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Thursday, March 5, 2009

दरअसल:ऑस्कर अवार्ड से आगे का जहां..

-अजय ब्रह्मात्मज
हम सभी खुश हैं। एक साथ तीन ऑस्कर पाने की खुशी स्वाभाविक है। मौलिक गीत और संगीत के लिए रहमान को दो और ध्वनि मिश्रण के लिए रेसूल पुकुट्टी को मिले एक पुरस्कार से भारतीय प्रतिभाओं को नई प्रतिष्ठा और पहचान मिली है। इसके पहले भानु अथैया को रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी के लिए कास्ट्यूम डिजाइनर का ऑस्कर अवार्ड मिला था।
सत्यजित राय के सिनेमाई योगदान के लिए ऑस्कर ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया था। इस तरह कुल पांच पुरस्कारों के साथ भारत ने अपनी मौजूदगी तो दर्ज कर दी है, लेकिन दरअसल, यहां एक प्रश्न यह उठता है कि क्या ऑस्कर पुरस्कार पाने के बाद भारतीय फिल्मों की तस्वीर बदलेगी?
भारतीय फिल्में पिछले पचास सालों से इंटरनेशनल फेस्टिवल में पुरस्कार बटोरती रही हैं। हर साल दो-चार पुरस्कार किसी न किसी फिल्म के लिए मिल ही जाते हैं। अनेक फिल्मों को सराहना मिलती है और देश-विदेश में उनके प्रदर्शन भी किए जाते हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि इन पुरस्कृत और सम्मानित फिल्मों में से अनेक फिल्में भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित ही नहीं हो पाती हैं! गौर करें, तो हम पाएंगे कि वितरकों और प्रदर्शकों के समूह पुरस्कृत फिल्मों पर अधिक ध्यान नहीं देते। उन्हें फेस्टिवल फिल्म कहा जाता है और माना जाता है कि ऐसी फिल्मों को आम दर्शक नहीं देखता! गंभीर और संवेदनशील फिल्मों को अपवाद और आर्ट फिल्म के दर्जे में डाल कर किनारे कर देने का सिलसिला दशकों से चल रहा है। यही वजह है कि पुरस्कारों से फिल्मों के प्रति दर्शकों का नजरिया नहीं मिलता।
आठ ऑस्कर पुरस्कार जीतने के बाद भले ही तीन राज्यों की सरकारों ने स्लमडॉग मिलिनेयर को टैक्स फ्री कर दिया हो, लेकिन दर्शकों में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी आज भी नजर नहीं आ रही है! हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में युवा निर्देशकों का एक समूह मान रहा है कि ऑस्कर में भारतीय तकनीशियनों को अवार्ड मिलने से निर्माताओं और प्रोडक्शन हाउस की सोच में बदलाव आएगा। वे किसी फिल्म की योजना बनाते समय तकनीशियन पर ध्यान देंगे। कहने का आशय यही है कि अब तकनीशियन फिल्म के स्टार होंगे। उनका महत्व बढ़ेगा। फिलहाल यह खयाली पुलाव ही लगता है, क्योंकि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुख्य रूप से स्टार केंद्रित है। यहां कोई भी फिल्म तभी फ्लोर पर जाती है, जब उस फिल्म के लिए कोई स्टार हां करता है। यही सच्चाई है। बड़े प्रोडक्शन हाउस और नामी डायरेक्टर की वजह से फिल्में नहीं बनतीं। आज भी स्टार की हां या ना पर फिल्म की योजनाओं का भविष्य निर्भर है। ऐसा नहीं लगता कि ऑस्कर मिल जाने से फिल्म इंडस्ट्री के रवैए में कोई फर्क आएगा!
हां, स्लमडॉग मिलिनेयर को मिले ऑस्कर पुरस्कारों से यह स्पष्ट जरूर हो गया है कि भारत में फिल्मों के न केवल विषय हैं, बल्कि उन्हें संगत तरीके से सेल्यूलाइड पर उतारने के लिए सक्षम और योग्य तकनीशियन भी हैं। जरूरत है कि उन्हें मौका दिया जाए और फिल्मों के विषयों के चुनाव में नवीनता और मौलिकता को महत्व दिया जाए। लंबे समय से हम काल्पनिक, वायवीय और पलायनवादी फिल्में दिखाकर दर्शकों को बहकाते रहे हैं। इसलिए अब हमें यह समझने की जरूरत है कि वास्तविक और सामाजिक विषयों की फिल्मों से सराहना और प्रशंसा हासिल की जा सकती है और व्यवसाय भी किया जा सकता है। हिंदी फिल्मों पर ध्यान दें, तो पिछले वर्षो में बड़े स्टारों के बावजूद फिल्में नहीं चली हैं, जबकि नए विषयों की छोटी फिल्मों को भी दर्शकों ने पसंद किया है। दर्शक नई फिल्मों के लिए तैयार हैं। वे देव डी से लेकर मुंबई मेरी जान तक देखना चाहते हैं। उन्हें गजनी पसंद है, तो आमिर भी प्रिय है। फिल्म बुरी हो, तो वे अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोण के होने के बावजूद चांदनी चौक टू चाइना को रिजेक्ट कर देते हैं। दरअसल.., यह सोच लेना जल्दबाजी ही होगी कि ऑस्कर मिल जाने से हिंदी फिल्मों की मेकिंग, प्लानिंग और मार्केटिंग में आकस्मिक बदलाव आ जाएगा। फिलहाल हमारे निर्माता, निर्देशक और स्टार बदलाव की जरूरत भी महसूस कर लें, तो काफी होगा।

Tuesday, February 24, 2009

एक आगाज है आस्कर

81वें अकादमी अवार्ड यानी आस्कर में स्लमडाग मिलिनेयर को नौ श्रेणियों में दस नामंाकन मिले थे। इस फिल्म ने आठ श्रेणियों में पुरस्कार हासिल कर इतिहास रच दिया। स्लमडाग मिलिनेयर को मिले आस्कर पुरस्कारों से कुछ लोग आह्लादित हैं तो एक समूह ऐसा भी है जो भारतीय खुशी को 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' समझ रहा है। उनका कहना है कि यह भारतीय फिल्म नहीं है, इसलिए हमारी खुशी निराधार है। तर्क के लिहाज से वे सही हैं, लेकिन प्रभाव, भावना और उत्साह की बात करें तो स्लमडाग मिलिनेयर की उपलब्धियों पर खुश होना किसी और के दरवाजे पर दीपक जलाना नहीं है। गीत, संगीत और ध्वनि मिश्रण के लिए भारतीयों को मिले पुरस्कारों से यह साबित होता है कि भारतीय प्रतिभाएं अंतरराष्ट्रीय मानदंड के समकक्ष हैं। जरूरत है कि विभिन्न प्रतियोगिताओं और समारोहों में उन्हें एंट्री मिले और उससे भी पहले जरूरी है कि देश में मौजूद प्रतिभाओं को नई चुनौतियां और अवसर मिलें ताकि वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। स्लमडाग मिलिनेयर के माध्यम से भारतीय प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान का अवसर मिला। आस्कर पुरस्कार श्रेष्ठता का अकेला मानदंड नहीं है। दुनिया में और भी मंच, फेस्टिवल, समारोह और आयोजन हैं, जहां मिली पहचान से हम गौरवान्वित होते रहे हैं। आस्कर के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना पालने के पहले हमें यह समझना चाहिए कि वहां की सामान्य श्रेणियों में भारत में बनी भारतीय भाषाओं की फिल्में शामिल नहीं हो सकतीं। पहले गांधी और फिर स्लमडाग मिलिनेयर मूल रूप से अंग्रेजी में बनी फिल्में हैं। आस्कर के लिए आवश्यक है कि फिल्म की भाषा अंग्रेजी हो और वह अमेरिका में भी रिलीज हुई हो। बहुत संभव है कि स्लमडाग मिलिनेयर की कामयाबी से प्ररित होकर शीघ्र ही कोई भारतीय निर्माता या निर्देशक इस तरह का प्रयास करे और आस्कर पुरस्कारों की दौड़ में शामिल हो जाए। फिलहाल हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में बनी फिल्में आस्कर की 'विदेशी भाषा की फिल्म' की श्रेणी में ही शामिल हो सकती हैं। इस वर्ग में आशुतोष गोवारिकर की लगान कुछ वर्ष पूर्व नामांकन सूची तक पहुंच सकी थी।
स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मकारों के लिए इस संदर्भ में प्रेरणा बन सकती है कि वे वास्तविक किस्म की फिल्मों के लिए प्रेरित हों। पुरस्कारों के लिए फिल्म के महंगा होने से ज्यादा जरूरी है कि वह मानवीय संवेदनाओं को छूती हो। उसका विषय गहरा और व्यापक हो। इस पर बहस चलती रहेगी कि स्लमडाग मिलिनेयर भारत की गरीबी का प्रदर्शन कर पुरस्कार बटोर रही है या मामला कुछ और है। इस फिल्म का बारीकी से अध्ययन करें तो यह भारतीय मानस की फिल्म है, जिसमें आस-विश्वास, भाग्य और कर्म का अनोखा मेल है। निश्चित ही स्लमडाग मिलिनेयर पश्चिमी नजरिए से बनी फिल्म है, लेकिन इसमें भारतीय मूल्यों और भावनाओं को समेटने और रेखांकित करने की कोशिश है। फिल्म अपने निहितार्थ में उम्मीद, जीत और प्रेम पर टिकी है। हां, पश्चिमी उदारता और वर्चस्व की अंतर्धारा भी फिल्म में मौजूद है, जो ढेर सारे राष्ट्रवादी दर्शकों को खल सकती है। पश्चिम की वर्चस्व ग्रंथि उनकी फिल्मों, साहित्य, संभाषण और नीतियों में साफ झलकती है। स्लमडाग मिलिनेयर में भी वर्चस्व ग्रंथि है।
इंटरनेशनल मार्केट, अवार्ड या दर्शकों को थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर हम आत्मावलोकन करें। क्या हमारे फिल्मकार विकास स्वरूप के इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की हिम्मत करते? अगर कोई निर्देशक साहस दिखाता तो क्या उसे किसी प्रोडक्शन हाउस से सहयोग मिलता? उत्तार होगा, नहीं। हमारे निर्माता और प्रोडक्शन हाउस दकियानूस और लकीर के फकीर हैं। यही कारण है कि कोई भारतीय निर्देशक 'क्यू एंड ए' पर फिल्म बनाने की पहल नहीं करता। हमारे बहुविध समाज में अनेक विषय हैं, जिन्हें तराश कर सेल्युलाइड पर उतारा जा सकता है। स्लमडाग मिलिनेयर जैसी अनेक कहानियां रूपहले पर्दे पर आ सकती हैं, लेकिन हम अपनी पारंपरिक सोच और लाभ-हानि की चिंता के कारण इस दिशा में पहल नहीं कर पाते। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री चंद लोभी और मुनाफाखोर निर्माताओं के चंगुल में फंसी है। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे निर्माताओं और संबंधित व्यक्तियों का एक वर्ग नए प्रयोग की सफलता को अपवाद, आर्ट या आकस्मिक घटना बताकर ट्रेंड बनने से रोकता है। उसकी बड़ी वजह यह है कि अगर अपारंपरिक विषयों के नए प्रयोग ट्रेंड बन गए तो कल्पनाहीन निर्देशकों का वर्चस्व टूटेगा और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उनके हाथों से निकल जाएगी। स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मों के लिए एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है। हम युवा निर्देशकों, लेखकों और तकनीशियनों को सृजनात्मक आजादी देकर इसकी सफलता भारतीय फिल्मों में दोहरा सकते हैं।