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Friday, September 21, 2018

फिल्म समीक्षा : मंटो

फिल्म समीक्षा
मंटो
-अजय ब्रह्मात्मज


नंदिता दास की ‘मंटो' 1936-37 के आसपास मुंबई में शुरू होती है. अपने बाप द्वारा सेठों के मनोरंजन के लिए उनके हवाले की गयी बेटी चौपाटी जाते समय गाड़ी में देविका रानी और अशोक कुमार की ‘अछूत कन्या' का मशहूर गीत ‘मैं बन की चिड़िया’ गुनगुना रही है.यह फिल्म का आरंभिक दृश्यबंध है. ‘अछूत कन्या' 1936 में रिलीज हुई थी. 1937 में सआदत हसन मंटो की पहली फिल्म ‘किसान कन्या’ रिलीज हुई थी. मंटो अगले 10 सालों तक मुंबई के दिनों में साहित्यिक रचनाओं के साथ फिल्मों में लेखन करते रहे. उस जमाने के पोपुलर स्टार अशोक कुमार और श्याम उनके खास दोस्त थे. अपने बेबाक नजरिए और लेखन से खास पहचान बना चुके मंटो ने आसान जिंदगी नहीं चुनी. जिंदगी की कड़वी सच्चाइयां उन्हें कड़वाहट से भर देती थीं. वे उन कड़वाहटों को अपने अफसानों में परोस देते थे.इसके लिए उनकी लानत-मलामत की जाती थी. कुछ मुक़दमे भी हुए.
नंदिता दास ने ‘मंटो’ में उनकी जिंदगी की कुछ घटनाओं और कहानियों को मिलाकर एक मोनोग्राफ प्रस्तुत किया है. इस मोनोग्राफ में मंटो की जिंदगी और राइटिंग की झलक मात्र है. इस फिल्म को मंटो के बायोपिक की तरह नहीं लिया जा सकता. मुख्य रूप से मंटो की जिंदगी के आखरी 5 सालों को नंदिता ने इस फिल्म में रखा है. देश के विभाजन की घोषणा के साथ लाखों मुसलमानों ने पाकिस्तान का रुख किया, उनमें से एक मंटो भी थे. फर्क इतना है कि मंटो ने नाउम्मीदी में यह फैसला लिया था. औरों की तरह पाकिस्तान जाने की उनकी वजह मजहबी और उम्मीदों से भरी नहीं थी. उनका भरोसा टूटा था. उन्होंने खुद को बेहद असहाय महसूस किया था. यूं लगता है कि उनके लेखक और फिल्मी दोस्त भी उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाए थे कि वह मुंबई में सुरक्षित रहेंगे. मंटो का पाकिस्तान जाना एक असुरक्षित संवेदनशील लेखक का पलायन था. फिल्म मैं श्याम के साथ के दो दृश्यों में संकेत मिलता है कि उन्होंने अचानक पाकिस्तान जाने का फैसला क्यों लिया?
मंटो - वो हड्डियाँ कहाँ जलाई या दफनाई जाएँगी,जिन पर से मजहब का गोष्ट चीलें नोच-नोच कर खा…
श्याम - भगवन के लिए अपनी ये डायलॉगबजी बंद करो. वो लोग तुम्हारी किसी कहानी के किरदार नहीं हैं.वो मेरे अपने लोग हैं.जीते-जागते असली लोग.
मंटो - पर या तो सब की ज़िन्दगी है श्याम या फिर किसी की भी नहीं.
श्याम - ये सब तुम्हारे लिए कहना-लिखना आसन है.
श्याम - साले मुसलमानों की टोल है…
मंटो - मैं भी तो मुसलमान हूँ श्याम. अगर यहाँ फसाद हो जाये तो मुमकिन है तुम मुझे ही मार डालो.
श्याम - हाँ,मुमकिन है मैं तुम्हें भी मार डालूँगा.
मंटो पाकिस्तान जाने की तयारी करने लगते हैं.श्याम उन्हें रोकते हैं और कहते हैं कि वैसे भी तुम कौन से बड़े मुसलमान हो?
मंटो जवाब देते हैं...इतना तो हूँ कि मारा जा सकू.
फिल्म देखते समय मेरी रूचि और जिज्ञासा यह जानने में थी कि मंटो पाकिस्तान क्यों गए? उनके ज्यादातर फ़िल्मी और अदबी दोस्त मुंबई में ही रहे. इस एक प्रसंग से पता चलता है कि मंटो खुद की सुरक्षा के साथ बीवी और बेटी के लिए भी परेशान हुए होंगे. उत्तेजना और असमंजस की उस घडी में मंटो को मजबूत भरोसा मिल गया होता तो शायद उनके पाकिस्तान जाने की नौबत नहीं आती.संवेदनशील मंटो अपने समाज के अंतर्विरोधों और विसंगतियों को समझने के बावजूद पाकिस्तान जाने का अहम फैसला लेते हैं.याद दिलाने पर भी वे एक रुपये की उधारी नहीं चुकाना चाहते.वे चाहते थे कि वे ज़िन्दगी भर मुंबई शहर का कर्ज़दार रहें.एक तरह से इसी कर्जदारी में उन्होंने ज़िनदगी बिता दि और मौत का आलिंगन किया.बंटवारे को वे कभी स्वीकार नहीं कर सके.इस दर्द के बवजू यह भी सच है कि वे पाकिस्तान गए. मंटो ने इस पर कभी विस्तार से नहीं लिखा और न किसी ने उनसे कभी पूछा.नंदिता उनकी पत्नी से मिल पाई होतीं तो शायद ठोस इशारा मिलता. नंदिता और किसी हवाले से भी इस जिज्ञासा को नहीं छू पातीं.
मंटो प्रासंगिक हैं. यह फिल्म उनके किरदारों के साथ उनकी ज़िन्दगी में उतरती है. नंदिता का यह शिल्प घटनाओं के अभाव को तो भर देता है,लेकी उनकी ज़िन्दगी के भाव को कम कर देता है.हालाँकि यह निर्देशक और लेखक का चुनाव है कि वे फिल्म के लिए क्या चुनें और छोड़ें. ‘मंटो' बतौर फिल्म संतुष्ट नहीं करती यह एक अधूरी कहानी है. नंदिता मंटो के मानस की परतों को उघेड़ने का प्रयास नहीं करतीं. इस मायने में पाकिस्तान में बनी समाद खूसट की फिल्म ‘मंटो' अधिक गहरे उतरती है.
फिल्म का तकनिकी और अभिनय पक्ष सटीक और खूबसूरत है. नंदिता दास की टीम पीरियड और परिवेश को फिल्म के काल के मुताबिक रचती है. मुख्य न्हूमिका में नाज़ज़ुद्दीन सिद्दीकी मंटो की झल्लाहट और उकताहट हो को अपनी चाल-ढाल और बोलचाल में उतारते हैं.वे मंटो की तकलीफ बगैर नाटकीयता के उभरते हैं. बाकि कलाकारों ने बराबर सहयोग दिया है. फिल्म इंडस्ट्री की कुछ बड़ी हस्तियाँ महज फिल्म की शोभा बढाती है. वे कुछ जोडती नहीं हैं.कलाकारों के संवादों में उछारण और अदायगी की अस्पष्टता खलती है.
अवधि - 116 मिनट

***1/2

Tuesday, January 19, 2016

मिसाल है मंटो की जिंदगी - नंदिता दास


अभिनेत्री नंदिता दास ने 2008 में फिराक का निर्देशन किया था। इस साल वह सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित एक बॉयोपिक फिल्म की तैयारी में हैं। उनकी यह फिल्म मंटो के जीवन के उथल-पुथल से भरे उन सात सालों पर केंद्रित है,जब वे भारत से पाकिस्तान गए थे। नंदिता फिलहाल रिसर्च कर रही हैं। वह इस सिलसिले में पाकिस्तान गई थीं और आगे भी जाएंगी।

 - मंटो के सात साल का समय कब से कब तक का है?
0 यह 1945 से लेकर तकरीबन 1952 का समय है। इस समय पर मैैंने ज्यादा काम किया। उनके जीवन का यह समय दिलचस्प है। हमें पता चलता है कि वे कैसी मुश्किलों और अंतर्विरोधों से गुजर रहे थे।

- यही समय क्यों दिलचस्प लगा आप को?
0 वे बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के साथ थे। प्रोग्रेसिव रायटर मूवमेंट का हिस्सा थे। इस बीच हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए थे। उस माहौल का उन पर क्या असर पड़ा? उन्होंने कैसे उस माहौल के अपनी कहानी में ढाला। वे क्यों बॉम्बे छोड़ कर चले गए,जब कि वे बॉम्बे से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि मुझे कोई घर मिला तो वह बम्बई था। यह अलग बात है कि उनका जन्म अमृतसर में हुआ था। वे दिन उनके लिए मुश्किल थे। बम्बई में उन्हें पैसा मिला। काम मिला। इज्जत मिली। वे अच्छी जिंदगी जी रहे थे। वह नहीं जाना चाहते थे। वह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। धीरे-धीरे वे कौन से हालात हुए कि वे चले गए। देखें तो आज भी वही मसले हैैं। उन्होंने बहुत लड़ाई लड़ी। छह बार उन पर केस दर्ज हुआ। आज भी हम उन्हीं सब चीजों का सामना कर रहे हैैं। फिल्मों को काटा जा रहा है। किताबों पर रोक लग रही है।  हम लड़ रहे हैैं। यह सब बेवकूफी हो रही है। मंटो आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक है।
 
-पिछले कुछ सालों में हिंदी में उनकी किताबें आयी हैैं। मुझे नहीं लगता है कि जितना मंटो को पढ़ा गया है,उतना किसी और लेखक को पढा गया होगा?
0 खासकर 2012 में जब उनका जन्मशती समारोह हुआ।  तब बहुत लोगों ने उनके बारे में लिखा। अब युवा वर्ग भी उन्हें बहुत पढ़ रहे हैैं। रिसर्च के दौरान मैैंने देखा कि मुंबई में ऐसे मंटो ग्रुप हैैं,जो उनकी कहानियों पर नाटक करते हैैं। कई उर्दू गु्रप हैैं जो उनकी कहानियां पढ़ते हैैं। पाकिस्तान में तो कई सालों तक मंटो को कैसे देखा जाए इस पर चर्चा हो रही थी। वे मंटो का स्ािान निर्धाििरत नहीं कर पा रहे थे। आखिरकार 2012 में उन्हें अवार्ड दिया गया। उन पर स्टैम्प बनाया गया। एक फिल्म भी बनायी गई।  मंटो पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। मेरी फिल्म में मंटो के बंबई और लाहौर के जीवन को लेना जरूरी है।

-मंटो से आपका परिचय कब हुआ?
0 कॉलेज के दिनों  मेरा उनसे परिचय हुआ था। मेरे पास उनकी दस्तावेज किताब का पूरा कलेक्शन है। दिल्ली में एक ग्रुप ने मंटो की दस्तावेज पर नाटक किया था। मुझे वह बहुत ही अच्छा लगा। उसके बाद मैैंने दस्तावेज का पूरा कलेक्शन ही खरीद लिया। मैैं उसे बीच-बीच में पढ़ती थी। जब मैैं फिल्मों में काम करने लगी तो सोचा कि इस पर फिल्म बनानी चाहिए। शार्ट फिल्म भी बन सकती है। कुछ कारणों की वजह से वह हुआ नहीं। कुछ कहानियां मैंने सोची भी थी। मैैंने फिर फिराक बनायी। मैैं कोई फुल टाइम डायरेक्टर तो हूं नहीं कि निर्देशन के लिए कहानी खोजी। मैैंने मंटो को पढ़ा तो पाया कि उनकी जिंदगी मिसाल है। उनकी कहानियों से भी बढ़कर उनकी असल जिंदगी है।
-जो आपने कहा कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति को भी पत्र लिखे थे।
0 जी,अंकल सैम के नाम ¸ ¸ ¸ वे पत्र आज भी प्रासंगिक है। इस तरह की बहुत सारी चीजें हैैं। मैैंने 2013 के शुरुआत में इस पर गंभीर होकर काम आरंभ किया। काफी चीजें निकलती गई। 2014 के बीच में मैैंने कई चीजें पढ़ी। मैैंने पाया कि कुछ रचनाओं का उर्दू से हिंदी में अनुवाद नहीं किया गया है। मुझे उर्दू पढ़ने नहीं आती है। मुझे लगा कि लिखने के लिए को रायटर लेना चाहिए। मैैंने तब तक काफी काम कर लिया था। मैैंने डोर के लेखक अली को अपने साथ लिया। उमैैंने उनके साथ मंटो का काम पूरा किया। पिछले साल मैैंने न्यूयार्क के एक विश्वविद्यालय से चार महीने का फेलोशिप किया था। मैैं अपने पांच साल के बेटे को ले गई थी। उस दौरान मैैं अली से मिली।
-आप की फिल्म में रचनाओं से निकले मंटो रहेंगे?
0 उन्होंने बहुत सारी चीजें अपने बारे में लिखी हैैं। उनकी एक कहानी है मुरली की धुन। इसमें उन्होंने अपने दोस्त श्याम के बारे में लिखा है। उनके साथ सहायक कहानी है। यह उनके बारे में है। मैैं उनके पूरे परिवार से मिली। उनकी बारीकियों पर काम किया। वे कैसे बैठते थे। अपनी बेटियों के साथ उनका कैसा रिश्ता था। वह अपने बच्चों को कविताएं सुनाते थे। रिश्तों या समाज के बारे में वे माडर्न खयाल थे। मंटो के बारे में लोग उतना जानते नहीं हैैं।

-कास्ट को लेकर क्या सोचा है।
0 मेरी अभी इरफान खान से बातचीत चल रही है। वह अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैैं। जब तक पूरी तरह हां ना कहें तब तक कुछ कहां नहीं जा सकता।

-इरफान तो कई साल पहले से मंटो करना चाहते थे।  उन्हें इसका प्रस्ताव भी मिला था। वह उसकी तैयारी भी कर रहे थे।
0 अच्छा। उनकी जबान में कहूं तो उन्होंने कहा था कि कब्र से निकल कर भी मंटो का किरदार निभाने के लिए तैयार रहेंगे। मैैंने उनको कहां कि आप अभी कर लो। कब्र से निकलने की क्या जरूरत है। मेरी उनसे मुलाकात हुई है। उन्होंने फर्स्ट ड्राफ्ट लिया है।

-उनकी कद-काठी मिलती है?
0 हां, बिल्कुल सही। वह उकडू  बैठकर कर सकते हैैं। हमने मंटो को नहीं सुना है। इरफान की स्टाइल शायद उनसे मेल खाती है। मंटो की जिंदगी नाटकीय थी। इरफान की एक्टिंग उसी तरह है। मैैं उत्साहित हूं।

Tuesday, March 26, 2013

नसीम बानो के साथ होली - मंटो




सआदत हसन मंटो के मीना बाजार से होली का एक प्रसंग। यह प्रसंग परी चेहरा नसीम बानो से लिया गया है। यहां नसीम के बहाने मंटो ने होली का जिक्र किया है। फिल्‍मों पर होली पर लिखते समय हम सभी राज कपूर की आर के स्‍टूडियो से ही आरंभ करते हैं। उम्‍मीद है अगली होली में फिल्मिस्‍तान और एस. मुकर्जी का भी उल्‍लेख होगा।
.......
      यह हंगामा होली का हंगामा था। जिस तरह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक ट्रेडीशनबरखा के आगाज पर मूड पार्टीहै। उसी तरह बम्बे टॉकीज की एक ट्रेडीशन होली की रंग पार्टी थी। चूंकि फिल्मिस्तान के करीब-करीब तमाम कारकुन बाम्बे टॉकीज के महाजिर थे। इसलिए यह ट्रेडीशन यहां भी कायम रही।
      एस. मुकर्जी उस रंग पार्टी के रिंग लीडर थे। औरतों की कमान उनकी मोटी और हंसमुख बीवी (अशोक की बहन) के सिपुर्द थी। मैं शाहिद लतीफ के यहां बैठा था। शाहिद की बीवी इस्मत (चुगताई) और मेरी बीवी (सफिया) दोनों खुदा मालूम क्या बातें कर रही थीं। एकदम शोर बरपा हुआ। इस्मत चिल्लाई। लो सफिया वह आ गये...लेकिन मैं भी...
      इस्मत इस बात पर अड़ गयी कि वह किसी को अपने ऊपर रंग फेंकने नहीं देगी। मुझे डर था कि उसकी यह जिद कहीं दूसरा रंग इख्तियार न कर ले। क्योंकि रंग पार्टी वाले सब होली के मूड  में थे। खुदा का शुक्र है कि इस्मत का मूड खुद बखुद बदल गया और वह चन्द लम्हात ही में रंगों में लत पत भुतनी बन कर दूसरी भुतनियों में शामिल हो गयी। मेरा और शाहिद तलीफ का हुलिया भी वही था, जो होली के दूसरे भुतनों का था।
      पार्टी में जब कुछ और लोग शामिल हुए तो शाहिद लतीफ ने बा आवाज-ए-बुलन्द कहा, ‘चलो परी चेहरा नसीम के घर रुख करो।
      रंगों से मुसल्लह गिरोह घोड़ बन्दर रोड की ऊंची-नीची तारकोल लगी सतह पर बेढंगे बेल-बूटे बनाता और शोर मचाता नसीम के बंगले की तरफ रवाना हुआ। चन्द मिनटों ही में हम सब वहां थे। शोर सुन कर नसीम और एहसान बाहर निकले। नसीम हल्के रंग की जारजट की साड़ी में मलबूस मेकअप की नोक पलक निकाले, जब हुजूम के सामने बरामदे में नमूदार हुई, तो शाहिद ने बिजन का हुक्म दिया। मगर मैंने उसे रोका, ‘ठहरो! पहले इनसे कहा कपड़े बदल आयें।
नसीम से कपड़े तब्दील करने के लिए कहा गया तो वह एक अदा के साथ मुस्कराई, ‘यही ठीक है।
      अभी यह अल्फाज उसके मुंह ही में थे कि होली की पिचकारियां बरस पड़ीं।  चन्द लम्हात ही में परी चेहरा नसीम बानो एक अजीब-ओ-गरीब किस्म की खौफनाक चुड़ैल में तब्दील हो गयी। नीले-पीले रंगों को तहों में से जब उसके सफेद और चमकीले दांत और बड़ी-बड़ी आंखें नजर आतीं तो ऐसा मालूम होता कि बहुजाद और मानी की मुसव्वरी पर किसी बच्चे ने स्याही उड़ेल दी है।
      रंगबाजी खत्म होने पर कबड्डी शुरू हुई। पहले मर्दों का मैच शुरू हुआ फिर औरतों का। यह बहु़त दिलचस्प था। मिस्टर मुकर्जी की फरबा बीवी जब भी गिरती कहकहों का तूफान-बरपा हो जाता। मेरी बीवी ऐनक-पोश थी। शीशे रंग-आलूद होने के बायस उसे बहुत कम नजर आता था। चुनांचे वह अक्सर गलत सिम्त दौडऩे लगती। नसीम से भगा नहीं जाता था या वह यह जाहिर करना चाहती थी कि वह उस मशक्कत की आदी नहीं। बहरहाल वह बराबर खेल में दिलचस्पी लेती रही।

Tuesday, January 15, 2013

बलराज साहनी और मंटो

यह सारगर्भित लेख आदरणीय शेष नारायण सिंह के ब्‍लॉग जंतर मंतर से चवन्‍नी के पाठकों के लिए लिया गया है। उन्‍होंने सहमत के एक कार्यक्रम के अवसर पर इसे लिखा था। आज के कलाकारों और लेखकों के संदर्भी में इसे पढ़ें। 
बलराज साहनी और मंटो का ज़िक्र किये बिना बीसवीं सदी के जनवादी आन्दोलन के बारे में बात पूरी नहीं की जा सकती है .बलराज साहनी ने इस देश को गरम हवा जैसी फिल्म दी .कहते हैं कि एम एस सत्थ्यूके निर्देशन में बनी फिल्म ,गरम हवा में बंटवारे के दौर के असली दर्द को जिस बारीकी से रेखांकित किया गया वह वस्तुवादी कलारूप का ऊंचे दर्जे का उदाहरण है . बलराज साहनी को उनकी फिल्मों के कारण आमतौर पर एक ऐसे कलाकार के रूप में जाना जाता है जिनका फिल्मों के बाहर की दुनिया से बहुत वास्ता नहीं था . लेकिन यह बिलकुल अधूरी सच्चाई है . बलराज साहनी बेशक बहुत बड़े फिल्म अभिनेता थे लेकिन एक बुद्धिजीवी के रूप में भी उनका स्तर बहुत ऊंचा है . बलराज साहनी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पहला कन्वोकेशन भाषण दिया था। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले छात्रों को सीनियर छात्रों की ओर से उस भाषण की साइक्लोस्टाइल कापी दी जाती थी . बलराज साहनी का वह भाषण शिक्षा की दुनिया में संस्कृति के सकारात्मक हस्तक्षेप की मिसाल के रूप में देखा जाता है .

बलराज साहनी की मौत के बाद महान पत्रकार , फिल्मकार और बुद्धिजीवी  ख्वाजा अहमद अब्बास ने उनकी याद में एक मज़मून लिखा था जिसकी कुछ पंक्तियाँ शामिल किये बिना मेरा यह मज़मून अधूरा रह जाएगा। ख्वाजा साहेब ने लिखा था  की बलराज साहनी ने अपनी जिंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू शिकंजे से बचाने के लिए और आम जन के जीवन के साथ उनके मूल, जीवनदायी रिश्ते फिर से कायम करने के लिए समर्पित किए थे।
बहुत से लोग इस पर हैरानी जताते थे कि बलराज साहनी  कितनी सहजता और आसानी से आम जन के बीच से विभिन्न पात्रों को मंच पर या पर्दे पर प्रस्तुत कर गए हैं, चाहे वह धरती के लाल का कंगाल हो गए किसान का बेटा हो या हम लोग का कुंठित तथा गुस्सैल नौजवान; चाहे वह दो बीघा जमीन का हाथ रिक्शा खींचने वाला मजबूर इंसान हो या काबुलीवाला का पठान मेवा बेचनेवाला या फिर इप्टा के नाटक "आखिरी शमा" में मिर्जा गालिब का बौद्धिक  रूपांतरण ही क्यों न हो। बलराज साहनी कोई यथार्थ से कटे हुए बुद्धिजीवी या  कलाकार नहीं थे। आम आदमी से उनका गहरा परिचय स्वतंत्रता के लिए तथा सामाजिक न्याय के लिए जनता के संघर्षों में उनकी हिस्सेदारी से निकला था। उन्होंने जुलूसों में, जनसभाओं में तथा ट्रेड यूनियन गतिविधियों में शामिल होकर और पुलिस की नृशंस लाठियों और गोलियां उगलती बंदूकों का सामना करते हुए यह भागीदारी की थी। गोर्की की तरह अगर जिंदगी उनके लिए एक विशाल विश्वविद्यालय थी, तो जेलों ने जीवन व जनता के इस चिरंतन अध्येता, बलराज साहनी के लिए स्नातकोत्तर प्रशिक्षण का काम किया था।

इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन, जिसे इप्टा के नाम से ही ज्यादा जाना जाता है, का जन्म दूसरे विश्व युद्ध तथा बंगाल के भीषण अकाल के बीच हुआ था और बलराज साहनी इसके पहले कार्यकर्ताओं में से थे। एक अभिनेता की हैसियत से भी और एक निदेशक की हैसियत से भी, उनका इप्टा के खजाने में शानदार योगदान रहा था। सब से बढक़र वह एक संगठनकर्ता थे। किसी भी मुकाम पर इप्टा अपने नाटकों के जरिए जिस भी लक्ष्य के लिए अपना जोर लगा रहा होता था, चाहे वह फासीविरोधी जनयुद्ध हो या नृशंस दंगों की पृष्ठïभूमि में हिंदू-मुस्लिम एकता का सवाल हो, वह चाहे  अफ्रीकी जनगण की मुक्ति हो या फिर साम्राज्यवाद के खिलाफ वियतनाम का युद्ध , बलराज साहनी हमेशा सभी के मन में उस लक्ष्य के प्रति हार्दिकता व गहरी भावना जगाते थे। काबुलीवाल फिल्म में बलराज साहनी ने जिस तरह से ऐ मेरे प्यारे वतन का सीन अभिनीत किया था वह आज भी हर उस आदमी को अपने वतन की याद दिलाता है जो अपने घर से दूर है . हालांकि यह गाना अफगानिस्तान छोड़कर आये एक मेवा बेचने वाले की टीस थी।

मंटो के बारे में  उनके जन्मशती के हवाले से पिछले एक साल से बहुत चर्चा हुई है . इस अवसर पर सहमत ने एक किताब भी प्रकाशित की . जनवादी लेखक और पत्रकार राजेन्द्र शर्मा ने इस किताब का सम्पादान किया है . किताब की भूमिका में उन्होंने मंटो के होने का अर्थ समझाने की  कोशिश की है . वे मंटो को भारतीय और  हिंदी पाठकों के  सामने बहुत ही बेबाक तरीके से प्रस्तुत करते हैं .  राजेन्द्र शर्मा ने लिखा  है  कि 1931 में यानी उन्नीस बरस की उम्र में जलियांवाला बाग त्रासदी पर पहली कहानी ‘तमाशा’ से शुरू करने वाले मंटो ने, मुश्किल से बाईस साल के अपने लेखकीय जीवन में इतना लिखा, गद्य की इतनी विधाओं में लिखा और इतने ऊंचे दर्जे का लिखा कि  मंटो की चमक  सबसे अलग  दिखाई देती है। मुश्किल से बाईस साल में बाईस कहानी संग्रह (बाईस दर्जन से ज्यादा कहानियां), एक उपन्यास, पांच रेडियो नाटक संग्रह, तीन लेख संग्रह, दो निजी खाकों के संकलन इतना सब कोई जुनूनी ही रच सकता था।  मंटो के देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में लाहौर में जा बसने के ‘कारणों’ और ‘संदेशों’ पर तो बहस हो सकती है और यह बहस शायद कभी खत्म भी न हो, पर इसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं है कि यह फैसला, व्यक्ति सआदत हसन को बहुत-बहुत भारी पड़ा। 

मंटो को अपने ‘दूसरे वतन’ बंबई से इतनी मोहब्बत थी कि वह बंबई छूटने के बाद भी खुद को ‘चलता-फिरता बंबई’ कहते थे.उस बंबई में उसने ‘चंद रुपयों से लेकर हजारों और लाखों कमाए और खर्च किए’ थे। दूसरी तरफ लाहौर में डेरा डालने के साढ़े चार बरस बाद भी मंटो को यह लिखना पड़ रहा था कि, ‘‘दिन रात मशक़्क़त के बाद मुश्किल से इतना कमाता हूं जो मेरी रोजमर्रा की जरूरियात के लिए पूरा हो सके। ये तकलीफदेह एहसास हर वक्त मुझे दीमक की तरह चाटता रहता है कि अगर आज मैंने आंखें मींच लीं तो मेरी बीवी और तीन कमसिन बच्चियों की देखभाल कौन करेगा।’’ फिर भी, जो चीज मंटो को खाए जा रही थी, वह न उसे पाकिस्तान में मिला सलूक था और न छूटे हुए पहले और दूसरे ‘वतनों’ की याद। 

मंटो विभाजन की  की विभीषिका को कभी स्वीकार  नहीं कर पाए . विभाजन का मंटो पर क्या और कैसा असर हुआ था, इसे समझने के लिए शायद विभाजन पर मंटो की कहानियां ही सबसे भरोसेमंद गवाह हैं .। फिर भी विभाजन के साढ़े चार साल बाद मंटो का यह लिखना एक महत्वपूर्ण संकेत है कि, ‘‘मुल्क के बंटवारे से जो इंकलाब बरपा हुआ, उससे मैं एक अर्से तक बागी रहा और अब भी हूं।’’ बेशक, उसी टिप्पणी में मंटो यह भी कहते हैं कि, ‘‘लेकिन बाद में उस खौफनाक हकीकत को मैंने तस्लीम कर लिया’’। लेकिन, मंटो का इसे तस्लीम करना, इस खौफनाक हकीकत को स्वीकार करने की जगह, उसे शिव के हालाहल पान की तरह, अपने भीतर उतार लेना ही ज्यादा लगता है। अचरज नहीं कि मंटो ‘‘तस्लीम करने’’ के दावे के फौरन बाद, उसी सांस में अपनी स्याह हाशिए के बहाने से, जो ‘टोबा टेक सिंह’ की ही तरह, विभाजन की त्रासदी का स्तब्धकारी दस्तावेज है, विभाजन की खौफनाक हकीकत के साथ अपने खास मंटोआई सलूक की अनोखी विशिष्टïता की ओर इशारा करता है:
बहरहाल, विभाजन की विभीषिका को देखने का मंटो का यह खास मुकाम, दो परस्पर जुड़े हुए काम और करता है। पहला, यह मंटो को विभाजन, उससे जुड़ी-चरम अमानवीयता और खून-खराबे को एक तिरछे कोण से देखने और इस तरह इस अमानवीयता के भीतर झांककर, सबसे बढक़र उसकी निरर्थकता को देखने और बहुत ही ठंडे तरीके से तथा मारक ढंग से दिखाने का मौका देता है। ‘टोबा टेक सिंह’ से लेकर, जिसे सहज ही भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के सबसे बड़े क्लासिक का दर्जा दिया जा सकता है, ‘खोल दो’ या स्याह हाशिए की पांच-सात वाक्यांशों की कहानी ‘मिस्टेक’ तक, विभाजन से अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी मंटो की अधिकांश रचनाएं, विडंबना और व्यंग्य को अपना मुख्य हथियार यूं ही नहीं बनाती हैं। मंटो सबसे बढक़र इन्हीं हथियारों से विभाजन की सचाई की भयावहता और उसकी सम्पूर्ण निरर्थकता को, एक दूसरे की पृष्ठïभूमि में रखते हैं और इस तरह इसकी भयावहता और निरर्थकता, दोनों को उस तरह रौशन करते हैं, जैसे हिंदी-उर्दू-पंजाबी में दूसरा कोई लेखक नहीं कर पाया है। 
वास्तव में मंटो विभाजन और उसके साथ जुड़ी विभीषिका को, उसकी निरर्थकता तथा भीषणता के अर्थ में ही ‘पागलपन’ के रूपक के जरिए नहीं देखता है बल्कि इस अर्थ में भी पागलपन के रूप में देखते हैं  कि यह पागलपन भी, पागल को इस तरह पूरी तरह नहीं भर सकता है कि वह शुद्ध पागल ही रह जाए और दूसरे किसी भाव की उसके अंदर गुंजाइश ही न बचे। मंटो इस पागलपन को पहचानता है, तो यह भी पहचानता है कि यह पागलपन भी कोई हमेशा बना नहीं रह सकता है। ‘यज़ीद’ इस पागलपन के नशे के धीरे-धीरे टूटने की ही कहानी है। वास्तव में यहां मंटो की सांप्रदायिकता और विभाजन की भी आलोचना, कहीं ज्यादा वास्तविक और मानव-केंद्रित लगती है। 
यह तो निर्विवाद है कि मंटो विभाजन के, हिंदी-उर्दू-पंजाबी के क्षेत्र के सबसे बड़े और सबसे ‘विश्वसनीय गवाह’ हैं। उन्होंने इस त्रासदी को गहरे अर्थों में जिया था और एक अर्थ में अपनी जान से इस गवाही की कीमत चुकायी। हिंदी के लिए, पंजाब से जुड़े या मुस्लिम लेखकों को छोड़ दें तो, विभाजन की यह त्रासदी शायद कभी घटी ही नहीं थी। ऐसा  आबादी की अदला-बदली में हिंदी क्षेत्र में भारी उथल-पुथल होने के बावजूद है। ऐसे में हिंदी के लिए तो विभाजन की त्रासदी का याद दिलाया जाना ही काफी है। फिर भी, मंटो का लेखकीय योगदान, विभाजन की त्रासदी की गवाही तक ही सीमित नहीं है। उल्टे, विभाजन की त्रासदी की उसकी गवाही भी, इंसानियत में और इसीलिए इंसान की बराबरी तथा स्वतंत्रता में, मंटो की गहरी आस्था का ही हिस्सा है।