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Showing posts from November, 2013

आर...राजकुमार के गाने

आर...राजकुमार
1 Gandi Baat Ho.. beedi peeke nukkad pe
Wait tera kiya re
Khali pili attharah cup
Chay bhi to piya re (Repeat once) Raja beta banke maine
Jab sharafat dikhayi
Toone bola hat mavali
Bhaav nahi diya re ABCD padh li bahut
Thandi aaheein bhar li bahut
Achchi baatein kar li bahut
Ab karunga tere saath.. Gandi baat..
Gandi gandi, gandi gandi, gandi baat..(Repeat 3 times) Aise kyun kyun kyun
Karta tu tu tu
Munh pe thu thu thu pyar me
Jab se hu hu hu
Laila ki ki ki
Into to to to pyar me Aise kyun kyun kyun
Karti tu tu tu
Munh pe thu thu thu pyaar mein
Jab se hu hu hu
Majnu ka ka ka
Into to to to pyar mein ABCD padhali bohot
Thandi aahein bhar li bahut
Acchi baatein karli bahut
Ab karungi tere saath Gandi baat…
Gandi gandi gandi gandi gandi baat.. (Repeat 3 times) Gul badan, dan dan dan
Deal done done done..
One to one one one ho gaya.. Mooh se kya kya kya
Bol na na na..
Man to man man man ho gaya.. Dikhne mein thi tu kadak
D…

पटना सिने परिवेश : सैयद एस तौहीद

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सैयद एस तौहीद का यह लेख मुझे बहुत पहले मिल गया था। पोस्‍ट नहीं कर पाया था। पटना शहर के सिने परिवेश पर उन्‍होंने रोचक तरीके से लिखा है। हम सभी को अपने शहरों और कस्‍बों के बारे में लिखना चाहिए। सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा हैं कि हम खुद ही भूल जाएंगे पते,ठौर-ठिाने और किस्‍से...इन सब के साथ भूलेंगी यादें।
पटना सिने वातावरण से गुजरा दौर बडे व्यापक रूप से ओझल होने की कगार पर है।

आधुनिक समय की धारा में गुजरा वक्त अपनी ब्यार खो चुका है। नए समय में सिनेमा का जन-सुलभ वितरण अमीरों के शौक में बदलता जा रहा है। राजधानी के बहुत से सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर परिवर्तन एवं तालाबंदी के दौर से गुजररहे हैं। परिवर्तन की रफ्तार में यह इतिहास ‘आधुनिकता’ व बाजारवाद के लिए जगह बना रहा है । अतीत जो अब भी उस समय की याद लिए नगर में कहीं सिमटा पडा था। आज वह गुजरे वक्त की जुस्तजु को फिर भी हवा देता है । सबसे पहले बुध मार्ग के उजड चुके ‘पर्ल’ का जिक्र करना चाहिए। कहा जाता है कि यह अस्सी के उत्तरार्ध में तालाबंदी के अंधेरे में डूब गया। रेलवे स्टेशन करीब जबरदस्त लोकेशन पर इसे स्थापित किया गया था। संचालन के कुछ ही वर्षों के …

फिल्‍म समीक्षा : बुलेट राजा

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देसी क्राइम थ्रिलर  -अजय ब्रह्मात्‍मज तिग्मांशु धूलिया 'हासिल' से अभी तक अपनी फिल्मों में हिंदी मिजाज के साथ मौजूद हैं। हिंदी महज एक भाषा नहीं है। हिंदी प्रदेशों के नागरिकों के एक जाति (नेशन) है। उनके सोचने-विचारने का तरीका अलग है। उनकी संस्कृति और तहजीब भी थोड़ी भिन्न है। मुंबई में विकसित हिंदी सिनेमा की भाषा ही हिंदी रह गई है। संस्कृति, लोकाचार, बात-व्यवहार, परिवेश और प्रस्तुति में इसने अलग स्वरूप ले लिया है। प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में यह एक हद तक आ पाती है। तिग्मांशु धूलिया ने बदले और प्रतिशोध की अपराध कथा को हिंदी प्रदेश में स्थापित किया है। हालांकि मुंबइया सिनेमा (बॉलीवुड) के दुष्प्रभाव से वे पूरी तरह से बच नहीं सके हैं, लेकिन उनके इस प्रयास की सराहना और प्रशंसा करनी होगी। 'बुलेट राजा' जोनर के लिहाज से 'न्वॉयर' फिल्म है। हम इसे 'पुरबिया न्वॉयर' कह सकते हैं। इन दिनों हिंदी फिल्मों में लंपट, बेशर्म, लालची और लुच्चे नायकों की भीड़ बढ़ी है। 'बुलेट राजा' के राजा मिसरा को गौर से देखें तो…

दरअसल : फिल्म लेखक बनना है तो...

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-अजय ब्रह्मात्मज
    आए दिन कभी कोई साहित्यकार मित्र या फेसबुक के जरिए बने युवा दोस्त जानना चाहते हैं कि फिल्मों का स्टोरी रायटर कैसे बना जा सकता है? हर किसी के पास एक कहानी है, जिसे वह जल्दी से जल्दी फिल्म में बदलना चाहता है। साहित्यकारों को लगता है कि उन्होंने आधा काम कर लिया है। अब उन्हें अपनी कहानी या उपन्यास को केवल पटकथा में बदलना है। गैरसाहित्यिक व्यक्तियों को भी लगता है कि अपने अनुभवों के कुएं में जब भी बाल्टी डालेंगे कहानी निकल आएगी। मुंबई में फिल्म पत्रकारिता करते हुए अनेक लेखकों से मिलना-जुलना हुआ है। उनसे हुई बातचीत और उनकी कार्यप्रणाली को नजदीक से परखने के बाद कुछ सामान्य बातें की जा सकती हैं। यों हर लेखक का संघर्ष अलग होता है और सफलता तो बिल्कुल अलग होती है।
    सबसे पहले तो यह जान और समझ लें कि इन दिनों अधिकांश निर्देशक खुद ही कहानी लिखते हैं। यह चलन पहले भी था, लेकिन अब यह प्रचलन बन चुका है। निर्देशक अपने संघर्ष के दौरान बेकारी के दिनों में लेखक मित्रों के साथ बैठ कर कहानियां रचते हैं और मौका मिलते ही धड़ाधड़ फिल्मों की घोषणाएं करने लगते हैं। कामयाबी मिल चुकी है तो ठ…