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Friday, April 10, 2015

फिल्म समीक्षा : धर्म संकट में

 -अजय ब्रहमात्मज 
स्टारः 2.5
धर्म पर इधर कई फिल्में आई हैं। 'ओह माय गॉड','पीके' और 'दोजख' के बाद 'धर्म संकट में' भी इसी कैटेगरी की फिल्म है। यहां भी धर्म और धार्मिकता के पहलू को एक अलग नजरिए से उठाया गया है। फिल्म के नायक या मुख्य अभिनेता परेश रावल हैं। वो इसके पहले 'ओह माय गॉड' में दिखे थे। यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे फिलहाल भाजपा के सांसद हैं। 'धर्म संकट में' ब्रिटिश कॉमेडी फिल्म 'द इनफिडेल' से स्पष्ट रूप से प्रेरित है। मूल फिल्म की तरह इस फिल्म में भी धर्म और धार्मिक पहचान के संकट का चित्रण कॉमिकल रखा गया है। ऐसी फिल्मों के लिए परेश रावल उपयुक्त कलाकार हैं। और उन्होंने धर्मपाल के किरदार को अच्छी तरह निभाया है।
धर्मपाल त्रिवेदी पारिवारिक व्यक्ति हैं। अपनी बीवी और बेटी-बेटे के साथ वे सुखी और सानंद दिखते हैं। उनके पड़ोस में मुसलमान नवाब महमूद नाजिम अली शाह खान बहादुर रहने चले आए हैं। धर्मपाल मुसलमानों को लेकर हमेशा खफा रहते हैं। खान बहादुर से उनकी बक-झक होती है। वे भला-बुरा सुनाते हैं। खान बहादुर उन्हें पलट कर जवाब देते हैं और सवाल करते हैं कि क्यों हर मुसलमान को शक की निगाह से देखा जाता है? उनके बीच के इन संवादों में उन धारणाओं की बातें आई हैं जो देश में जब-तब सुनाई पड़ते हैं। धर्मपाल की दुविधा तब खड़ी होती है, जब वे बीवी के याद दिलाने पर अपनी दिवंगत मां का लॉकर खोलते हैं। वहीं पता चलता है कि उन्हें गोद लिया गया था। आगे यह भी मालूम होता है कि वे एक मुसलमान पिता की औलाद हैं। इस राज के जाहिर होने पर उनके पांव के नीचे की जमीन खिसक जाती है। उनके मुसलमान विरोध का सुर ठंडा होता है। वे अपने मरणासन्न पिता से मिलने और देखने के लिए पक्के मुसलमान बनने की कोशिश में खान बहादुर की मदद लेते हैं। इस कहानी में नील आनंद बाबा की भी कहानी चलती है। उनके साथ भी एक राज छिपा है।
निर्देशक फुवाद खान ने भारतीय संदर्भ में यहूदी और मुसलमान चरित्रों की मूल कहानी को हिंदी और मुसलमान चरित्रों में बदल दिया है। उन्होंने मुसलमानों के बारे में प्रचलित धारणाओं और मिथकों पर संवेदनशील कटाक्ष किया है। हालांकि वे गंभीर मसले पर खुद को केंद्रित करते हैं, लेकिन निर्वाह और वर्णन में सतह पर ही रहते हैं। शायद तह में जाने पर विवाद और विरोध हो सकता था। फुवाद खान का यह प्रयास सराहनीय है। वे दोनों धर्मां में मौजूद कठमुल्लापन पर निशाना साधने में सफल रहे हैं। ऐसी फिल्मों की प्रासंगिकता कलात्मकता या सिनेमाई कौशल से अधिक वास्तविकता से होती है। ऐसी फिल्में एक स्तर पर समाज में फैला भ्रमजाल तोड़ती हैं। फुवाद खान ने सलीके से अपनी बात कही है और किसी भी धर्म के नागरिक को आहत नहीं किया है।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में इस विषय पर अनेक फिल्में बनी हैं कि इंसान पैदाइशी अच्छा या बुरा नहीं होता। उसके हालात और परवरिश ही उसके वर्तमान के कारण होते हैं। 'धर्म संकट में' अलग संकट है। यहां 50 साल की जिंदगी बिता चुका एक व्यक्ति अचानक वाकिफ होता है कि वह पैदाइशी तो किसी और धर्म का था। उस धर्म के अनुयायिओं के प्रति उनकी राय नेगेटिव थी। पहचान के इस दोराहे पर एक तरफ धर्मपाल की समझ है और दूसरी तरफ भावना व संवेदना...निर्देशक ने धर्मपाल की उलझन को दिखाने की कोशिश की है। परेश रावल की तरह अन्नू कपूर ने भी अपने किरदार को सही तरीके से निभाया है। हां, अन्नू कपूर कभी-कभी अपनी अभिनय शैली के दोहराव के मोह में फंस जाते हैं। नसीरूद्दीन शाह ने नील आनंद बाबा की भूमिका में मस्ती की है।
अवधि - 129 मिनट

Friday, March 29, 2013

फिल्‍म समीक्षा : हिम्‍मतवाला

बेमेल मसालों का मनोरंजन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
1983 में आई के राघवेन्द्र राव की हिम्मतवाला की रीमेक साजिद खान की हिम्मतवाला 1983 के ही परिवेश और समय में है। कपिलदेव के नेतृत्व में व‌र्ल्ड कप जीतने की कमेंट्री के अलावा फिल्म का एक किरदार बाल कर बताता है कि यह 1983 है। इस प्रकार पिछले बीस सालों में हिंदी सिनेमा के कथ्य और तकनीक में जो भी विकास और प्रगति है, उन्हें साजिद खान ने सिरे से नकार और नजरअंदाज कर दिया है। मजेदार तथ्य है कि साजिद खान की सोच और समझ में यकीन करने वाले निर्माता, कलाकार, तकनीशियन और दर्शक भी हैं। निश्चित ही हमारा देश भारत कई स्तरों पर एक साथ चल रहा है। मनोरंजन का एक स्तर साजिद खान का है।
साजिद खान थैंक्स गॉड इटस फ्रायडे जैसा गीत सुनवाने और मॉडर्न फाइट दिखाने के बाद 1983 के गांव रामनगर ले जाते हैं। इस गांव में शेर सिंह, नारायण दास, गोपी, सावित्री आदि जैसे दुनिया से कटे किरदार रहते हैं। बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे ग्राम सभा होती है। यहां पुलिस भी 2000 किलोमीटर दूर से आती है। रामनगर की ग्राम पंचायत में एक ही सरपंच है। उसने सभी ग्रामीणों की जमीन-जायदाद गिरवी रख ली है। प्रतीकात्मक रूप से साजिद खान मनोरंजन जगत की पंचायत के ऐसे ही सरपंच हैं, जिन्होंने दुनिया से कटे दर्शकों के दिल-आ-दिमाग को गिरवी रख लिया है। उन्हें लगता है कि मनोरंजन के नाम पर वे जो भी परोसेंगे, दर्शक उसे चटखारे लेकर देखेंगे।
साजिद खान की पिछली फिल्मों करी सफलता ने उन्हें कुतर्क की गली में और अंदर और गहरे धकेल दिया है। हिम्मतवाला में वे पिछली फिल्मों से ज्यादा सरल, सतही, तर्कहीन और फूहड़ अंदाज में अपने किरदारों को लेकर आए हैं। साजिद खान की हिम्मतवाला शुद्ध मसालेदार फिल्म है। बस, मसालों को बेमेल तरीके से डाल दिया गया है। ऐसे बेमेल स्वाद इन दिनों पसंद किए जा रहे हें।यह कुछ-कुछ पायनीज भेल, चिकेन डोसा या जैन मंचूरियन की तरह है। न कोई ओर, न कोई छोर, लेकिन बिक्री बेजोड़। हिम्मतवाला पहले दिन पहले शो में दर्शकों के साथ देखने का संयोग बना। एक दर्शक ने इंटरवल में उच्छवास लेते हुए कहा-पका दिया। उसी दर्शक ने फिल्म खत्म होने पर टिप्पणी की, जो मन में आता है, बना देते हैं। इस लिहाज से हिम्मतवाला दर्शकों के मनोरंजन के बजाए साजिद खान का मनरंजन है।
साजिद खान ने अजय देवगन को उनके पॉपुलर इमेज में ही पेश किया है। अजय की प्रतिभा का ऐसा स्वार्थी उपयोग साजिद खान ही कर सकते हैं। अजय देवगन स्वयं पिछली कुछ फिल्मों से कॉमेडी और एक्शन के हिट फार्मूले में फंसे हैं। अपने संवादों और दृश्यों से भरोसा उठने पर साजिद खान अजय देवगन से आता माझा सटकली भी बुलवाते हैं। बम पे लात गाना गवाते हैं। पिछली फिल्म के गानों नैनों में सपना और ताकी रे ताकी को इस फिल्म में रखा गया है, लेकिन जितेन्द्र-श्रीदेवी का जादू जगाने में अजय देवगन-तमन्ना असफल रहे हैं। अमजद खान और कादर खान के किरदारों में इस बार महेश मांजरेकर और परेश रावल हैं। दोनों ने साजिद खान की मर्जी से किरदारों को नया अवतार दिया है। अपनी फूहड़ता से कभी वे हंसाते हैं और कभी हंसने पर मजबूर करते हैं कि बात बन नहीं रही है।
हिम्मतवाला साजिद खान का सिनेमा है। उन्हें भ्रम है कि वे मनमोहन देसाई की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इस भ्रम में वे सिनेमा को कभी पीछे ले जाते हैं तो कभी तर्कहीन ड्रामा दिखाते हैं।
अवधि-150 मिनट,
*1/2 डेढ़ स्टार

Saturday, September 29, 2012

फिल्‍म समीक्षा : ओह माय गॉड

film review

प्रपंच तोड़ती, आस्था जगाती

-अजय ब्रह्मात्मज
परेश रावल गुजराती और हिंदी में 'कांजी वर्सेस कांजी' नाट सालों से करते आए हैं। उनके शो में हमेशा भीड़ रहती है। हर शो में वे कुछ नया जोड़ते हैं। उसे अद्यतन करत रहते हैं। अब उस पर 'ओह माय गॉड' फिल्म बन गई। इसे उमेश शुक्ला ने निर्देशित किया है। फिल्म की जरूरत के हिसाब से स्क्रिप्ट में थोड़ी तब्दीली की गई है। नाटक देख चुके दर्शकों को फिल्म का अंत अलग लगेगा। वैसे नाटक में इस अंत की संभावना जाहिर की गई है।
उमेश शुक्ल के साथ परेश रावल और अक्षय कुमार के लिए 'ओह माय गॉड' पर फिल्म बनाना साहसी फैसला है। धर्मभीरू देश केदर्शकों के बीच ईश्वर से संबंधित विषयों पर प्रश्नचिह्न लगाना आसान नहीं है। फिल्म बड़े सटीक तरीके से किसी भी धर्म की आस्था पर चोट किए बगैर अपनी बात कहती है। फिल्म का सारा फोकस ईश्वर के नाम पर चल रहे ताम-झाम और ढोंग पर है। धर्मगुरू बने मठाधीशों के धार्मिक प्रपंच को उजागर करती हुई 'ओह माय गॉड' दर्शकों को स्पष्ट संदेश देती है कि ईश्वर की आराधना की रुढि़यों और विधि-विधानों से निकलने की जरूरत है। कांजी भाई घोर नास्तिक व्यक्ति हैं। वे हर मौके पर ईश्वर केनाम पर चल रहे ढोंग का मजाक उड़ाते हैं। वे अपने वाजिब सवालों से ईश्वर की सत्ता को चुनौती देते हैं। उनके सवालों का मुख्य स्वर है कि अगर ईश्वर है तो आखिर क्यों मनुष्य की मुश्किलें बनी हुई हैं? मनुष्य पर हो रहे अत्याचार को अपने चमत्कार से वह क्यों नहीं खत्म नहीं करता? ऐसा लगता है कि फिल्म आस्तिकों व आस्थाओं पर चोट करती है, लेकिन फिल्म का अंतिम संदेश आस्तिकाओं के पक्ष में है। दरअसल, 'ओह माय गॉड'आस्था के तालाब में उग आई रुढि़यों की जलकुंभी की सफाई कर देती है। यह कतई न समझें न कि फिल्म ईश्वर के विरोध में है। यह फिल्म ईश्वर के एजेंट और एजेंसी के खिलाफ है। उसके नाम पर चल रहे प्रपंच का पर्दाफाश करती है। इस फिल्म का संदेश आम दर्शकों तक पहुंचे तो समाज के लिए बेहतर है। फिल्म मुख्य रूप से परेश रावल के किरदार कांजी भाई पर टिकी है। उन्होंने दृश्यों के अनुरूप इसे निभाया है। उनकी पकड़ कहीं भी कमजोर नहीं होती। कृष्ण के रूप में अक्षय कुमार के आगमन के बाद दोनों कलाकारों की संगत फिल्म का आनंद बढ़ा देती है। सुपरबाइक पर शूट पहने हुए कृष्ण के रूप में कृष्ण का आधुनिक रूप खुलता नहीं। लेखक-निर्देशक ने कृष्ण को अच्छी तरह से फिल्म में पिरोया है। अक्षय कुमार ने इस किरदार को जिम्मेदार तरीके से निभाया है। फिल्म के सहयोगी किरदार सिद्धेश्वर, लीलाधर और गोपी रोचक और मजेदार बनाते हैं। मिथुन चक्रवर्ती और गोविंद नामदेव ने अपने संवादों और भावों से फिल्म की रोचकता बढ़ा दी है। दोनों फिल्म में एक ही परिधान और भावमुद्रा में रहे हैं,लेकिन सिद्ध अभिनेता की तरह उन्होंने अपनी भंगिमाओं से बुहत कुछ कह दिया है। कांजीभाई की पत्नी सुशीला की भूमिका में लुबना सलीम जंचती हैं। कांजीभाई के सहयोगी महादेव साथ देते हैं।
ओह माय गॉड की खूबी इसके संवादों और अक्षय-परेश की केमिस्ट्री से निखरी है। किसी भी धर्म और उससे जुड़ी आस्था का निरादर न करते हुए भी फिल्म उपयोगी संदेश देती है। फिल्म में स्पष्ट कहा गया है कि किसी का धर्म छीनोगे तो वे तुम्हें धर्म बना देंगे।
साढ़े तीन स्टार
अवधि-1 2 मिनट

Thursday, September 27, 2012

ईश्वर है तो झगड़े-फसाद क्यों?


-अजय ब्रह्मात्मज
भावेश मांडलिया के नाटक ‘कांजी वर्सेज कांजी’ नाटक पर आधारित उमेश शुक्ला की फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में परेश रावल और अक्षय कुमार फिर से साथ आ रहे हैं। दोनों ने अभी तक 32 फिल्मों में एक साथ काम किया है। दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती है। ‘ओह माय गॉड’ के संदर्भ में अक्षय कुमार ने स्वयं परेश रावल से इस फिल्म के बारे में बात की। कुछ सवाल परेश ने भी अक्षय से पूछे।
अक्षय- परेश, आप को इस नाटक में ऐसी क्या खास बात दिखी कि आपने इसके इतने मंचन किए और अब फिल्म आ रही है?
परेश-बहुत कम मैटेरियल ऐसे होते हैं, जो सोचने पर मजबूर करते हैं। मनोरंजन की दुनिया में हमलोग लोगों को हंसाने-रूलाने का काम करते रहते हैं। यह नाटक और अब फिल्म लोगों को उससे आगे जाकर सोचने पर मजबूर करेगी। इस नाटक के मंचन में मैंने हमेशा कुछ नया जोड़ा है। अभी पिछले शो में एक महत्वपूर्ण दर्शक ने कहा कि मंदिर का मतलब क्या होता है? जो मन के अंदर है, वही मंदिर है।
अक्षय- सही कह रहे हो। जो मन के अंदर है वही मंदिर है। भगवान तो हमारे अंदर बैठा हुआ है। परेश, आप का नाटक देखने के बाद मैंने भगवान को ज्यादा अच्छी तरह समझा। अब मैं अपने गार्डन में बैठकर ही पूजा कर लेता हूं। इस नाटक को देखने के बाद मेरी तो जिंदगी ही बदल गई है। पूजा-पाठ के ढोंग का समय बचाकर अब मैं काम करता हूं। और काम से मिले पैसों से दूसरों की मदद करता हूं। मेरे जीवन का नया मंत्र है- नेकदिली ही प्रार्थना है।
अक्षय- परेश, क्या आप ईश्वर में यकीन रखते हैं?
परेश- मुझे लगता है कि कोई शक्ति जरूर है। अब उस शक्ति को क्या नाम दें, चाहें तो ईश्वर कह सकते हैं। सच कहूं तो मैं हिल गया हूं। जिस तरह गरीबी है। हाहाकार मचा है। लोग मर रहे हैं। ईश्वर के नाम पर एक-दूसरे को मार रहे हैं। मेरा सिंपल सा सवाल है कि अगर आप की बिल्डिंग में आप का नाम लेकर दो पड़ोसी लड़ रहे हों तो आप नीचे उतरकर पूछोगे न कि भई क्या बात है? यह ईश्वर कहां बैठा हुआ है? आकर पूछता क्यों नहीं कि उसके नाम पर झगड़े क्यों चल रहे हैं?
अक्षय- ईश्वर ने लड़ाई-झगड़े के लिए नहीं उकसाया है। मेरे ख्याल में उसने ख्याल रखा हुआ है, तभी तो सारी गड़बडिय़ों के बावजूद दुनिया चल रही है। सभी तरक्की कर रहे हैं। मेरी नजर में यह सद्बुद्धि खुद लानी पड़ती है। भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं रास्ता दिखा सकता हूं, लेकिन लक्ष्य तक तो पहुंचना आप का काम है।
परेश- माफ करें। मैं थोड़ा सिनिकल हो गया हूं। अखबार खोलते ही डिप्रेशन होता है। टीवी खोलते ही फ्रस्टे्रशन होता है। कहीं कोई अच्छी खबर नहीं मिलती।
अक्षय- तू किताबें पढ़ और ज्ञानवद्र्धक चैनल देख। पता चलेगा कि दुनिया कितनी खूबसूरत है। लोग कितने अच्छे हैं। पॉजिटिव रहना सीख।
परेश- मेरी एक ही समस्या है कि उसके नाम पर जो गोरखधंधा चल रहा है, वह सब बंद हो। मुझे तो लगता है ‘आसमां पर है खुदा और जमीं पर हम, इन दिनों इस तरफ वो देखता है कम।’
अक्षय- अगर कुछ लोग गलत हैं तो उसके लिए ईश्वर और पूरी कायनात को क्यों दोषी ठहरा रहे हो? मैं यकीन से कह रहा हूं सही लोग दुनिया में ज्यादा हैं। जिस दिन उनकी संख्या कम हुई, उस दिन सब गड़बड़ हो जाएगा। मैं तो यही कहूंगा कि उम्मीद मत छोड़ो और हिम्मत मत हारो। ‘ओह माय गॉड’ फिर से देखो और सीखो।
परेश-हां भाई। सभी देखें।


Saturday, December 6, 2008

फ़िल्म समीक्षा:महारथी

** 1/2
बेहतरीन अभिनय के दर्शन


शिवम नायर की महारथी नसीरुद्दीन शाह और परेश रावल के अभिनय के लिए देखी जानी चाहिए। दोनों के शानदार अभिनय ने इस फिल्म को रोचक बना दिया है। शिवम नायर की दृश्य संरचना और उन्हें कैमरे में कैद करने की शैली भी उल्लेखनीय है। आम तौर पर सीमित बजट की फिल्मों में तकनीकी कौशल नहीं दिखता। इस फिल्म के हर दृश्य में निर्देशक की संलग्नता झलकती है।
परेश रावल ने बीस साल पहले एक नाटक का मंचन गुजराती में किया था। उस नाटक के अभी तक सात सौ शो हो चुके हैं। परेश रावल इस नाटक पर फिल्म बनाना चाहते थे और निर्देशन की जिम्मेदारी शिवम नायर को सौंपी। शिवम नायर नाटक पर आधारित इस फिल्म को अलग दृश्यबंध देते हैं और सिनेमा की तकनीक से दृश्यों को प्रभावपूर्ण बना देते हैं।
महारथी थ्रिलर है, लेकिन मजा यह है कि हत्या की जानकारी दर्शकों को हैं। पैसों के लोभ में एक आत्महत्या को हत्या बनाने की कोशिश में सभी किरदारों के स्वार्थ और मन के राज एक-एक कर खुलते हैं। फिल्म में सबसे सीधी और सरल किरदार निभा रही तारा शर्मा भी फिल्म के अंत में एक राज बताकर अपनी लालसा जाहिर कर देती है। हां, हम जिस तरह की नियोजित और सपाट थ्रिलर फिल्में देखते रहे हैं, उससे कुछ अलग है महारथी। फिल्म में जितनी घटनाएं बाहर घटती हैं, उतनी ही किरदारों के मन। यह मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। महारथी में नसीरुद्दीन शाह ने शराब की लत का शिकार व्यक्ति का किरदार स्वाभाविक तरीके से निभाया है। नशे में सिर्फ चाल ही नहीं लड़खड़ाती, पूरा व्यक्तित्व लड़खड़ा जाता है। परेश रावल ने लोभ, लालसा और चालाकी को चतुर तरीके से निभाया है। बोमन ईरानी, ओम पुरी, नेहा धूपिया सामान्य हैं। तारा शर्मा और विवेक शौक साधारण हैं।