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Showing posts from February, 2016

फिल्‍म समीक्षा : अलीगढ़

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साहसी और संवेदनशील अलीगढ़ -अजय ब्रह्मात्‍मज
हंसल मेहता की ‘अलीगढ़’ उनकी पिछली फिल्‍म ‘शाहिद’ की तरह ही हमारे समकालीन समाज का दस्‍तावेज है। अतीत की घटनाओं और ऐतिहासिक चरित्रों पर पीरियड फिल्‍में बनाना मुश्किल काम है,लेकिन अपने वर्त्‍तमान को पैनी नजर के साथ चित्रबद्ध करना भी आसान नहीं है। हंसल मेहता इसे सफल तरीके से रच पा रहे हैं। उनकी पीढ़ी के अन्‍य फिल्‍मकारों के लिए यह प्रेरक है। हंसल मेहता ने इस बार भी समाज के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के व्‍यक्ति को चुना है। प्रोफेसर सिरस हमारे समय के ऐसे साधारण चरित्र हैं,जो अपनी निजी जिंदगी में एक कोना तलाश कर एकाकी खुशी से संतुष्‍ट रह सकते हैं। किंतु हम पाते हैं कि समाज के कथित संरक्षक और ठेकेदार ऐसे व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देते हैं। उन्‍हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं। उन्‍हें शर्मसार किया जाता है। प्रोफेसर सिरस जैसे व्‍यक्तियों की तो चीख भी नहीं सुनाई पड़ती। उनकी खामोशी ही उनका प्रतिकार है। उनकी आंखें में उतर आई शून्‍यता समाज के प्रति व्‍यक्तिगत प्रतिरोध है। प्रोफेसर सिरस अध्‍ययन-अध्‍यापन से फुर्सत पाने पर दो पैग ह्विस…

फिल्‍म समीक्षा : तेरे बिन लादेन-डेड और अलाइव

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टुकड़ों में हंसी -अजय ब्रह्मात्‍मज पहली कोशिश मौलिक और आर्गेनिक होती है तो दर्शक उसे सराहते हैं और फिल्‍म से जुड़ कलाकारों और तकनीशियनों की भी तारीफ होती है। अभिषेक शर्मा की 2010 में आई ‘तेरे बिन लादेन’ से अली जफर बतौर एक्‍टर पहचान में आए। स्‍वयं अभिषेक शर्मा की तीक्ष्‍णता नजर आई। उम्‍मीद थी कि ‘तेरे बिन लादेन-डेड और अलाइव’ में वे एक स्‍ता ऊपर जाएंगे और पिछली सराहना से आगे बढ़ेंगे। उनकी ताजा फिलम निराश करती है। युवा फिल्‍मकार अपनी ही पहली कोशिश के भंवर में डूब भी सकते हैं। अभिषेक शर्मा अपने साथ मनीष पॉल को भी ले डूबे हैं। टीवी शो के इस परिचित चेहरे को बेहतरीन अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। क्‍या उनके चुनाव में ही दोष है ? ओसामा बिन लादेन की हत्‍या हो चुकी है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति को उसका वीडियो सबूत चाहिए। इस कोशिश में अमेरिकी सीआईए एजेंट ओसामा जैसे दिख रहे अभिनेता पद्दी सिंह के साथ मौत के सिक्‍वेंस शूट करने की प्‍लानिंग करता है। वह निर्देशक शर्मा को इस काम के लिए चुनता है। शर्मा को लगता है कि ‘तेरे बिन लादेन’ का सारा क्रेडिट अली जफर ले गए। इस बार वह खुद को लाइमलाइट में रखना चाहता है। एक स्‍था…

दरअसल : फितूर में कट्रीना कैफ

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-अजय ब्रह्मात्‍मज अभिषेक कपूर की पिछली रिलीज ‘फितूर’ दर्शकों को पसंद नहीं आई। फिल्‍म पसंद न आने की सभी की वजहें अलग-अलग हो सकती हैं। फिर भी सभी की नापसंद में एक समानता दिखी। कट्रीना कैफ का काम अधिकांश को पसंद नहीं आया। कुछ ने तो यहां तक कहा कि उन्‍होंने बुरा काम किया है। वह फिरदौस के किरदार में कतई नहीं जंची। अभिषेक कपूर ने उन्‍हें जिस तरह पेश किया,वह भी दर्शकों को नागवार गुजरा। किरदार ढंग से संवर नहीं पाया। व‍ह जिस रंग-ढंग के साथ पर्दे पर दिखा,उसे भी कट्रीना संवार नहीं सकीं। कट्रीना की कुछ बदतरीन फिल्‍मों में ‘फितूर’ शामिल रहेगी। मैंने खुद अभिषेक कपूर से कट्रीना की पसंद की वजह पूछी थी? मेरे सवाल में यह संदेह जाहिर था कि कट्रीना ऐसी गहन भूमिकाओं के योग्‍य नहीं हैं। तब अभिषेक कपूर ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में अपना तर्क दिया था। उनका कहना था,’ फिल्म देखेंगे तो आपको लगेगा कि मेरा फैसला सही है। मैं उनके चुनाव के कारण नहीं देना चाहता। मेरे बताने से धारणा बदलने वाली नहीं है। यह तो देख कर ही हो सकता है। कुछ लोगों में अलग तरह की खूबी होती है। खासकर फिल्म में मेरे किरदार की है,जिसे कट्रीना निभा रही ह…

जीवन में संतुष्‍ट होना बहुत जरूरी : राजकुमार राव

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-अजय ब्रह्मात्‍मज प्रतिभावान राजकुमार राव की अगली पेशकश ‘अलीगढ़़’ है। समलैंगिक अधिकारों व व्‍यक्ति की निजता को केंद्र में लेकर बनी इस फिल्‍म में राजकुमार राव पत्रकार दीपू सेबैस्टिन की भूमिका में हैं। दीपू न्‍यूज स्‍टोरी को सनसनीखेज बनाने में यकीन नहीं रखता। वह खबर में मानव अधिकारों को पुरजोर तरीके से रखने का पैरोकार है। राजकुमार राव अपने चयन के बारे में बताते हैं, ‘दीपू का किरदार तब निकला, जब मनोज बजापयी कास्ट हो रहे थे। उस वक्‍त हंसल मेहता सर की दूसरे एक्टरों से भी बातें हो रही थीं। नवाज से बातें हुईं। और भी एक्टरों के नाम उनके दिमाग में घूम रहे थे। जैसे कि नाना पाटेकर। वह सब केवल दिमाग में चल रहा था। तब दीपू का किरदार फिल्म में था ही नहीं। जहन में भी नहीं थी। केवल एक हल्का स्केच दिमाग में था। जब स्क्रिप्ट तैयार हुई तब पता चला कि दीपू तो प्रिंसिपलकास्ट है। जैसे वो बना हंसल ने तय कर लिया कि यह राजकुमार राव का रोल है। हंसल मेहता के मुताबिक उन्‍हें मेरे बिना फिल्म बनाने की आदत नहीं है। दरअसल हम दोनों की जो कला है, कला में आप विस्तार करते हो। अपने भीतर के कलाकार को उभारने का मौका मिलता है…

अपने मिजाज का सिनेमा पेश किया - सनी देओल

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-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍म जगत में 50 पार खानत्रयी का स्‍टारडम बरकरार है। सनी देओल अगले साल साठ के हो जाएंगे। इसके बावजूद वे अकेले अपने कंधों पर फिल्‍म की सफलता सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। ’घायल वंस अगेन’ इसकी नवीनतम मिसाल है।
- दर्शकों से मिली प्रतिक्रिया से आप कितने संतुष्ट हैं? इस फिल्म के बाद मेरी खुद की पहचान बनी है। वह पहले भी थी, लेकिन मेरे लिए अभी यह बनाना जरूरी था। कई सालों से मैं सिनेमा में कुछ कर भी नहीं रहा था। जो एक-दो फिल्मों में अच्छा काम किया, वे फिल्में भी अटकी हुई थी। उनका काम शुरू नहीं हो रहा था। इसके अलावा मैं जो भी कर रहा था, हमेशा एक सरदार ही था। कई सालों से लोग मुझे एक ही रूप में देख रहे थे। नॉर्मल रूप किरदार में नहीं देख पा रहे थे। यह सारी चीजें थी, जो मेरे साथ नहीं थी। मेरी इस फिल्म से अलग शुरुआत हुई है। हांलाकि मुझे इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली है, पर मेरे लिए इतना काफी है। क्योंकि इस फिल्म से मेरे काम को सराहा जा रहा है। लोग मेरी वापसी को पसंद कर रहे हैं। -आप इस फिल्म के एक्टर सनी देओल की सफलता मानते हैं या डायरेक्टर सनी देओल की? मेरे लिए मैंने डायरेक्टर पूरी…

किरदार ने निखारा मेरा व्‍यक्तित्‍व - मनोज बाजपेयी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज ‘अलीगढ़’ का ट्रेलर आने के बाद से ही मनोज बाजपेयी के प्रेजेंस की तारीफ हो रही है। ऐसा लग रहा है कि एक अर्से के बाद अभिनेता मनोज बाजपेयी अपनी योग्‍यता के साथ मौजूद हैं। वे इस फिल्‍म में प्रो. श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की भूमिका निभा रहे हैं। - इस फिल्‍म के पीछे की सोच क्‍या रही है ? 0 एक आदमी अपने एकाकी जीवन में तीन-चार चीजों के साथ खुश रहना चाहता है। समाज उसे इतना भी नहीं देना चाहता। वह अपनी अकेली लड़ाई लड़ता है। मेरी कोशिश यही रही है कि मैं दुनिया के बेहतरीन इंसान को पेश करूं। उसकी अच्‍छाइयों को निखार कर लाना ही मेरा उद्देश्‍य रहा है। -किन चीजों के साथ खुश रहना चाहते थे प्रोफेसर सिरस? 0 वे लता मंगेशकर को सुनते हैं। मराठी भाषा और साहित्‍य से उन्‍हें प्रेम है1 वे कविताओं में खुश रहते हैं। अध्‍ययन और अध्‍यापन में उनकी रुचि है। वे अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय औा अलीगढ़ छोड़ कर नहीं जाना चाहते। वे अपनी जिंदगी अलग ढंग से जीना चाहते हैं। -एक अंतराल के बाद आप ऐसी प्रभावशाली भूमिका में दिख रहे हैं? 0 अंतराल इसलिए लग रहा है कि मेरी कुछ फिल्‍में रिलीज नहीं हो पाई हैं। पोस्‍ट प्रोडक्‍शन में समय…

नीरजा सी ईमानदारी है सोनम में : राम माधवानी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज लिरिल के ऐड में प्रीति जिंटा के इस्‍तेमाल से लेकर ‘हरेक फ्रेंड जरूरी होता है’ जैसे पॉपुलर ऐड कैंपेन के पीछे सक्रिय राम माधवानी खुद को एहसास का कारोबारी मानते हैं। वे कहते हैं, ‘हमलोग ऐडफिल्‍म और दूसरे मीडियम से ‘फीलिंग्‍स’ का बिजनेस करते हैं।‘ अपनी नई फिल्‍म ‘नीरजा’ के जरिए वे दर्शकों को रूलाना, एहसास करना, एहसास देना और सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं। ‘लेट्स टॉक’ के 14 सालों बाद उनकी फिल्‍म ‘नीरजा’ आ रही है। -पहली और दूसरी फिल्‍म के बीच में 14 सालों का गैप क्‍यों आया। क्‍या अपनी पसंद का को‍ई विषय नहीं मिला या दूसरी दिक्‍कतें रहीं? विषय तो कई मिले। मैंने कोशिशें भी कीं। अपनी फिल्‍मों के साथ कई लोगों से मिला। बातें हुईं, लेकिन कुछ भी ठोस रूप में आगे नहीं बढ़ सका। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में मेरी अच्‍छी जान-पहचान है। वे लोग मेरी इज्‍जत भी करते हैं। उनमें से कुछ ने मुझे ऑफर भी दिए, जिन्‍हें मैंने विनम्रता से ठुकरा दिया। मेरी पसंद की फिल्‍मों में बजट, स्क्रिप्‍ट और एक्‍टर की समस्‍या रही। अभी कह सकता हूं कि यूनिवर्स मुझसे कुछ और करवाना चाह रहा था। मैं ‘नीरजा’ के लिए अतुल कसबेकर का …

अभिनेता राजकुमार राव और निर्देशक हंसल मेहता की बातचीत

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– अजय ब्रह्मात्‍मज

( हंसल मेहता और राजकुमार राव की पहली मुलाकात ‘शाहिद’ की कास्टिंग के समय ही हुई थी। दोनों एक-दूसरे के बारे में जान चुके थे,लेकिन कभी मिलने का अवसर नहीं मिला। राजकुमार राव बनारस में ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ की शूटिंग कर रहे थे तब कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा ने उन्‍हें बताया था कि हंसल मेहता ‘शाहिद’ की प्‍लानिंग कर रहे हैं। राजकुमार खुश हुएफ उन्‍हें यह पता चला कि लीड और ऑयोपिक है तो खुशी और ज्‍यादा बढ़ गई। इधर हंसल मेहता को उनके बेटे जय मेहता ने राजकुमार राव के बारे में बताया। वे तब अनुराग कश्‍यप के सहायक थे। एक दिन मुकेश ने राजकुमार से कहा कि जाकर हंसल मेहता से मिल लो। मुकेश ने हंसल को बताया कि राजकुमार मिलने आ रहा है। तब तक राजकुमार उनके दफ्तर की सीढि़यां चढ़ रहे थे। हंसल मेहता के पास मिलने के सिवा कोई चारा नहीं था। दोनों मानते हैं कि पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच रिश्‍ते की बिजली कौंधी। अब तो हंसल मेहता को राजकुमार राव की आदत हो गई है और राजकुमार राव के लिए हंसल मेहता डायरेक्‍टर के साथ और भी बहुत कुछ हैं।) राजकुमार राव और हंसल मेहता की तीसरी फिल्‍म है ‘अलीगढ़’। दो…

कुछ तो बदल सकूं यह दुनिया - सोनम कपूर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज सोनम कपूर ‘नीरजा’ में शीर्षक भूमिका में दिखेंगी। निर्देशक राम माधवानी ने फिल्‍म का खयाल आते ही सोनम के नाम पर विचार किया था। सोनम ने नीरजा की कहानी और स्क्रिप्‍ट सुनी तो तुरंत हां कह दी। साेनम इस बातचीत में बता रही हैं अपनी सहमति की वजह और ‘नीरजा’ फिल्‍म और व्‍यक्ति के बारे में... -बताएं कि कैसे यह फिल्‍म आप तक पहुंची ? 0 तकरीबन ढाई साल पहले मुझे इस फिल्‍म की जानकारी मिली। मुझे बताया गया कि राम माधवानी इसे मेरे साथ ही करना चाहते हैं। स्क्रिप्‍ट पढ़ते समय ही मुझे रुलाई आ गई। मैंने राम माधवानी के बारे में सुन रखा था कि वे ऐड वर्ल्‍ड का बड़ा नाम हैं। ‘नीरजा’ की कहानी बहुत स्‍ट्रांग है। वह एक साधारण लड़की थी। उनके पिता एक जर्नलिस्‍ट थे। उनकी मां हाउस वाइफ थीं। वह खूबसूरत थी तो उसे माडलिंग के असाइनमेंट मिल जाते थे। उनके टाइम में एयर होस्‍टेस के जॉब के साथ ग्‍लैमर जुड़ा हुआ था। वह एयर होस्‍टेस बनना चाहती थ। उनके डैड बहुत ओपन माइंड के थे। उन्‍होंने हां कर दी। घर में सभी उसे लाडो बुलाते थे। वह परिवार की लाडली थी। -लगता है ‘नीरजा’ के बारे में काफी रिसर्च किया है आप ने... 0 अपने कि…

दरअसल : खलनायक बन जाते हैं थिएटर एक्‍टर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज ऐसा नहीं कह सकते कि यह किसी साजिश के तहत होता है,लेकिन यह भी सच है कि ऐस होता है। थिएटर से फिल्‍मों में आए ज्‍यादातर एक्‍टर आरंभिक सफलता के बाद खलनायक की भूमिकाओं में सिमट कर रह जाते हैं। लंबे समय से यही होता आ रहा है। आठवें दशक के आरंभ में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय से आए ओम शिवपुरी समर्थ अभिनेता थे। छोटी-मोटी भूमिकाओं से उन्‍होंने पहचान बनाई। बाद में मुख्‍यधारा की फिल्‍मों में उन्‍हें मुख्‍य रूप से खलनायक की भूमिकाओं में ही इस्‍तेमाल किया गया। कभी-कभार चरित्र भूमिकाओं में भी हम ने उन्‍हें देखा। इस तरह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का सदुपयोग नहीं हो पाया। उनके बाद अमरीश पुरी,मोहन आगाशे,अनुपम खेर,परेश रावल,आशीष विद्यार्थी,आशुतोष राणा,मुकेश तिवारी,मनोज बाजपेयी,इरफान खान,यशपाल शर्मा,जाकिर हुसैन,गोविंद नामदेव,के के मेनन,नीरज काबी,पंकज त्रिपाठी,दिब्‍येन्‍दु भट्टाचार्य,राजकुमार राव और मानव कौल जैसे अनेक नाम इस सूची में शामिल किए जा सकते हैं। दरअसल,हिंदी फिल्‍मों के नायक(हीरो) के खास प्रतिमान बन गए है। इस प्रतिमान के साथ उनकी उम्र भी जुड़ जाती है। गौर करें तो हिंदी फिल्‍मों में ज्‍य…

फिल्‍म समीक्षा : फितूर

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सजावट सुंदर,बुनावट कमजोर -अजय ब्रह्मात्‍मज अभिषेक कपूर की ‘फितूर’ चार्ल्‍स डिकेंस के एक सदी से पुराने उपन्‍यास ‘ग्रेट एक्‍पेक्‍टेशंस’ का हिंदी फिल्‍मी रूपांतरण है। दुनिया भर में इस उपन्‍यास पर अनेक फिल्‍में बनी हैं। कहानी का सार हिंदी फिल्‍मों की अपनी कहानियों के मेल में है। एक अमीर लड़की,एक गरीब लड़का। बचपन में दोनों की मुलाकात। लड़की की अमीर हमदर्दी,लड़के की गरीब मोहब्‍बत। दोनों का बिछुड़ना। लड़की का अपनी दुनिया में रमना। लड़के की तड़प। और फिर मोहब्‍बत हासिल करने की कोशिश में दोनों की दीवानगी। समाज और दुनिया की पैदा की मुश्किलें। अभिषेक कपूर ने ऐसी कहानी को कश्‍मीर के बैकड्राप में रखा है। प्रमुख किरदारों में कट्रीना कैफ,आदित्‍य रॉय कपूर,तब्‍बू और राहुल भट्ट हैं। एक विशेष भूमिका में अजय देवगन भी हैं। अभिषेक कपूर ने कश्‍मीर की खूबसूरत वादियों का भरपूर इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने इसे ज्‍यादातर कोहरे और नीम रोशनी में फिल्‍मांकित किया है। परिवेश के समान चरित्र भी अच्‍छी तरह प्रकाशित नहीं हैं। अभिषेक कपूर की रंग योजना में कश्‍मीर के चिनार के लाल रंग का प्रतीकात्‍मक उपयोग किया गया है। पतझड़ में…

मेहनत से मंजिल खुद आयी करीब-दिव्‍या खोसला कुमार

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-अजय ब्रह्मात्‍मज दिव्‍या खोसला कुमार का एक परिचय यह है कि वह टीसीरिज के सर्वेसर्वा भूषण कुमार की पत्‍नी हैं। यह परिचय उन पर इस कदर हावी है कि उनके व्‍यक्तित्‍व के अन्‍य पहलुओं पर लोगों की नजर नहीं जाती। एक आम धारणा है कि चूंकि वह भूषण कुमार की पत्‍नी हैं,इसलिए उन्‍हें सुविधाएं मिल जाती हैं। और अब नाम भी मिल रहा है। इस धारणा से अलग सचचाई यह है कि दिव्‍या ने पहले अपने म्‍यूजिक वीडियो और फिर अपनी फिल्‍म से साबित किया है कि वह सक्षम फिल्‍मकार हैं।यारियां के बाद उनकी सनम रे आ रही है।
-फिल्‍म निर्देशन में आप ने खुद को बहुत जल्दी साध लिया। 0 जी मैं मानती हूं कि हमें जिस मंजिल पर पहुंचना होता है,वह हो ही जाता है। लोगों कुछ भी कहें,मैं आपको बताऊं कि मुझे काम करते हुए सोलह साल हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ तुंरत हो गया। यारियां के समय सबको लगा कि यह लड़की नई है। सच यह है कि उस फिल्म को बनाने में मैंने सालों की मेहनत लगाई है। अपनी फिल्‍म पर मुझे विश्वास था। फिल्म हिट हुई। क्रिएटिव इंसान के तौर पर मेरा विकास हुआ है। पहली फिल्म बनाते समय मेरे सामने काफी अड़चने आयी। स्किप्ट में अड़चन आयी। कास्टिं…