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Friday, June 3, 2016

फिल्‍म समीक्षा : हाउसफुल 3



फूहड़ और ऊलजुलूल    
-अजय ब्रह्मात्‍मज

साजिद नाडियाडवाला हाउसफुल सीरिज के निर्माता हैं। 2010 में हाउसफुल और 2012 में हाउसफुल 2 के बाद उन्‍होंने 2016 में हाउसफुल 3 का निर्माण किया है। इस बार उन्‍होंने डायरेक्‍टर बदल दिया है। साजिद खान की जगह अब साजिद-फरहाद आ गए हैं। एक से भले दो...दो दिमागों ने मिलकर हाउसफुल 3 का लेखन और निर्देशन किया है। तय कर पाना मुश्किल है कि यह पहली दोनों से किस मायने में कमतर या बेहतर है। मन में यह भी सवाल उठ सकता है कि साजिद खान कैसे साजिद-फरहाद से अच्‍छे या बुरे हैं कि साजिद नाडियाडवाला ने उन पर भरोसा किया। बता दें कि हाउसफुल 3 के क्रिएटिव डायरेक्‍टर स्‍वयं साजिद नाडियाडवाला हैं।
फिल्‍म की कहानी...माफ करें कहानी बताने के नाम पर घटनाएं लिखनी होंगी,जिनका एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है और उनके होने के पीछे कोई तर्क भी नहीं है। साजिद-फरहाद इस कला में माहिर हैं। उन्‍होंने इट्स एंटरटेनमेंट के बाद फिर से साबित किया है कि उन्‍हें ह्वाट्स ऐप लतीफों को सीन बनाने आता है। शुक्रिया कपिल शर्मा और उन जैसे कॉमेडी के टीवी होस्‍ट का...हम हंसी-मजाक में किसी भी स्‍तर तक फिसल सकते हैं। हम रंग,नस्‍ल और विकलांगता पर हंस सकते हैं। इतना हंस सकते हैं कि खुद और दूसरों को भी रोना आ जाए। हाउसफुल 3 देखते हुए सचमुच रोने का मन करता है। कोफ्त होती है। खुद पर और उन कलाकारों पर भी,जो निहायत संजीदगी से ऊलजुलूल हरकतें करते हें। टांग उठा कर नाचते हैं और मुंह फाड़ कर खिलखिला सकते हैं। अक्ष्‍य कुमार और रितेश देशमुख हाउसफुल सीरिज के स्‍थायी नगीने हैं। इस बार अभिषेक बच्‍चन को भी शामिल कर लिया गया है। हंसी की मात्रा बढ़ाने के लिए मौके-कुमौके अमिताभ बच्‍चन और ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन का भी लेखक-निर्देशक ने दुरुपयोग किया है। रितेश देशमुख ने एक जगह जीनिलिया उच्‍चारण किया है। पता नहीं कैसे ट्विंकल मजाक बनने से रह गईं।
हाउसफुल 3 उस हफ्ते आई है,जब सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर पर तन्‍मय भट्ट के मजाकिया वीडियो पर थू-थू,विरोध और प्रवचन चालू हैं। इस फिल्‍म में मजाक बन रहे अमिताभ बच्‍चन,ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन,मैडम तुसाद संग्रहालय की अन्‍य हस्तियों के मखौल पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। कॉमेडी फिल्‍म के नाम पर सब माफ है। अपाहिजों का मजाक माफ है। अंधे,गूंगे और लंगड़े की चल रही तौहीन माफ है। मजेदार तथ्‍य या विडंबना यह है कि ऐसी फिल्‍में देखते हुए दर्शक ठहाके लगा रहे हैं। हैं। सिनेमाघरों से निकलते समय टीवी चैनलों के कैमरे के आगे कलाकारों की तारीफ कर रहे हैं। उनमें ही किसी को अच्‍छा और किसी को कम अच्‍छा बता रहे हैं। यह इस दौर की विसंगति है। इस विसंगति से भी कुछ लोग पैसे बना रहे हैं।
अक्षय कुमार और रितेश देशमुख के लिए हाउसफुल 3 की हरकतें नई नहीं हैं। अभिषेक बच्‍चन उन्‍हें बराबर का साथ देते हें। गौर करने की बात है कि फिल्‍म की तीनों हीरोइनों जैक्‍लीन फर्नांडिस,नरगिस फाखरी और लिजा हेडन के विदेशी कनेक्‍शन हैं। तीनों के रंग-रूप और कद-काठी के साथ मेकअप और चाल-ढाल में भी समानता रखी गई हैं। वैसे भी उन्‍हें ज्‍यादातर दिखने-दिखाने और गानों के लिए ही रखा गया है। वे बहाना हैं,ताकि तीनों हीरो बेवकूफाना हरकतें कर सकें। बोमन ईरानी और चंकी पांडे के साथ इस बार जैकी श्राफ को जोड़ लिया गया है। तीनों ने फिल्‍म को हास्‍यास्‍पद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
यह फिल्‍म फूहड़ दृश्‍यों और राइटिंग का नमूना है। लेखक संवादों में डबल मिन्रिंग से बचते हैं,लेकिन सिंगल मिनिंग भी खो देते हैं। बेमतलब और बेखुदी में ही किरदार कुछ बकते नजर आते हें।
अवधि- 135 मिनट
स्‍टार- एक स्‍टार

Friday, July 25, 2014

फिल्‍म समीक्षा : किक

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
कुछ फिल्में समीक्षाओं के परे होती हैं। सलमान खान की इधर की फिल्में उसी श्रेणी में आती हैं। सलमान खान की लोकप्रियता का यह आलम है कि अगर कल को कोई उनकी एक हफ्ते की गतिविधियों की चुस्त एडीटिंग कर फिल्म या डाक्यूमेंट्री बना दे तो भी उनके फैन उसे देखने जाएंगे। ब्रांड सलमान को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्मों में सारे उपादानों के केंद्र में वही रहते हैं। साजिद नाडियाडवाला ने इसी ब्रांड से जुड़ी कहानियों, किंवदंतियो और कार्यों को फिल्म की कहानी में गुंथा है। मूल तेलुगू में 'किक' देख चुके दर्शक बता सकेगे कि हिंदी की 'किक' कितनी भिन्न है। सलमान खान ने इस 'किक' को भव्यता जरूर दी है। फिल्म में हुआ खर्च हर दृश्य में टपकता है।
देवी उच्छृंखल स्वभाव का लड़का है। इन दिनों हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक उच्छृंखल ही होते हैं। अत्यंत प्रतिभाशाली देवी वही काम करता है, जिसमें उसे किक मिले। इस किक के लिए वह अपनी जान भी जोखिम में डाल सकता है। एक दोस्त की शादी के लिए वह हैरतअंगेज भागदौड़ करता है। इसी भागदौड़ में उसकी मुलाकात शायना से हो जाती है। शायना उसे अच्छी लगती है। देवी उसके साथ बूढ़ा होना चाहता है। शायना चाहती है कि देवी किसी नियमित जॉब में आ जाए। उधर देवी की दिक्कत है कि हर नए काम से कुछ ही दिनों में उसका मन उचट जाता है। शायना उसे टोकती है। उसकी एक बात देवी को लग जाती है। इसके बाद वह किक के लिए देवी से डेविल में बदल जाता है। डेविल और पुलिस अधिकारी हिमांशु की अलग लुकाछिपी चल रही होती है। इनके बीच भ्रष्ट नेता और उसका भतीजा भी है।
रोमांस, एक्शन, चेज, कॉमेडी, सॉन्ग एंड डांस और इमोशन से भरपूर 'किक' से साजिद नाडियाडवाला केवल सलमान खान के प्रशंसकों को खुश करने की कोशिश में हैं। दृश्य विधान ऐसे रचे गए हैं कि कैमरा आखिरकार हर बार सलमान की भाव-भंगिमाओं पर आकर ठहर जाता है। अगर कभी दूसरे किरदार पर्दे पर दिखते हैं तो वे भी देवी या डेविल की ही बातें कर रहे होते हैं। हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन का यह खास कौशल है, जो पॉपुलर स्टार की फिल्मों में आजमाया जाता है। एकांगी होने से बचते हुए ढाई घंटे की ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करने में अलहदा मेहनत लगती है। 'किक' जैसी फिल्मों का एकमात्र उद्देश्य आम दर्शकों का मनोरंजन करना है। आम दर्शक अपने परिवार के सदस्यों के साथ उसका आनंद उठा सकें।
'किक' अपनी इन सीमाओं और खूबियों में कहीं बिखरती और कहीं प्रभावित करती है। इंटरवल के पहले का विस्तार लंबा हो गया है। देवी और उसके पिता के रिश्ते को स्थापित करने वाले दृश्य नाहक खींचे गए हैं। इसी तरह नायक-नायिका की मुलाकात के दृश्य में दोहराव है। हम दशकों से ऐसी छेड़खानियां और बदमाशियां देखते आए हैं। अगर फिल्म के नायक सलमान खान हैं तो सीधे व सामान्य की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। देवी और डेविल की हरकतों में कई बार लॉजिक की परवाह नहीं की गई है, लेकिन क्या सलमान खान के प्रशंसक इन पर गौर करते हैं? बेहतर है कि दिल में आने वाले इस नायक को समझने में दिमाग न लगाया जाए।
'किक' में सलमान खान पूरे फॉर्म में हैं। उम्र चेहरे और शरीर पर दिखती है, लेकिन ऊर्जा में कोई कमी नहीं है। सलमान ने एक्शन के दृश्यों में आवश्यक फुर्ती दिखाई है। रोमांस और डांस का उनका खास अंदाज यहां भी मौजूद है। सलमान खान की इस फिल्म में रणदीप हुडा और नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। रणदीप हुड्डा ने पुलिस अधिकारी हिमांशु के किरदार में स्फूर्ति बरती है। कुछ दृश्यों में वे अवश्य लड़खड़ा गए हैं। नवाज की तारीफ करनी होगी कि चंद दृश्यों के अपने किरदार का उन्होंने अदायगी से यादगार बना दिया है। चटखारे लेकर उनके बोलने के अंदाज की नकल होगी। जैकलीन फर्नांडीज के लिए कुछ डांस स्टेप्स और रोमांस के सीन थे। उनमें वह जंचती हैं। संवाद अदायगी और नाटकीय दृश्यों के लिए उन्हें और मेहनत करनी होगी। सौरभ शुक्ला, मिथुन चक्रवर्ती, विपिन शर्मा और संजय मिश्रा अपनी भूमिकाओं में उपयुक्त हैं।
ईद के मौके पर सलमान खान और साजिद नाडियाडवाला की पेशकश 'किक' आम दर्शकों का ध्यान में रख कर बनाई गई सलमान खान की विशेषताओं की फिल्म है।
अवधि: 146 मिनट
***  तीन स्‍टार

Thursday, July 24, 2014

ताजिंदगी 27 साल का रहूं मैं-सलमान खान


-अजय ब्रह्मात्मज
ऐसा कम होता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सीनियर बाद की पीढ़ी की खुले दिल से तारीफ नहीं करते। सलमान खान इस लिहाज से भिन्न हैं। वे अपनी फिल्मों में नई प्रतिभाओं को मौका देते और दिलवाते हैं। पिछली मुलाकात में उन्होंने शुरुआत ही नए और युवा स्टारों की तारीफ से की। फिल्मों की रिलीज के समय उनके अपार्टमेंट गैलेक्सी के पास स्थित महबूब  स्टूडियो उनका दूसरा घर हो जाता है। एक अस्थायी कैंप बन जाता है। उनके सारे सहयोगी तत्पर मिलते हैं। यहीं वे मीडिया के लोगों से मिलते हैं। पिछले कुछ सालों से यही सिलसिला चल रहा है। ‘किक’ के लिए हुई इस मुलाकात में सलमान खान ने सबसे पहले अर्जुन कपूर ,आलिया भट्टऔर वरुण धवन समेत सभी नए टैलेंट की तारीफ की। उन्होंने अपने अनुभव से कहा कि वे खुले मिजाज के हैं। बातचीत और मेलजोल में किसी प्रकार का संकोच नहीं रखते। मैंने देखा है कि वे आपस में एक-दूसरे की खिंचाई भी करते हैं। खिल्ली उड़ाते हैं। मेरी पीढ़ी में केवल मैं हंसी-मजाक करता हूं। दूसरे तो सीरियस रहते हैं। अपनी पीढ़ी की बातें करते समय उन्होने जाहिर किया कि संजू यानी संजय दत्त के साथ उनकी ऐसी दोस्ती रही है। बाकी से भी मित्रता है,लेकिन वैसी अंतरंगता नहीं है।
    सलमान ने अपने दर्शकों से आग्रह किया कि वे ‘किक’ के टिकट ब्लैक में न खरीदें और न ही पायरेटेड डीवीडी पर घर में देखें। वे सिनेमाघरों में जाएं और सामान्य टिकट के लिए थोड़ा इंतजार कर लें। फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने के चक्कर में ब्लैक में डेढ़ हजार रुपए में टिकट खरीदने का कोई मतलब नहीं है। ब्लैक में खर्च किया दर्शकों का पैसा किसी निर्माता के पास नहीं आता। सोम-मंगल को देखने से कम पैसे खर्च होंगे। मेरी या किसी और की फिल्म हो। आप सोचो और फिर देखो। ‘किक’ में सलमान खान ने अपने लुक पर भी काम किया है। मास्क के अलावा फ्रेंच दाढ़ी भी रखी है। यह फैसला साजिद नाडियाडवाला का है। सलमान ने बताया, साजिद ने मुझे मेरी छह-सत साल पुरानी तस्वीर दिखाई। उसमें मैंने गोटी रखी थी। उन्हें वह लुक अच्छा लगा। ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ के समय मैंने उस लुक की होर्डिंग जुहू में लगवाई थी। मजेदार बात है कि फिल्म में कहीं भी मेरा वैसा लुक नहीं था। बहरहाल,साजिद ने सोचा की डेविड का लुक ऐसा रखते हैं और देवी का लुक तो नार्मल रहेगा। मास्क का आयडिया भी साजिद का था। देवी करी ड्रेसिंग स्टायल भी अलग है। वह जींस और कुर्ते में रहता है।
     कुछ सालों पहले सलमान खान ने फैसला किया था कि वे अब दोस्ती-यारी में फिल्में नहीं करेंगे। क्या उन्होंने साजिद नाडियाडवाला के लिए उस फैसले को बदला? इस सवाल पर सलमान की परिचित हंसी फूट पड़ी। उन्होंने हंसते हुए कहा,यह प्रोफेशनल फैसला है। वैसे साजिद मेरे पुराने दोस्त हैं,लेकिन दोस्ती में हम दोनों इतनी राशि का रिस्क नहीं ले सकते। फिल्म बिजनेस में थोड़ी भी कमजोर हुई तो लोग साजिद को कोसेंगे। साजिद के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। निर्माता होना और बात है। वे इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। अरबाज और सोहेल के साथ भी इसलिए फिल्म नहीं करता कि वे मेरे भाई हैं। हमलोग बहुत मेहनत करते हैं। इस फिल्म में तो रिलीज के दस दिनों पहले तक हम कुछ न कुड जोड़ते रहे हैं। शुक्रवार को सब पता चल जाएगा। हां,देख लेंगे,संभाल लेंगे,तू है न जैसे प्रपोजल की फिल्में अब नहीं करता। फिल्म लिख ली गई हो और पूरी फिल्म का खाका सामने हो तभी हो करता हूं। अभी कंपीटिशन बढ़ गया है।
    सलमान खान यह तो मानते हैं कि उम्र बढऩे के साथ उन्हें भी सीनियर एक्टर की तरह कैरेक्टर रोल में जाना पड़ेगा। उन्होंने शरारती मुस्कान के साथ जोड़ा,यह देखना रोचक होगा कि हम तीनों में से कौन पहले कैरेक्टर रोल में जाता है। मैं 27 दिसंबर को पैदा हुआ हूं। मेरी उम्र हर साल 27 दिसंबर को 27 की हो जाती है। मैं तो हमेयाा 27 की उम्र में ही रहना चाहता हूं। तो क्या 2027 तक आप हीरो ही रहेंगे? सलमान ने 27 से 14 घटा कर देखा। क्या कह रहे हैं? अभी से सिर्फ 13 साल और? ना ना कम से कम 27 साल और दें मुझे। इतने दिनों तक तो मैं दर्शकों का चहेता बने रहना चाहता हूं।

Friday, July 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमबख्त इश्क




-अजय ब्रह्मात्मज

कोई शक नहीं कि निर्माता साजिद नाडियाडवाला पैसे खर्च करते हैं। वह अपने शौक और जुनून के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। कमबख्त इश्क की शूटिंग हालीवुड के स्टूडियो में करनी हो या फिल्म में हालीवुड के एक्टर रखने हों, वह रत्ती भर भी नहीं हिचकते। अब यह अलग बात है कि उनके लेखक और निर्देशक हिंदी फिल्म के चालू फार्मूले में हालीवुड-बालीवुड की संगति नहीं बिठा पाते। यही वजह है कि फिल्म सारी भव्यता, नवीनता और खर्च के बावजूद चूं-चूं का मुरब्बा साबित होती है। सब्बीर खान के निर्देशन में बनी कमबख्त इश्क ऊंची दुकान, फीका पकवान का ताजा उदाहरण है।
फिल्म में अक्षय कुमार और करीना कपूर की जोड़ी है। दोनों हाट हैं और दोनों के चहेते प्रशंसकों की कमी नहीं है। प्रशंसक सिनेमाघरों में आते हैं और अपने पसंदीदा सितारों को कमजोर और अनगढ़ किरदारों में देख कर निराश लौटते हैं तो अपनी शर्मिदगी में किसी और को फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताते। नतीजतन ऐसी फिल्में आरंभिक उत्साह तो जगाती हैं, लेकिन उसे जारी नहीं रख पातीं।
कमबख्त इश्क अक्षय कुमार और करीना कपूर की पुरानी फिल्म टशन से कंपीटिशन करती नजर आती है। निर्माता-निर्देशकों को समझ लेना चाहिए कि दर्शक ऐसी फिल्में स्वीकार नहीं करते। फिल्म की बुनियाद में पुरुष जाति और स्त्री जाति के प्रति परस्पर नफरत और हिकारत है। विराज (अक्षय कुमार) और सिमरिता (करीना कपूर) विपरीत लिंग के प्रति कोई सम्मान नहीं रखते। अपने जीवन के अनुभव और विश्वास से वे एक-दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हैं। उनके बीच इतनी नफरत है कि वह धीरे-धीरे मुहब्बत में तब्दील हो जाती है। मुहब्बत का कोई लाजिक नहीं होता। इस फिल्म में स्थितियों, घटनाओं और प्रसंगों के साथ भावनाओं का भी कोई तर्क नहीं है। टुकड़ों में सोची गई यह फिल्म अंतिम प्रभाव में निहायत कमजोर साबित होती है।
अक्षय कुमार को विदूषक की भूमिका में हम कई फिल्मों में देख चुके हैं। निर्देशक उन्हें नई भावस्थिति नहीं देते। चूंकि पापुलर एक्टर को अपने सेफ जोन में खेलना अच्छा लगता है, इसलिए अक्षय कुमार भी नहीं समझ पाते कि उनकी एक जैसी भूमिकाओं और अदाओं से दर्शक ऊबने लगे हैं। करीना कपूर भी कुछ गानों और दृश्यों में सेक्सी दिखने के अलावा कोई प्रभाव नहीं छोड़ पातीं । फिल्म के नायक-नायिका के साथ बाकी किरदार भी आधे-अधूरे तरीके से गढ़े गए हैं।
हिंदी फिल्मों में 25-30 प्रतिशत संवाद अब अंग्रेजी में होने लगे हैं। गालियों और फूहड़ दृश्यों के उपयोग और सृजन में लेखक और निर्देशक अपनी भोंडी कल्पना का उपयोग करने लगे हैं। कमबख्त इश्क उसी की बानगी है। दोहराव और नकल फिल्म के संगीत में भी है। गाने कमबख्त इश्क के चल रहे होते हैं और कानों में किसी और फिल्म का पापुलर गीत सुनाई देता रहता है। संगीतकार अनु मलिक कहां से कहां पहुंच गए हैं?
रेटिंग : *1/2