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Wednesday, May 4, 2016

सब पर चढ़ा पहला नशा - फराह खान


-स्मिता श्रीवास्‍तव 
फराह खान हरफनमौला है। निर्माता निर्देशक, कोरियोग्राफर होने के साथ ट्रिपलेट की मां भी हैं। वह अपनी प्रोफेशनल और कमर्शियल लाइफ में संतुलन साध कर चल रही हैं। पिछले दिनों उन्होंने विशाल भारद्वाज की पीरियड फिल्म रंगूनके लिए एक गाना कोरियोग्राफ किया है। साथ ही अपनी अगली फिल्म की तैयारी में जुटी हैं। हालांकि इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्होंने काफी संघर्ष किया है। पिछले दिनों मुंबई में आयोजित मास्‍टर क्‍लास में उन्‍होंने जीवन के कई पहलुओं पर विस्‍तार से चर्चा की।
फराह ने बताया , मेरे फिल्मों में आने से पहले पिता का निधन हो गया था। वह 50 और 60 के दौर में फिल्म निर्माता हुआ करते थे। मेरी मौसी हनी ईरानी और डेजी ईरानी सुपर चाइल्ड स्टार थे। हनी ईरानी के पति जावेद अख्तर थे। वे सब बेहतर स्थिति में थे। जबकि हम गरीब थे। हम सब उनकी रहनुमाई पर रहते थे। वे हमारे स्कूल की फीस देते थे। उस समय टीवी, आईपैड या इंटरनेट नहीं था। घर में फिल्मी माहौल रहता था। भाई साजिद 80 के दौर में फिल्मों का इनसाइक्लोपीडिया हुआ करता था।
मैंने जलवा से बतौर बैकग्राउंड डांसर अपनी शुरुआत की थी। दरअसल, उन्हें कुछ डांसर की जरूरत थी। जलवा के समय मैं एकमात्र ब्रेक डांसर हुआ करती थी। उस समय मेरी उम्र महज बीस साल थी। उसे करने का कारण यह था कि वे सब हवाई जहाज से गोवा जा रहे थे। उससे पहले मैं कभी हवाई जहाज पर नहीं बैठी थी। उस समय प्रतिदिन का पांच सौ रुपये भी मिल रहा था। वह मोटी रकम थी उस समय। लिहाजा मैंने स्वीकार लिया। वहीं से डांस की दिशा में आगे बढ़ी। हालांकि मैंने कभी नहीं सोचा था कि कभी कोरियोग्राफर बनूंगी। हिंदी सिनेमा में उस समय कोरियोग्राफर 50-60 की उम्र के आसपास होते थे। उनमें ज्यादातर मोटे होते थे। मैं उस समय दुबली हुआ करती थी। मेरे पास कोरियोग्राफर बनने का विकल्प नहीं था। पहले करियोग्राफर बनने की प्रक्रिया होती थी। आपको कई साल बतौर डांसर काम करना होता था। फिर किसी कोरियोग्राफर को कई वर्षों तक असिस्ट करना होता था। फिर कहीं जाकर कोरियोग्राफर बनने का मौका मिलता था। मैं वास्तव में निर्देशक बनना चाहती थी। मैं मंसूर खान से किसी शो के दौरान मिली थी। उन्होंने पूछा कि मैं कयामत से कयामततक के लिए डांसर ला सकती हूं। मैंने उनसे कहा कि मैं डांसर ला दूंगी। मगर मैं आपकी असिस्टेंट बनना चाहती हूं। वह मान गए। मैं जो जीता वहीं सिंकदरमें उनकी फोर्थ असिस्टेंट बनीं। मैं क्लैप देती थी। ठीक एक महीन के बाद मुझे बतौर कोरियोग्राफर चांस मिला। दरअसल, कोरियोग्राफर किसी अन्य फिल्म की शूटिंग के लिए चली गई थी। ऊंटी में उनका चार दिन इंतजार महंगा खर्चा था। मंसूर खान ने मुझे बुलाया और कहा कि तुम गाना कोरियोग्राफ कर रही हो। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रही। मैंने पहला नशा... को कोरियोग्राफर किया।
कोरियोग्राफी का मेरा अपना मैथेड है। मैं होमवर्क अच्छे से करती हूं। मैं गाने को सौ बार सुनती हूं। सुनने के दौरान छवि मेरे दिमाग में आने लगती है। यह ठीक वैसे है कि जैसे फिल्म के सीन दिमाग में आने लगते हैं। अपनी कल्पनाओं को कागज पर उतारती हूं। मैं गानों की लाइन के साथ कैसे शॉट लिया जाएगा उसका विस्तृत विवरण लिखती हूं। यानी क्लोप अप होगा या दूर का शॉट। एक तरीके से मैं गाने की स्क्रिप्ट लिखती हूं। सेट पर उसमें आमूल-चूल बदलाव हो सकते हैं। सेट पर मैं उसकी फोटो कॉपी सबको देती हूं। कई लोग उस पर आश्चर्यचकित भी होते हैं कि मैंने गाने की स्क्रिप्ट लिखी है।
मैं अपने कोरियोग्राफी के फेस में सबसे अधिक मणिरत्नम से प्रेरित हुई हूं। उनकी खासियत है कि सामने वाले इंसान के भीतर से हमेशा कुछ अलहदा निकालने की कोशिश करते हैं।हम उन्हें डांस का आइडिया बताते थे।वह कहते थे कि यह तो मैंने देखा है।कुछ नया और बेहतर करो। वह अपने फिल्म के एक्टरों के साथ भी इसी तरह काम करते हैं। वह हमेशा कुछ बेहतर करने का दबाव बनाए रखते हैं। यही वजह है कि कुछ डायरेक्टर अपनी सोच से आगे हैं। कुछ वहीं के वहीं पर ही पड़े हुए हैं। यह एक्टरों पर भी लागू करता है।
फराह की प्राथमिकता अब बच्‍चे हैं। वह अब उस मुकाम पर है जहां अपनी पसंद का काम चुन सकती हैं। वह कहती हैं,‘ यह जहीन क्राफट है। मैं बहुत सारे गाने कोरियोग्राफ नहीं करती हूं। अब उस स्थिति समय हूं कि अपनी पसंद का काम चुन सकूं। जबकि पूर्व में मुझे पांच हजार रुपये मिल रहे होते थे तो गाना कर लेती थी। हालांकि बच्चे भी मेरे काम की अहमियत समझने लगे हैं। हाल में मुझे जोधपुर जाना था। बच्चों ने कहा मम्मा आप क्यों जा रहे हो? मैंने कहा आपकी मां जैकी चेन को कोरियोग्राफ करने जा रही है। उसे इस पर गर्व हुआ। उसने कहा ठीक है आप जाइए। हालांकि मैं बच्‍चों को हमेशा अपने स्‍टारडम से दूर रखती हूं। एक दिन बेटे ने मुझे पूछा कि क्या में फेमस हूं। मैंने उससे कहा कि तुम हमारे बेटे हो।इस वजह से लोग तुम्हें जानते हैं।लेकिन अगर तुम यही सोच में रहोंगे तो कल कोई और अपनी मेहनत से आगे बढ़ जायेंगे। इससे बेहतर है कि तुम अपनी मेहनत पर विश्वास करो। कुछ करो और आगे बढ़ो।‘
देर से शादी करने के संबंध में फराह कहती हैं’ मुझ पर कभी शादी का दबाव नहीं रहा है। मैं तो २३ साल की उम्र में ही शादी करना चाहती थी।तब मेरी मां ने मुझे कहा कि इतनी जल्दी शादी करोंगी तो हम तुम्हें घर से बाहर निकाल देंगे। चालीस की उम्र में मेरी शादी की बात सुनकर वे बेहद खुश हए। मेरा मानना है कि शादी कभी करियर में रूकावट नहीं बनती है। अगर आपका जीवन साथी आपको समझने वाला हो। इसलिए यह जरूरी है कि सही इंसान से शादी की जाएं। जो अपने करियर के साथ आपके करियर को प्रमुखता दे। आपका सपोर्ट सिस्टम बने। उसमें भी घर की जिम्‍मेदारी संभालने का अहसास होना जरुरी है। इसे ही समानता कहते हैं। अच्छा हुआ कि मैं देरी से मां बनी। मुझे खुद के करियर को विस्तार देने का मौका मिला। बच्चें मेरे जीवन में सही समय पर आए। अगर बच्चे जल्दी आते तो मैं वह नहीं कर पाती जो मैं कर पायी हूं। मैं तो सभी को यही सलाह करूंगी कि देरी से ही मां बने।ताकि आप अपना जीवन जी पाएं,। जल्दी मां बनने पर हम बच्चें और करियर के बीच उलझ जाते हैं। बच्चों को भी मां का भरपूर साथ मिलना चाहिए। करियर के दबाव में बच्चों को सही परवरिश नहीं मिल पाती है। वैसे मां बनने के बाद मैं नम्र हो गई हूं। मैं पहले से अधिक खुश रहने लगी हूं।
‘शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी’ के बाद कोई फिल्‍म न करेन को लेकर फराह कहती हैं,’ मुझे एक्टर बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। एक्टर बनने के बाद मुझे एक जगह बैठे रहना पड़ता था। उनका किसी चीज पर कंट्रोल नहीं रहता था। बतौर निर्देशक आपका सेट से लेकर एक्‍टर तक सभी पर कंट्रोल होता है। मुझे वहीं पसंद है।‘ 
भविष्य की योजना के संबंध में फराह खान बताती हैं,‘मेरी अगली फिल्म महिला प्रधान है। उसमें दो हीरोइनें होंगे। उनकी कास्टिंग मेरे लिए बहुत बड़ा चैलेंज है। फिलहाल उसी की तैयारी चल रही है।
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(यह आर्टिकल दैनिक जागरण के झंकार परिशिष्‍ट में 1 मई 2016 को प्रकाशित हुआ था।)


Friday, October 24, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हैप्‍पी न्‍यू ईयर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 फराह खान और शाह रुख खान की जोड़ी की तीसरी फिल्म 'हैप्पी न्यू इयर' आकर्षक पैकेजिंग का सफल नमूना है। पिता के साथ हुए अन्याय के बदले की कहानी में राष्ट्रप्रेम का तडका है। नाच-गाने हैं। शाहरुख की जानी-पहचानी अदाएं हैं। साथ में दीपिका पादुकोण, अभिषेक बच्‍चन, सोनू सूद, बोमन ईरानी और विवान शाह भी हैं। सभी मिलकर थोड़ी पूंजी से मनोरंजन की बड़ी दुकान सजाते हैं। इस दुकान में सामान से ज्‍यादा सजावट है। घिसे-पिटे फार्मूले के आईने इस तरह फिट किए गए हैं कि प्रतिबिंबों से सामानों की तादाद ज्‍यादा लगती है। इसी गफलत में फिल्म कुछ ज्‍यादा ही लंबी हो गई है। 'हैप्पी न्यू इयर' तीन घंटे से एक ही मिनट कम है। एक समय के बाद दर्शकों के धैर्य की परीक्षा होने लगती है।
चार्ली(शाहरुख खान) लूजर है। उसके पिता मनोहर के साथ ग्रोवर ने धोखा किया है। जेल जा चुके मनोहर अपने ऊपर लगे लांछन को बर्दाश्त नहीं कर पाते। चार्ली अपने पिता के साथ काम कर चुके टैमी और जैक को बदला लेने की भावना से एकत्रित करता है। बाद में नंदू और मोहिनी भी इस टीम से जुड़ते हैं। हैंकिंग के उस्ताद रोहन को शामिल करने के बाद उनकी टीम तैयार हो जाती है। संयोग है कि ये सभी लूजर है। वे जीतने का एक मौका हासिल करना चाहते हैं। कई अतार्किक संयोगों से रची गई पटकथा में हीरों की लूट और वर्ल्‍ड डांस कंपीटिशन की घटनाएं एक साथ जोड़ी गई है। फराह खान ने अपने लेखकों और क्रिएटिव टीम के अन्य सदस्यों के सहयोग से एक भव्य, आकर्षक, लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाई है, जिसमें हिंदी फिल्मों के सभी प्रचलित फॉर्मूले बेशर्मी के साथ डाले गए हैं।
कहा जाता है कि ऐसी फिल्मों के भी दर्शक हैं। शायद उन्हें यह फिल्म भी अच्‍छी लगे। कला में यथास्थिति बनाए रखने के हिमायती दरअसल फिल्म को एक व्यवसाय के रूप में ही देखते हैं। 'हैप्पी न्यू इयर' का वितान व्यावसायिक उद्देश्य से ही रचा गया है। अफसोस है कि इस बार फराह खान इमोशन और ड्रामा के मामले में भी कमजोर रही है। उन्होंने फिल्म की पटकथा में इसी संभावनाओं को नजरअंदाज कर दिया है। किरदारों की बात करें तो उन्हें भी पूरे ध्यान से नहीं रचा गया है। चार्ली के बदले की यह कहानी आठवें-नौवें दशक की फिल्मों का दोहराव मात्र है, जो तकनीक और वीएफएक्स से अधिक रंगीन, चमकदार और आकर्षक हो गया है।
कलाकारों में शाह रुख खान ऐसी अदाकारी अनेक फिल्मों में कर चुके हैं। वास्तव में यह फिल्म उनकी क्षमताओं का दुरुपयोग है। फराह खान ने अन्य कलाकारों की प्रतिभाओं की भी फिजूलखर्ची की है। दीपिका पादुकोण ने मोहिनी के किरदार में चार-छह मराठी शब्दों से लहजा बदलने की व्यर्थ कोशिश की है। बाद में डायरेक्टर और एक्टर दोनों लहजा भूल जाते हैं। अभिषेक बच्‍चन डबल रोल में हैं। उन्होंने फिल्म में पूरी मस्ती की है। स्पष्ट दिखता है कि उन्होंने सिर्फ निर्देशक की बात मानी है। अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ा है। यही स्थिति बाकी कलाकारों की भी है। सोनू सूद धीरे-धीरे बलिष्ठ देह दिखाने के आयटम बनते जा रहे हैं। बोमन अपने लहजे से पारसी किरदार में जंचते हैं। विवान शाह साधारण हैं।
'हैप्पी न्यू इयर' निश्चित ही आकर्षक, भव्य और रंगीन है। फिल्म अपनी संरचना से बांधे रखती है। फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फराह खान खुद कोरियोग्राफर रही हैं। फिर भी 'हैप्पी न्यू इयर' के डांस सीक्वेंस प्रभावित नहीं करते। दीपिका पादुकोण की नृत्य प्रतिभा की झलक भर मिल पाती है। फराह खान और शाह रुख खान की पिछली दोनों फिल्में 'मैं हूं ना' और 'ओम शांति ओम' से कमजोर फिल्म है 'हैप्पी न्यू ईयर'।
अवधि- 179 मिनट 
** 1/2 ढाई स्‍टार

Tuesday, September 23, 2014

आत्मविश्वास से लंबे डग भरतेअभिषेक बच्चन


-अजय ब्रह्मात्मज
    हमेशा की तरह अभिषेक बच्चन की मुलाकात में मुस्कान तैरती रहती है। उनकी कबड्डी टीम पिंक पैंथर्स विजेता रही। इस जीत ने उनकी मुस्कान चौड़ी कर दी है। अलग किस्म का एक आत्मविश्वास भी आया है। आलोचकों की निगाहों में खटकने वाले अभिषेक बच्चन के नए प्रशंसक सामने आए हैं। निश्चित ही विजय का श्रेय उनकी टीम को है,लेकिन हर मैच में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने टीम के खिलाडिय़ों का उत्साह बढ़ाया। इस प्रक्रिया में स्वयं अभिषेक बच्चन अनुभवों से समृद्ध हुए।
    वे कहते हैं, ‘जीत तो खैर गर्व की अनुभूति दे रहा है। अपनी टीम के खिलाडिय़ों से जुड़ कर कमाल के अनुभव व जानकारियां मिली हैं। हम मुंबई में रहते हैं। सुदूर भारत में क्या कुछ हो रहा है? हम नहीं जानते। उससे अलग-थलग हैं। हमारी टीम में अधिकांश खिलाड़ी सुदूर इलाकों से थे। मैं तो टुर्नामेंट शुरू होने के दो हफ्ते पहले से उनके साथ वक्त बिता रहा था। उनसे बातचीत के क्रम में उनकी जिंदगी की घटनाओं और चुनौतियों के बारे में पता चला। उनके जरिए मैं सपनों की मायावी दुनिया से बाहर निकला। असली इंडिया व उसकी दिक्कतों के बारे में पता चला। उन तमाम दिक्कतों के बावजूद उनमें जो लडऩे का माद्दा है, वह कमाल का है। मैच के दौरान वे मुझसे कहा करते कि दादा यह टूर्नामेंट हम ने आप के लिए जीता है।’
    दूसरी चीज जो मुझे उनसे सीखने को मिली, वह यह कि जिंदगी में,किसी टीम में लीडर बनना चाहिए, बॉस नहीं। बॉस सिर्फ इंस्ट्रक्ट करेगा, लीडर अपनों के संग रहेगा। लड़ेगा। यही वजह थी कि मैं मैदान पर उनका जोश बढ़ाने के लिए रहता था। चाहता तो मैं भी अपने आफिस में बैठ कर उनके बारे में पता करता रहता और दूसरे काम भी करता रहता। मेरी मौजूदगी उनमें कमाल का जोश भरती रही और नतीजा आज सब के सामने है।
    इस गर्व के बाद आत्मिक खुशी के पल ‘हैप्पी न्यू ईयर’ दे रही है। वे बताते हैं, ‘फिल्म में लंबी-चौड़ी कास्ट है। शूटिंग के दौरान पूरा पारिवारिक इमोशनल माहौल बन गया था। सबके संग हंसी-मजाक होता था। एक-दूसरे के दिल की बातें जानने का मौका मिलता था। अब शूटिंग खत्म हो चुकी है। रिलीज की तारीख नजदीक आ रही है तो शूटिंग के दौरान वाले पल याद कर इमोशनल हो रहा हूं। अभी हमारा ध्यान प्रमोशन पर है। शाह रुख के बारे में जैसा सब जानते हैं, वे प्रमोशन के यूनीक कलेवर लेकर आते हैं। वह पीरियड भी काफी मजेदार होता है। हम सब फिल्म को सेलिब्रेट कर रहे हैं। फराह ने एक विशुद्ध मसाला फिल्म दी है। एकदम टिपिकल कमर्शियल फिल्म, जैसा मनमोहन देसाई दिया करते थे। लोग हिंदी सिनेमा को जिन खूबियों के लिए जानते हैं। जैसी फिल्में देखकर हम बड़े हुए हैं, ‘हैप्पी न्यू ईयर’ वैसी ही फिल्म है।’
क्या ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में अभिषेक बच्चन डबल रोल में हैं? पूछने पर वे हामी भरते हैं,‘ जी,फिल्म में डबल रोल है मेरा। एक का नाम नंदू भीड़े है। वह मुंबई का है। वह पैसे के लिए दही हांडी और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेता है। दूसरे रोल में निगेटिव शेड में हूं। मैं इसे अपने करिअर का पहला डबल रोल फिल्म मानता हूं। बोल बच्चन में भी मैं दो अवतार में था, मगर यहां मैं पूरी तरह दो अपोजिट किरदार निभा रहा हूं। आज के दौर में भी डबल रोल निभाना आसान काम नहीं है। पहले के जमाने में हाई लेवल तकनीक नहीं थी। पहले कैमरे के फ्रेम को लॉक नहीं किया जाता था। कलाकार को तुरंत कपड़े बदल कैमरे के सामने आ जाना पड़ता था। आज फ्रेम को लॉक नहीं करना पड़ता। बाकी परफॉरमेंस में आप को वरायटी तो लानी ही पड़ती है।’
    पहले के जमाने में इस एंटरटेमेंट जॉनर की फिल्मों में कॉमेडी का एक ट्रैक भर होता था। अब उसका डोज बढ़ गया है। हर फिल्म में कॉमेडी पर जोर रहता है। अभिषेक बच्चन इसे स्वीकार करते हैं,‘उसकी संभवत : वजह यही है कि आज लोगों की जिंदगी में स्ट्रेस लेवल काफी बढ़ चुका है। सभी चाहते हैं कि उन्हें भरपूर आनंद मिले। फिल्म देखते समय वे ऐसा बंधें कि सारे तनावों से मुक्त हो सकें। उसकी खातिर अब कमर्शियल फिल्मों में कॉमेडी का तडक़ा ज्यादा होता है। हम एक्टर के लिए कॉमेडी करना सबसे टफ काम है। ड्रामा और इंटेंस सीन में मोमेंट के साथ खेला जा सकता है। कॉमेडी अगर अच्छी नहीं लिखी गई हो तो उसे पर्दे पर पेश करना बहुत टेढ़ा काम है। और यह साथ के कलाकारों की केमिस्ट्री से निखरती और डूबती है।’
    अभिषेक बच्चन जोर देकर कहते हैं,‘फिल्म की सबसे खास बात यह है कि आप को हर सीन में तकरीबन सभी कलाकार साथ परफॉर्म करते नजर आएंगे। शाह रुख को सिर्फ दो दिन बगैर किसी कलाकार के शूट करना पड़ा, जबकि मुझे तीन दिन। इस फिल्म का स्ट्रक्चर ऐसा रखा गया है कि सभी हर फ्रेम में नजर आएं। फराह खान के लिए यह मुश्किल फिल्म रही होगी।’ फिर खुद ही फराह खान की तारीफ करने लगते हैं अभिषेक,‘ फराह बड़ी दिलेर और साहसी फिल्ममेकर हैं। वे अपनी दिल की सुनती हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं? उनके सिनेमा को क्या करार देते हैं? मुझे उनकी यही सोच प्रभावित करती है। फिर वे अपने कलाकारों को बच्चों जैसा प्यार देती हैं। घर में तीन बच्चों को पालने के अनुभव से उन्हें हमें संभालने में दिक्कत नहीं हुई। खुशी है कि मुझे ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में उनके साथ काम करने का मौका मिला। सारे कलाकार एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित भी थे। मैं सबके संग पहले भी फिल्में कर चुका हूं सिवाय विवान के। सोनू सूद ‘युवा’ में मेरे बड़े भाई के रोल में थे। यहां शूट के दरम्यान भी वे मेरा ख्याल बड़े भाई के तौर पर करते थे। हर शाम सात बजे फोन आ जाता था कि चलो भाई कहां हो? जिम चलो।’
   

Sunday, August 17, 2014

छह लूजर्स का ख्वाब है ‘हैप्पी न्यू ईयर’- शाह रुख खान


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
- आजादी की पूर्व संध्या पर ट्रेलर लाने का कोई खास मकसद है क्या?
0 इसके टेक्निकल कारण हैैं। ‘सिंघम रिटर्न्‍स’ 15 अगस्त को रिलीज हो रही है। इसी के साथ ‘हैप्पी न्यू ईयर’ का ट्रेलर आ रहा है। वितरक और मार्केटिंग टीम ही यह फैसला करती है। फिल्म का एक अलग पहलू भी है, इसमें कमर्शियल हैप्पी पैट्रियटिक फील है। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बहुत बड़ी फिल्म है। इसमें फन, गेम और फुल एंटरटेनमेंट है। आमतौर पर बॉलीवुड की फिल्मों के बारे में दुष्प्रचार किया जाता है कि वे ऐसी होती हैैं, वैसी होती हैैं। फराह खान ने जब इस फिल्म की स्टोरी सुनाई, तभी यह तय किया गया कि बॉलीवुड के बारे में जो भी अच्छा-बुरा कहा जाता है, वह सब इस फिल्म में रहेगा। बस इसे इंटरनेशनल स्तर का बनाना है। पूरे साहस के साथ कहना है, जो उखाडऩा है, उखाड़ लो। हम यहीं खड़े हैैं। इस फिल्म में गाना है, रिवेंज है, फाइट है, डांस है... अब चूंकि समय बदल गया है, इसलिए सभी चीजों के पीछे लॉजिक भी है। उन्हें थोड़ा रियल रखा गया है। अब ऐसा नहीं होगा कि कमरा खोला और स्विटजरलैैंड पहुंच गए। हमने ऐसा विषय चुना, जिसमें बॉलीवुड के सभी तत्व डाले जा सकें। फिल्म के अंदर इंडिया वाले कांसेप्ट बहुत महत्वपूर्ण है। यह अच्छा संयोग है कि स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले हम लोग ट्रेलर लेकर आ रहे हैैं।
- क्या कांसेप्ट है इंडिया वाले का? आपकी एक पुरानी फिल्म है, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी?
0 फिर भी दिल है हिंदुस्तानी मीडिया पर थी। इंडिया वाले के पीछे दो बातें हैैं। अमूमन लोग विजेताओं पर फिल्में बनाते हैैं। जो जीत जाते हैैं, कुछ हासिल करते हैैं, हम उनकी ही फिल्में बनाते हैैं। वे इंस्पायरिंग और हीरो होते हैैं। हमने लूजर्स की कहानी कही है। पहले के हीरो बहुत अच्छे होते थे। हमारे हीरो हर तरह से हारे हुए हैैं। उन सभी के पास कुछ ख्वाब है, जिन्हें वे पूरा करना चाहते हैैं। यह पहली फिल्म होगी, जो लूजर्स होने का जश्न मनाती है। आप थक गए हों, हार गए हों तो भी अपने ख्वाबों को पूरा करने की साकारात्मकता रहनी चाहिए।
- आपके लिए लूजर्स का रोल प्ले करना बहुत मुश्किल रहा होगा। 
0 मैैं लूजर्स होने का मतलब समझता हूं,इसीलिए मैैं विनर हूं। हार की समझ हो, तभी आप जीत सकते हैैं। हम जिंदगी में बहुत कुछ खोते हैैं। हर किसी का अपना एक लेवल होता है। हम लोगों का खोना 100 करोड़ का होता है। हार को मैैंने करीब से देखा है। आईपीएल में हारता रहा हूं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में एक लाइन है। दुनिया में हर तरह के लोग होते हैैं, काले-गोरे, बड़े-छोटे, सच्चे-झूठे, मेरे खयाल से यह विभाजन सही नहीं है। दुनिया में दो ही तरह के इंसान होते हैैं। एक विनर और दूसरा लूजर। जिंदगी हर हारने वाले को एक मौका जरूर देती है, जब वह जीत सके। यह कहानी उन सभी की है। गौर करें तो दुनिया में ज्यादातर लोग लूजर हैैं, लेकिन उनकी खुशियों पर कोई गौर नहीं करता। बहुत कम लोग ही सफल होते हैैं। एक-दो ही स्टीब जॉब होते है। लूजर की हार को भी सेलीब्रेट करना चाहिए। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ लूजर्स की हार को सेलिब्रेट करती है।
- अपने पिता को भी आप सफल फैल्योर कहते रहे हैैं?
0 मैैं उनसे बहुत प्रभावित हूं। उनकी भद्रता, शिक्षा और उनके सबक। प्रभाव की वजह शायद यह भी हो सकती है कि वे हमें छोडक़र जल्दी चले गए। वे बहुत ही योग्य, सुंदर और त्याग करने वाले व्यक्ति थे। वे स्वतंत्रता सेनानी थे। आजादी के लिए उन्होंने अपना परिवार छोड़ दिया। शायद उन्हें मालूम था कि वह जो हासिल कर सकते हैैं, वह सब वे नहीं कर पाएंगे। फिर भी उन्होंने हमें मूल्य दिए। हमेशा यही कहते थे कि धोखा मत देना। घटियापन, छिछोरापन नहीं करना, बदतमीजी नहीं करना। पठान होने के बावजूद वे यह सब सिखाते थे। आमतौर पर पठानों में ये गुण नहीं होते। वे बहुत ही विनम्र और सुशील थे। मैैं पूर गर्व से कहता हूं कि वे दुनिया के सफलतम फैल्योर थे। इसके बावजूद मैैं उन्हें लूजर नहीं कहूंगा, क्योंकि उनकी सारी सफलताएं मुझे मिली हैैं। उनकी शिक्षा से ही मैैं सफल हुआ, उनका सिखाया बेकार नहीं गया।
- आपके अमेरिका टूर स्लैम में भी क्या इंडिया वाले कांसेप्ट ही रहेगा?
0 नहीं। पिछले 10 सालों से मैैं किसी वल्र्ड टूर नहीं गया। इसमें फिल्म के यूनिट के लोग जरूर हैैं, लेकिन हम सिर्फ अपनी ही फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ पर परफॉर्म नहीं करेंगे। सभी की राय थी कि हम लोग वल्र्ड टूर पर चलें। मुझे भी लगा कि मेरी फिल्म में हीरो-हीरोइन और बाकी टैलेंट हैैं तो उन सभी के साथ क्यों न एक टूर किया जाए। हम सुष्मिता सेन को भी शामिल करना चाह रहे थे। ‘मैैं हूं ना’ से उनके साथ एसोसिएशन रहा है, लेकिन वह कहीं शूटिंग कर रही हैैं। व्यस्त हैं। हम लोग छह शो करेंगे। मैैं अमूमन 18 शो करता हूं। इस टूर को ‘हैप्पी न्यू ईयर’ टूर कहना ठीक नहीं होगा,इसीलिए हम ने इसे स्लैम नाम दिया है। हां, सभी को एक साथ देखकर लोगों को ‘हैप्पी न्यू ईयर’ का खयाल आएगा। फिल्म के प्रचार के लिए हमें जाना ही है। उसमें रेगुलर सवाल के जवाब देने से बेहतर है कि हम परफॉर्म और एंटरटेन करें। तब तक अगर ’हैप्पी न्यू ईयर’ के गाने आ गए तो उन पर भी परफॉर्म करेंगे। यह ढाई घंटे का एंटरटेनिंग पैकेज होगा।  मैैं, अभिषेक, दीपिका, सोनू, फराह, डिनो और बोमन ईरानी के अलावा कुछ और लोग भी होंगे। जैकी श्राफ को भी निमंत्रित करूंगा।
- क्या आप अच्छे लूजर हैैं? 3
0 मैैं अच्छा लूजर हूं। मैैं खिलाड़ी रहा हूं। खेल में हमेशा जीतते ही नहीं हैैं। खेल बताता है कि आप हार को कैसे स्वीकार करते हैैं। क्रिकेट और फुटबाल में हार जाता था तो टीचर कहते थे, तुम कल जीतोगे। माइकल जार्डन ने कहा था,मैं बार-बार हारता हूं,बार-बार गलत हो जाता हूं,एक टीम के तौर पर इतना हार चुका हूं कि मैंने जीत सीख ली है। लूजर होने के बाद यह सबक मिलता है कि इस एहसास से निकलने के लिए कल अलग तरीके से खेलना होगा। मैैं गुड लूजर हूं। मैँ बैड लूजर नहीं हूं। निजी तौर पर उदास हो जाऊंगा, परेशान रहूंगा, दुख तो पहुंचता ही है। कोई काम करें आप और वह लोगों को पसंद न आए, अच्छी न जाए। हमारा काम इतना तनाव से भरा होता है। सभी कहते हैैं कि यह कला है, लेकिन यह कला लोगों की पसंद-नपसंद पर निर्भर करती है। मेरे खयाल में कला के साथ आर्थिक विचार नहीं जुड़ा होना चाहिए। कविता तो कविता होती है, कोई कविता 250 या 500 रुपए की कैसे हो सकती है? यह कहने में ही घटिया लगता है। लेकिन फिल्मों के साथ अलग मामला है। हम 150-300 करोड़ की फिल्में बना रहे हैैं। हम ऐसी विवश स्थिति में हैैं।
- क्या सफलता और समृद्धि आपके लिए जुड़ी हुई चीजें नहीं हैैं? 3
0 बिल्कुल नहीं। मैैंने बहुत पैसे बनाए हैैं। मैैं सफल भी हूं। अल्लाह का फजल है। मैैं खुशकिस्मत हूं। मैैं आपको इंटरव्यू दे सकता हूं कि मुझे बिजनेस की अच्छी समझ है। जब चल पड़ती है, तब खूब चलती है। वजह और बहाने एक ही जैसी चीजें हैैं। जीतने की वजह लोग बताते हैैं और हारने के बहाने बताते हैैं। और दोनों में से कोई भी सही नहीं होता।
- आप हमेशा यह कहते रहे हैैं कि आपको बिजनेस की ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन स्मार्ट बिजनेसमैन का तमगा आपको ही मिला है? आक्रामक प्रचार का तरीका आपने ही शुरू किया।
0 दो बातें हैैं, मैैं अपनीे बिजनेस टीम के साथ बैठता हूं तो वे कई योजनाएं लेकर आते हैैं। मैैं उन्हें सुनकर कुछ बता देता हूं। कुछ सुझा देता हूं। चल पड़ती है तो क्रेडिट मुझे मिल जाता है। मेरे खयाल में बड़े सिनेमा का एक्सपीरियंस ऐसा होना चाहिए कि सभी खुश हों। वरना लोग टीवी या लैपटॉप पर फिल्में देखने लगेंगे। फिल्म की वह इज्जत हो कि उसे सिनेमाघर में ही देखा जाए। हमारे यहां जिंदगी डिब्बों में होती है। हम लोग अपने परिवारों में सब कुछ डिब्बों और पैकेट्स में बंद कर के रखते हैैं। गहने, जेवर, बच्चों के कपड़े, अपने कपड़े... सब कुछ संजोकर डब्बे में रखते हैैं। अपने पहले लेख, पहली किताब, पहला सब कुछ संजोने की कोशिश करते हैैं। अगर उन्हें डब्बे में न रखें या डब्बे इधर-उधर हो जाएं तो हम डर जाते हैैं। हमें उन सभी चीजों से दिक्कत होती है, जिन्हें हम डब्बाबंद या श्रेणीबद्ध नहीं कर पाते। हम श्रेणीबद्ध या रेफरेंस से जोडक़र सुरक्षित महसूस करते हैैं। मुझे जो तमगे मिले या दिए गए हैैं, उनके बारे में मुझे भी नहीं मालूम। कुछ हो जाता है और लोग समझ नहीं पाते तो तमगे दे देते हैैं। मैैं आज तक नहीं समझ पाया कि मैैं कैसी फिल्में करता हूं। यह लोग मुझे समझा देते हैैं। सभी की इच्छा रहती है कि वे हर चीज समझ लें और समझा दें। मैैं सब कुछ करता हूं और चल भी रहा हूं। इसे समझने की कोशिश में लोग अलग-अलग चीजों को श्रेय देते हैैं। कभी कोई कहता है कि इसकी पीआर टीम बहुत अच्छी है। कभी किसी को लगता है कि मैैं खुद ही कुछ कमाल कर देता हूं। मैैं एक्टर हूं। मुझ इस तरह के तमगे अच्छे लगते हैैं। जब तक लोग समझ नहीं पाएंगे, तब तक लोग तमगे देते रहेंगे। इसकी वजह से मेरे साथ जुड़ा रहस्य बरकरार रहता है। जो लोग बाहर से देखते-समझते हैैं, उनकी धारणा कुछ और होती है। जो लोग आसपास रहते हैैं, वे लोग मुझे थोड़ा-बहुत समझ पाते हैैं। कई पत्रकार पहले से कुछ सोचकर इंटरव्यू करने आते हैैं। मैैं उनके सवालों से समझ जाता हूं और फिर वैसा ही इंटरव्यू दे देता हूं। उन्हें खुश कर देता हूं। मुझे आप बता दें, मैैं वैसा ही इंटरव्यू दे दूंगा। अभी आप लोगों के साथ इंटरव्यू नहीं कर रहा हूं। यह तो बातचीत हो रही है। इसके पहले अनुपम खेर के शो में उनके साथ बातचीत कर रहा था। कई बार लोग कुछ निकालने की कोशिश में अजीब से सवाल पूछते हैैं तो मैैं स्मार्ट सा जवाब देकर उन्हें खुश कर देता हूं। अब कोई पूछे कि मैैं सुबह उठकर क्या बनना चाहूंगा तो उसे क्या जवाब दिया जा सकता है। फिर भी मैैं कुछ चटपटा-सा जवाब देता हूं।
- अभी आपकी उम्र के सारे हीरो सोलो हीरो की फिल्में कर रहे हैैं। ऐसे दौर में ‘हैप्पी न्यू ईयर’ जैसी फिल्म लेकर आना कुछ नया है? ऐसा एंसेबल कास्ट जमा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
0 इस फिल्म में न केवल सारे कलाकारों को प्रमुख भूमिका मिली है। पोस्टर पर भी हम सभी साथ नजर आएंगे। सच कहूं तो अपने प्रोडक्शन में अभी तक मैैंने खुद के लिए कोई फिल्म नहीं बनाई। कभी यह नहीं सोचा कि यह मेरी खासियत है और मुझे ऐसी ही फिल्म करनी चाहिए। अभी मैैंने खुद के लिए फिल्में बनाना शुरू ही नहीं किया है। अभी मैैं ऐसी फिल्में चुनता हूं, जिनमें कुछ अलग-अलग कर सकूं। वही फिल्म करता हूं, जिन्हें करते हुए मजा आता है। वैसे लोगों के साथ करता हूं, जिनके साथ काम करना अच्छा लगता है। फराह यह फिल्म सुनाते समय आशंकित थीं कि तुम यह फिल्म क्यों करोगे? ऐसी फिल्म का हिस्सा क्यों बनोगे, जिसमें सभी के रोल बराबर हों। इस फिल्म में एक भी कैरेक्टर ऐसा नहीं है, जिसका रोल एक-दूसरे से कम या ज्यादा हो। सबका कमोबेश बराबर ही है।  इस फिल्म का कोई हीरो है ही नहीं। रोमांटिक एंगल होने की वजह से कह सकते हैैं कि मैैं हीरो हूं। हीरोइन मुझे मिलती है। यह छह लोगों की कहानी है। मैैंने शुरू में ही कह दिया था कि पोस्टर में कोई अकेला नहीं आएगा, टे्रलर में अकेला नहीं आएगा, बात कोई अकेले नहीं करेगा। हम सभी साथ में बोलेंगे। सभी का रोल समान है। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ छह लूजरों की कहानी है। मैैं अभी कॉमेडी और एक्शन फिल्में नहीं करना चाहता हूं। क्वाइट और इंक्लूसिव फिल्म करना चाहता हूं।
-अभी सब कुछ बड़े स्केल पर होने लगा है?
0 शेखर कपूर ने कहा था कि फिल्में बहुत बड़ी हो जाएंगी। अभी सब कुछ कमर्शियल और बड़ा हो गया है। मौत कमर्शियल हो गई है। एमएच 17 की एक पूरी डॉक्यूमेंट्री है। लोग इसे देख रहे हैैं। समाचार देख लो, कैसे म्यूजिक, एंकर और प्रेजेंटेशन से बेचा जा रहा है। इलेक्शन बेचा गया। लोग बॉलीवुड पर इल्जाम लगाते हैैं कि हम लोग सब कुछ बेचते हैैं। बाहर पूरे समाज में भी तो यही बिक्री चालू है। मैैं इसे गलत नहीं मानता हूं। ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ के समय भी मैैंने इसे गलत नहीं कहा। एक दर्शक आईपीएल और इलेक्शन कैंपेन एक ही रुचि के साथ देख सकता है। वह एंटरटेन हो रहा है। सब कुछ एंटरटेनमेंट हो गया है। तब हमने कहा था कि मौत भी बिकेगी और कोई शीतल पेय उसका स्पांसर होगा। हम इस कमर्शियललाइजेशन के बहुत करीब पहुंच गए हैैं। ट्रेजडी बिक रही है। इंवेंशन ऑफ लाइज एक फिल्म आई थी, उसमें लोग झूठ नहीं बोलते हैैं और जब झूठ बोलने लगते हैैं तो वे ईश्वर भी बना लेते हैैं। कमर्शियल सिनेमा में अब यह सब चीजें भी आएंगी। मेरा यही कहना है कि यह सारी चीजें लाएं, लेकिन उसे खुशी और कॉमर्स से भर दें।
- आप पर हमेशा आरोप रहता है कि आप एक जैसी ही फिल्में करते हैैं?
0 कहां एक जैसी फिल्में करता हंू। मेरी पिछले 10 साल की फिल्में देख लें, कितनी भिन्नता है। मैैं एक एक्टर हूं, आपको हंसा भी सकता हूं और रूला भी सकता हूं। मैैं कभी भी फैशन और चलन के मुताबिक फिल्में नहीं करता। मैैं सुबह 9 बजे से अगले दिन सुबह छह बजे तक काम करता रहता हूं। मुझे मजा आता है। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में छह लोगों को साथ में लेकर चलना फराह के लिए बहुत मुश्किल कम रहा है। हर फ्रेम में सबको साथ रखना, उनके खड़े होने और बैठने की पोजिशन तय करना, उसके हिसाब से सेट बनाना, यह सब कुछ मुश्किल रहा।
- मुझे याद है कभी आपकी दिली इच्छा थी कि आप आइकॉन बनें। अब तो आप आइकॉन होने के साथ सफल ब्रांड भी हैैं। यहां से आगे कहां जाना है? कभी अमरता के लिए कुछ करने का खयाल आता है? आपको लोग याद रखें?
0 और बड़ा आइकॉन बनाना चाहूंगा। याद रखने के लिए मैैं कोई काम नहीं करता। कोई भी नहीं करता। मैैं उदाहरण देता हूं, प्यासा अभी देश की सबसे अच्छी फिल्म मानी जाती है। जब यह फिल्म रिलीज हुई थी, तब किसी ने इसे पानी नहीं दिया था। बनी होगी, तब न जाने लोगों ने क्या-क्या कहा होगा। दत्त साहब को कितनी बातें सुनाई होंगी। कह नहीं सकते, आज की असफल फिल्म 50 साल के बाद बड़ी फिल्म साबित हो सकती है। हो सकता है कि ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ की अलग व्याख्या हो। हो सकता है कि मेरा बेटा मेरे ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘चक दे’, ‘अशोका’, ‘देवदास’ आदि की तारीफ करे और कोई उसे समझाए कि यह सब तो ठीक है,लेकिन ‘गुड्डू’ तेरे पापा की सबसे अछी फिल्म है। जो लोग भविष्य के बारे में सोचकर काम करते हैैं, वे अंधेरे में तीर चलाते हैैं। भविष्य का किसी को ज्ञान ही नहीं है। अगर हमें पांच साल बाद की चीजों का इल्हाम हो गया रहता, तब न जाने हम कहां से कहां पहुंच जाते। वैज्ञानिकों को भी नहीं मालूम होता है। हमें वर्तमान और इस पल के लिए काम करना चाहिए। फिल्मों की मेरी एक जानकारी हो गई है। फिर भी कोई नई चीज आती है तो मैैं नहीं कतराता। मैैं रीमेक और पुरानी चीजें करने से दूर रहता हूं।
- ‘देवदास’ और ‘डॉन’ के बारे में क्या कहेंगे?
0 मैैं उन्हें रीमेक नहीं कहता। मेरे खयाल से वे क्लासिक फिल्मों का रिइंट्रोडक्शन हैैं। इन फिल्मों को देखकर हम बड़े हुए हैैं। नई पीढ़ी ‘डॉन’ के बारे में नहीं जानती। अमित जी को देखकर हम पागल हो जाते थे। 11 मुल्कों की पुलिस उनके पीछे पड़ी रहती थी। उनके बारे में तो बताया जाना चाहिए। फराह कहती है कि हमारी फिल्म न भी देंखे, कम से कम इसी बहाने पुरानी फिल्में तो देखें। सच कहूं तो मैैं दिलीप कुमार के ‘देवदास’ के बारे में ज्यादा नहीं जानता था। मेरी मम्मी हमेशा उसकी तारीफ करती थीं। संजय लीला भंसाली ने कहा तो मैैंने स्वीकार कर लिया और कहा कि चलो बनाते हैैं। मेरा दिल कल के बारे में सोचकर नहीं धडक़ता। मेरा दिल आज के लिए धडक़ता है। मैैं सबसे यही कहता हूं कि आप जिस वक्त पर जहां हैैं, आपकी दुनिया वही हैैं। अभी हम लोग बातचीत कर रहे हैैं, इस पल के बाहर दुनिया में क्या हो रहा है, हमें कुछ नहीं मालूम। हम जहां नहीं हैैं,वहां की चीजों से हम वाकिफ नहीं हैैं। हो सकता है कि 30 सेकंड के बाद एक सुनामी आए। मैैं तो समुद्र के किनारे रहता हूं। हमें 30 सेकंड का फ्यूचर नहीं मालूम,आप आगे की बात पूछ रहे हैैं। हम लोग यहां बातें कर रहे हैैं और बाहर कोई इंटरनेशनल लीडर मारा जाए या जैसे जहाज में 400 लोग जा रहे थे और जहाज अचानक विस्फोट कर गया। उस विस्फोट के समय न जाने कौन क्या कर रहा होगा? किसी को पता ही नहीं चला होगा कि क्या हो गया। मैैं बहुत स्पष्ट हूं। 20 साल के बाद मुझे किसी ने याद रखा या नहीं रखा, इसकी मुझे परवाह नहीं है। लोग अभी तो मुझे याद रख रहे हैैं। मेरा होना उनके लिए मानीखेज है। अपने बेटे के लिए मैैं जरूरी हूं। अपनी फिल्मों के लिए जरूरी हूं। दर्शकों और दोस्तों के लिए जरूरी हूं। हूं कि नहीं, यह देखना चाहिए।
- अभी ऐसी क्या तीन चीजें हैैं, जो आपको चिंतित करती हैैं? 3
0 पहला,मेरे बच्चे सेहतमंद रहें। उनको जुकाम वगैरह भी हो जाता है, तो मैैं घबरा जाता हूं। बेटी को अभी दिल्ली में बुखार लग गया था, मुझे मालूम है कि ठीक हो जाएगा, लेकिन मैैं घबरा गया था। दूसरा, अपने होने का लाभ उठाते हुए ऐसा काम कर जाना जो लोगों को आनंदित कर सके। वह आज का खास काम हो। तीारा, दूसरों की खुशी, सफलता और काम देखकर परेशान न हों। आप खुश रहो, मैैं भी खुश हूं अपनी जगह। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों की जिंदगी के बारे में सोच सके। मैैं सिनिकल नहीं हो रहा हूं। अपना खयाल रखो, अपनी लाइफ लीड करो, दूसरों का भी ठीक-ठाक हो ही जाएगा। मैैंने खुद तो एक आवरण में लपेट लिया है। मैैं सभी चीजों से अप्रभावित रहता हूं। अपने बारे में ही मैैंने इतनी चीजें सुन ली हैैं कि घोर निराशा में जा सकता हूं। बेहतर है मैैं उस पर मजाक करूं। अन्यथा मैैं पागल हो जाऊंगा।
-आप प्रेस कांफ्रेस और पब्लिक इंटरैक्शन में हंसी-मजाक के मूड में रहते हैं?
0 ज्यादातर समय मुझ से वैसे ही सवाल पूछे जाते हैैं, जिनके जवाब पूछने वालों के पास पहले से रहते हैैं। लोगों को लगता है कि उन्हें मेरे बारे में सब कुछ मालूम है, वे कोई ऐसा सवाल नहीं करते हैैं कि जिससे कोई नई बात पता चले। अभी दुबई में एक महिला मिलीं। उन्होंने पूछा कि आप अनुपम खेर के शो में इतने दुखी क्यों थे। मैैंने उन्हें बताया कि आंखों की लेसिक करवाई है, इसलिए ऐसा लग रहा होगा। उसमें आंखें थक जाती हैैं। महिला नहीं मानीं। उन्होंने कहा कि आप थके हुए थे, आप उदास थे। मैैं 20 साल से आप की आंखें देख रही हूं, ऐसी उदासी नहीं देखी। फिर मैैंने उनसे कहा कि आप सच कह रही हैैं। मैैं बहुत दुखी था उस दिन। अब खुश हो। वह मेरा मजाक नहीं समझ पाईं। उन्होंने खुश होकर कहा, मैैं कह रही थी कि आप उदास थे। यही वजह है कि मैैं अपनी किताब लिख रहा हूं। मैैं जो बताना चाहता हूं, उसके बारे में कोई पूछता ही नहीं है। मैैंने सोचा कि मैैं खुद ही लिख देता हूं। इन दिनों अपने एहसास लिखा करता हूं। प्रेस कांफ्रेंस वगरैह में तो मजाक ही चलते रहते हैैं। वहां तो वही दो सवाल सलमान पर होते हैैं, दो फिल्मों के बारे में और ढाई किसी नई घटना के बारे में। अब आप कितना मजाक उड़ाएं। उनकी भी मजबूरी है, वे हेडलाइन के इंतजार में रहते हैैं। मेरा पूरा यकीन है कि 20 सालों से अगर कोई किसी फील्ड में काम कर रहा है, तो उससे ऐसी कई बातें पूछी जा सकती है, जो दूसरों के काम आएं। सचिन से आप कोई सवाल कर सकते हैैं, जिससे क्रिकेट और जिंदगी के बारे में कुछ नई बातें पता चले।
- आपके विज्ञापनों को देखकर लगता है कि उनमें फिल्मों से आपकी अर्जित छवि का ही विस्तार हो रहा है? दूसरे सितारों से अलग आपके विज्ञापनों में घरेलू और फैमिली अप्रोच दिखता है? यह संयोग है या किसी योजना के तहत आप ऐसा करते हैैं?
0 मैैं जब एड फिल्म वालों के साथ बैठता हूं तो वे अजीब-अजीब एक्सपलानेशन देते हैैं। मैैं उनसे कभी कोई सवाल नहीं करता। वे जो भी कहते हैैं, मैैं सुन लेता हूं। मैैं यह नहीं समझाता कि मैैं क्या हूं। वे बताते हैैं कि हमारा जो ब्रांड है। वह फलां वैल्यू के लिए स्टैैंड करता है। भले ही वे बनियान का विज्ञापन लेकर आए हों, लेकिन वे फैमिली की बात करेंगे। मुझे भी पता नहीं चलता कि यह सब कैसे होता है। वे बताते हैैं कि आप घर की आलमारी खोलेंगे तो यह लगेगा कि यह हमारे घर की शान है। उसमें प्यार है। वे प्रोडक्ट का मानवीकरण कर देते हैैं। फिर उसे मेरे ऊपर थोप देते हैैं। मैैं उनकी बात मान लेता हूं। कहेंगे कि यह ड्रिंक बबली, रिफरेसिंग और हैप्पी है आपकी तरह। मैैं भी मान लेता हूं। मैैं बबली हूं, रिफरेसिंग हूं, हैप्पी हूं। वे मुझे हमेशा यही कहते हैैं कि हमारे प्रोडक्ट के लिए आप फिट ब्रांड हो। मैैंने तमाम अलग-अलग ब्रांड किए हैैं। गजब बात है कि मैैं सब में फिट हो जाता हूं। पहले मैैं उनके क्रिएटिव में थोड़ा-बहुत बदलाव करता था। अब समझदार हो गया हूं। मैैंने समझ लिया है कि विज्ञापन बनाने वालों की जानकारी मुझसे ज्यादा है। फिल्म बनाते समय अगर मुझे कोई कहेगा तो मैैं मना कर दूंगा। वह मेरा मैदान है। अब तो मैैं उनसे जाकर पूछता हूं कि बताओ आपको क्या चाहिए। मैैं वही कर देता हूं। मैैं उनसे कभी सवाल नहीं करता। मेरे ज्यादातर प्रोडक्ट मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास के हैैं। मैैं बहुत महंगी चीजों का विज्ञापन नहीं करता। मैैं टैग की घड़ी पहनता हूं। यह सस्ती घड़ी है। 80 हजार में आ जाती है। मेरा बेटा भी इसे खरीद सकता है। मेरे पास जब पैसे नहीं होते थे, तब भी मैैंने यही घड़ी खरीदी थी। मैैं उनसे नहीं पूछता कि वे इसे कैसे बेचेंगे। मुझसे यह कोई नहीं पूछता कि मैैं अपनी फिल्म कैसे बेचूंगा।
-क्या फिल्मों के प्रमोशन में सही जानकारी दी जाती है ?
0 अपनी फिल्मों के बारे में मैैं झूठ नहीं बोलता। जब से चीजें मेरे नियंत्रण में आई हैैं, तब से मैैं धोखे में नहीं रखता। कभी ऐसा नहीं किया कि दिखाऊं कुछ और बेचूं कुछ और। मैैं दर्शक को वही बताता हूं, जो फिल्म में होता है। हर ट्रेलर में फिल्म की सही जानकारी रहती है। फिल्में टीवी या फ्रिज नहीं हैैं कि पसंद नहीं आने पर आप उन्हें वापस कर सकते हैैं। आपने टिकट ले लिया तो फिल्म देखनी ही है। मैैं यही चाहता हूं कि दर्शक 700 रुपए खर्च करने के बाद यह न कहे कि शाहरुख ने बताया तो कुछ और था, दिखा कुछ और रहा है।
-अभी आप सेहतमंद हैं। कोई चोट वगैरह तो नहीं है ?
0 अब मैं चोट देने के लिए तैयार हूं।



Sunday, November 10, 2013

फराह खान का रोचक इंटरव्‍यू

 फराह खान का यह इंटरव्‍यू http://thebigindianpicture.com से चवन्‍नी के पाठकों के लिए। इस जगह और भी केहतरीन इंटरव्‍यू हैं। कभी समय निकाल कर देखें,सुनें और पढ़ें।



Friday, August 24, 2012

फिल्‍म समीक्षा :शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
संजय लीला भंसाली की बड़ी बहन बेला भंसाली सहगल की पहली फिल्म है शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी। बेला काफी अर्से से फिल्म बनाना चाहती थी और वे पहले भी असफल कोशिशें कर चुकी हैं। एक समय अदनान सामी के साथ तो उनकी फिल्म लगभग फ्लोर पर जाने वाली थी। बहरहाल, भाई संजय लीला भंसाली ने बहन की ख्वाहिश पूरी कर दी। बेला भंसाली सहगल ने अपने भाई से बिल्कुल अलग किस्म की फिल्म निर्देशित की है। वैसे इसे संजय लीला भंसाली ने ही लिखा है। शिरीन फरहाद.. की प्रेमकहानी मशहूर शिरीं-फरहाद की प्रेमकहानी से अलग और आज के पारसी समुदाय की है।
शिरीन फरहाद.. पारसी समुदाय के दो कुंवारे प्रौढ़ों की कहानी है। फरहाद की उम्र 45 की हो चुकी है। सीधे-सादे और नेक फरहाद के जीवन में अभी तक किसी लड़की का आगमन नहीं हुआ है। मां की प्रबल इच्छा है कि उसके बेटे को एक लायक बीवी मिल जाए। बार-बार संभावित बीवियों से रिजेक्ट किए जाने के कारण फरहाद अब शादी के नाम से ही बिदक जाता है। उधर शिरीन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण शादी के बारे में सोच भी नहीं सकी है। दोनों किरदारों के घरों में कैमरे के आने के साथ हम पारसी समुदाय की जीवनशैली, सोच और आचार-व्यवहार से भी परिचित होते हैं। हिंदी फिल्मों ने तो इन्हें ज्यादातर मजाकिया अंदाज में ही छोटे किरदारों में पेश किया है।
शिरीन फरहाद.. का पूरा परिवेश पारसी है। बेला भंसाली सहगल ने बड़ी खूबसूरती के साथ उसे रचा है। हास्य पैदा करने के उद्देश्य से उन्होंने पारसी समुदाय के हंसी-मजाक, बैठकें और सामुदायिकमेल-जोल की जो तस्वीर पेश की है, वह पारसी समुदाय की सही तस्वीर नहीं लगती। सामुदायिक मेल-जोल में उनकी मार-पीट और उठा-पटक के दृश्य नाटकीय और नकली हो गए हैं। हां, उन्होंने शिरीन और फरहाद को गढ़ने में नाटकीयता का कम उपयोग किया है।
एक जमाने में जैसे परेश रावल गुजराती किरदारों के लिए तयशुदा कलाकार थे। वैसे ही इन दिनों पारसी किरदार के लिए बमन ईरानी पहली पसंद बन गए हैं। पिछले दो-तीन सालों में हमने अनेक पारसी किरदारों में उन्हें देखा है। शिरीन फरहाद.. में बेला ने उन्हें रोमैंटिक और संवेदनशील प्रौढ़ की भूमिका दी है। मां और शिरीन के बीच फंसे फरहाद के द्वंद्व को बमन ईरानी ने समुचित ढंग से व्यक्त किया है। लहजा, शैली और बात-व्यवहार में वे बिल्कुल पारसी लगते हैं। इसके विपरीत शिरीन की भूमिका में फराह खान दिखने में तो पारसी लगती हैं, लेकिन जैसे ही मुंह खोलती हैं, तो उनका लहजा उनकी पोल खोल देता है। फराह खान और बेला भंसाली सहगल ने शिरीन के लहजे पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। इस एक कमी से फराह खान की ईमानदारी और सादगी खटाई में पड़ जाती है। फिल्म में नाचते-गाते समय वह बहुत स्वाभाविक लगती हैं। खासकर, स्वयं नृत्य निर्देशक होने की वजह से उनके डांसिंग स्टेप्स लय में दिखते हैं। बमन ईरानी ने भी डांस करते समय उनसे तालमेल बिठाने की पूरी कोशिश की है। अन्य किरदारों में फरहाद की मां बनी डेजी ईरानी और दादी शम्मी आंटी स्वाभाविक और प्रिय लगते हैं।
बेला भंसाली सहगल ने प्रौढ़ प्रेमियों के प्रेम, मिलन और विछोह को उनकी उम्र के मुताबिक शालीन और रोचक ढंग से पेश किया है। शिरीन और फरहाद की मां की मुलाकात का पहला दृश्य काफी मजेदार है। शिरीन फरहाद.. में सारे महिला किरदार स्ट्रांग और स्वतंत्र हैं। ऐसा लगता है कि पारसी समुदाय में परिवार और समुदाय का नियंत्रण महिलाओं के हाथ में ही रहता है। यों यह संयोग भी हो सकता है कि इस फिल्म में पुरुष किरदार नहीं आ पाए हों। बेला भंसाली सहगल ने मार्मिक विषय चुना है, लेकिन उसे पेश करने में वह मार्मिकता कहीं खो गई है। हम शिरीन फरहाद.. की तकलीफ देखते भर हैं। उसे महसूस नहीं कर पाते। फिल्म में गीत-संगीत का अधिक योगदान नहीं है। सारे गाने जबरदस्ती ठूंसे गए हैं, इसलिए अनावश्यक और लंबे लगते हैं। 
संरचना और प्रस्तुति की अंतर्निहित कमियों के बावजूद हमें बेला भंसाली सहगल के इस प्रयास की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने लोकप्रिय हो रहे अर्थहीन और कथ्यहीन सिनेमा के इस दौर में एक खास समुदाय के प्रौढ़ों की समस्या पर संवेदनशील फिल्म निर्देशित की है। चूंकि रोमांटिक कामेडी में फूहड़ता शिल्पगत विशेषता के तौर पर घुस गई है,इसलिए संभव है कि उन पर बाजार और समकालीन सफल फिल्मों का दबाव रहा हो। बमन ईरानी और फराह खान को लीड भूमिकाओं के लिए चुनना ही क्रिएटिव हिम्मत है।
अवधि- 112 मिनट
*** तीन स्टार

Tuesday, February 14, 2012

जुड़े गांठ पड़ जाए

जुड़े गांठ पड़ जाए-अजय ब्रह्मात्‍मज

अभी पिछले दिनों शिरीष कुंदर ने ट्विट किया है कि झगड़े के बाद हुई सुलह से कुछ रिश्ते ज्यादा मजबूत हो जाते हैं, लेकिन मानव स्वभाव शब्दों के संविधान से निर्देशित नहीं होता। रहीम ने सदियों पहले कहा है, रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाये, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये..। यह गांठ और खलिस शिरीष कुदर, फराह खान और मुमकिन है कि शाहरुख खान के मन में भी बनी रहे। शाहरुख और फराह की दोस्ती बहुत पुरानी है। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के सेट पर सरोज खान से अनबन होने पर शाहरुख ने फराह को अपने गाने की कोरियोग्राफी के लिए बुलाया था। दिन पलटे। फराह सफल कोरियोग्राफर हो गईं। फिर शाहरुख ने ही उनकी बढ़ती ख्वाहिशों को पर दिए और मैं हूं ना डायरेक्ट करने का मौका दिया। शाहरुख के प्रोडक्शन को पहली बार फायदा हुआ, लेकिन उससे बड़ा फायदा फराह का हुआ। सफल निर्देशक के तौर पर उन्होंने दस्तक दी और शाहरुख के प्रोडक्शन की अगली फिल्म ओम शांति ओम से उनकी योग्यता मुहर लग गई। इसी बीच शिरीष का फराह के जीवन में प्रवेश हुआ। दोनों का विवाह हुआ और इसके गवाह रहे साजिद खान, साजिद नाडियाडवाला और शाहरुख।

शादी के बाद शिरीष ने संबंधों के उस स्पेस में अपने लिए जगह बनाई जो तब तक मुख्य रूप से शाहरुख के अधीन था। देखा गया है कि प्रेम या शादी के बाद सबसे पहले किसी नजदीकी दोस्त से रिश्ता दरकता है। शाहरुख और फराह का रिश्ता पहले सा नहीं रहा। फिल्म निर्माण-निर्देशन से जुड़े शिरीष की ख्वाहिशों ने करवट ली। शाहरुख ने इस बार उसे तरजीह नहीं दी। नतीजा इस रूप में सामने आया कि फराह ने अपने पति की इच्छाओं के लिए नई दोस्ती कर ली। गलतफहमी गाढ़ी हुई और फिर प्रेम का धागा चटक गया। फराह और शाहरुख ने मर्यादित व्यवहार बनाए रखा, लेकिन खार खाए शिरीष की अम्लीय टिप्पणियां सोशल नेटवर्क पर सामने आने लगीं। हद तब हुई, जब रॉ. वन की रिलीज और दर्शकों के रेस्पॉन्स पर शिरीष ने ट्विट किया, सुना 150 करोड़ का पटाखा फुस्स हो गया..। बॉक्स ऑफिस की मार झेल रहे शाहरुख के लिए टिप्पणी शूल साबित हुई। इमोशन लहूलुहान हुए और संबंधों में कड़वाहट आ गई।

यही कड़वाहट पिछले रविवार-सोमवार की रात हाथपाई के तौर पर सामने आई। शिरीष के व्यवहार और स्वभाव के जानकारों के मुताबिक वह पंगे के लिए उतारू थे। शाहरुख के सब्र का बांध टूटा। वे उत्तेजित हुए और उन्होंने हाथ छोड़ दिया। कहना मुश्किल है कि उस खास क्षण में क्या हुआ होगा, लेकिन जो सामने आया वह भद्दा और शर्मनाक था। मीडिया और इंडस्ट्री ने इस मौके पर संयम से काम नहीं लिया। बात को बतंगड़ और तिल को ताड़ बनाने की हर कोशिश की गई। अगले दिन कहते हैं संजय दत्त और साजिद खान की पहल पर शिरीष और फराह मन्नत गए और उन्होंने शाहरुख को मना लिया। फिलहाल ऊपरी तौर पर सुलह हो गई है और शांति दिख रही है, लेकिन दोस्ताने में पड़ी कलह भविष्य में किसी और रूप में जाहिर हो सकती है। सुहल से सब कुछ सुलझ जाए, तो फराह और शाहरुख की जोड़ी फिर से धमाल कर सकती है। थोड़ी फेर-बदल से उनकी स्थापित फिल्म हैप्पी न्यू ईयर आरंभ हो सकती है। फराह लोकप्रिय सिनेमा के तत्वों को बारीकी से समझती हैं और शाहरुख उन्हें बखूबी पर्दे पर उतारते हैं। करीबी बताते हैं कि शाहरुख के कैंप में शिरीष अच्छी तरह फिट नहीं हो पाए हैं। दोस्ती और दांपत्य दो अलग चीजें हो सकती हैं। दोनों रिश्तों को उनकी जरूरतों के साथ काजोल ने निभाया है। काजोल भी शाहरुख के कैंप की सदस्य हैं, जबकि अजय देवगन की इस कैंप से नहीं छनती। फिर भी कभी कोई अभद्र या अशोभनीय घटना आज तक नहीं सुनाई पड़ी।

उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे लोकप्रिय स्टार भविष्य में ऐसी अप्रिय घटनाओं में शामिल न हों। उन्हें अपने सामाजिक व्यवहार ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आइकॉन हैं। उनसे संयत व्यवहार की उम्मीद की जाती है। आम नागरिक की तरह उनका लड़ना-झगड़ना सही नहीं लगता..।

Sunday, December 12, 2010

क्राइम कलाकार है तीस मीर खां-फराह खान


-अजय ब्रह्मात्मज

इस मुलाकात के दिन जुहू चौपाटी पर ‘तीस मार खां’ का लाइव शो था। सुबह से ही फराह खान शो की तैयारियों की व्यस्तता में भूल गईं कि उन्हें एक इंटरव्यू भी देना है। बहरहाल याद दिलाने पर वह वापस घर लौटीं और अगले गंतव्य की यात्रा में गाड़ी में यह बातचीत की। फिल्म की रिलीज के पहले की आपाधापी में शिकायत की गुंजाइश नहीं थी। लिहाजा सीधी बातचीत ...
- बीस दिन और बचे हैं। कैसी तैयारी या घबराहट है?
0 आज से पेट में गुदगुदी महसूस होने लगी है। कल तक एक्साइटमेंट 70 परसेंट और घबराहट 30 परसेंट थी। आज घबराहट 40 परसेंट हो गई है। मुझे लगता है कि रिलीज होते-होते मैं अपने सारे नाखून कुतर डालूंगी। हमने एक बड़ा कदम उठाया है। यह हमारी कंपनी की पहली फिल्म है। ऐसे में घबराहट तो बढ़ती ही है। व्यस्तता भी बढ़ गई है। आप देख रहे हो कि अपने तीनों बच्चों को लेकर मैं डबिंग चेक करने जा रही हूं। सुबह स्पेशल इफेक्ट चेक किया। फिर मछली लेकर आई। अभी बच्चों को उनकी दादी के पास छोडूंगी। डबिंग चेक करूंगी। फिर लौटते समय बच्चों को साथ घर ले जाऊंगी। उनके साथ दो घंटे बिताने के बाद जुहू चौपाटी के लाइव शो के लिए निकलूंगी। इस व्यस्तता में भूल गई कि आपसे बातचीत भी करनी थी।
- आप एक व्यस्त मां हैं। अपने बच्चों की देखभाल कैसे करती हैं?
0 ‘तीस मार खां’ मेरी नई संतान है। अभी उसी को ज्यादा समय देना पड़ता है। किसी बच्चे की तरह ही रिलीज के पहले फिल्म को प्यार, देखभाल और सेक्यूरिटी देनी पड़ती है। अभी क्रिएटिव संतान और बायलॉजिकल संतानों के बीच संतुलन बिठाना पड़ रहा है।
- आप की पिछली दोनों फिल्म सफल रहीं। कोई भी निर्माता खुशी-खुशी आपकी नई फिल्म का निर्माता बन जाता। फिर अपनी प्रोडक्शन कंपनी की बात क्यों सोची?
0 उसकी तीन वजहें हैं ... जार, दीवा और अन्या। तीनों यहां गाड़ी में आपके आस-पास हैं। इन्हीं तीनों को ध्यान में रख कर अपनी कंपनी का नाम भी हमने थ्रीज कंपनी रखा है। मैं इसे करिअर प्रोमोशन के तौर पर देखती हूं। सफल डायरेक्टर के लिए जरूरी है तो वह खुद ही प्रोड्यूसर बने। प्रोड्यूसर बनने के बाद फिल्म उसकी प्रोपर्टी हो जाती है। हमारे बाद उन पर बच्चों का अधिकार होगा। निर्माता बनना एक प्रकार से अचल संपत्ति खरीदने के समान है। शिरीष और मैंने सोचा कि फिल्ममेकिंग का सारा काम हमलोग खुद ही करते हैं तो किसी और के लिए क्यों काम करें? इस फिल्म के लिए मैंने जितना काम किया है। उससे कुछ ज्यादा ही पहली दोनों फिल्मों के लिए किया था।
- अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म में फराह खान कितनी डिमांडिंग रहती हैं?
0 फिल्म में मैं कोई समझौता नहीं करती। सभी जानते हैं कि मैं बहुत ही इकानॉमिकल टेक्नीशियन हूं। फालतू पैसे खर्च नहीं करवाती हूं। शिरीष बहुत उदार निर्माता हैं। हमने इस फिल्म का एक निश्चित बजट रखा था। फिल्म उसी बजट में बन गई है। किसी दूसरे डायरेक्टर को हायर करने पर शिरीष को आटे-दाल का भाव पता चलेगा। मैं तो घर की डायरेक्टर हूं। वैसे शिरीष ने मुझे ट्रेन और हवाई जहाज भी बना कर दिए। भले ही उसके लिए एक करोड़ से ज्यादा खर्च हो गए। मैं अपनी शूटिंग में किसी प्रकार की रूकावट नहीं चाहती थी। इसलिए खुद ही ट्रेन और हवाई जहाज बनवा लिए। फिल्म में ‘तीस मार खां’ उड़ते हुए हवाई जहाज को बचाता है।
- फिल्म वास्तव में क्या है?
0 बहुत ही इंटरेस्टिंग प्लाट है। यह चालाक तरीके से लिखी गई है। एंटरटेनिंग है। फिल्म में कोई सोशल मैसेज नहीं है। सोशल मैसेज के लिए आप एसएमएस का उपयोग कीजिए या किताब पढि़ए। मेरा मानना है कि फिल्म का प्राथमिक उद्देश्य मनोरंजन करना होता है। मैं तो यही कहूंगी कि फिल्म देखने आओ, एंज्वाय करो और जाओ। कहते हैं ‘तीस मार खां’ बादशाह अकबर के जमाने में हुआ करता था। वास्तव में उसने तीस मक्खी मारे थे और डींग मारी थी कि उसने तीस शेर मारे हैं। उसी की तरह हमारी फिल्म का हीरो भी फेंकूचंद है, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा क्राइम कलाकार है। प्रोमो में आपने सुना होगा कि वह आधा रॉबिनहुड हैं। मुसीबत में पडऩे पर वह हीरोगिरी नहीं करता। वहां से उलटे पांव भाग खड़ा होता है।
- और शीला क्या कर रही हैं?
0 शीला उसकी गर्लफ्रेंड है। वह एक्ट्रेस हैं। उसको कट्रीना कैफ बनना है। उसको ग्लैमरस हीरोइन बनना है।
- माना जा रहा है कि क्रिसमस पर आई फिल्में अवश्य हिट होती हैं?
0 अच्छा हो गया। पहले केवल दीवाली पर रिलीज फिल्में हिट होती थीं। अब क्रिसमस और ईद भी शामिल हो गए हैं। वास्तव में फेस्टिवल के समय सभी मस्ती के मूड में रहते हैं। उस समय कोई एंटरटेनिंग फिल्म रहे तो परिवार के साथ देखने निकलते हैं। उन दिनों बच्चों की छुट्टी रहती है। मुझे पूरा यकीन है कि ‘तीस मार खां’ बच्चों को खूब पसंद आएगी। मेरी फिल्म का विलेन निराला है। वे हिप से जुड़े ट्विन हैं। रोडिज के रघु और राजीव को हमने लिया है। ‘शीला की जवानी’ अभी से हिट हो चुकी है।
-आप के पति शिरीष कुंदर ने कैसा सहयोग दिया?
0 इस फिल्म में शिरीष को आठ क्रेडिट मिल रहे हैं। सबसे पहले तो उन्होंने इतनी अच्छी स्क्रिप्ट लिखी और फिर फिल्म बढऩे के साथ टैलेंट दिखते गए। मैं उनके मल्टी टैलेंट के बारें में समझ गई थी। तभी तो शादी की।
- इन दिनों फिल्म की पैकेजिंग और मार्केटिंग पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। जबकि कोई भी फिल्म कंटेंट और क्वालिटी की वजह से ही दर्शकों के बीच लोकप्रिय होती हैं। आप क्या कहेंगी?
0 निश्चित ही कंटेंट और क्वालिटी ही काम करती है। फिर भी अभी पब्लिसिटी का जमाना है। जैसे आप सुने हुए ब्रांड का ही टूथपेस्ट खरीदते हैं। वैसे ही आपकी बहुत अच्छी फिल्म के बारे में सभी को मालूम होना चाहिए। मैं पब्लिसिटी पर पूरा ध्यान देती हूं। यही वजह है कि तमाम व्यस्तताओं के बीच मीडिया और प्रोमोशन के लिए समय निकालती हूं। हमने चलती ट्रेन में म्यूजिक रिलीज किया। अभी तक उसकी चर्चा ठंडी नहीं हुई है। आज हम लाइव शो कर रहे हैं। जुहू चौपाटी आने वाले लोग फिल्म के कलाकारों को आमने-सामने देख सकेंगे।