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Thursday, February 5, 2009

देव डी की पारो पंजाब की है और माही भी

-अजय ब्रह्मात्मज

देवदास की पार्वती देव डी में परमिंदर बन गयी है। वह बंगाल के गांव से निकलकर पंजाब में आ गयी है। पंजाब आने के साथ ही उसमें हरे-भरे और खुशहाल प्रदेश की मस्ती आ गयी है। उसके व्यक्तित्व में ज्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन समय बदल जाने के कारण परमिंदर अब ट्रैक्टर भी चलाने लगी।
संयोग से अभिनय में आ गयी माही ने अब एक्टिंग को ही अपना करियर बना लिया है। देव डी के पहले उन्होंने दो पंजाबी फिल्में कर ली हैं। उनकी ताजा पंजाबी फिल्म चक दे फट्टे अच्छा बिजनेस कर रही है।
एक्टिंग के खयाल से मुंबई पहुंची माही अपने दोस्त दिब्येन्दु भट्टाचार्य के बेटे शौर्य के जन्मदिन की पार्टी में बेपरवाह डांस कर रही थीं? संयोग से उनकी अल्हड़ मस्ती अनुराग कश्यप ने देखी और तत्काल अपनी फिल्म के लिए पसंद कर लिया। उन्हें अपनी पारो मिल गयी थी। माही को एकबारगी यकीन नहीं हुआ। वह कहती हैं, मैं तब तक अनुराग के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। मैंने अपने दोस्तों से जानकारी ली। सभी ने कहा कि यह बेहतरीन लांचिंग है। ना मत कर देना।
माही ने सुचित्रा सेन वाली देवदास पहले देखी थी। दिलीप कुमार की फिल्में उन्हें पसंद हैं, इसलिए देख ली थी? तब कहां पता था कि भविष्य में पारो का रोल निभाना पड़ सकता है। फिल्म शुरू होने के बाद ऐश्वर्या राय की देवदास भी देख ली। माही कहती हैं, अनुराग की फिल्म की पारो उन फिल्मों से अलग है। वे थोड़ी सहमी और माता-पिता के अनुशासन में रहती थीं। यह पारो जिद्दी है। इस सदी की लड़की है पारो। उनकी तरह यह पारो भी अपने देव को प्यार करती है। उसके प्रेम में पैशन है, लेकिन मर-मिटने वाली बात नहीं है। वह खुद को समझा लेती है कि जिंदगी में एक रास्ता बंद हो गया तो दूसरा रास्ता भी है। पहले घबराहट महसूस होती है कि पता नहीं कर पाऊंगी या नहीं कर पाऊंगी? इस फिल्म में पहले दिन ही मैंने लगभग बारह घंटे शूटिंग की। हर तरह के एक्सप्रेशन दिए। अनुराग ने दिन भर कुछ नहीं बोला। बस शूट करते रहे। पैकअप के बाद उन्होंने कहा कि तुमने बहुत अच्छा काम किया। डायरेक्टर के मुंह से ये पांच शब्द सुनकर तसल्ली हुई और कंफीडेंस बढ़ गया। लगा कि अब मैं कर सकती हूं।
डांस और एक्टिंग के शौक के बारे में बात चलने पर माही कहती हैं, मेरी मां को एक पंजाबी फिल्म ऑफर हुई थी। तब वह फिल्मों में नहीं आ सकी थीं। मां की इच्छा थी कि मैं कुछ करूं। मां ने मुझे बचपन से ही डांस की ट्रेनिंग दिलवायी। रही बात एक्टिंग की तो एमए में एडमिशन के वक्त दोस्तों की सलाह पर मैंने अंग्रेजी और सोशियोलॉजी के साथ थिएटर का भी फार्म भर दिया था। संयोग से थिएटर में पहले एडमिशन मिल गया। हफ्ते-दस दिन क्लास भी हो गयी तो मुझे लगा कि यह अच्छी पढ़ाई है। मेरा मन लग गया। चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रही थी तभी फिल्म के ऑफर मिलने लगे थे। मैंने मनमोहन सिंह की पंजाबी फिल्म की थी। उन दिनों ही हवाएं में एक छोटा रोल किया था।
माही अपने प्रोफेसर मोहन महर्षि की कृतज्ञ हैं। उनका नाम आदर के साथ लेते हुए कहती हैं, मोहन महर्षि ने मुझे अहसास कराया कि तू कर सकती है। उन्होंने खूब प्रोत्साहित किया। मेरे दोस्तों ने हमेशा बढ़ावा दिया। फिल्म शुरू होने पर अनुराग ने भरोसा किया और मुझ में विश्वास दिखाया। मैं थोड़ी नर्वस एक्टर हूं, लेकिन कैमरे के सामने ठीक हो जाती हूं।
इस फिल्म के नायक अभय देओल हैं। अभय के साथ ही माही के दृश्य हैं। दोनों ने लंबा वक्त साथ बिताया। अभय के बारे में माही ऊंचे खयाल रखती हैं। वह बेहिचक बताती हैं, जब अनुराग ने अभय को मेरे बारे में बताया और मिलवाया था तो अभय ने तुरंत सहमति दे दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि बाहर से आई लड़कियों की कामयाबी देखकर वे खुश होते हैं। उन्होंने मुझे पूरा समर्थन और सहयोग दिया। अभय अलहदा एक्टर और अच्छे इंसान हैं।
अपने निर्देशक अनुराग कश्यप के बारे में माही हंसते हुए बताती हैं, सच कहूं तो मैं यहां आयी थी तो अपने सर्किल में अनुराग-अनुराग सुना करती थी। मैं तो डायरेक्टर के तौर पर यश चोपड़ा और सुभाष घई को जानती थी। मुझे दिब्येन्दु ने ही उनके बारे में विस्तार से बताया। अपने अनुभव से कह सकती हूं कि वे बिल्कुल बच्चों की तरह रिएक्ट करते हैं। वैसे ही निश्छल हैं। खुश होने पर उसे जाहिर करते हैं। थोड़े मूडी हैं।
पारो का किरदार निभा कर इस कड़ी में आने की बात कहने पर माही झेंपने लगती हैं। अपनी घबराहट और खुशी छिपा नहीं पातीं। वह कहती हैं, वे सब बहुत खूबसूरत हैं। मैं तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं हूं। बस यही एहसास मुझे जोश देता है कि उनके निभाए किरदार को निभाने का मौका मुझे मिला। मैं दर्शकों से यही कहूंगी कि वे मेरी फिल्म के रेफरेंस में ही मुझे देखें।

Sunday, March 9, 2008

...और कितने देवदास


-अजय ब्रह्मात्मज
शरत चंद्र चंट्टोपाध्याय की पुस्तक देवदास 1917 में प्रकाशित हुई थी। उनकी यह रचना भले ही बंगला और विश्व साहित्य की सौ महान कृतियों में स्थान नहीं रखती हो, लेकिन फिल्मों में उसके बार-बार के रूपांतर से ऐसा लगता है कि मूल उपन्यास और उसके किरदारों में ऐसे कुछ लोकप्रिय तत्व हैं, जो आम दर्शकों को रोचक लगते हैं। दर्शकों का यह आकर्षण ही निर्देशकों को देवदास को फिर से प्रस्तुत करने की हिम्मत देता है।
संजय लीला भंसाली ने 2002 में देवदास का निर्देशन किया था। तब लगा था कि भला अब कौन फिर से इस कृति को छूने का जोखिम उठाएगा? हो गया जो होना था।
सन् 2000 के बाद हिंदी सिनेमा और उसके दर्शकों में भारी परिवर्तन आया है। फिल्मों की प्रस्तुति तो बदल ही गई है, अब फिल्मों की देखने की वृति और प्रवृत्ति में भी बदलाव नजर आने लगा है। पिछले आठ सालों में जिस तरह की फिल्में पॉपुलर हो रही हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि दुख, अवसाद और हार की कहानियों पर बनी फिल्मों में दर्शकों को कम आनंद आता है। एक समय था कि ऐसी ट्रेजिक फिल्मों को दर्शक पसंद करते थे और दुख भरे गीत गाकर अपना गुबार निकालते थे। एकाध अपवादों को छोड़ दें तो इधर रोमांस, थ्रिलर और कॉमेडी फिल्में ही ज्यादा पसंद की जा रही हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप का फिर से देवदास पर आधारित फिल्म की बात सोचना सचमुच हिम्मत और युक्ति की बात है।
अनुराग कश्यप कहते हैं,भारतीय समाज में हम सभी आत्ममंथन और निजी दुख से प्यार करते हैं और दूसरों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही कारण है कि देवदास का किरदार और उसका विषय हर पीढ़ी के दर्शकों को पसंद आता है। अनुराग आगे बताते हैं, मेरी फिल्म देवदास से प्रेरित है, लेकिन वह आज की कहानी है, इसलिए उसका नाम देव.डी है। मेरा देव पंजाब का आधुनिक युवक है, जो बेहद समझदार और दुनियादारी से परिचित है। अनुराग की फिल्म में अभय देओल , माही, कल्की और दिब्येंदु भट्टाचार्य मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं।
दूसरी तरफ सुधीर मिश्र अपनी फिल्म देवदास के मूल कथानक को राजनीतिक संदर्भ दे रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक बैंक ड्रॉप में देवदास को गढ़ा है। उनकी फिल्म में मां का किरदार महत्वपूर्ण है, जो अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की थाती देव को सौंपती हैं। एक तरह से मां की मदद के लिए राजनीति में आया देव आखिरकार कैसे राजनीति के पचड़े में फंसता है। यहां नए संबंध बनते हैं, क्योंकि उन संबंधों का राजनीतिक महत्व है। सुधीर मिश्र कहते हैं, मेरी फिल्म की कहानी शरत चंद्र के उपन्यास से अलग है। मैंने अपनी फिल्म में देवदास के स्वभाव को लिया है और उसे आज के संदर्भ में देखने की कोशिश की है।
क्या एक-दूसरे माहौल और समय में भी देवदास वैसे ही रिएक्ट करेगा, जैसे बिमल राय और संजय लीला भंसाली की फिल्मों में करता रहा या शरत चंद्र के उपन्यास में चित्रित हुआ? सुधीर मिश्र की फिल्म में शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह मुख्य भूमिकाओं में हैं।
देवदास उपन्यास के अंत में शरत चंद्र ने लिखा था, यदि कभी देवदास सरीखे अभागे, असंयमी और पापी के साथ आपका परिचय हो जाये तो उसके लिए प्रार्थना करना कि और चाहे जो हो, लेकिन उसकी तरह किसी की मृत्यु न हो। शायद सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप दोनों की ही फिल्मों में देवदास की मृत्यु नहीं होगी या उनकी फिल्म शोकांतिका नहीं होगी। यह भी पहली बार होगा कि देवदास पर आधारित इन फिल्मों के किरदार मूल उपन्यास के किरदारों से बिल्कुल अलग और समकालीन होंगे। दोनों ने अपने लिए यह चुनौती पहले ही खत्म कर दी है कि वे मूल के कितने करीब होते हैं?
फिल्म लेखक कमलेश पांडे दोनों युवा निर्देशकों के प्रयास की सराहना करते है और कहते हैं, यह छूट निर्देशकों को मिलनी चाहिए कि वे किरदार को अपनी जरूरत के सांचे में ढाल सकें। बस इतनी सावधानी रखें कि वे शाहरुख खान की अशोक की तरह अशोक को न बदल दें। आज के हिसाब से समसामयिक और सार्थक परिवर्तन का स्वागत होगा। देवदास में आत्मदया का एक भाव है। मुझे नहीं लगता कि आज की पीढ़ी के दर्शकों को यह भाव पसंद आएगा। गौर करें कि देवदास पतित व्यक्ति नहीं है। वह एक विरोध के तहत शराब को हाथ लगाता है। त्याग और विरोध के ऐसे किरदार की प्रासंगिकता इसी से समझ सकते हैं कि सौ सालों के बाद भी वह हमारी स्मृति में ताजा है। देखना रोचक होगा कि सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप के देवदास को दर्शक कितना पसंद करते हैं?