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Saturday, March 2, 2013

फिल्‍म समीक्षा : द अटैक्‍स ऑफ 26/11

-अजय ब्रह्मात्मज
-अजय ब्रह्मात्मज
film review of the film Attacks of 26/11-अजय ब्रह्मात्‍मज 
राम गोपाल वर्मा को सच्ची घटनाओं पर काल्पनिक फिल्में बनाने का नया शौक हुआ है। 'नॉट ए लव स्टोरी' में उन्होंने मुंबई की एक हत्या को सेल्यूलाइड के लिए चुना था। इस बार 26/11 की घटना को उन्होंने फिल्म का रूप दिया है। हालांकि 26 /11 की घटना को देश के दर्शकों ने टीवी पर लाइव देखा था। राम गोपाल वर्मा मानते हैं कि लाइव कवरेज और डाक्यूमेंट्री फिल्मों में फैक्ट्स होते हैं, लेकिन इमोशन और रिएक्शन नहीं होते हैं।
              26/11 की ही बात करें तो गोलियां चलाते समय कसाब क्या सोच रहा था? या उसके चेहरे पर कैसे भाव थे। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में इमोशन और रिएक्शन के साथ 26/11 की घटना को पेश किया है। फिल्म की शुरुआत पुलिस कमिश्नर के बयान से होती है। उस रात की आकस्मिक स्थिति और उसके मुकाबले में मुंबई की सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के काल्पनिक दृश्यों से राम गोपाल वर्मा ने घटना की भयावहता और क्रूरता को प्रस्तुत किया है। 'द अटैक्स ऑफ 26/11' मुख्य रूप से वीटी स्टेशन, ताज होटल, लियोपोल्ड कैफे और कामा हास्पिटल में हुई गोलीबारी पर केंद्रित है। नरीमन हाउस और ट्रायडेंट होटल की गोलीबारी को दृश्यों के दोहराव की वजह से छोड़ दिया गया है। वैसे नरीमन हाउस के रीक्रिएशन में अधिक इमोशन होता।              
राम गोपाल वर्मा कैमरे और साउंड के अनोखे प्रयोग करते हैं। इन दोनों से दृश्यों को प्रभावशाली बनाने में उनका हुनर नजर आता है। इस फिल्म में भी उनकी यह प्रतिभा दिखती है। कसाब के किरदार के लिए उन्होंने ऐसा अभिनेता चुना है,जिसका चेहरा उससे मिलता हो। इस किरदार को निभा रहे संजीव जायसवाल की अभिनय क्षमता की सीमाएं हैं। गोलियां चलाते समय हर फायर के साथ उनके चेहरे पर आई घृणा कुछ देर के बाद हास्यास्पद हो जाती है। मुर्दाघर के दृश्य में नाना पाटेकर और संजीव जायसवाल के बीच के दृश्य में राम गोपाल वर्मा के उद्देश्य की झलक मिलती है। 
नाना पाटेकर यहां कुरान, इस्लाम और जिहाद के असली मायने बताते हैं और आतंकवाद की रास्ते पर गुमराह होकर आए मुसलमान युवकों को सचेत और आगाह करते हैं।
 'द अटैक्स ऑफ 26/11' में राम गोपाल वर्मा ने पुलिस अभियान के दौरान शिव तांडव  स्तोत्र का इस्तेमाल किया है। इस स्त्रोत्र में एक किस्म का जोश है और निहित शब्दों में एक हुंकार है। किंतु पुलिस अभियान में शिव तांडव स्त्रोत का उपयोग दृश्य को अनुचित धार्मिक रंग देता है। यहां किसी और उद्दाम संगीत का प्रयोग हो सकता था। 
नाना पाटेकर तीव्र भावों के कुशल अभिनेता हैं। उन्होंने जांच समिति, कसाब से बहस और मुंबई पुलिस की विवशता एवं मुस्तैदी के दृश्यों में भावानुकूल अभिनय किया है। राम गोपाल वर्मा वास्तविक लोकेशन को रिक्रिएट करने में सफल रहे हैं। इस फिल्म को देखते हुए हम उस आतंकपूर्ण रात की लाचारगी और क्रूरता दोनों महसूस करते हैं।  
अवधि- 108 मिनट 
 *** तीन स्‍टार
26/11 की ही बात करें तो गोलियां चलाते समय कसाब क्या सोच रहा था? या उसके चेहरे पर कैसे भाव थे। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में इमोशन और रिएक्शन के साथ 26/11 की घटना को पेश किया है। फिल्म की शुरुआत पुलिस कमिश्नर के बयान से होती है। उस रात की आकस्मिक स्थिति और उसके मुकाबले में मुंबई की सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के काल्पनिक दृश्यों से राम गोपाल वर्मा ने घटना की भयावहता और क्रूरता को प्रस्तुत किया है। 'द अटैक्स ऑफ 26/11' मुख्य रूप से वीटी स्टेशन, ताज होटल, लियोपोल्ड कैफे और कामा हास्पिटल में हुई गोलीबारी पर केंद्रित है। नरीमन हाउस और ट्रायडेंट होटल की गोलीबारी को दृश्यों के दोहराव की वजह से छोड़ दिया गया है। वैसे नरीमन हाउस के रीक्रिएशन में अधिक इमोशन होता।
राम गोपाल वर्मा कैमरे और साउंड के अनोखे प्रयोग करते हैं। इन दोनों से दृश्यों को प्रभावशाली बनाने में उनका हुनर नजर आता है। इस फिल्म में भी उनकी यह प्रतिभा दिखती है। कसाब के किरदार के लिए उन्होंने ऐसा अभिनेता चुना है,जिसका चेहरा उससे मिलता हो। इस किरदार को निभा रहे संजीव जायसवाल की अभिनय क्षमता की सीमाएं हैं। गोलियां चलाते समय हर फायर के साथ उनके चेहरे पर आई घृणा कुछ देर के बाद हास्यास्पद हो जाती है। मुर्दाघर के दृश्य में नाना पाटेकर और संजीव जायसवाल के बीच के दृश्य में राम गोपाल वर्मा के उद्देश्य की झलक मिलती है।
नाना पाटेकर यहां कुरान, इस्लाम और जिहाद के असली मायने बताते हैं और आतंकवाद की रास्ते पर “ुमराह होकर आए मुसलमान युवकों को सचेत और आगाह करते हैं।
'द अटैक्स ऑफ 26/11' में राम गोपाल वर्मा ने पुलिस अभियान के दौरान शिव तांडव स स्तोत्र का इस्तेमाल किया है। इस स्त्रोत्र में एक किस्म का जोश है और निहित शब्दों में एक हुंकार है। किंतु पुलिस अभियान में शिव तांडव स्त्रोत का उपयोग दृश्य को अनुचित धार्मिक रंग देता है। यहां किसी और उद्दाम संगीत का प्रयोग हो सकता था।
नाना पाटेकर तीव्र भावों के कुशल अभिनेता हैं। उन्होंने जांच समिति, कसाब से बहस और मुंबई पुलिस की विवशता एवं मुस्तैदी के दृश्यों में भावानुकूल अभिनय किया है। राम गोपाल वर्मा वास्तविक लोकेशन को रिक्रिएट करने में सफल रहे हैं। इस फिल्म को देखते हुए हम उस आतंकपूर्ण रात की लाचारगी और क्रूरता दोनों महसूस करते हैं।
अवधि- 108 मिनट
*** तीन स्टार
- See more at: http://www.jagran.com/entertainment/reviews-film-review-of-the-film-attacks-of2611-10176927.html#sthash.fa5XVEte.dpufvvvvvvvvvv
राम गोपाल वर्मा को सच्ची घटनाओं पर काल्पनिक फिल्में बनाने का नया शौक हुआ है। 'नॉट ए लव स्टोरी' में उन्होंने मुंबई की एक हत्या को सेल्यूलाइड के लिए चुना था। इस बार 26/11 की घटना को उन्होंने फिल्म का रूप दिया है। हालांकि 26 /11 की घटना को देश के दर्शकों ने टीवी पर लाइव देखा था। राम गोपाल वर्मा मानते हैं कि लाइव कवरेज और डाक्यूमेंट्री फिल्मों में फैक्ट्स होते हैं, लेकिन इमोशन और रिएक्शन नहीं होते हैं।
26/11 की ही बात करें तो गोलियां चलाते समय कसाब क्या सोच रहा था? या उसके चेहरे पर कैसे भाव थे। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में इमोशन और रिएक्शन के साथ 26/11 की घटना को पेश किया है। फिल्म की शुरुआत पुलिस कमिश्नर के बयान से होती है। उस रात की आकस्मिक स्थिति और उसके मुकाबले में मुंबई की सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के काल्पनिक दृश्यों से राम गोपाल वर्मा ने घटना की भयावहता और क्रूरता को प्रस्तुत किया है। 'द अटैक्स ऑफ 26/11' मुख्य रूप से वीटी स्टेशन, ताज होटल, लियोपोल्ड कैफे और कामा हास्पिटल में हुई गोलीबारी पर केंद्रित है। नरीमन हाउस और ट्रायडेंट होटल की गोलीबारी को दृश्यों के दोहराव की वजह से छोड़ दिया गया है। वैसे नरीमन हाउस के रीक्रिएशन में अधिक इमोशन होता।
राम गोपाल वर्मा कैमरे और साउंड के अनोखे प्रयोग करते हैं। इन दोनों से दृश्यों को प्रभावशाली बनाने में उनका हुनर नजर आता है। इस फिल्म में भी उनकी यह प्रतिभा दिखती है। कसाब के किरदार के लिए उन्होंने ऐसा अभिनेता चुना है,जिसका चेहरा उससे मिलता हो। इस किरदार को निभा रहे संजीव जायसवाल की अभिनय क्षमता की सीमाएं हैं। गोलियां चलाते समय हर फायर के साथ उनके चेहरे पर आई घृणा कुछ देर के बाद हास्यास्पद हो जाती है। मुर्दाघर के दृश्य में नाना पाटेकर और संजीव जायसवाल के बीच के दृश्य में राम गोपाल वर्मा के उद्देश्य की झलक मिलती है।
नाना पाटेकर यहां कुरान, इस्लाम और जिहाद के असली मायने बताते हैं और आतंकवाद की रास्ते पर “ुमराह होकर आए मुसलमान युवकों को सचेत और आगाह करते हैं।
'द अटैक्स ऑफ 26/11' में राम गोपाल वर्मा ने पुलिस अभियान के दौरान शिव तांडव स स्तोत्र का इस्तेमाल किया है। इस स्त्रोत्र में एक किस्म का जोश है और निहित शब्दों में एक हुंकार है। किंतु पुलिस अभियान में शिव तांडव स्त्रोत का उपयोग दृश्य को अनुचित धार्मिक रंग देता है। यहां किसी और उद्दाम संगीत का प्रयोग हो सकता था।
नाना पाटेकर तीव्र भावों के कुशल अभिनेता हैं। उन्होंने जांच समिति, कसाब से बहस और मुंबई पुलिस की विवशता एवं मुस्तैदी के दृश्यों में भावानुकूल अभिनय किया है। राम गोपाल वर्मा वास्तविक लोकेशन को रिक्रिएट करने में सफल रहे हैं। इस फिल्म को देखते हुए हम उस आतंकपूर्ण रात की लाचारगी और क्रूरता दोनों महसूस करते हैं।
अवधि- 108 मिनट
*** तीन स्टार
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26/11 की ही बात करें तो गोलियां चलाते समय कसाब क्या सोच रहा था? या उसके चेहरे पर कैसे भाव थे। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में इमोशन और रिएक्शन के साथ 26/11 की घटना को पेश किया है। फिल्म की शुरुआत पुलिस कमिश्नर के बयान से होती है। उस रात की आकस्मिक स्थिति और उसके मुकाबले में मुंबई की सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के काल्पनिक दृश्यों से राम गोपाल वर्मा ने घटना की भयावहता और क्रूरता को प्रस्तुत किया है। 'द अटैक्स ऑफ 26/11' मुख्य रूप से वीटी स्टेशन, ताज होटल, लियोपोल्ड कैफे और कामा हास्पिटल में हुई गोलीबारी पर केंद्रित है। नरीमन हाउस और ट्रायडेंट होटल की गोलीबारी को दृश्यों के दोहराव की वजह से छोड़ दिया गया है। वैसे नरीमन हाउस के रीक्रिएशन में अधिक इमोशन होता।
राम गोपाल वर्मा कैमरे और साउंड के अनोखे प्रयोग करते हैं। इन दोनों से दृश्यों को प्रभावशाली बनाने में उनका हुनर नजर आता है। इस फिल्म में भी उनकी यह प्रतिभा दिखती है। कसाब के किरदार के लिए उन्होंने ऐसा अभिनेता चुना है,जिसका चेहरा उससे मिलता हो। इस किरदार को निभा रहे संजीव जायसवाल की अभिनय क्षमता की सीमाएं हैं। गोलियां चलाते समय हर फायर के साथ उनके चेहरे पर आई घृणा कुछ देर के बाद हास्यास्पद हो जाती है। मुर्दाघर के दृश्य में नाना पाटेकर और संजीव जायसवाल के बीच के दृश्य में राम गोपाल वर्मा के उद्देश्य की झलक मिलती है।
नाना पाटेकर यहां कुरान, इस्लाम और जिहाद के असली मायने बताते हैं और आतंकवाद की रास्ते पर “ुमराह होकर आए मुसलमान युवकों को सचेत और आगाह करते हैं।
'द अटैक्स ऑफ 26/11' में राम गोपाल वर्मा ने पुलिस अभियान के दौरान शिव तांडव स स्तोत्र का इस्तेमाल किया है। इस स्त्रोत्र में एक किस्म का जोश है और निहित शब्दों में एक हुंकार है। किंतु पुलिस अभियान में शिव तांडव स्त्रोत का उपयोग दृश्य को अनुचित धार्मिक रंग देता है। यहां किसी और उद्दाम संगीत का प्रयोग हो सकता था।
नाना पाटेकर तीव्र भावों के कुशल अभिनेता हैं। उन्होंने जांच समिति, कसाब से बहस और मुंबई पुलिस की विवशता एवं मुस्तैदी के दृश्यों में भावानुकूल अभिनय किया है। राम गोपाल वर्मा वास्तविक लोकेशन को रिक्रिएट करने में सफल रहे हैं। इस फिल्म को देखते हुए हम उस आतंकपूर्ण रात की लाचारगी और क्रूरता दोनों महसूस करते हैं।
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Friday, October 22, 2010

फि‍ल्‍म समीक्षा : रक्‍त चरित्र

-अजय ब्रह्मात्‍मज

बदले से प्रेरित हिंसा


रक्त चरित्र: बदले से प्रेरित हिंसा

लतीफेबाजी की तरह हिंसा भी ध्यान आकर्षित करती है। हम एकटक घटनाओं को घटते देखते हैं या उनके वृतांत सुनते हैं। हिंसा अगर बदले की भावना से प्रेरित हो तो हम वंचित, कमजोर और पीडि़त के साथ हो जाते हैं, फिर उसकी प्रतिहिंसा भी हमें जायज लगने लगती है। हिंदी फिल्मों में बदले और प्रतिहिंसा की भावना से प्रेरित फिल्मों की सफल परंपरा रही है। राम गोपाल वर्मा की रक्त चरित्र उसी भावना और परंपरा का निर्वाह करती है। राम गोपाल वर्मा ने आंध्रप्रदेश के तेलुगू देशम पार्टी के नेता परिताला रवि के जीवन की घटनाओं को अपने फिल्म के अनुसार चुना है। यह उनके जीवन पर बनी बायोपिक (बायोग्रैफिकल पिक्चर) फिल्म नहीं है।

कानूनी अड़चनों से बचने के लिए राम गोपाल वर्मा ने वास्तविक चरित्रों के नाम बदल दिए हैं। घटनाएं उनके जीवन से ली है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए परिताला रवि के उदय के राजनीतिक और वैचारिक कारणों को छोड़ दिया है। हिंदी फिल्म निर्देशकों की वैचारिक शून्यता का एक उदारहण रक्त चरित्र भी है। विचारहीन फिल्मों का महज तात्कालिक महत्व होता है। हालांकि यह फिल्म बांधती है और हमें फिल्म के नायक प्रताप रवि से जोड़े रखती है। अनायास हिंसा की गलियों में उसका उतरना और अपने प्रतिद्वंद्वियों से हिंसक बदला लेना उचित लगने लगता है। राम गोपाल वर्मा ने प्रताप रवि और उसके परिवार की सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता को रेखांकित नहीं किया है। ऐसा करने पर शायद फिल्म गंभीर हो जाती और दर्शकों का कथित मनोरंजन नहीं हो पाता।

फिल्म जिस रूप में हमारे सामने परोसी गई है, उसमें राम गोपाल वर्मा अपनी दक्षता और अनुभव का परिचय देते हैं। उन्होंने अपने नैरेशन में घटनाओं और हत्याओं पर अधिक जोर दिया है। केवल शिवाजी राव और प्रताप रवि के संसर्ग के दृश्यों में ड्रामा दिखता है। रक्त चरित्र एक्शन प्रधान फिल्म है। एक्शन के लिए देसी हथियारों कट्टा, कटार, हंसिया का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए पर्दे पर रक्त की उछलती बूंदे और धार दिखती हैं। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में हिंसा को कथ्य में पिरोने से अधिक ध्यान उसके दृश्यांकन में दिया है। मुमकिन है कुछ दर्शकों को मितली आए या सिर चकराए। राम गोपाल वर्मा ने रक्त और खून के साथ सभी क्रियाओं, विशेषणों, समास, उपसर्गो और प्रत्ययों का उपयोग किया है। गनीमत है कि उनके लेखकने रक्त के पर्यायों का इस्तेमाल नहीं किया है। रक्त चरित्र को आज के भारत की महाभारत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश में उन्होंने अन्य भावनाओं को दरकिनार कर दिया है। इस फिल्म में पिता-पुत्र संबंध, परिवार के प्रति प्रेम, सत्ता की चाहत और वंचितों के उभार जैसी भावनाएं हैं। फिल्म वंचितों और समृद्धों के संघर्ष और अंतर्विरोध से आरंभ होती है, लेकिन कुछ दृश्यों केबाद ही व्यक्तिगत बदले की लकीर पीटने लगती है। प्रताप रवि कहता भी है कि बदला भी मेरा होगा। यह भाव ही फिल्म की सीमा बन जाता है और रक्त चरित्र हमारे समय के महाभारत के बजाए चंद व्यक्तियों के रक्तरंजित बदले की कहानी बन कर रह जाती है।

रक्त चरित्र विवेक ओबेराय और अभिमन्यु सिंह के अभिनय के लिए याद की जाएगी। विवेक ने अपनी पिछली फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने प्रताप के क्रोध और प्रतिहिंसा के भाव को चेहरे, भाव और चाल में अच्छी तरह उतारा है। अभिमन्यु सिंह के रूप में हमें एक गाढ़ा अभिनेता मिला है। इस चरित्र के रोम-रोम से क्रूरता फूटती है और अभिमन्यु ने किरदार की इस मनोदशा को खूंखार बना दिया है। अन्य कलाकारों में सुशांत सिंह, राजेन्द्र गुप्ता, शत्रुघ्न सिन्हा और कोटा श्रीनिवास राव का सहयोग सराहनीय है।

फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर में चल रहे संस्कृत के श्लोक स्पष्ट होते तो फिल्म का प्रभाव बढ़ता। राम गोपाल वर्मा की अन्य फिल्मों की तरह ही बैकग्राउंड स्कोर लाउड और ज्यादा है।

रेटिंग- तीन स्टार


Saturday, April 17, 2010

फिल्म समीक्षा :फूँक 2

-अजय ब्रह्मात्मज
दावा था कि फूंक से ज्यादा खौफनाक होगी फूंक-2, लेकिन इस फिल्म के खौफनाक दृश्यों में हंसी आती रही। खासकर हर डरावने दृश्य की तैयारी में साउंड इफेक्ट के चरम पर पहुंचने के बाद सिहरन के बजाए गुदगुदी लगती है। कह सकते हैं कि राम गोपाल वर्मा से दोहरी चूक हो गई है। पहली चूक तो सिक्वल लाने की है और दूसरी चूक खौफ पैदा न कर पाने की है।
इस फिल्म के बारे में रामू कहते रहे हैं कि मिलिंद का आइडिया उन्हें इतना जोरदार लगा कि उन्होंने निर्देशन की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी। अफसोस की बात है कि मिलिंद अपने आइडिया को पर्दे पर नहीं उतार पाए। रामू ने भी गौर नहीं किया कि फूंक-2 हॉरर फिल्म है या हॉरर के नाम पर कामेडी। किसी ने सही कहा कि जैसी कामेडी फिल्म में लाफ्टर ट्रैक चलता है, पाश्‌र्र्व से हंसी सुनाई पड़ती रहती है और हम भी हंसने लगते हैं। वैसे ही अब हॉरर फिल्मों में हॉरर ट्रैक चलना चाहिए। साथ में चीख-चित्कार हो तो शायद डर भी लगने लगे।
फूंक-2 में खौफ नहीं है। आत्मा और मनुष्य केबीच का कोई संघर्ष नहीं है, इसलिए रोमांच नहीं होता। फिल्म में कुछ हत्याएं होती हैं, लेकिन उन हत्याओं से भी डर नहीं बढ़ता। पर्दे पर खून की बूंदाबूंदी होती है, फिर भी रगों में खून की गति तेज नहीं होती। फूंक-2 की आत्मा कुछ दृश्यों में स्थिर मुद्रा में आड़ी-तिरछी, उल्टी-सीधी खड़ी, टंगी, बैठी नजर आती है। उसकी निष्क्रियता संभावित खौफ को भी मार देती है। वक्त आ गया है कि रामू और दूसरे निर्देशक हारर फिल्मों की कहानियों पर मेहनत करें। कहानी में घटनाएं रहेंगी, तभी तकनीक से उन्हें खौफनाक बनाया जा सकेगा।
* एक स्टार

Friday, January 29, 2010

फिल्‍म समीक्षा : रण

मध्यवर्गीय मूल्यों की जीत है रण


-अजय ब्रह्मात्‍मज

राम गोपाल वर्मा उर्फ रामू की रण एक साथ पश्चाताप और तमाचे की तरह है, जो मीडिया केएक जिम्मेदार माध्यम की कमियों और अंतर्विरोधों को उजागर करती है। रामू समय-समय पर शहरी जीवन को प्रभावित कर रहे मुद्दों को अपनी फिल्म का विषय बनाते हैं। पिछले कुछ सालों से इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव और उसमें फैल रहे भ्रष्टाचार पर विमर्श चल रहा है। रामू ने रण में उसी विमर्श को एकांगी तरीके से पेश किया है। फिल्म का निष्कर्ष है कि मीडिया मुनाफे के लोभ और टीआरपी के दबाव में भ्रष्ट होने को अभिशप्त है, लेकिन आखिर में विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक और पूरब शास्त्री के विवेक और ईमानदारी से सुधरने की संभावना बाकी दिखती है।

मुख्य रूप से इंडिया 24-7 चैनल के सरवाइवल का सवाल है। इसके मालिक और प्रमुख एंकर विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक अपनी जिम्मेदारी और मीडिया के महत्व को समझते हैं। सच्ची और वस्तुनिष्ठ खबरों में उनका यकीन है। उनके चैनल से निकला अंबरीष कक्कड़ एक नया चैनल आरंभ करता है और मसालेदार खबरों से जल्दी ही टाप पर पहुंच जाता है। विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक के बेटे जय मलिक की चिंता है कि टीआरपी की लड़ाई में कैसे चैनल को आगे लाया जाए? वह अपने उद्योगपति बहनोई नवीन और विरोधी पार्टी के नेता मोहन पांडे के साथ मिल कर खबरों की साजिश रचते हैं। बेटे के विश्वास में मलिक से खबर चल जाती है और सत्तापलट हो जाती है। मोहन पांडे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन जाते हैं। इंडिया 24-7 चैनल टाप पर आ जाता है। उद्योगपति नवीन को नए अनुबंध मिल जाते हैं। इन सब के बीच भ्रष्टाचार की इस जीत के आड़े आ जाता है मध्यवर्गीय मूल्यों और नैतिकताओं का पक्षधर पूरब शास्त्री।

रण वास्तव में मध्यवर्गीय नैतिकता और मूल्यों की प्रासंगिकता और विजय की कहानी है। भारतीय समाज में हर निर्णायक आंदोलन और अभियान में मध्यवर्ग की खास भूमिका रही है। भ्रष्ट हो रहे मीडिया तंत्र में आदर्शो और मूल्यों के साथ आए पूरब शास्त्री की हताशा ही विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक को पश्चाताप और ग्लानि के लिए विवश करती है। अपने दर्शकों से किया विजय का अंतिम संवाद मीडिया की हकीकत को तार-तार कर देता है। मीडिया में आए भटकाव की वजहों को हम समझ पाते हैं।

लगता है कि रामू ने पहले फिल्म का क्लाइमेक्स और निष्कर्ष तय कर लिया था और फिर किरदारों और घटनाओं को उस निष्कर्ष के लिए जोड़ा गया है। इस जल्दबाजी में फिल्म की संरचना और पटकथा कमजोर पड़ गई है। मीडिया का तंत्र वैसा नहीं है, जो फिल्म में दिखाया गया है, लेकिन मीडिया के लक्ष्य, साधन, स्रोत और विचार को रामू ने सही तरीके से पिरोया है। थोड़े और रिसर्च और गंभीरता से काम लिया गया होता तो रण मीडिया के ऊपर बनी सार्थक फिल्म होती। अभी यह सतह को खरोंचती हुई निकल जाती है। गहरे उतरने पर च्यादा प्रदूषण, भष्टाचार और उसके कारण दिखाई पड़ते।

अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर साबित किया है कि अभिनय में भाव और भाषा का कैसे सुंदर उपयोग किया जा सकता है। कांपती उंगलियों की वजह से हथेलियां जुड़ नहीं पातीं। पश्चाताप की पीड़ा शब्दों में निकलती है और आंखें नम हो जाती हैं। फिल्म के अंतिम संवाद को अमिताभ बच्चन ने मर्मस्पर्शी बना दिया है। सुदीप ने जय मलिक के द्वंद्व को अच्छी तरह व्यक्त किया है, लेकिन क्या उन्हें हर तनाव के दृश्य में सिगरेट पीते दिखाना जरूरी था? मोहनिश बहल और राजपाल यादव की मौजूदगी उल्लेखनीय है। फिल्म में महिला पात्रों पर फोकस नहीं है, फिर भी नीतू चंद्रा और गुल पनाग अपने हिस्से का उचित निर्वाह करती हैं। क्लाइमेक्स में नीतू चंद्रा की बेबसी प्रभावित करती है।

पुन:श्च - अमेरिकी समाजशास्त्री और चिंतक नोम चोमस्की ने 1989 में पहली बार सहमति का निर्माण- मीडिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र व्याख्यान दिया था। बाद में 1992 में इसी पर एक डाक्यूमेंट्री - मैन्युफैक्चरिंग कंसेट नाम से बनी थी। रण के संदर्भ में ये लेख और फिल्म प्रासंगिक हैं।

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*** तीन स्टार

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Thursday, May 7, 2009

रामू के रण में जन गण मन

जन गण मन रण है
इस रण में ज़ख्मी हुआ है
भारत का भाग्यविधाता

पंजाब सिंध गुजरात मराठा

एक दूसरे से लड़कर मर रहे हैं
इस देश ने हमको एक किया
हम देश के टुकड़े कर रहे हैं
द्रविड़ उत्कल बंगा

खून बहा कर
एक रंग का कर दिया हमने तिरंगा

सरहदों पे ज़ंग और
गलियों में फसाद दंगा

विन्ध हिमाचल यमुना गंगा
में तेजाब उबल रहा है

मर गया सब का ज़मीर
जाने कब जिंदा हो आगे

फिर भी तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशीष मांगे

आग में जल कर चीख रहा है
फिर भी कोई सच को नहीं बचाता

गाहे तव जय गाथा

देश का ऐसा हाल है लेकिन
आपस में लड़ रहे नेता

जन गण मंगल दायक जय हे

भारत को बचा ले विधाता

जय है या यह मरण है
जन गण मन रण है


Saturday, February 28, 2009

दरअसल:बन रही हैं डरावनी फिल्में

-अजय ब्रह्मात्मज

हालिया रिलीज भट्ट कैंप की मोहित सूरी निर्देशित फिल्म राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज को 2009 की पहली हिट फिल्म कही जा रही है। इस फिल्म ने इमरान हाशमी और कंगना रानावत के बाजार भाव बढ़ा दिए। भट्ट कैंप में खुशी की लहर है और सोनी बीएमजी भी मुनाफे में रही।
उल्लेखनीय है कि सांवरिया और चांदनी चौक टू चाइना में विदेशी प्रोडक्शन कंपनियों को नुकसान हुआ था। ट्रेड पंडित राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज की सफलता का श्रेय पुरानी राज को देते हैं। इसके अलावा, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह धारणा काफी मजबूत हो रही है कि डरावनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस करती हैं।
सन 2008 में रामगोपाल वर्मा की फिल्म फूंक और विक्रम भट्ट की 1920 ने ठीकठाक कारोबार किया। इसके पहले रामू की भूत भी सफल रही, लेकिन उसकी कामयाबी से प्रेरित होकर बनी दूसरी डरावनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लुढ़क गई। पिछले साल फूंक को पसंद करने के बाद विक्रम भट्ट आशंकित थे कि शायद दर्शकों को 1920 पसंद न आए। दरअसल, उन्हें यह लग रहा था कि कुछ ही हफ्तों के अंतराल पर आ रही 1920 को दर्शक नहीं मिलेंगे, लेकिन उनकी आशंका निराधार निकली। रजनीश दुग्गल और अदा शर्मा जैसे नए कलाकारों के बावजूद 1920 चली। इसकी सफलता ने विक्रम भट्ट से चिपकी फ्लॉप डायरेक्टर की बदनामी दूर की। इस फिल्म की सफलता से जोश में आए विक्रम भट्ट ने तत्काल नई फिल्म शापित की घोषणा कर दी। शापित के जरिए वे गायक उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण और नई अभिनेत्री श्वेता को लॉन्च कर रहे हैं।
विक्रम भट्ट ने शापित की शूटिंग आरंभ कर दी है। इन दिनों फिल्मिस्तान में एक बंगले का सेट लगा कर वे आदित्य और श्वेता के साथ इसकी शूटिंग कर रहे हैं। डरावनी फिल्मों के प्रति अपने आकर्षण और उसके बाजार के संदर्भ में विक्रम कहते हैं, मैं स्वयं डरपोक किस्म का व्यक्ति हूं, इसलिए मुझे बहुत डर लगता है। मैं अकेले में डरावने विचारों से घिरा रहता हूं और डरावनी कहानियां बुनता रहता हूं। फिल्में बना कर मैं अपने डर को अभिव्यक्ति देता हूं। रही दर्शकों की बात, तो मुझे लगता है कि डर के साथ जुड़ा रोमांच दर्शकों को आकर्षित करता है। डरने में भी एक आनंद है। बचपन में डरावनी कहानियां पढ़ते या सुनते समय आप दादी-नानी या मां-पिता को भींच लेते हैं, लेकिन पूरी कहानी सुने बगैर नहीं सोते! फिल्म देखते समय कुछ वैसा ही रोमांच होता है। शापित विक्रम की डरावनी फिल्मों की ट्रायलॉजी की तीसरी और आखिरी फिल्म होगी। उसके बाद वे नए सिरे से डरावनी फिल्में निर्देशित करेंगे।
डरावनी फिल्मों के प्रति दर्शकों के रुझान को देखते हुए परसेप्ट पिक्चर कंपनी ने डरावनी फिल्मों के निर्माण में एकमुश्त राशि निवेश करने का फैसला किया है। फिलहाल उन्होंने पांच फिल्मों की घोषणा की है। प्रियदर्शन के निर्देशन में गर्रर.. इस सीरीज की पहली फिल्म होगी। इसमें प्रियदर्शन एक शेर और उसके शिकार की खौफनाक कहानी चित्रित करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी जल्दी ही 888, 13, मुंबई और वहम का निर्माण करेगी। शैलेन्द्र सिंह मानते हैं कि डरावनी फिल्मों का बाजार है। कम्प्यूटर तकनीक के विकास और स्पेशल इफेक्ट की संभावना से डरावनी फिल्मों में डर पैदा करना ज्यादा आसान हुआ है। उदाहरण के लिए प्रियदर्शन की फिल्म में शेर को एनिमेशन के जरिए तैयार किया जाएगा। फिल्मों के ट्रेड पंडित मानते हैं कि अगर आने वाली डरावनी फिल्में सफल हुई, तो हिंदी फिल्मों में फिर से सातवें दशक का वह दौर आ सकता है, जब बड़े फिल्मकार और स्टार्स भी डरावनी फिल्मों का हिस्सा बनते थे। डरावनी फिल्में मुख्यधारा की मनोरंजक फिल्में मानी जाती थीं।
याद करें, तो वो कौन थी, मेरा साया और मधुमती जैसी फिल्मों में हमने दिलीप कुमार, मनोज कुमार, साधना और वैजयंतीमाला जैसे सितारों को देखा है। मुमकिन है कि आज के पॉपुलर सितारे भी डरावनी फिल्मों की तरफ रुख करें!

Monday, January 19, 2009

गणेश क्यों सुपरस्टार हैं और कार्तिक क्यों नहीं?-राम गोपाल वर्मा

१६ जनवरी २००९ को राम गोपाल वर्मा ने यह पोस्ट अपने माई ब्लॉग पर लिखी है.यहाँ चवन्नी के पाठकों के लिए उसी पोस्ट को हिन्दी में पेश किया जा रहा है.उम्मीद है रामू की इस पोस्ट का मर्म समझा जा सकेगा.

मेरे लिए यह हमेशा रहस्य रहा है कि कोई क्यों जिंदगी में कामयाब हो जाता है और कोई क्यों नहीं हो पाता? यह सिर्फ प्रतिभा या भाग्य की बात नहीं है। मेरे खयाल में इसका संबंध अचेतन प्रोग्रामिंग से होता है, जरूरी नहीं है कि उसे डिजाइन किया गया हो या उसके बारे में सोचा गया हो।
बीते सालों में मैंने कई ऐसे अनेक एक्टर और टेक्नीशियन देखे, जिनके बारे में मेरी ऊंची राय थी, लेकिन वे कुछ नहीं कर सके और जिन्हें मैं औसत या मीडियाकर समझता रहा वे शिखर पर पहुंच गए। ऐसा नहीं है कि मैं इस विषय का अधिकारिक ज्ञाता हूं, लेकिन जिस समय मैं ऐसा सोच रहा था … मेरे आसपास के लोग भी वही राय रखते थे।
इसकी सबसे सरल व्याख्या है 'एस' यानी 'सफलता' । लेकिन सफलता का मतलब क्या है? सफलता वास्तव में प्राथमिक तौर पर ज्यादातर लोगों की स्वीकृति है कि फलां आदमी बहुत ही अच्छा है। लेकिन यह कैसे पता चले कि इतने सारे लोग क्या सोच रहे हैं? 'गदर' और 'लगान' का उदाहरण लें। दोनों फिल्में एक ही दिन रिलीज हुईं, लेकिन 'लगान' की तुलना में 'गदर' ज्यादा बड़ी हिट रही। दोनों फिल्मों की रिलीज के सालों बाद मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसकी पसंद 'गदर' हो। 'लगान' को पसंद करने वाले ढेर सारे मिल जाएंगे। तो 'गदर' को पसदं करनेवाले कौन थे? क्या वे चुपचाप मंगल ग्रह से आए थे और फिल्म देखकर वहीं चले गए?
मजाक एक तरफ, जिन्होंने 'गदर' पसंद की, वे कथित आम दर्शक होंगे, जिनकी परवाह हर चीज में नाम घुसेडऩे वाले समीक्षक और मीडिया नहीं करते। इसलिए जब वे लोगों की पसंद की फिल्मों की तारीफ में कुछ बोलते या लिखते नहीं है तो समय के साथ 'गदर' पसंद करने वाले भी धीरे-धीरे अपनी पसंद के प्रति आशंकित हो जाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि 'गदर' पसंद करने से कोई गलती हो जाएगी।
मेरी एक चाची हैं। एक बार वह किसी के साथ सत्य साईं बाबा के दर्शन के लिए चली गयी थीं। वहां से लौटने के बाद अपने घर में उन्होंने उनकी एक बड़ी तस्वीर लगायी। उन्होंने दावा किया कि जब इतने हजारों लोग उनमें यकीन रखते हैं तो निश्चित ही वे दिव्य हैं। मैंने उनका प्रतिकार किया और कहा कि अगर वह सचमुच यकीन नहीं रखतीं, लेकिन हजारों लोगों के विश्वास के कारण खुद भी यकीन करने लगती हैं तो यही बात उन हजारों के साथ भी तो हो सकती है। इसका मतलब हुआ कि सभी एक सामूहिक झूठ में यकीन कर रहे हैं। मैं यहां सत्य साईं बाबा की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके प्रति लोगों के यकीन के आधार पर सवाल कर रहा हूं।
मैं यह भी नहीं समझ सका कि कार्तिक अपने भाई गणेश से छोटे भगवान क्यों हैं? मिथकों में कहीं नहीं कहा गया है कि कार्तिक कमतर हैं और न कहीं यह लिखा गया है कि गणेश असाधारण हैं। लेकिन किसी कारण से स्वर्ग के पीआर डिपार्टमेंट ने गणेश को आगे रखा और कार्तिक को पीछे कर दिया। उन्होंने बुलंद आवाज में गणेश का प्रोमोशन किया, यहां तक कि उनके जन्म की अतार्किक कहानी को भी श्रद्धालु (दर्शक) ध्यान से देखते-सुनते हैं (उन पर आधारित अतार्किक फिल्म भी सुपरहिट हो जाती है।)
अगर फिल्म इंडस्ट्री में कोई लेखक ऐसी कहानी सुनाए तो उसे हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। 'बाल गणेश द्वार पर खड़े होकर पहरा दे रहे हैं। मां पार्वती अंदर नहा रही हैं। पिता शिव आते हैं तो गणेश उन्हें रोकते हैं। क्रोधित होकर शिव उनका सिर काट देते हैं (मेरे ख्याल में शिव की क्रूरता से दुनिया को सीखना चाहिए।) और जब पार्वती बताती हैं कि वह बच्चा कौन है। शिव बाहर जाते हैं और एक हाथी का सिर (क्या जंगली जीवों के पक्षधर पेटा वाले सुन रहे हैं) काट लाते हैं और बच्चे के सिर पर चिपका देते हैं।' इसके अलावा वे मां के प्रिय थे… बाकी मेरी समझ में नहीं आता कि उन्हें दिव्य प्रतिष्ठा क्यों मिली और निस्संदेह हमने कभी कार्तिक के बारे में जिज्ञासा नहीं की, क्योंकि उन्हें नजरअंदाज करने के लिए हमें तैयार कर दिया गया था।
हर तरह से और व्यावहारिक दृष्टिकोण से कार्तिक अधिक सुंदर हैं और स्मार्ट दिखते हैं। (कम से कम गणेश की तरह उनसे जुड़ी कोई अतार्किक कहानी नहीं है) और न ही मिथकों में कहीं यह उल्लेख है कि वे गणेश से कम शक्तिशाली हैं।
तो फिर गणेश क्यों सुपरस्टार हैं और कार्तिक क्यों नहीं?
अंत में इनता ही कहना चाहूंगा कि किसी के कामयाब होने या न होने का चमत्कार सिर्फ बालीवुड में ही नहीं होता, डिवाइनवुड में भी यही होता है।


Thursday, December 11, 2008

दरअसल:रामगोपाल वर्मा की ताज यात्रा

-अजय ब्रह्मात्मज
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के साथ राम गोपाल वर्मा ताज होटल क्या चले गए, हंगामा खड़ा हो गया! उनके हाथ से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई। हालांकि उनकी कुर्सी के जाने या रहने का सीधा ताल्लुक रामू की ताज यात्रा से नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो रामू को इसके लिए जिम्मेदार मानेंगे। एक एसएमएस भी चला कि रामू ने दो बार सरकार बनाई और एक बार गिरा दी।
बगैर उत्तेजित हुए हम सोचना आरंभ करें, तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के साथ रामू की ताज यात्रा पर व्यक्त हो रहीं तीखी प्रतिक्रियाएं दरअसल फिल्मों के प्रति हमारी सोच की बानगी है। फिल्मों को हम सभी ने मनोरंजन का माध्यम मान लिया है। निर्माता हमारे लिए एंटरटेनर के सिवा और कुछ नहीं। समाज में फिल्मों को ऊंचा दर्जा नहीं हासिल है। हम फिल्मी चर्चाओं में इतने गैरजिम्मेदार होते हैं कि उनकी जिंदगी के बारे में चटखारे लेकर बातें करते हैं और उन्हें नीची नजर से देखते हैं। अजीब विरोधाभास दिखता है समाज में। एक तरफ तो फिल्में देखने के लिए आतुर दर्शकों की भीड़ हमें अचंभित करती है। किसी भी स्थान पर स्टार की मौजूदगी आकर्षण का केंद्र बन जाती है। हम उन्हें छूने के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर चर्चा और बातचीत में फिल्मों को सिरे से खारिज कर देते हैं। क्या निर्माता, आर्टिस्ट और फिल्म बिरादरी के लोग इस समाज में नहीं रहते? क्या वे मुंबई हमले जैसी घटनाओं से प्रभावित नहीं होते? देखें, तो लोगों के सुख-दुख और हर्ष-विषाद के साथ ही राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों से वे भी उसी प्रकार आहत या गर्व महसूस करते हैं, जैसा कि एक आम हिंदुस्तानी। मुंबई हमले की ही बात करें, तो मीडिया में अमिताभ बच्चन, आमिर खान, अजय देवगन समेत छोटी-बड़ी फिल्मी हस्तियों के बयानों और टिप्पणियों को प्रमुखता से छापा और प्रसारित किया जा रहा है। बहस में हम उन्हें शामिल करते हैं, पैनल चर्चा में बुलाते हैं, ताकि दर्शक टीवी से चिपके रहें। अगर उनकी बिरादरी का एक प्रमुख व्यक्ति मौका पाकर ताज होटल में चला जाता है, तो हम हाय-तौबा मचाने लगते हैं और उसकी संवेदनशीलता को मसखरी बना देते हैं।
बेटे रितेश देशमुख को लेकर ताज होटल गए विलासराव देशमुख पर सवाल उठा रहे लोगों को क्या तब भी आपत्ति होती, जब रितेश राजनीति में होते? शायद नहीं होती। नेहरू इंदिरा गांधी को लेकर महत्वपूर्ण बैठकों और यात्राओं में जाते थे। कहा जा सकता कि इंदिरा गांधी भी राजनीति में थीं, लेकिन क्या सिर्फ फिल्मों में काम करने से व्यक्ति कम समझदार और असंवेदनशील हो जाता है? क्या फिल्मों से जुड़ने के बाद मनुष्य को तकलीफ नहीं होती?
अपराध और आतंक पर फिल्में बनाने के माहिर राम गोपाल वर्मा ने एक फिल्मकार की हैसियत से पहला मौका मिलते ही मुंबई हमले के ठिकाने को देखने की पहल की। मान लें कि उनके दिमाग में कोई फिल्म घूम रही हो और वे उसके फ‌र्स्ट हैंड रिसर्च के लिए ही वहां चले गए हों, तो क्या उन्होंने अपराध कर दिया? आखिर विलासराव देशमुख के साथ रामू की ताज यात्रा प्रहसन क्यों बन गई है?
दरअसल, हमारी नजर में फिल्मकार महज मनोरंजन का सामान परोसने वाले होते हैं और यही वजह है कि गंभीर और संवेदनशील मुद्दों से उन्हें दूर रखा जाता है। माना जाता है कि उनकी सामाजिक और राजनीतिक समझ खोखली होती है। वे नाच-गाने और मनोरंजन के लिए ही ठीक हैं। वे विदूषक हैं और उन्हें बस विदूषक की भूमिका में ही रहना चाहिए। वास्तव में यह फिल्मकारों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह की एक झलक है। क्या हम इस पूर्वाग्रह को छोड़ने के लिए तैयार हैं..?

Saturday, August 23, 2008

फ़िल्म समीक्षा:फूँक

डर लगा राम गोपाल वर्मा के लिए
फूंक डराती है। यह डर फिल्म देखने के बाद और बढ़ जाता है। डर लगता है कि राम गोपाल वर्मा और क्या करेंगे? प्रयोगशील और साहसी निर्देशक राम गोपाल वर्मा हर विधा में बेहतर फिल्म बनाने के बाद खुद के स्थापित मानदंडों से नीचे आ रहे हैं। डर लग रहा है कि एक मेधावी निर्देशक सृजन की वैयक्तिक शून्यता में लगातार कमजोर और साधारण फिल्में बना रहा है। फूंक रामू के सृजनात्मक क्षरण का ताजा उदाहरण है।
पूरी फिल्म इस उम्मीद में गुजर जाती है कि अब डर लगेगा। काला जादू के अंधविश्वास को लेकर रामू ने लचर कहानी बुनी है। फिल्म की घटनाओं, दृश्य और प्रसंग का अनुमान दर्शक पहले ही लगा लेते हैं।

फिल्म खतरनाक तरीके से काला जादू में यकीन करने की हिमायत करती है और उसके लिए बाप-बेटी के कोमल भावनात्मक संबंध का उपयोग करती है। रामू से ऐसी पिछड़ी और प्रतिगामी सोच की अपेक्षा नहीं की जाती। फिल्में सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती, भारतीय समाज में वे दर्शकों की मानसिकता भी गढ़ती हैं। एक जिम्मेदार निर्देशक से अपेक्षा रहती है कि वह मनोरंजन के साथ कोई विचार भी देगा।

मुख्य कलाकार : सुदीप, अमृता खनविलकर, अहसास चानना, श्रेय बावा, ज्योति सुभाष, जाकिर हुसैन, किशोर कदम आदि।
निर्देशक : राम गोपाल वर्मा
तकनीकी टीम : निर्माता- आजम खान, लेखक- मिलिंद गडकर

Friday, July 18, 2008

फ़िल्म समीक्षा:कांट्रेक्ट

फिर असफल रहे रामू
बारीक स्तर पर कांट्रैक्ट के दृश्यों के बीच उभरते भाव और निर्देशक की सोच को जोड़ने की कोशिश करें तो यह फिल्म कथित स्टेट टेरेरिज्म का चित्रण करती है। राम गोपाल वर्मा ने विषय तो रखा है अंडरव‌र्ल्ड और आतंकवाद के बीच गठबंधन का, लेकिन उनकी यह फिल्म एक स्तर पर राजसत्ता की जवाबी रणनीति का संकेत देती है। आतंकवादी संगठन जिस तरह किसी शोषित या पीडि़त को गुमराह कर आतंकी बना देते हैं, लगभग उसी तरह पुलिस और प्रशासन भी अपने गुर्गे तैयार करता है। कांट्रैक्ट देख कर तो ऐसा ही लगता है।
रामू अपनी फिल्मों में मुख्य रूप से चरित्रों से खेलते हैं। अगर रंगीला और सत्या की तरह चरित्र सटीक हो जाएं तो फिल्में सफल हो जाती हैं। चरित्रों के परिवेश, पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य में वे गहरे नहीं उतरते। देश की सामाजिक स्थितियों की समझदारी नहीं होने के कारण यह उनकी सीमा बन गई है। कांट्रैक्ट में यह सीमा साफ नजर आती है।
सेना के रिटायर अधिकारी अमन (अद्विक महाजन) को पुलिस अधिकारी अहमद हुसैन आतंकवादियों से निबटने के लिए अंडरव‌र्ल्ड में घुसने के लिए प्रेरित करता है। पहली मुलाकात में ऐसे मिशन में शामिल होने से साफ इंकार कर देने वाला अमन एक आतंकवादी हमले में बीवी और बेटी की मौत के बाद स्वयं ही मिशन में शामिल होता है। हमें लगता है कि उसके इस मिशन से अंडरव‌र्ल्ड और टेरेरिज्म का रिश्ता बेनकाब होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनके लेखक प्रशांत पांडे यहां विफल रहे। अमन के अमान बनने और सुलतान को खत्म करने की पटकथा में ड्रामा और एक्शन की कमी है।
कांट्रैक्ट में रामू की पिछली फिल्मों के दृश्यों, घटनाओं, स्थितियों, पात्रों और संवादों तक का दोहराव है। सरकार राज में एक संवाद था - फैसले गलत नहीं होते, नतीजे गलत होते हैं। वह इस फिल्म में भी सुनाई पड़ता है। हां, इस फिल्म में सुल्तान की भूमिका में जाकिर हुसैन किरदार को अच्छी तरह निभा गए हैं। नए अभिनेता अद्विक में भी आत्मविश्वास है। साक्षी गुलाटी कुछ दृश्यों में सिर्फ सुंदर दिखती हैं।

मुख्य कलाकार : अद्विक महाजन, साक्षी गुलाटी, जाकिर हुसैन, प्रशांत पुरंदरे आदि।
निर्देशक : राम गोपाल वर्मा
तकनीकी टीम : निर्माता : प्रवीण निश्चल, अजय बिजली, संजीव बिजली, संगीत : अमर मोहिले, बापी-टुटुल, साना, लेखक : प्रशांत पांडे, गीत : प्रशांत पांडे, महबूब

Friday, May 30, 2008

राम गोपाल वर्मा और सरकार राज

यहाँ प्रस्तुत हैं सरकार राज की कुछ तस्वीरें.इन्हें चवन्नी ने राम गोपाल वर्मा के ब्लॉग से लिया है.जी हाँ,रामू भी ब्लॉग लिखने लगे हैं।
http://rgvarma.spaces.live.com/default.aspx


















Saturday, October 6, 2007

थ्रिलर व कॉमेडी के बीच पिस गयी गो


-अजय ब्रह्मात्मज

क्लिक..क्लिक.. यह है राम गोपाल वर्मा फ्लिक राम गोपाल वर्मा जितनी फिल्में बनाते हैं.. उनकी कंपनियों के नाम भी उतने ही हैं। कभी फैक्ट्री तो कभी आरजीवी फिल्म्स तो कभी यह फ्लिक.. इरादा क्या है? शायद दर्शकों को लगातार तंग करना..।
राम गोपाल वर्मा फ्लिक की गो के निर्देशक मनीष श्रीवास्तव हैं। उन्होंने इस फिल्म की योजना क्यों और कैसे बनाई, उसे रामू ने क्यों मंजूर किया? यह तो दोनों से मिल कर ही पूछा जा सकता है। फिलहाल फिल्म हमारे सामने है, जिसमें नायक अभय (गौतम) और नायिका वसु (निशा कोठारी) गा रहे हैं बैंड बजा दे। वो अपना तो क्या बैंड बजाएंगे.. दर्शकों का बैंड बजाने पर जरूर लगे हैं। शायद ये भी बता रहे हैं कि रामू का भी बैंड बज गया है।
दो युवा प्रेमी अपने माता-पिता से नाराज होकर घर से भागते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि अनजाने में किन चंगुलों में फंसते जा रहे हैं। ऐसे विषय पर एक रोमांचक फिल्म बन सकती थी, लेकिन मनीष श्रीवास्तव कभी थ्रिलर तो कभी कॉमेडी का सहारा लेते दिखते हैं। हम सभी जानते हैं कि दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय.. गो भी चकनाचूर हो जाती है।
उम्दा एक्टर के।के. मेनन अधपके किरदार को निभाने में निराश करते हैं। गलती उनकी इतनी है कि उन्होंने रोल क्यों लिया? राजपाल यादव अब जॉनी लीवर के ट्रैक पर जा रहे हैं। अपने लाउड अभिनय से वह प्रशंसकों को दुखी कर रहे हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अच्छे एक्टरों की हत्या का यह पुराना तरीका है। उन्हें कोशिश कर इस दुष्चक्र से बाहर आ जाना चाहिए।

मुख्य कलाकार : गौतम, निशा कोठारी, राजपाल यादव, गोविंद नामदेव, केके
निर्देशक : मनीष श्रीवास्तव
तकनीकी टीम : निर्माता-राम गोपाल वर्मा, गीत-स्वानंद किरकिरे, राहुल सेठ, संगीत-स्नेहा खानवलकर।

Saturday, September 1, 2007

'आग' से जख्मी हुए रामू

अजय ब्रह्मात्मज
रामगोपाल वर्मा ने आगे बढ़कर 'शोले' को फिर से बनाने का जोखिम लिया था। इस जोखिम में वह चूक गए हैं। 'शोले' इस देश की बहुदर्शित फिल्म है। इसके संवाद, दृश्य और पात्र हमारी लोकरुचि का हिस्सा बन चुके हैं। लगभग हर उम्र के दर्शकों ने इसे बार-बार देखा है। यह फिल्म रामू को भी अत्यंत प्रिय है। रामू तो पूरे खम के साथ कह चुके हैं कि 'शोले' नहीं बनी होती तो मैं फिल्मकार नहीं बन पाता। बहरहाल, घटनाएं और संवेदनाएं 'शोले' की हैं, सिर्फ परिवेश और पात्र बदल गए हैं। कहानी रामगढ़ की जगह कालीगंज की हो गई है। यह मुंबई के पास की टापूनुमा बस्ती है, जहां ज्यादातर मछुआरे रहते हैं। खूंखार अपराधी बब्बन की निगाह इस बस्ती पर लगी है। इंस्पेक्टर नरसिम्हा से उसकी पुरानी दुश्मनी है। नरसिम्हा को भी बब्बन से बदला लेना है। वह हीरू और राज को ले आता है। ये दोनों छोटे-मोटे अपराधी हैं। जो नासिक से मुंबई आए हैं रोजगार की तलाश में ़ ़ ़ बसंती यहां घुंघरू बन गई है और तांगे की जगह ऑटो चलाती है तो राधा का बदलाव दुर्गा में हुआ है, जिसका अपना नर्सिग होम है। बाकी सारे पात्र भी नाम और भेष बदलकर मौजूद हैं। 'शोले' के कुछ महत्वपूर्ण दृश्य प्रसंगों को थोड़े बदलाव के साथ पेश करने में रामू मुंह के बल गिरे हैं। रीमेक में कोई भी दृश्य मूल की तरह प्रभावशाली नहीं है। हां, कुछ नए दृश्यों में रामू अपनी छाप के साथ मौजूद हैं। गीत-संगीत और उनका फिल्मांकन रामू की अन्य फिल्मों की तुलना में भी कमजोर है। 'रामगोपाल वर्मा की आग' का कोई भी संवाद याद नहीं रहता। हां, अगर इसे नयी फिल्म की तरह देखें और याददाश्त से 'शोले' निकाल दें तो औसत फिल्मों की श्रेणी में इसे रख सकते हैं। ऐसी मेहनत, प्रतिभा और लागत के साथ रामू ने किसी नए विषय पर मौलिक फिल्म बनायी होती तो करियर और क्रियेटिविटी के लिहाज से बेहतर रहता। '़ ़ ़ आग' से खेलने में रामू जख्मी हो गए हैं। अभिनय की बात करें तो अमिताभ बच्चन और मोहन लाल को एक साथ पर्दे पर देखना किसी दर्शक के लिए यादगार अनुभव से कम नहीं। दोनों ही एक-दूसरे को उम्दा टक्कर देते हैं। '़ ़ ़ आग' का बाक्स आफिस पर जो भी हश्र हो, यह फिल्म अमिताभ की बब्बन सिंह की भूमिका के लिए याद रखी जाएगी। अजय देवगन की प्रतिभा का दुरुपयोग हुआ है। निशा कोठारी अपनी क्षमता से ज्यादा कोशिश करती नजर आती हैं। सुष्मिता सेन सादे रूप में भी अच्छी लगती हैं। नए अभिनेता प्रशांत राज निराश नहीं करते। पहली फिल्म से वह उम्मीद जगाते हैं।