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Friday, March 15, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : जॉली एलएलबी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
तेजिन्दर राजपाल - फुटपाथ पर सोएंगे तो मरने का रिस्क तो है।
जगदीश त्यागी उर्फ जॉली - फुटपाथ गाड़ी चलाने के लिए भी नहीं होते।
सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' में ये परस्पर संवाद नहीं हैं। मतलब तालियां बटोरने के लिए की गई डॉयलॉगबाजी नहीं है। अलग-अलग दृश्यों में फिल्मों के मुख्य किरदार इन वाक्यों को बोलते हैं। इस वाक्यों में ही 'जॉली एलएलबी' का मर्म है। एक और प्रसंग है, जब थका-हारा जॉली एक पुल के नीचे पेशाब करने के लिए खड़ा होता है तो एक बुजुर्ग अपने परिवार के साथ नमूदार होते हैं। वे कहते हैं साहब थोड़ा उधर चले जाएं, यह हमारे सोने की जगह है। फिल्म की कहानी इस दृश्य से एक टर्न लेती है। यह टर्न पर्दे पर स्पष्ट दिखता है और हॉल के अंदर मौजूद दर्शकों के बीच भी कुछ हिलता है। हां, अगर आप मर्सिडीज, बीएमडब्लू या ऐसी ही किसी महंगी कार की सवारी करते हैं तो यह दृश्य बेतुका लग सकता है। वास्तव में 'जॉली एलएलबी' 'ऑनेस्ट ब्लडी इंडियन' (साले ईमानदार भारतीय) की कहानी है। अगर आप के अंदर ईमानदारी नहीं बची है तो सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' आप के लिए नहीं है। यह फिल्म मनोरंजक है। फिल्म में आए किरदारों की सच्चाई और बेईमानी हमारे समय के भारत को जस का तस रख देती है। मर्जी आप की ़ ़ ़ आप हंसे, रोएं या तिलमिलाएं।
हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के नाम पर हास्य इस कदर हावी है कि हम व्यंग्य को व्यर्थ समझने लगे हैं। सुभाष कपूर ने किसी भी प्रसंग या दृश्य में सायास चुटीले संवाद नहीं भरे हैं। कुछ आम किरदार हैं, जो बोलते हैं तो सच छींट देते हैं। कई बार यह सच चुभता है। सच की किरचें सीने को छेदती है। गला रुंध जाता है। 'जॉली एलएलबी' गैरइरादतन ही समाज में मौजूद अमीर और गरीब की सोच-समझ और सपनों के फर्क की परतें खोल देती है। 'फुटपाथ पर क्यों आते हैं लोग?' जॉली के इस सवाल की गूंज पर्दे पर चल रहे कोर्टरूम ड्रामा से निकलकर झकझोरती है। हिंदी फिल्मों से सुन्न हो रही हमारी संवेदनाओं को यह फिल्म फिर से जगा देती है। सुभाष कपूर की तकनीकी दक्षता और फिल्म की भव्यता में कमी हो सकती है, लेकिन इस फिल्म की सादगी दमकती है।
'जॉली एलएलबी' में अरशद वारसी की टीशर्ट पर अंग्रेजी में लिखे वाक्य का शब्दार्थ है, 'शायद मैं दिन में न चमकूं, लेकिन रात में दमकता हूं'। जॉली का किरदार के लिय यह सटीक वाक्य है। मेरठ का मुफस्सिल वकील जगदीश त्यागी उर्फ जॉली बड़े नाम और रसूख के लिए दिल्ली आता है। तेजिन्दर राजपाल की तरह वह भी नाम-काम चाहता है। वह राजपाल के जीते एक मुकदमे के सिलसिले में जनहित याचिका दायर करता है। सीधे राजपाल से उसकी टक्कर होती है। इस टक्कर के बीच में जज त्रिपाठी भी हैं। निचली अदालत के तौर-तरीके और स्थिति को दर्शाती यह फिल्म अचानक दो व्यक्तियों की भिड़ंत से बढ़कर दो सोच की टकराहट में तब्दील हो जाती है। जज त्रिपाठी का जमीर जागता है। वह कहता भी है, 'कानून अंधा होता है। जज नहीं, उसे सब दिखता है।'
सुभाष कपूर ने सभी किरदारों के लिए समुचित कास्टिंग की है। बनी इमेज के मुताबिक अगर अरशद वारसी और बमन ईरानी किसी फिल्म में हों तो हमें उम्मीद रहती है कि हंसने के मौके मिलेंगे। 'जॉली एलएलबी' हंसाती है, लेकिन हंसी तक नहीं ठहरती। उससे आगे बढ़ जाती है। अरशद वारसी, बमन ईरानी और सौरभ शुक्ला ने अपने किरदारों को सही गति, भाव और ठहराव दिए हैं। तीनों किरदारों के परफारमेंस में परस्पर निर्भरता और सहयोग है। कोई भी बाजी मारने की फिक्र में परफारमेंस का छल नहीं करता। छोटे से दृश्य में आए राम गोपाल वर्मा (संजय मिश्रा) भी अभिनय और दृश्य की तीक्ष्णता की वजह से याद रह जाते हैं। फिल्म की नायिका संध्या (अमृता राव) से नाचने-गाने का काम भी लिया गया है, लेकिन वह जॉली को विवेक देती है। उसे झकझोरती है। हिंदी फिल्मों की आम नायिकाओं से अलग वह अपनी सीमित जरूरतों पर जोर देती है। वह कामकाजी भी है।
सुभाष कपूर ने 'जॉली एलएलबी' के जरिए हिंदी फिल्मों में खो चुकी व्यंग्य की धारा को फिर से जागृत किया है। लंबे समय के बाद कुंदन शाह और सई परांजपे की परंपरा में एक और निर्देशक उभरा है, जो राजकुमार हिरानी की तरह मनोरंजन के साथ कचोट भी देता है। धन्यवाद सुभाष कपूर।

Sunday, March 3, 2013

अमृता राव से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत


-अजय ब्रह्मात्मज
    अमृता राव जल्दी ही सुभाष कपूर की फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ में दिखाई पड़ेंगी। इस फिल्म में उन्होंने कस्बे की दबंग लडक़ी की भूमिका निभाई है। वह जॉली से प्रेम करती है, लेकिन उस पर धौंस जमाने से भी बाज नहीं आती। छुई मुई छवि की अमृता राव के लिए यह चैलेंजिंग भूमिका है। अमृता राव इन दिनों अनिल शर्मा की फिल्म ‘सिंह साब द ग्रेट’ की भोपाल में शूटिंग कर रही हैं। शूटिंग से फुर्सत निकाल कर उन्होंने झंकार से यह बातचीत की  ...
- सुभाष कपूर की ‘जॉली एलएलबी’ कैसी फिल्म है?
0 इस देश में हम सभी को कभी न कभी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं। सुभाष कपूर ने रियल सिचुएशन पर यह फिल्म बनाई है। यह फिल्म कोर्ट-कचहरी के हालात, देश के कानून और उसमें उलझे नागरिकों की बात कहती है। सुभाष कपूर फिल्मों में आने से पहले पत्रकार थे। उन्हें स्वयं कभी कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े थे। वहीं से उन्होंने फिल्म का कंसेप्ट लिया है। यह फिल्म सैटेरिकल थ्रिलर है।
- कोर्ट कचहरी के मामले में आप क्या कर रही हैं?
0 इस फिल्म की पृष्ठभूमि केस की है। मैं मेरठ की बड़बोली लडक़ी संध्या हूं। छोटे शहरों की दूसरी लड़कियों की तरह वह शर्मीली और झेंपू नहीं है। वह बोल्ड और फ्रैंक लडक़ी है। जॉली से कुछ भी कहने में उसे हिचक नहीं होती। हर वक्त वह उसे सच्चाई का आईना दिखाती है। वह सच कहने से नहीं डरती।
- अरशद वारसी और बमन ईरानी की मुठभेड़ सी दीखती है। आप के लिए कितनी गुंजाईश थी?
0 यह दो वकीलों की कहानी है। अरशद वारसी और बमन ईरानी उन्हें निभा रहे हैं। वे दोनों ही फिल्म के मुख्य किरदार हैं। मेरा भी किरदार महत्वपूर्ण है, क्योंकि मैं अरशद के जीवन में संतुलन बनाए रखती है। सुभाष कपूर ने पहले ही सब कुछ बता दिया था। आम फिल्मों की तरह हीरो के साथ मेरा रोमांटिक ट्रैक नहीं है। उनका रिश्ता एक अलग लेवल पर दिखेगा। मैं फिल्म के हर फ्रेम में नहीं हूं, लेकिन जब भी पर्दे पर आती हूं तो फिल्म के टोन और क्वालिटी को बदल देती हूं।
- इस फिल्म में छोटे शहर की लडक़ी का किरदार निभाना कितना मुश्किल रहा?
0 इसके पहले भी मैंने छोटे शहर की लड़कियों के किरदार निभाए हैं, लेकिन वे सब बहुत सीधी और घरेलू किस्म की थीं। पूरे लिहाज में रहती थी। उनकी आंखें नीची रहती थीं। इस फिल्म में संध्या मुंहफट और बोल्ड है। बड़े शहरों के लोग कल्पना नहीं कर सकते कि कस्बों में ऐसी लड़कियां भी मिलती हैं। मैं जॉली से कभी प्यार से बात नहीं करती। उसे हमेशा डांटती और समझाती रहती हूं। हमारा संबंध तू-तड़ाके का है। इसके बावजूद वह जॉली से बेतरह प्यार करती है।
- और कौन सी फिल्में कर रही हैं?
0 फिलहाल भोपाल में अनिल शर्मा की फिल्म ‘सिंह साहेब द ग्रेट’ की शूटिंग कर रही हूं। सनी देओल और अनिल शर्मा के साथ यह मेरी पहली फिल्म होगी। इसमें मैं न्यूज रिपोर्टर के रोल में हूं। माइक की दूसरी तरफ मिलूंगी। फिल्म में सनी देओल के साथ रोमांटिक एंगल नहीं है, लेकिन मेरा जबरदस्त किरदार है। वह सनी देओल जी के मकसद के साथ हो लेती है। उनके साथ लड़ती है।
- रिपोर्टर और जर्नलिस्ट से आप मिलते रहे हो। क्या उनसे कुछ सीखने को मिला?
0 फिल्म में मैं न्यूज रिपोर्टर हूं। मेरी मुलाकात ज्यादातर फिल्म रिपोर्टरों से हुई है। फिर भी काम के नेचर में दोनों के बीच समानता होती है। दोनों के कंटेंट अलग होते हैं, लेकिन मेहनत एक जैसी होती है। मुझे सबसे अच्छा लगता है कि जर्नलिस्ट कैसे हर मुद्दे को स्पष्टता और अपनी राय के साथ पेश करते हैं। भाषा पर उनका नियंत्रण होता है। मैंने एक बार एक अखबार के लिए फूड रिव्यू का कॉलम लिखा था। मैं उस दबाव और परेशानी को समझती हूं।
- इन दिनों आप की कम फिल्में आ रही हैं। क्या वजह है? क्या आप धीमे चल रही हैं या  ...
0 घुमा कर सवाल पूछा आप ने। कम फिल्में इसलिए है कि कम फिल्में मिलीं। 2010 में मेरे पास काफी फिल्में थीं। उन फिल्मों के साइनिंग राशि भी मिल गई थीं, लेकिन वे शुरू नहीं हो सकीं। डॉ ़ चंद्रप्रकाश द्विवेदी एबीकॉर्प के लिए ‘द लिजेंड ऑफ कुणाल’ बना रहे थे। वह अटक गई। रमेश तौरानी के लिए केन घोष के निर्देशन में नील नितिन मुकेश के साथ एक फिल्म शुरू होने वाली थी। ‘हुक या क्रूक’ में भी मैं थी। अब इसे संयोग कहें या कुछ और ...तीनों फिल्में रुक गईं। 2010 में राजश्री की एक फिल्म तुषार कपूर के साथ की। मैं नील के साथ ‘आ देखें जरा’ करने वाली थी। श्याम बेनेगल की ‘वेलडन अब्बा’ भी छोडऩी पड़ी। सच कहूं तो जिंदगी हम प्लान नहीं कर सकते। कुछ चीजें अचानक हो जाती है और हम ठिठक जाते हैं।
- ‘जॉली एलएलबी’ से कैसी उम्मीद है?
0 अभी उम्मीद बढ़ गई है। 15-17 दिनों में ही इसके ट्रेलर को 10 लाख दर्शकों ने देखा। इस वजह से लगता है कि फिल्म के प्रति अच्छा रेस्पांस है। यह दर्शकों के लायक फिल्म है। दर्शक रियल फिल्में पसंद कर रहे हैं।
- आजकल फिल्मों में गालियों और अपशब्दों का चलन बढ़ गया है। क्या कहेंगी?
0 इतना ही कहना है कि महाभारत में भी युद्ध हुआ था। खून-खराबे के बाद ही एक संदेश दिया गया था।
- बप्पी लाहिड़ी के साथ आपने ‘जॉली एलएलबी’ का एक प्रोमोशनल वीडियो किया। उसके बारे में कुछ बताएं?
0 बप्पी दा रॉकस्टार हैं। इस वीडियो को रिकार्डिंग स्टूडियो में ही तैयार किया गया है। रिकार्डिंग के माहौल को कम लोग देख पाते हैं। मुझे देखते ही बप्पीदा ने कहा अरे ‘विवाह’ की हीरोइन आ गई। मेरी फेवरिट फिल्म है ‘विवाह’। इस वीडियो का सिर्फ प्रचार में इस्तेमाल किया जाएगा।