित्रण करती है. मां नरगिस बेटे संजय दत्त की जिंदगी की आसन्न तबाही से पहले गुजर जाती हैं. संजय दत्त के बिगड़ने में मां नरगिस की ढील बड़ा कारण है. फिल्म उधर झांकती ही नहीं. यह फिल्म संजय दत्त और उनके दोस्त कमली (कमलेश) के संबंधों की प्रगाढ़ता को बहुत अच्छे तरीके से फिल्म में पिरोती है. संजय दत्त की छवि साफ करने के साथ ही संजूपिता-पुत्र संबंध और दोस्ती की भी कहानी है. लेखक-निर्देशक ने बहुत चालाकी से संजय दत्त के अन्य दुर्बल पक्षों को किनारे कर दिया है. उनके प्रेम प्रसंगों, 350 लड़कियों के साथ कथित सहवास और फिल्म करिअर पर निर्देशक की नजर नहीं है. भरपूर इमोशन छलकाती यह फिल्म कमियों के बावजूद हंसाती और रुलाती है. ड्रामा भी प्रचुर मात्रा में है.
            अभिनय के लिहाज से रणबीर कपूर और विक्की कौशल उल्लेखनीय हैं. दोनों ने श्रेष्ठ और समर्थ अभिनय किया है. इसमें मेक उप के उस्ताद विक्रम गायकवाड का बड़ा योगदान है. विक्की कौशन संजूमें लगभग पैरेलल भूमिका में हैं। वे अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करते हैं। उनकी अभिनय क्षमता और बारीकियां प्रभावित करती हैं। सुनील दत्त की भूमिका में परेश रावल गन मामले में मुश्किलों में फंसे बेटे की वजह से टूटे और कमजोर पड़े सुनील दत्त को पर्दे पर नहीं उतार पाते। उन दृश्यों में वे अप्रभावी हैं। मान्यता दत्त की भूमिका में दीया मिर्जा और नरगिस की भूमिका में मनीषा कोईराला ने जरूरत के मुताबिक साथ दिया है। राजकुमार हिरानी की प्रच्छन्न और बदली भूमिका निभा रही अनुष्का शर्मा के पास विस्मित होने के अलावा और कोई भाव नहीं था। यही विस्मय राजकुमार हिरानी को संजय दत्त की जिंदगी में ले गया होगा, जिसका परिणाम संजूहै।
अवधि 161 मिनट
***½ साढ़े तीन स्टार

Friday, January 29, 2016

फिल्‍म समीक्षा : साला खड़ूस

खेल और ख्‍वाब का मैलोड्रामा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    हर विधा में कुछ फिल्‍में प्रस्‍थान बिंदु होती हैं। खेल की फिल्‍मों के संदर्भ में हर नई फिल्‍म के समय हमें प्रकाश झा की हिप हिप हुर्रे और शिमित अमीन की चक दे इंडिया की याद आती है। हम तुलना करने लगते हैं। सुधा कोंगरे की फिल्‍म साला खड़ूस के साथ भी ऐसा होना स्‍वाभाविक है। गौर करें तो यह खेल की अलग दुनिया है। सुधा ने बाक्सिंग की पृष्‍ठभूमि में कोच मदी(आर माधवन) और बॉक्‍सर(रितिका सिंह) की कहानी ली है। कहानी के मोड़ और उतार-चढ़ाव में दूसरी फिल्‍मों से समानताएं दिख सकती हैं,लेकिन भावनाओं की जमीन और परफारमेंस की तीव्रता भिन्‍न और सराहनीय है।
    आदि के साथ देव(जाकिर हुसैन) ने धोखा किया है। चैंपियन बॉक्‍सर होने के बावजूद आदि को सही मौके नहीं मिले। कोच बनने के बाद भी देव उसे सताने और तंग करने से बाज नहीं आता। देव की खुन्‍नस और आदि की ईमानदारी ने ही उसे खड़ूस बना दिया है। अभी कर्तव्‍यनिष्‍ठ और ईमानदार व्‍यक्ति ही घर,समाज और दफ्तर में खड़ूस माना जाता है। देव बदले की भावना से आदि का ट्रांसफर चेन्‍नई करवा देता है। चेन्‍नई में आदि की भिड़ंत मदी से होती है। मछवारन मदी में उसे उसकी बड़ी बहन और बॉक्‍सर लक्‍स(मुमताज सरकार) से अधिक एनर्जी और युक्ति दिखती है। मदी में आदि को खुद जैसी आग का अहसास होता है। वह उसे बॉक्सिंग के गुर सिखाता है और कंपीटिशन के लिए तैयार करता है। साला खड़ूस में दोनों के रिश्‍तों(शिष्‍य-गुरू) के साथ खेल की दुनिया की राजनीति और अंदरूनी कलह पर भी ध्‍यान दिया गया है। दोनों एकदूसरे से प्रभावित भी होते हैं।
    देश में बाक्सिंग का स्‍तर सुधारने के लिए खड़ूस आदि किसी भी स्‍तर तक जा सकता है। वह मदी के लिए सब कुछ करता है। कहीं न कहीं वह उसके जरिए अपने अधूरे ख्‍वाब पूरे करना चाहता है। आदि की यह निजी ख्‍वाहिश स्‍वार्थ से प्रेरित लग सकती है,लेकिन आखिरकार इसमें बॉक्सिंग का हित जुड़ा है। मदी की अप्रयुक्‍त और कच्‍ची ऊर्जा को सही दिशा देकर आदि उसे सफल बॉक्‍सर तो बना देता है,लेकिन देव की अड़चनें नहीं रुकतीं। स्थिति ऐसी आती है कि फायनल मैच के पहले आदि को सारे पदों से त्‍यागपत्र देने के साथ ही अनुपस्थित रहने का निर्णय लेना पड़ता है। फायनल मैच और उसके पहले के कई दृश्‍यों में भी फिल्‍म मैलोड्रैमैटिक होती है। भावनाओं का ज्‍वार हिलोरें मारता है। इन दृश्‍यों की भावुकता दर्शकों को भी द्रवित करती है,लेकिन इस बहाव से अलग होकर सोचें तो साला खड़ूस की तीव्रता इन दृश्‍यों में शिथिल होती है।
    आदि की भूमिका में हम एक अलग आर माधवन से परिचित होते हैं। उन्‍हें हम रोमांटिक और सॉफ्ट भूमिकाओं में देखते रहे हैं। इस फिल्‍म में वे अपनी प्रचलित छवि से बाहर आए हैं और इस भूमिका में जंचे हैं। केवल चिल्‍लाने और ऊंची आवाज में बोलने के दृश्‍यों में उनके संवाद थोड़े अनियंत्रित और अस्‍पष्‍ट हो जाते हैं। भावार्थ तो समझ में आ जाता है। शब्‍द स्‍पष्‍ट सुनाई नहीं पड़ते। परफारमेंस के लिहाज से उनके अभिनय का नया आयाम दिखाई पड़ता है। नयी अभिनेत्री रितिका सिंह का स्‍वच्‍छंद अभिनय साला खड़ूस में जान भर देता है। अपनी खुशी,गुस्‍से और बाक्सिंग के दृश्‍यों में वह बेधड़क दिखती हैं। रियल लाइफ बॉक्‍सर होने की वजह से उनके आक्रमण और बचाव में विश्‍वसनीयता झलकती है। कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा की भी तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने किरदारों के लिए उपयुक्‍त कलाकारों का चुनाव किया है। छोटी भूमिकाओं में आए ये कलाकार फिल्‍म के अंति प्रभाव को बढ़ा देते हैं। जूनियर कोच के रुप में आए नासिर और मदी की मां की भूमिका निभा रही अभिनेत्री बलविंदर कौर के उदाहरण दिए जा सकते हैं।
    फिल्‍म में मदी के अंदर आया रोमांटिक भाव पूरी फिल्‍म के संदर्भ में गैरजरूरी लग सकता है,लेकिन उसकी पृष्‍ठभूमि और कंडीशनिंग के मद्देनजर यह प्रतिक्रिया स्‍वाभाविक है। निर्देशक ने संयम से कायम लिया है। उन्‍होंने दोनों के ऊपर कोई रोमांटिक गीत नहीं फिल्‍माया है। स्‍वानंद किरकिरे और संतोष नारायण ने फिल्‍म की थीम के मुताबिक गीत-संगीत रचा है।
अवधि- 109 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार

Saturday, January 2, 2016

खेल के साथ रिश्‍तों की कहानी है ‘साला खड़ूस’-राजकुमार हिरानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

    राजकुमार हिरानी पीके से सहनिर्माता बन गए थे। उसके पहले वे विधु विनोद चापड़ा की परिणीता,एकलव्‍य और फरारी की सवारी में क्रिएटिव प्रड्यूसर रहे। स्‍वतंत्र निर्माता के तौर पर उनकी पहली फिल्‍म साला खड़ूस होगी। इस फिल्‍म में आर माधवन और रितिका सिंह ने मुख्‍य भूमिकाएं निभाई हैं। प्रस्‍तुत है बतौर निर्माता राजकुमार हिरानी से हुई बातचीत के अंश.....- निर्माता बनने का खयाल क्‍यों और कैसे आया ?

0 यह संयोग से हुआ। चाहता था कि कुछ प्रड्यूस करूं। इंतजार था कि कोई अच्‍छी स्क्रिप्‍ट आए या कोई असिस्‍टैंट तैयार हो। हुआ यों कि एक दिन माधवन मेरे पास आ गए। उन्‍होंने  20 मिनट में एक कहानी सुनाई। वे चाहते थे कि मैं उसे प्रेजेंट करूं। कहानी अच्‍छी लगी तो मु लगा कि इनवॉल्‍व होना चाहिए। उन्‍होंने साथ आने का प्रस्‍ताव दिया और मैंने स्‍वीकार कर लिया।- बाधवन से आप की दोस्‍ती और स्क्रिप्‍ट दोनों ने आप को राजी किया या...0 माधवन के साथ मैंने काम किया है। उन्‍हें अर्से से जानता हूं। मिलना-जुलना रहता ही है। हमारी मुलाकात के समय तक माधवन अपनी बॉडी पर काम कर चुके थे। बेहद फिट थे। उन्‍होंने जिस जोश से मुझे कहानी सुनाई,उसने मुझे भी प्रेरित किया।फिर फिल्‍म की डायरेक्‍टर सुधा कोंगरा से मुलाकात हुई। वह मणि रत्‍नम के साथ काम किया करती थीं। यह उनकी कहानी थी। उन पर मुझे विश्‍वास हुआ। निर्माता बनने के लिए जरूरी था कि स्क्रिप्‍ट और डायरेक्‍टर पर मेरा विश्‍वास हो।- आप का क्रिएटिव कंट्रीब्‍यूशन किस स्‍तर पर रहा ?

0 मिली हुई स्क्रिप्‍ट को सुधारना और बेहतर बनाना। फिर एडीटिंग में इनके साथ बैठा। डायरेक्‍टर के साथ मैं चला। मैंने खुद को कभी इम्‍पोज नहीं किया। गीत-संगीत के लिए मैं अपनी टीम लेकर गया। स्‍वानंद किरकिरे को जोड़ा। म्‍यूजिक डायरेक्‍टर चेन्‍नई के ही हैं।-क्‍या है यह फिल्‍म ?

0 एक बॉक्‍सर की कहानी है,जो कभी ओलिंपिक में जाना चाहता था,जो इंटरनल पॉलिटिक्‍स की वजह से नहीं जा सका। उसने बॉक्सिंग छोड़ दी। दस सालों के बाद उसे उसका दोस्‍त कोच बना कर ले आया। कोच बन कर आने के बाद वह महसूस करता है कि स्थितियां और बदतर हुई हैं। उस समय के कुछ लोग आज भी मौजूद हैं। वह इस बार कुछ करना चाहता है तो उसे दूसरी जगह भेज दिया जाता है। महिला बॉक्‍सर की टीम तैयार करने की जिम्‍मेदारी दे दी जाती है। उसे एक दिन एक मछवारिन मिलती है। उसमें उसे क्षमता दिखती है। वह उसे कैसे तैयार करता है,यही सब कहानी है। वास्‍तव में यह खेल के साथ रिश्‍तों की भी कहानी है। क्‍लाइमेक्‍स बेहतरी बना है।-फिल्‍म के ट्रेलर से लगता है कि कोई प्रेमकहानी भी हो ?

0 प्रेमकहानी तो नहीं है। ट्रेलर में हंसी-मजाक के लिए डाला गया है। दोनों की जर्नी है। माधवन उसके जरिए कुछ हासिल करना चाहते हैं। असल में दोनों ही खड़ूस हैं। एक के सपने और दूसरे के संघर्ष की पैरेलल कहानी चलती है। सब होने के बाद भी कहानी बॉक्सिंग पर टिकी रहती है।

-ऐसी फिल्‍मों के दर्शक और बाजार हैं क्‍या?

0 हम ने इसे नियंत्रित तरीके से बनाया है। पता नहीं रहता। कई बार छोटी फिल्‍में सरप्राइज कर देती है। पिछले साल जैसे मसान ने किया। हम तो बेहतर की उम्‍मीद रख रहे हैं। इसे मैंने अपनी फिल्‍म के तरह ही बनाया है। मेरी फिल्‍मों को ट्रेड अनसेफ कहता रहा है,लेकिन दर्शकों ने उन्‍हें हाथोंहाथ लिया। पूरे पैशन से बनाई है मैंने।-और भी फिल्‍मों के निर्माण की योजनाएं हैं क्‍या ?

0 अभी नहीं। इसके बाद संजय दत्‍त की बॉयोग्राफी में लग जाऊंगा। फिर मुन्‍नाभाई की अगली कड़ी भी लिखी जा रही है। अब मुझे एक अच्‍छी कहानी मिल गई है। चार-पांच आधी-आधी लिखने के बाद यह कहानी मिली है। वह फिल्‍म संजय दत्‍त के साथ ही होगी। बीच में सुभाष कपूर ने भी कोशिश की थी। उनसे भी नहीं हो सकी। दरअसल,मुन्‍नाभाई सीरिज की अगली फिल्‍म पिछली फिल्‍मों के समकक्ष या बेहतर हागी तभी दर्शक संतुष्‍ट होंगे। उस फिल्‍म के प्रति दर्शकों का प्रेम बना हुआ है। दोनों फिल्‍में मुझे डायरेक्‍ट करनी हैं।


Monday, December 29, 2014

पीके फिल्‍म की धुरी है यह गीत और संवाद

पीके के पर चल रहे इस विवाद के संदर्भ में कि फिल्‍म में केवल हिंदू धर्म और साधु-संतों पर निशाना साध गया है... 
पेश है फिल्‍म का एक गीत और वह महत्‍वपूर्ण संवाद जो फिल्‍म की धुरी है....112वें मिनट से 116 वें मिनट तक आप फिल्‍म में इन्‍हें सुन सकते हैं।

 

Bhagwan Hai Kahan Re Tu Lyrics

Hai suna ye poori dharti tu chalata hai
Meri bhi sun le araj mujhe ghar bulata hai
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu

Hai suna tu bhatke mann ko raah dikhata hai
Main bhi khoya hun mujhe ghar bulata hai
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu

Aa...
Main pooja karun ya namajein padhun
Ardaasein karun din rain
Na tu Mandir mile, na tu Girje mile
Tujhe dhoondein thake mere nain
Tujhe dhoondein thake mere nain
Tujhe dhoondein thake mere nain

Jo bhi rasmein hain wo saari main nibhata hoon
In karodon ki tarah main sar jhukata hoon
Bhagwan hai kahan re tu
Aye Khuda hai kahan re tu

Tere naam kayi, tere chehre kayi
Tujhe paane ki raahein kayi
Har raah chalaa par tu na mila
Tu kya chaahe main samjha nahin
Tu kya chaahe main samjha nahin
Tu kya chaahe main samjha nahin

Soche bin samjhe jatan karta hi jaata hun
Teri zid sar aankhon par rakh ke nibhata hun
Bhagwan hai kahan re tu
Aye Khuda hai kahan re tu

Hai suna ye poori dharti tu chalata hai
Meri bhi sun le araj mujhe ghar bulata hai
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu..

....बहुत ही कनफुजिया गया हूं भगवान। कुछ तो गलती कर रहा हूं कि मेरी बात तुम तक पहुंच नहीं रही है। हमारी कठिनाई बूझिए न। तनिक गाइड कर दीजिए... हाथ जोड़ कर आपसे बात कर रहे हैं...माथा जमीन पर रखें, घंटी बजा कर आप को जगाएं कि लाउड स्पीकर पर आवाज दें। गीता का श्लोक पढ़ें, कुरान की आयत या बाइबिल का वर्स... आप का अलग-अलग मैनेजर लोग अलग-अलग बात बोलता है। कौनो बोलता है सोमवार को फास्ट करो तो कौनो मंगल को, कौनो बोलता है कि सूरज डूबने से पहले भोजन कर लो तो कौनो बोलता है सूरज डूबने के बाद भोजन करो। कौनो बोलता है कि गैयन की पूजा करो तो कौनो कहता है उनका बलिदान करो। कौना बोलता है नंगे पैर मंदिर में जाओ तो कौनो बोलता है कि बूट पहन कर चर्च में जाओ। कौन सी बात सही है, कौन सी बात लगत। समझ नहीं आ रहा है। फ्रस्टेटिया गया हूं भगवान...

Monday, December 22, 2014

दरअसल : राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी

-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों के इतिहास में सलीम-जावेद की जोड़ी मशहूर रही है। दोनों ने अनेक सफल फिल्मों का लेखन किया। दोनों बेहद कामयाब रहे। उन्होंने फिल्मों के लेखक का दर्जा ऊंचा किया। उसे मुंशी से ऊंचे और जरूरी आसन पर बिठाया। उनके बाद कोई भी जोड़ी बहुत कामयाब नहीं रही।  लंबे समय के बाद राजकुमारी हिरानी और अभिजात जोशी की जोड़ी कुछ अलग ढंग से वैसी ही ख्याति हासिल कर रही है। अभी देश का हर दर्शक राजकुमार हिरानी के नाम से परिचित है। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’, ‘3 इडियट’ और इस हफ्ते आ रही ‘पीके’ के निर्देशक राजकुमार हिरानी ने हिंदी फिल्मों को नई दिशा दी है। उन्होंने मनोरंजन की परिभाषा बदल दी है। उन्होंने अपनी तीनों फिल्मों से साबित किया है कि मनोरंजन के लिए आसान और आजमाए रास्तों पर ही चलना जरूरी नहीं है। लकीर छोडऩे पर भी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।
    अभिजात जोशी उनके सहयोगी लेखक हैं। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ से दोनों साथ आए। दोनों के बीच संयोग से मुलाकात हुई। 1992 में अयोध्या में घटना के बाद अहमदाबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने ‘शैफ्ट ऑफ सनलाइट’ नामक नाटक लिखा था। विधु विनोद चोपड़ा को इस नाटक के विषय ने प्रभावित किया था। उन्होंने अभिजात जोशी से मिलने में रुचि दिखाई थी। बाद में अभिजात जोशी ने विधु विनोद चोपड़ा के लिए लेखन आरंभ किया था। उसी दरम्यान एक बार राजकुमार हिरानी से उनकी संगत हुई। राजकुमार हिरानी ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे। वे अपना ड्राफ्ट सुना रहे थे। अभिजात जोशी ने साथ में काम करने का प्रस्ताव रखा, जिसे राजकुमार हिरानी ने सहज रूप से स्वीकार नहीं किया। कुछ महीनों की मेलबाजी के बाद स्पष्ट समझदारी बनी। बाद में ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट में गांधी के विचारों का सार समेटने में अभिजात जोशी ने पूरी मेहनत की। उन्होंने गांधी वांग्मय के साथ गांधी जी के सचिव महादेव देसाई की डायरी भी पढ़ी। उनके इनपुट से ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट समृद्ध और सारगर्भित हुई।
    अभिजात जोशी और राजकुमार हिरानी का सहयोग चलता रहा। बीच में अभिजात जोशी अमेरिका वेस्टरविले ओहियो में पढ़ाने चले गए। उस दौरान दोनों के बीच ईमेल और फोन के जरिए निरंतर संपर्क रहता था। राजकुमार हिरानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दोनों फिल्म के मुख्य विषय और विचार को स्वतंत्र रूप से दृश्यों में विकसित करते हैं। वे अपना लिखा एक-दूसरे को भेजते हैं। सुझाव से उसमें परिष्कार करते हैं। लंबी बहस और बातचीत के बाद ही वे स्क्रिप्ट को अंतिम रूप देते हैं। उनकी इस कार्यशैली में कई अड़चनें आती थीं। लेकिन चूंकि सहयोग और समझदारी आला दर्जे की थी, इसलिए कभी कोई मनमुटाव या मतभेद नहीं हुआ।
    दोनों की परवरिश अलग-अलग शहरों में हुई है। राजकुमार हिरानी नागपुर के हैं। उनके सिंधी पिता पाकिस्तान से माइग्रेट होकर भारत आए थे। पार्टीशन के बाद नागपुर को अपना ठिकाना बनाकर उन्होंने जीवनयापन आरंभ किया। कह सकते हैं कि राजकुमार हिरानी की फिल्मों में आए मध्यमवर्गीय मूल्य इसी पारिवारिक संस्कार के परिणाम हैं। अभिजात जोशी अहमदाबाद में रहे। दोनों की सोच में सामाजिकता हैं। उन्हें सोशलिस्ट विचार के लेखक कहा जा सकता है। दोनों चाहते हैं कि उनकी फिल्मों में एक ठोस संदेश रहे, जो मनोरंजक तरीके से दर्शकों के बीच पहुंचे। ‘3 इडियट’ में शिक्षा और करियर के प्रति अभिभावकों के दृष्टिकोण को बदल दिया। सभी ने महसूस किया कि बच्चों की जिस पढ़ाई और कार्य में रुचि हो, उन्हें उसी के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
    ‘पीके’ का संदेश अभी तक जाहिर नहीं हो सका है। इस फिल्म में आमिर खान पीके की केंद्रीय भूमिका में हैं। उनके किरदार को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। एक बात तो सामने आ रही है कि हिरानी और जोशी ने पीके के माध्यम से भारतीय समाज और सिस्टम पर बातें की हैं। हास्य-विनोद और सोच से इस बार कौन सा नया संदेश वे देंगे, वह देखने वाली बात होगी। यह अभी तक नहीं मालूम है। इतना मालूम है कि राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की जोड़ी फिल्म लेखन में सफलता और गंभीरता के नए अध्याय जोड़ रही है।

Friday, December 19, 2014

फिल्‍म समीक्षा : पीके

-अजय ब्रह्मात्‍मज
....बहुत ही कनफुजिया गया हूं भगवान। कुछ तो गलती कर रहा हूं कि मेरी बात तुम तक पहुंच नहीं रही है। हमारी कठिनाई बूझिए न। तनिक गाइड कर दीजिए... हाथ जोड़ कर आपसे बात कर रहे हैं...माथा जमीन पर रखें, घंटी बजा कर आप को जगाएं कि लाउड स्पीकर पर आवाज दें। गीता का श्लोक पढ़ें, कुरान की आयत या बाइबिल का वर्स... आप का अलग-अलग मैनेजर लोग अलग-अलग बात बोलता है। कौनो बोलता है सोमवार को फास्ट करो तो कौनो मंगल को, कौनो बोलता है कि सूरज डूबने से पहले भोजन कर लो तो कौनो बोलता है सूरज डूबने के बाद भोजन करो। कौनो बोलता है कि गैयन की पूजा करो तो कौनो कहता है उनका बलिदान करो। कौना बोलता है नंगे पैर मंदिर में जाओ तो कौनो बोलता है कि बूट पहन कर चर्च में जाओ। कौन सी बात सही है, कौन सी बात लगत। समझ नहीं आ रहा है। फ्रस्टेटिया गया हूं भगवान...

पीके के इस स्वगत के कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के पेशावर में आतंकवादी मजहब के नाम पर मासूम बच्चों की हत्या कर देते हैं तो भारत में एक धार्मिक संगठन के नेता को सुर्खियां मिलती हैं कि 2021 तक वे भारत से इस्लाम और ईसाई धर्म समाप्त कर देंगे। धर्माडंबर और अहंकार में मची लूटपाट और दंगों से भरी घटनाओं के इस देश में दूर ग्रह से एक अंतरिक्ष यात्री आता है और यहां के माहौल में कनफुजियाने के साथ फ्रस्टेटिया जाता है। वह जिस ग्रह से आया है, वहां भाषा का आचरण नहीं है, वस्त्रों का आवरण नहीं है और झूठ तो बिल्कुल नहीं है। सच का वह हिमायती, जिसके सवालों और बात-व्यवहार से भौंचक्क धरतीवासी मान बैठते हैं कि वह हमेशा पिए रहता है, वह पीके है।
धर्म के नाम पर चल रही राजनीति और तमाम किस्म के भेदभाव और आस्थाओं में बंटे इस समाज में भटकते हुए पीके के जरिए हम उन सारी विसंगतियों और कुरीतियों के सामने खड़े मिलते हैं, जिन्हें हमने अपनी रोजमर्रा जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। आदत हो गई है हमें, इसलिए मन में सवाल नहीं उठते। हम अपनी मुसीबतों के साथ सोच में संकीर्ण और विचार में जीर्ण होते जा रहे हैं। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की कल्पना का यह एलियन चरित्र पीके हमारे ढोंग को बेनकाब कर देता है। भक्ति और आस्था के नाम पर 'रौंग नंबर' पर भेजे जा रहे संदेश की फिरकी लेता है। वह अपनी सच्चाई और लाजवाब सवालों से अंधी आस्था और धंधा बना चुकी धार्मिकता के प्रतीक तपस्वी को टीवी के लाइव प्रसारण में खामोश करता है। 'पीके' आज के समय की जरूरी फिल्म है। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी का संदेश स्पष्ट है कि अलग-अलग भगवान के मैनेजर बने स्वामी, बाबा, गुरु, मौलवी और पादरी वास्तव में डर का आतंक फैला कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की कथा-पटकथा सामाजिक विसंगति और कुरीति की गहराइयों में उतर कर विश्लेषण और विमर्श नहीं करती। वह सतह पर तैरते पाखंड को ही अपना निशाना बनाती है। मान सकते हैं कि 2 घंटे 33 मिनट की फिल्म में सदियों से चली आ रही आस्था की जड़ों और वजहों में जाने की गुंजाइश नहीं हो सकती थी, लेकिन धर्म सिर्फ कथित मैनेजरों और तपस्वियों का प्रपंच नहीं है। इसके पीछे सुनिश्चित सामाजिक सोच और राजनीति है। 'पीके' एक धर्महीन समाज की वकालत करती है,लेकिन वह ईश्वर की अदृश्य सत्ता से इंकार नहीं करती। फिल्म यहीं अपने विचारों में फिसल जाती है। वैज्ञानिक सोच और आचार-व्यवहार के समर्थक किसी भी रूप में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करेंगे तो कालांतर में फिर से विभिन्न समूहों के धर्म और मत पैदा होंगे। फिर से तनाव होगा, क्योंकि सभी अपनी आस्था के मुताबिक भगवान रचेंगे और फिर उनकी रक्षा करने का भ्रमजाल फैला कर भोली और नादान जनता को ठगेंगे। 'पीके' सरलीकरण से काम लेती है।
वैचारिक स्तर पर इस कमी के बावजूद 'पीके' मनोरंजक तरीके से कुछ फौरी और जरूरी बातें करती है। भेद और मतभेद के मुद्दे उठाती है। उनके समाधान की कोशिश भी करती है। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने खूबसूरती से पीके की दुनिया रची है, जिसमें भैंरो और जग्गू (जगत जननी) जैसे किरदार हैं। जग्गू की मदद से पीके अपने ग्रह पर लौट पाने का रिमोट हासिल करता है। और फिर एक साल के बाद अपने ग्रह से दूसरे यात्री को लेकर आगे के शोध के लिए आता है। सवाल है कि रिमोट मिलते हैं, उसे लौट जाने की ऐसी क्या हड़बड़ी थी? वह अपना शोध पूरा करता या फिर मानवीय व्यवहार और आचरण से ही वह धरतीवासियों को परख लेता है?
इस दरम्यान जग्गू की उपकथा भी चलती है। पाकिस्तानी सरफराज से उसके प्रेम और गलतफहमी की कहानी बाद में मूल कथा में आकर मिलती है। बाबाओं के आडंबर और ईश्वर के नाम पर चल रहे ढोंग और प्रपंच को अनके फिल्मों में विषय बताया गया है। हिरानी और जोशी इस विषय के विवरण और चित्रण में कुछ नया नहीं जोड़ते। नयापन उनके किरदार पीके में है, जो 'कोई मिल गया' में जादू के रूप में आ चुका है। 'पीके' की विचित्रता ही मौलिकता है। पता चलता है कि सभ्यता और विकास के नाम पर अपनाए गए आचरण और आवरण ही मतभेद और आडंबर के कारण हैं।
पटकथा अनेक स्थानों पर कमजोर पड़ती है। कहीं उसकी क्षिप्र गति तो कहीं उसकी तीव्र गति से मूल कथा को झटके लगते हैं। सरफराज और जग्गू के बीच प्रेम की बेल तेजी से फैलती है, फिर सरफराज परिदृश्य से गायब हो जाते हैं। जग्गू भारत लौट आती है। और यहां उसकी मुलाकात पीके से हो जाती है। अपने रिमोट की तलाश में भटकता पीके पहले जग्गू के लिए एक स्टोरी मात्र है, जो कुछ मुलाकातों और संगत के बाद प्रेम और समझ का प्रतिरूप बन जाता है। पीके के किरदार को आमिर खान ने बखूबी निभाया है। यह किरदार हमें प्रभावित करता है। ऐसे किरदारों की खासियत है कि वे दिल को छूते हैं। फिल्म के अंतिम दृश्य में सहयात्री के रूप में आए रणबीर कपूर भी उतने ही जंचते हैं। तात्पर्य यह कि हिरानी और जोशी की काबिलियत है कि पीके में आमिर खान की प्रतिभा निखरती है। जग्गू की भूमिका में अनुष्का निराश नहीं करतीं। वह सौंपी गई भूमिका निभाकर ले जाती हैं। सरफराज की छोटी भूमिका में आए सुशांत सिंह राजपूत में आकर्षण है। अन्य भूमिकाओं में सौरभ शुक्ला, परीक्षित साहनी, बोमन ईरानी, संजय दत्त आदि अपने किरदारों के अनुरूप हैं।
फिल्म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। इस बार स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा जादू नहीं जगा पाए हैं। अन्य गीतकारों में अमिताभ वर्मा और मनोज मुंतजिर भी खास प्रभावित नहीं करते। पीके पर फिल्माए गाने अतिरंजित और अनावश्यक हैं। ईश्वर की खोज का गाने से अधिक प्रभावपूर्ण उसके बाद का स्वगत संवाद है।
अवधि- 153 मिनट 
**** चार स्‍टार

Saturday, December 6, 2014

‘3 इडियट’ के तीनों इडियट ही ला रहे हैं ‘पीके’

आमिर खान ने आगामी फिल्म ‘पीके’ के प्रचार के लिए इस बार नया तरीका अनपाया है। वे इस फिल्म की टीम के साथ सात शहरों की यात्रा पर निकले हैं। आज पटना से इसकी शुरुआत हो रही है। इस अभियान में वे ‘3 इडियट’ का प्रदर्शन करेंगे और फिर आमंत्रित दर्शकों से बातचीत करेंगे। पटना के बाद वे बनारस, दिल्ली, अहमदाबाद, हैदराबाद, जयपुर और रायपुर भी जाएंगे। पटना के लिए उड़ान भरने से पहले उन्होंने अजय ब्रह्मात्माज से खास बातचीत की।

प्रचार के इस नए तरीके के आयडिया के बारे में बताएं ?

हमलोग ‘3 इडियट’ दिखा रहे हैं। मकसद यह बताने का है कि ‘3 इडियट’ की टीम एक बार फिर आ रही है। इस बार वही टीम ‘पीके’ ला रही है। ‘3 इडियट' के तीनो इडियट राजू,विनोद और मैं अब ‘पीके’ लेकर आ रहे हें। हमलोग तयशुदा सात शहरों में ‘3 इडियट’ की स्क्रीनिंग करेंगे। इस स्क्रीनिंग में आए लोगों के साथ फिल्म खत्म होने के बाद हमलोग बातचीत करेंगे। कोशिश है कि हमलोग ग्रास रूट के दर्शकों से मिलें।
पटना से शुरूआत करने की कोई खास वजह...?
पटना से शुरूआत करने की यही वजह है कि ‘पीके’ में मेरा किरदार भोजपुरी बोलता है। वास्तव में हमलोग भोजपुर जाना चाहते थे। वहां की पुलिस ने मना कर दिया कि आप न आएं। हम कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। मेरा तो यही मन था कि भोजपुर से शुरू करें। उनके मना करने के बाद अब पटना से शुरू कर रहे हैं।

हां,डर तो रहता है कि कहीं कुछ हो गया तो ?

कुछ भी नहीं होता है। सभी मुझे प्यार करते हैं। उन्होंने यही कहा कि भीड़ के नियंत्रण में दिक्कत होगी। प्रशासन असुविधा महसूस कर रहा था। चूंकि भोजपुरी भाषा है तो बिहार से आरंभ करना लाजिमी था। अब पटना से शुरूआत होगी।

भोजपुरी का आयडिया कैसे आया? मैंने सुना कि आप ने ही भोजपुरी पर जोर दिया था।
मेरे लिए इसे अभी बताना मुश्किल है। फिल्म देखने पर आप समझ जाएंगे कि पीके क्यों भोजपुरी बोल रहा है। स्क्रिप्ट में तो वह खड़ी बोली हिंदी ही बोल रहा था। स्क्रिप्ट सुनने पर मैंने राजू से कहा कि उसे भोजपुरी में बोलने दो। उस भाषा से किरदार में एक कलर आएगा। वह निखर जाएगा।

मेरी धारणा है कि कहीं न कहीं आप में और दिलीप कुमार की कार्यशैली में कई समानताएं हैं। हालांकि आप स्पष्ट प्रभाव या प्रेरणा से मना करते हैं। अब ‘पीके’ की भोजपुरी लें। मुझे दिलीप साहब की ‘गंगा जमुना’ याद आ रही है।
दिलीप साहब तो गजब की भोजपुरी बोलते थे। भाषा पर उनकी पूरी कमांड थी। मैंने भी कोशिश की है। हमारे साथ एक विशेषज्ञ और प्रशिक्षक शांतिभूषण थे। शूटिंग के चार महीने पहले से मैंने अभ्यास आरंभ कर दिया था। वे संवाद बोलते थे और मैं उसे फोनटिकली लिख लेता था और फिर याद करता था। मैं शब्दों और वाक्यों को ध्वनि और लहजे के साथ याद रखता था। एक चीज स्पष्टर कर दूं कि मैंने भोजपुरी भाषा नहीं सीखी है। किसी भी भाषा को अपनाने में वक्ती लगता है।

भोजपुरी की कितनी गालियां सीखी आप ने...?
पीके गाली नहीं देता। इस फिल्मे में गालियां नहीं हैं। मैंने कहा न कि भोजपुरी भाषा नहीं सीखी है। मैं अपने संवादों तक सीमित रहा। उन्हें ही सही उच्चाकरण के साथ बोलता रहा। बोलते-बोलते एक टच आ ही जाता है। उन दिनों मेरी हिंदी में भोजपुरी का असर सुनाई पड़ता था।
पीके विचित्र प्राणी लग रहा है। क्या कुछ बता पाएंगे?

'पीके' के बारे में नहीं बता पाऊंगा। हां, फिल्म का अनुभव बहुत कमाल रहा। पहली दफा ऐसा हुआ कि शॉट की तैयारी का टेक में इस्तेंमाल नहीं हुआ। टेक देते समय मैं किसी और बहाव में आकर कुछ अलग कर जाता था। वह राजू को अच्छा लगता था। मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ? किसी एक शॉट की बात नहीं कह रहा हूं। कई बार ऐसा हुआ। लगातार हुआ। कमाल की कहानी है ‘पीके’। मैंने कल फाइनल फिल्म देखी और मैं काफी खुश हूं। हमें लगता है कि हम जो बनाने चले थे, उसमें कामयाब हुए हैं। अब दर्शकों की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

राजकुमार हिरानी के क्रिएटिव धैर्य की तरीफ करनी होगी कि वे आज के इस दौर में भी किसी हड़बड़ी में नहीं हैं। उनकी फिल्म पांच सालों के अंतराल के बाद आ रही है।
मेरे हिसाब से अभी वे हिंदी सिनेमा के नंबर वन डायरेक्टर हैं।

‘सत्यमेव जयते’ तो जारी रहेगा ?
हां,जारी रहेगा। 2015 में हम नहीं करेंगे। हमलोग रिसर्च और बाकी इंतजाम में इमोशनली थक गए हैं। अब ब्रेक लेने के बाद आरंभ करेंगे। 2015 में न तो ‘सत्यमेव जयते’ आएगा और न ही मेरी कोई फिल्म आएगी। मैंने कोई फिल्म साइन नहीं की है। अभी स्क्रिप्ट सुन रहा हूं। कोई स्क्रिप्ट पसंद भी आ गई तो वह 2016 में ही आ पाएगी।

Thursday, May 2, 2013

21वीं सदी का सिनेमा



-अजय ब्रह्मात्मज

            समय के साथ समाज बदलता है। समाज बदलने के साथ सभी कलारूपों के कथ्य और प्रस्तुति में अंतर आता है। हम सिनेमा की बात करें तो पिछले सौ सालों के इतिहास में सिनेमा में समाज के समान ही गुणात्मक बदलाव आया है। 1913 से 2013 तक के सफर में भारतीय सिनेमा खास कर हिंदी सिनेमा ने कई बदलावों को देखा। बदलाव की यह प्रक्रिया पारस्परिक है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव से समाज में परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन से सिनेमा समेत सभी कलाएं प्रभावित होती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हिंदी सिनेमा को देखें तो अनेक स्पष्ट परिवर्तन दिखते हैं। कथ्य,श्ल्पि और प्रस्तुति के साथ बिजनेस में भी इन बदलावों को देखा जा सकता है। हिंदी सिनेमा के अतीत के परिवर्तनों और मुख्य प्रवृत्तियों से सभी परिचित हैं। मैं यहां सदी बदलने के साथ आए परिवर्तनों के बारे में बातें करूंगा। 21वीं सदी में सिनेमा किस रूप और ढंग में विकसित हो रहा है?
            सदी के करवट लेने के पहले के कुछ सालों में लौटें तो हमें निर्माण और निर्देशन में फिल्म बिरादरी का स्पष्ट वर्चस्व दिखता है। समाज के सभी क्षेत्रों की तरह फिल्मों में भी परिवारवाद चलता है। कहा जाता है कि फिल्म बिरादरी एक दूसरे की मदद करने में आगे रहती है, लेकिन जब भी कोई बाहरी प्रतिभा इस बिरादरी में शामिल होना चाहती है तो एक अनकहा प्रतिरोध होता है। बाहर से आई प्रतिभाओं को दोगुनी-तिगुनी मेहनत करनी पड़ती है। अपनी जगह और पहचान बनाने में उन्हें तिरस्कार और अपमान भी झेलने पड़ते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के गलियारे में जाने कहां-कहां से चले आते हैं?’  की झुंझलाहट भरी प्रतिध्वनि अक्सरहां सुनाई पड़ती है।
            21वीं सदी के पहले सूरज बडज़ात्या, आदित्य चोपड़ा और करण जौहर की तिगड़ी ने हिंदी सिनेमा को खास ढंग से विकसित किया। उन्होंने इसे संभ्रांत और आभिजात्य वर्ग के सिनेमा के रूप में बढ़ाया। भव्य चमकदार सेट और उनसे भी भव्य भाव भंगिमा के किरदारों के साथ उन्होंने ऐसा फील गुडसिनेमा रचा, जिसका आम दर्शक से सीधा ताल्लुक नहीं था। अपने ही देश के दर्शकों से कटा यह सिनेमा मुख्य रूप से आप्रवासी भारतवंशियों के मनोरंजन के लिए तैयार किया जा रहा था। ध्येय के अनुरूप इन फिल्मों का बिजनेस भी हो रहा था। कुछ इतिहासकारों ने इस सिनेमा को डॉलर सिनेमाया एनआरआई सिनेमाका भी नाम दिया। इस ससिनेमा ने देसी दर्शकों को रिक्त और बहिष्कृत कर दिया। कुछ फिल्मकार तो दंभी के साथ कहने लगे थे कि हम चवन्नी छाप या हिंदी प्रदेश के दर्शकों के लिए फिल्में नहीं बनाते। गौर करें तो यह वही दौर था जब हिंदी सिनेमा के मुख्य दर्शकों ने मनोरंजन के विकल्प के रूप में भोजपुरी सिनेमा को चुना। हम ने देखा कि भोजपुरी सिनेमा में तेजी से उभार आया। इसी दौर में मल्टीप्लेक्स संस्कृति की वजह से हिंदी सिनेमा का अखिल भारतीय स्वरूप खंडित हुआ। फिलमें पूरे भारत में सफल होनी बंद हो गईं। माना गया कि मल्टीप्लेक्स के दर्शकों का सिनेमा अलग होता है और पारंपरिक सिंगल स्क्रीन के दर्शकों का सिनेमा अलग होता है। सिनेमा की समझ के इस विभाजन से वास्तव में हिंदी फिल्मों का भारी नुकसान किया।
            दूसरी तरफ हिंदी फिल्मों में आ रही जड़ता और एकरसता को कुछ फिल्मकार महसूस कर रहे थे। वजह यह भी थी कि ग्लोबल गांव के दौर में आम दर्शक भी घिसी पिटी और फाूर्मला फिल्मों से ऊब चुका था। कॉमेडी और एक्शन के नाम पर परोसी जा रही फूहड़ फिल्मों से मनोरंजन की उसकी भूख नहीं मिट रही थी। वह चालू किस्म की फिल्मों को लगातार रिजेक्ट कर रहा था। संक्रांति के इस  पल में आमिर खान ने पहल की। अपने मित्र आशुतोष गोवारीकर की नायाब स्क्रिप्ट पसंद करने के साथ उसके निर्माण का भी उन्होंने फैसला लिया। आमिर खान अभिनीत लगानहिंदी फिल्मों के इतिहास में मील का स्तंभ कही जा सकती है। इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों की दशा, दिशा और राह बदल दी। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में व्याप्त आलस्य और भ्रष्टाचार खत्म हुआ। निर्माता और अभिनेता एक शेड्यूल में फिल्म पूरी करने के लिए जागृत हुए। इस परिवर्तन से फिल्म निर्माण के साथ उसकी मार्केटिंग भी बदली। अंग्रेजों के अत्याचार से दबी जनता की इस फिल्म में चित्रित लड़ाई और जीत ने दर्शकों को आनंदित किया। इन दिनों दो घंटे से अधिक अवधि की फिल्म को लंबी फिल्म कहा जाता है। कहा जाता है कि दर्शक ऊब जाते हैं, जबकि लगानपौने चार घंटे की फिल्म थी। लगानका हीरो भुवन अकेले नहीं लड़ता। वह एक समूह का नेतृत्व करता है। यह समूह ही टीम भावना के साथ खेल के मैदान में डटती और जीत हासिल करती है।
             पिछले 13 सालों में फिल्म इंडस्ट्री में देश के सुदूर इलाकों से अनेक निर्देशकों और तकनीशियनों ने सफलता पाई है। पहले के दशकों में ऐसा कभी नहीं हुआ। हां, आजादी के बाद जब मुंबई हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का केन्द्र बनी तो अवश्य कोलकाता, लाहौर और दक्षिण से अनेक लेखकों और निर्देशकों ने मुंबई का रुख किया। उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक भिन्नता ने ही हिंदी फिल्मों को समृद्ध किया। इस दौर में लेखन,निर्देशन,गीत-संगीत सभी क्षेत्रों में सृजनात्मक निनिधता और कलात्मकता दिखाई और सुनाई पड़ती है। आज हम उस दौर को हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के नाम से जानते हैं।
         बाहर से आई प्रतिभाओं का वैसा ही योगदान पिछले डेढ़ दशकों में दिखा है। बाजार की भाषा में इसे धोनी प्रभाव कहा जा रहा है। धोनी प्रभाव का सीधा तात्पर्य है कि अब किसी भी क्षेत्र में अवसर बड़े शहरों के नागरिकों तक ही सिमटे नहीं रह सकते। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने समाज को इस रूप में विकसित किया है कि छोटे और मझोले शहरों की प्रतिभाएं अपने क्षेत्रों में हक से जगह बना रही हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिभाओं के इस प्रवाह ने परविारवाद के बांध को तोड़ दिया है। पिछले कुछ सालों में आई फिल्मों को ही देख लें तो पाएंगे कि फिल्म इंडस्ट्री से आए फिल्मकार ज्यादातर रीमेक और सीक्वल फिल्में बना रहे हैं, जब कि बाहर से आए निर्देशक नई कहानियों से फिल्मों का खजाना भर रहे हैं।
            राजकुमार हिरानी से लेकर व्रिक्रमादित्य मोटवाणी तक ऐसी प्रतिभाओं की लंबी सूची है। इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, अनुराग बसु, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया, सुजीत सरकार, हबीब फैजल, सुजॉय घोष आदि ने हिंदी फिल्मों का कंटेंट बदल दिया है। इन सभी की फिल्मों में जिंदगी के ताजा और विविध अनुभव हैं, जबकि फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित फिल्मकारों की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के ही रेफरेंस पाइंट मिलते हैं। उल्लेखनीय है कि इन फिल्मकारों को एक दो सालों में यह सफलता और पहचान नहीं मिली है। उनकी इस पहचान के पीछे लंबा संघर्ष और कामयाब होने की जिद है। आज दमक रही इन प्रतिभाओं के बायोडाटा को ही पढ़ लें तो पाएंगे कि सभी ने इस मुकाम तक पहुंचने में कम से कम दस साल बिताए। आरंभिक असफलताओं और तिरस्कार से उन्होंने हार नहीं मानी। इन प्रतिभाओं के संघर्ष की प्रतिनिधि कथा अनुराग कश्यप के प्रयास से समझी जा सकती है। टीवी लेखन से उनका करिअर आरंभ हुआ। पहला बड़ा मौका राम गोपाल वर्मा की सत्यामें मिला। उसके बाद उन्होंने पांचनिर्देशित की तो उसे अनेक कारणों से रिलीज नहीं मिल सकी। हताशा के उन सालों में भी अनुराग अपने दोस्तों के साथ सक्रिय रहे। उन्हें देव डीऔर गुलालसे पहचान मिली, जबकि ब्लैक फ्रायडेवह काफी पहले बना चुके थे।
        कमोबेश सभी युवा निर्देशकों को अनुराग कश्यप जैसा ही संघर्ष करना पड़ा। केवल राजकुमार हिरानी ही इस समूह के अकेले सफल फिल्मकार है, जिनकी पहली फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएसको कामयाबी और सराहना मिली। पिछले साल की सफल और प्रशंसित फिल्मों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उन्हें ही नेशनल अवार्ड मिले हैं। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमरएक मिसाल है। वगैर लोकप्रिय स्टार के बनी इस फिल्म का नायक एक धावक था, जो सामाजिक अत्याचार और प्रशासन की उदासीनता से डकैत बन गया। कैसी विडंबना है कि जिस पान सिंह तोमर की समाज ने उपेक्षा की थी, उसी के जीवन पर मिली फिल्म को समाज ने सराहा और पुरस्कृत किया। सुजॉय घोष की कहानीकी एक अलग कहानी है। इस फिल्म को विद्या बालन ने अपने कंधों पर खींचा और बाक्स आफिस पर सफलता दिलाई। विद्या बालन की कामयाबी समाज में हुए नारी उत्थान का ही प्रतिफल  और रेखांकन है। हिंदी फिल्मों की कामयाबी का श्रेय पूरा हीरो को मिलता रहा है, लेकिन विद्या बालन की कामयाबी सोच और समाज में आए बदलाव का संकेत देती है। पिछले साल ही सुजीत सरकार की विकी डोनरभी आई थी। इस फिल्म की नवीनता ने दर्शकों को चौंकाया। नए कलाकार थे। फिल्म के हीरो आयुष्मान खुराना की गायकी और अदयगी का जलवा हम सभी ने देखा और सुना।
             स साल सुभाष कपूर की जॉली एलएलबीकी सफलता और साजिद खान की हिम्मतवालाकी असफलता दर्शकों की बदलती रुचि और रुझान को स्पष्ट कर देती है। भारी प्रचार और स्टारों के बावजूद हिम्मतवालाको दर्शक नकार देते हैं,जबकि सीमित बजट की देसी फिल्म जॉली एलएलबीको वे हाथोंहाथ लेते हैं। यह अनोखा संयोग है कि जॉली एलएलबीके जज त्रिपाठी के पर्दे पर लिए जागरूक फैसले के बाद वास्तविक जिंदगी में सालों से अटके मामलों के फैसले आने लगे हैं।