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Tuesday, August 3, 2010

बदलता दौर, बदलते नायक -मंजीत ठाकुर

भारत में सिनेमा जब शुरु हुआ, तो फिल्में मूल रुप से पौराणिक आख्यानों पर आधारित हुआ करती थीं। लिहाजा, हमारे नायक भी मूल रुप से हरिश्चंद्र, राम या बिष्णु के किरदारों में आते थे।

पहली बोलती फिल्म आलम आरा’ (1931) के पहले ही हिंदी सिनेमा की अधिकांश परिपाटियाँ तय हो चुकी थीं, लेकिन जब पर्दे पर आवाज़ें सुनाई देने लगीं तो अभिनेताओं के चेहरों और देह-भाषा के साथ अभिनय में गले और स्वर की अहमियत बढ़ गई।

1940 का दशक हिंदी सिनेमा का एक संक्रमण-युग था। वह सहगल, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, जयराज,प्रेम अदीब, किशोर साहू, मोतीलाल, अशोक कुमार सरीखे छोटी-बड़ी प्रतिभाओं वाले नायकों का ज़माना था तो दूसरी ओर दिलीप कुमार, देव आनंद, किशोर कुमार और भारत भूषण जैसे नए लोग दस्तक दे रहे थे।

पारसी और बांग्ला अभिनय की अतिनाटकीय शैलियां बदलते युग और समाज में हास्यास्पद लगने लगीं,उधर बरुआ ने बांग्लादेवदासमें नायक की परिभाषा को बदल दिया।

अचानक सहगल और सोहराब मोदी जैसे स्थापित नायक अभिनय-शैली में बदलाव की वजह से भी पुराने पड़ने लगे। मोतीलाल और अशोक कुमार पुराने और नए अभिनय के बीच की दो अहम कड़ियाँ हैं। इन दोनों में मोतीलाल सहज-स्वाभाविक अभिनय करने में बाज़ी मार ले जाते हैं। लेकिन कलकत्ता में लगातार तीन साल चलने वाली क़िस्मत में प्रतिनायक के किरदार में अशोक कुमार एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे।

आजा़दी के आसपास ही परदे पर देवानंद, राजकपूर और दिलीप कुमार सितारे की तरह उगे। दिलीप कुमारनुमा रोमांस का मतलब था ट्रैजिक रोमांस। दिलीप कुमार, रोमांस हो या भक्ति, मूल रुप से अपनी अदाकारी को केंद्र में रखते थे, और वे ट्रेजिडी किंग के नाम से मशहूर भी हो गए। दिलीप कुमार ने अभिनय की हदें बदल डालीं।


आजादी के बाद के युवाओं में रोमांस का पुट भरा, देवानंद ने। देवानंद कॉलेज के लड़कों में, एडोलेसेंट लेवल पर काफी लोकप्रिय थे। देव आनंद हॉलीवुड के बड़े नायक ग्रेगरी पेक से प्रभावित तो हुए लेकिन पेक की कुछ अदाओं को छोड़कर उन्होंने उनसे अच्छा अभिनय कभी नहीं सीखा जो पेक की रोमन हॉलिडे’, ‘टु किल ए मॉकिंग बर्डया दि गांस ऑफ़ नावारोनेमें दिखाई देता है।

एक मज़ेदार प्लेब्वॉय बनकर ही रह गए देवानंद की लोकप्रियता कई बार दिलीप कुमार और राजकपूर से ज़्यादा साबित हुई। इस तिकड़ी में देव ही ऐसे थे जिनकी नकल करोड़ों दर्शकों ने की, लेकिन उनके किसी समकालीन ने उसकी नकल करने की ज़ुर्रत नहीं की।

राज कपूर, एक अच्छे अभिनेता तो थे ही लेकिन उससे भी बड़े निर्देशक थे। अपनी फिल्मों में अदाकार के तौर पर उन्होंने हमेशा आम आदमी को उभारने की कोशिश की। आर के लक्ष्मण के आम आदमी की तरह के चरित्र उन्होने रुपहले परदे पर साकार करने की कोशिश की।

राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद, ये तीनों एक स्टाइल आइकॉन थे। लेकिन इन तीनों का जादू तब चुकने लगा, जब एक किस्म का रियैलिटी चेक (जांच) जिदंगी में आया।

इस तिकडी़ के शबाब के दिनों में ही बलराज साहनी ने दो बीघा ज़मीन के ज़रिए मार्क्सवादी विचारों को सिनेमाई स्वर दिए। दो बीघा ज़मीन उ ज़माने की पहली फिल्म थी, जिसमें इटालियन नव-यथार्थवादकी झलक तो थी ही, इसका कारोबार भी उम्दा रहा था।

फिल्म में बेदखल सीमांत किसान की भूमिका को बलराज ने जीवंत कर दिया था। बेहद हैंडसमरहे साहनी हिंदी सिनेमा के पहलेअसलीकिसान-मज़दूर के रूप में पहचाने गए। दरअसल, अभिनय के मामले में अपने समकालीनों से बीस ही रहे साहनी, ओम पुरी, नसीर और इरफान के पूर्वज ठहरते हैं।

गुरुदत्त बेहद निजी किस्म की फिल्में बनाते थे। लेकिन उनका दायरा बेहद सार्वजनिक हुआ करता था।

गुरुदत्त ने परदे पर एक अलग तरीके के नायक की रचना की। काग़ज़ के फूल के नायक ने दुनिया के बेगानेपन पर अपनी तल्ख़ टिप्पणी छोड़ी।

इसी दशक में मदर इंडिया भी आई। परदे पर विद्रोह और आदर्शवाद साथ दिखा। भारत माता के रुप में उकेरी गई नरगिस ने अपने ही डकैत बेटे को गोली मारकर आदर्शवाद की नई छवि गढ़ दी। लेकिन दर्शकों का एक ऐसा वर्ग तैयार होना शुरु हो चुका था, जिसकी सहानुभूति डकैत बेटे सुनील दत्त से थी।

उधर अभिनय-शैली के मामले शुरु में एल्विस प्रेस्ली से प्रभावित शम्मी कपूर ने बाद में खुद की जंगलीशैली विकसित की । इसका गहरा असर जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती वगैरह से होता हुआ गोविंदा तक आता है। यह संकोचहीन नाच-गाने का पॉपुलर कल्चर है।

1969 में को शक्ति सामंत की ब्लॉकबस्टर आराधना ने रोमांस के एक नए नायक को जन्म दिया, जो पूछ रहा था, मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू....इस के साथ ही हिंदी सिनेमा में सुपरस्टारडम की शुरुआत हुई। राजेश खन्ना दिलीप कुमार की परंपरा में थे और रोमांटिक किरदारों में नजर आते रहे। किशोर कुमार की आवाज़ गीतों के लिए परदे पर राजेश खन्ना की आवाज़ बन गई, और इसने राजेश खन्ना को एक मैटिनी आइडल बना दिया। परदे पर पेड़ों के इर्द-गिर्द नाच-गाने लोगों को दुनियावी मुश्किलों से कुछ देर के लिए तो दूर कर देते थे लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं जैसी प्रेमकहानियों को देखकर कर कसमसा रहा था।


जाहिर है, सिनेमा का एक बेहद प्रचलित मुहावरा विलिंग सस्पेंसन ऑफ़ डिसविलिफ़ सच होता दिख रहा था।

लेकिन तभी परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद फिल्म जंज़ीर में एक बाग़ी तेवर की धमक दिखी, जिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना। गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी। और उस वक्त जब देश जमाखोरी, कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था, बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया।

विजय नाम का यह नौजवान इंसाफ के लिए लड़ रहा था, और उसे न्याय नहीं मिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता था।

लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया। जंजीर में उसूलों के लिए सब-इंसपेक्टरी छोड़ देने वाला नौजवान देव तक अधेड़ हो जाता है। देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं, और वह समझौतावादी हो जाता है।

90 के दशक की शुरुआत में अमिताभ बच्चन का गुस्सैल नौजवान अप्रासंगिक होता दिखा। 90 के दशक में भारत बदला, नई नीतियां आ गईं और तरक्की की ओर जाने के रास्ते बदल गए, तो बाग़ी तेवरों के लिए दर्शकों के लिए जो अपील थी, वो ख़त्म होने लगी।

रेगुलराइजेशन होने लगा तो नए हिंदुस्तान को दिखाने के लिए सिनेमा में नए चेहरों की ज़रुरत पड़ी। इस मौके को वैश्विक भारतीय बने राज मल्होत्रा यानी शाहरुख ख़ान ने थाम लिया। इनका किरदार नौकरी के लिए कतार में नहीं लगता, उसे भूख की चिंता नहीं है, वह एनआरआई है, और अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक आ जाता है।


आमिर में शाह रुख़ जैसी अपील तो नही है लेकिन वह अदाकारी में शाह रुख़ से कई क़दम आगे हैं। शाह रुख़ तड़क-भड़क में आगे हैं लेकिन अपनी फ़िल्मों में मैथड एक्टिंग के ज़रिए आमिर, शाह रुख़ के जादू पर काबू पा लेते हैं। एक तरह से आमिर मिडिल सिनेमा में मील के पत्थर है तो शाहरुख सुपर सितारे की परंपरा के वाहक।


Wednesday, February 4, 2009

Gr8 Marketing turns Worst Movies into HITs-goutam mishra

चवन्नी ने गौतम मिश्रा से आग्रह किया था की वोह हिन्दी फिल्मों पर मार्केटिंग के नज़रिए से कुछ लिखें। उन्होंने यह प्रासंगिक टिप्पणी भेजी है। इसे चवन्नी अंग्रेज़ी में ही पोस्ट कर रहा है...

Bollywood has produced some great flicks in recent past but at the same time it also witnessed movies which had great music, big stars, much needed action and a bit of comedy so that it attracts all age brackets but one of the most important ingredient for a successful movie – ‘A Good Story’ was completely missing. Here comes the role of marketers who still managed to create a pull and bring viewers to cinemas across country rather I must say globe at large and making it a highly fruitful venture for its producers.

2009
“Chandni Chowk 2 China” (CC2C) the first Warner Brothers’ bollywood venture is the latest example of this practice bollywood producers applied, though it could not turn up as a great hit but still marketers were able to bring people out of their homes for the much awaited and much hyped flick. The movie has cost its producers approximately Rs. 80 crores (including marketing) was complete disaster as country’s top film critics rated it poorly and so viewers did. The marketing efforts put in could only give it good opening. Movie’s cross promotions also helped meet its cost pre-release like CC2C has brand tie-ups with Coca Cola, Jet Airways and others.

2008
Let’s move lil more backward and we can find another movie - the King Khan starrer “Rab Ne Bana Di Jodi” in fact this Yash Chopra camp flick was also made on the lines of CC2C in terms of very good music, Stars (SRK), Comedy and emotions a perfect appetizer for Indian viewers at a whooping cost of Rs. 31 crores. Though this movie is a Hit but its storyline was really very weak as I read in many reviews Dainik Jagran, Times, Rediff etc and also had pathetic experience of watching the movie where a girl flies in the air on her bike and by simply changing his hairstyle SRK could not be recognized by the heroine ha...ha…ha…. But perhaps Khan and marketers were able to turn it into a great venture for producers.

2007
Dating back to year 2007 once again a SRK starrer – Om Shanti Om needs a mention here, the movie was also launch-pad for glamorous Deepika Padukone and yet another Directorial & Choreography venture of Farah Khan. The movie is based on reincarnation of SRK, (Om Prakash Makhija & Om Kapoor) in rebirth he finds his love and kills the killer of his love in previous life. In fact a lot of hype was created in the media prior to release of movie and huge money was spent on promotion and no media vehicle was left alone but it did not earn critics’ accolades at large.

2006
Dhoom 2 is the second installment in the Dhoom series directed by Sanjay Gadhvi (Dhoom 2). It stars Hrithik Roshan, Abhishek Bachchan, Aishwarya Rai, Uday Chopra and Bipasha Basu. The movie was a sequel to the 2004 hit, Dhoom. The film was released on November 24, 2006. The film was also released in Telugu and Tamil (dubbed).The film's score and soundtrack were composed by Pritam and lyrics were penned by Sameer. The film was shot partially in-studio, in India, and also on location in Rio de Janeiro, Brazil and Durban, South Africa. It was the first Bollywood movie to be filmed in Rio de Janeiro. Dhoom 2 received a mixed response from critics. While it was considered an entertaining action blockbuster, critics thrashed it for being excessively action oriented without much character development.

2004
Lets move on lil more backwards (2004) here is yet another example of the above trend - Industry’s so called Super Star/King Khan played lead role in the movie Main Hoon Naa. It was directorial debut of Farah Khan and perhaps that’s why she tried to put in every ingredient/emotion – Patriotism, Action, Love, Drama, and Comedy, to make it a success. In fact her endeavors actually worked and movie was a success at Box Office but could not win Critics’ numbers. SRK (RAM) flies in the air on a rickshaw, Jumps with a rope to save his brother after getting beaten badly stands firm and fights with villain. Marketers were able to pull people at least once to theaters watch all the shit thing, and that all if all movie lovers in India go and watch a movie once it will be a hit.