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Thursday, August 30, 2012

लेखकों के सम्‍मान की लड़ाई

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
आजकल जितने टीवी चैनल, लगभग उतने अवार्ड। ये अवार्ड टीवी सीरियल और शो में उल्लेखनीय काम कर रहे कलाकारों, लेखकों, तकनीशियनों और निर्माता-निर्देशकों को दिए जाते हैं। याद करें कि क्या आपने किसी टीवी अवार्ड समारोह में किसी लेखक को पुरस्कार ग्रहण करते देखा है? न तो किसी लेखक का नाम याद आएगा और न ही उनका चेहरा, जबकि टीवी और फिल्म का ब्लू प्रिंट सबसे पहले लेखक तैयार करता है।
फिल्मों के अवार्ड समारोह में अवश्य लेखकों को पुरस्कार लेते हुए दिखाया जाता है। टीवी के लेखकों को यह मौका नहीं दिया जाता। क्यों..? टीवी लेखकों का एक समूह मुंबई में यही सवाल पूछ रहा है। उनके संगठन ने सदस्य लेखकों का आवान किया है कि वे अपने सम्मान के लिए पुरस्कार समारोहों का बहिष्कार करें। वे अपने नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों को ठुकरा दें। उनकी अनेक शिकायतें हैं। पुरस्कारों के लिए नामांकित लेखकों को समारोहों में बुला तो लिया जाता है, लेकिन उन्हें पुरस्कार ग्रहण करने के लिए मंचपर नहीं बुलाया जाता। उन्हें रिहर्सल के दौरान ही पुरस्कार देते हुए शूट कर लिया जाता है और आग्रह किया जाता है कि पुरस्कार समारोह की शाम भी उसी कपड़े में आएं। अगर कभी मंच पर बुलाया भी जाता है तो उन्हें पुरस्कार देने के लिए किसी नामचीन हस्ती को नहीं चुना जाता। इतना हो भी गया तो पुरस्कार समारोह के प्रसारण से लेखकों का फुटेज काट दिया जाता है। लेखकों ने इस अपमानजनक स्थिति को बदलने का बीड़ा उठा लिया है। हाल में दो लेखकों के नाम पुरस्कारों की भी घोषणा हुई, लेकिन उन्हें समारोह में बुलाना उचित नहीं समझा गया। लेखकों को संदेश दिया गया कि उनकी ट्रॉफी उनके घर भिजवा दी जाएगी। आत्मसम्मान के धनी उन लेखकों ने पुरस्कार लेने से ही मना कर दिया।
इस साल फिल्मफेयर अवार्ड समारोह में आई ऐम कलाम के लेखक ने पुरस्कार ग्रहण करने के बाद चुटकी ली थी। उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ने तो यह समझ कर उनके साथ शादी की थी कि लेखक हैं तो क्रिएटिव व्यक्ति होंगे। मुझे आज पता चला कि मैं टेक्नीकल आदमी हूं। लेखन एक क्रिएटिव प्रॉसेस है, लेकिन अवार्ड समारोहों ने उसे टेक्निकल कैटेगरी में डाल दिया है। गलत पहचान की पीड़ा बहुत तकलीफदेह होती है। संजय चौहान ने अपनी चुटकी में जिस दर्द को बयां किया था, वही दर्द टीवी लेखकों को भी है। उनकी मांग है कि लेखकों को कहानी, संवाद और पटकथा के लिए अलग-अलग पुरस्कार दिए जाएं। उनके पुरस्कार को निर्देशन के पुरस्कार की तरह का सम्मान मिले। वास्तव में यह सम्मान की लड़ाई है, जिसमें वे एकजुट होते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों मुंबई में फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के मानद महासचिव कमलेश पांडे ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया।
गौर किया जाए तो टीवी हो या फिल्म.., दोनों ही माध्यमों में लेखक की भूमिका बुनियादी होती है। वही नींव रखता है, जिसके ऊपर मनोरंजन की इमारत खड़ी की जाती है। लेखकों की महती भूमिका के बावजूद उन्हें अपने योगदान की तुलना में कभी सम्मान नहीं मिला। सलीम-जावेद की हिट जोड़ी एक जमाने में अवश्य प्रभावशाली रही, लेकिन वे अपवाद ही बन कर रह गए। आज भी यदा-कदा कुछ लेखकों का नाम बताया और पोस्टर पर लिखा जाता है। ज्यादातर फिल्मों और टीवी शो में लेखकों के नाम क्रेडिट रोल में चलते हैं। फिल्म या टीवी शो के प्रचार में उनकी भूमिका गौण मानी जाती है। गीतकार तो फिर भी चर्चा में आ जाते हैं, लेकिन लेखक गुमनाम ही रह जाता है। अपने किरदारों को उनका वाजिब हक दिलाने में कामयाब लेखक अपने हक की लड़ाई में अभी तक हारते ही रहे हैं। वक्त आ गया है कि मनोरंजन जगत में उनके महत्व को नए सिरे से आंका जाए। उन्हें क्रेडिट और उचित सम्मान दिया जाए। साथ ही पुरस्कार समारोहों में भी उन्हें समुचित प्रतिष्ठा मिले। अभी यह आवाज टीवी के लेखकों ने उठाई है। कल फिल्म के लेखक भी जगेंगे..।

Tuesday, April 27, 2010

दरअसल : नहीं करते हम लेखकों का उल्लेख

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों एक लेखक के साथ लंबी बैठक हुई। वे साहित्यिक लेखक नहीं हैं। फिल्में लिखते हैं। उनकी कुछ फिल्में पुरस्कृत और चर्चित हुई हैं। हाल ही में उनकी लिखी फिल्म वेलडन अब्बा की समीक्षकों ने काफी तारीफ की। वे समीक्षकों से बिफरे हुए थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, किसी भी अंग्रेजी समीक्षक ने फिल्म की तारीफ में लेखक का हवाला नहीं दिया। उन्होंने यह जानने और बताने की जरूरत नहीं समझी कि वेलडन अब्बा का लेखक कौन है? बोमन ईरानी की तारीफ करते हुए भी उन्हें खयाल नहीं आया कि जरा पता कर लें कि इस किरदार को किसने रचा? मैं एनएसडी के स्नातक और संवेदनशील लेखक अशोक मिश्र की बात कर रहा हूं। उन्होंने ही श्याम बेनेगल की वेलकम टू सज्जनपुर भी लिखी थी। इन दिनों वे श्याम बेनेगल के लिए एक पॉलिटिकल कॉमेडी फिल्म लिख रहे हैं। यह शिकायत और नाराजगी केवल अशोक मिश्र की नहीं है। वे सीधे व्यक्ति हैं, इसलिए उन्होंने अपना असंतोष जाहिर कर दिया। बाकी चुपचाप खटते (लिखते) रहते हैं। वे समीक्षकों से कोई उम्मीद नहीं रखते। निर्माता-निर्देशक भी उन्हें अधिक महत्व नहीं देते। उनका नाम पर्दे पर पुरानी परंपरा के तहत आ जाता है। कथा, पटकथा और संवाद फिल्म लेखन के तीनों खंडों में सक्रिय व्यक्तियों का नाम देने का रिवाज है। कुछ बैनर अपने लेखकों का नाम पोस्टर पर देते हैं। पोस्टर पर लेखकों का नाम देने की ग्लैमरस शुरुआत सलीम-जावेद ने पूरे हक से की थी। वैसे देश की आजादी के आगे-पीछे भी पोस्टर पर कभी-कभी लेखकों के नाम आते थे। बाद में लेखक मुंशी बन गए और फिल्म के प्रोमोशन में उनके योगदान को नजरअंदाज किया जाने लगा। सलीम-जावेद का किस्सा मशहूर है कि उन्होंने पहले निर्माता से पोस्टर पर नाम देने का आग्रह किया। उसने आग्रह नहीं माना, तो उन्होंने शहर में पोस्टर लगते ही कुछ आदमी भेजकर पोस्टरों पर अपने नाम लिखवा दिए। यह हिम्मत सलीम-जावेद कर सकते थे। दोनों को स्टार राइटर माना जाता था और अलग होने तक दोनों ने इस गरिमा का पूरा लुत्फ उठाया।

उनके बाद फिल्मों में लेखकों का महत्व सिमटता गया। निर्देशक और स्टार किसी हिंदीभाषी सहायक की मदद से कहानी और संवाद लिखने लगे और उसका फुल क्रेडिट भी लेने लगे। धीरे-धीरे स्थिति यह आ गई कि लेखक नामक जीव अदृश्य जैसा हो गया। उसका नाम तो आता था, लेकिन वह निराकार होता था। कोई नहीं जानता था कि उस नाम का कोई व्यक्ति है भी या नहीं? फिर नया दौर आया। सूरज बड़जात्या ने इसकी जोरदार शुरुआत की। उन्होंने खुद अपनी फिल्म की कहानी लिखी। उसके बाद आए ज्यादातर निर्देशकों ने बाहरी लेखकों से मदद लेनी बंद कर दी। सभी लेखक हो गए। केवल संवादों के लिए उन्हें लेखक किस्म के व्यक्ति की जरूरत पड़ती थी। वह भी मूल लेखक नहीं होता था। उसे संवाद अंग्रेजी में दे दिए जाते थे। वह उसे हिंदी में अनूदित कर देता था। यह सिलसिला आज भी चल रहा है। ऐड फिल्म और मुंबई या अन्य मेट्रो के पले-बढ़े ज्यादातर डायरेक्टर अंग्रेजी में ही सोचते और लिखते हैं। हिंदी के लिए पर अनुवादक उर्फ लेखक को भाड़े पर ले आते हैं।

सभी कहते हैं कि कंटेंट इज किंग, लेकिन इस कंटेंट को क्रिएट करने वाले व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री में न तो इज्जत मिलती है और न पैसे। फिल्म समीक्षक, पत्रकार और पत्र-पत्रिकाएं भी लेखकों के नाम से परहेज करते हैं। लेखकों का उल्लेख करना उन्हें स्पेस की बर्बादी लगती है। दुमछल्ले स्टारों से पेज भरने और रंगने से संतुष्ट हम सभी को लगता है कि हम पाठकों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं। हम अपना दायित्व भूल रहे हैं कि पाठकों को समुचित जानकारी देना भी एक प्रकार का मनोरंजन है।