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Friday, October 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : सीक्रेट सुपरस्‍टार



फिल्‍म रिव्‍यू
सीक्रेट सुपरस्‍टार
जरूरी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

खूबसूरत,विचारोत्‍तेजक और भावपूर्ण फिल्‍म सीक्रेट सुपरस्‍टार के लिए लेखक-निर्देशक अद्वैत चंदन को बधाई। अगर फिल्‍म से आमिर खान जुड़े हो तो उनकी त्रुटिहीन कोशिशों के कारण फिल्‍म का सारा क्रेडिट उन्‍हें दे दिया जाता है। निश्चित ही आमिर खान के साथ काम करने का फायदा होता है। वे किसी अच्‍छे मेंटर की तरह निर्देशक की सोच को अधिकतम संभावनाओं के साथ फलीभूत करते हैं। उनकी यह खूबी सीक्रेट सुपरस्‍टार में भी छलकती है। उन्‍होंने फिल्‍म को बहुत रोचक और मजेदार तरीके से पेश किया है। पर्दे पर उन्‍होंने अपनी पॉपुलर छवि और धारणाओं का मजाक उड़ाया है। उनकी मौजूदगी फिल्‍म को रोशन करती है,लेकिन वे जायरा वसीम की चमक फीकी नहीं पड़ने देते। सीक्रेट सुपरस्‍आर एक पारिवारिक फिल्‍म है। रुढि़यों में जी रहे देश के अधिकांश परिवारों की यह कहानी धीरे से मां-बेटी के डटे रहने की कहानी बन जाती है। हमें द्रवित करती है। आंखें नम होती हैं और बार-बार गला रुंध जाता है।
वडोदरा के निम्‍नमध्‍यवर्गीय मुस्लिम परिवार की इंसिया को गिटार बजाने का शौक है। वह लिखती,गुनगुनाती और गाती है। उसका सपना है कि वह सिंग्रिग स्‍टार बने। मां उसके साथ हैं1 दिक्‍क्‍त पिता की है। खास तरह की सोच के साथ पले-बढ़े पिता को अहसास ही नहीं है कि व‍ह रुढि़वादी और कठोर है। वह पारंपरिक पति और पिता की तरह बीवी-बेटी को नियंत्रण में रखना चाहता है। बेटे से उसे अलबत्‍ता प्‍यार है। उसका लाढ़-दुलार बेटे तक ही सीमित रहता है। बीवी पर हाथ उठाना वह अपना अधिकार समझता है। फिल्‍म की शुरूआत में वह गैरमौजूद है,लेकिन मां-बेटी की बातचीत से हमें जानकारी मिल जाती है कि हम कैसे पति और पिता से मिलने वाले हैं?
मां-बेटी की मिली-जुली इस कहानी में तय करना मुश्किल है कि कौन सुपरस्‍टार है? मां एक दायरे में पली है। वह चाहती तो है,लेकिन हिम्‍मत नहीं कर पाती। बेटी हिम्‍मती है,लेकिन दायरे में बंधी है। दोनों आपनी सोच,शौक और सुकून के पल निकाल ही लेते हैं। बेटी की संबल है मां और मां की प्रेरणा है बेटी। दोनों अपनी परिस्थिति के शिकार हैं,लेकिन उनमें रत्‍ती भी भी नकारात्‍मकता नहीं है। वे खुशी के रास्‍ते निकालती रहती हैं। लेखक को बधाई देनी चाहिए कि अवसाद से घिरे इन किरदारों को उन्‍होंने उदास और व्‍यथित नहीं रख है। वक्‍त पड़ने पर आने फैसलों से वे चौंकाती हैं। उम्‍मीद देती हैं।
इंसिया की भूमिका में जायरा वसीम की अदाकारी नैसर्गिक है। जायरा ने इंसिया को उसकी मासूमिसत और जिद के साथ निभाया है। निर्देशक की सोच में ढली जायरा इंसिया को साक्षात कर देती है। इंसिया के भाई और दोस्‍त के रूप में आए कलाकार जीवंत हैं। दोस्‍त चिन्‍मय उम्‍दा किरदार है। उसे ऐसा ही कोई कलाकार निभा पाता। मां की भूमिका में केहर विज उल्‍लेखनीय हैं। उनका किरदार एक दायरे में ही रहता है,जिसे उन्‍होंने बखूबी निभाया है। आमिर खान के क्‍या कहने? पृष्‍ठभूमि में रहते हुए भी वे शक्ति कुमार को जिस अंदाज में पेश करते हैं...वह दर्शनीय है। इस फिल्‍म की खोज हैं राज अर्जुन। उन्‍होंने पिता फारुख की भूमिका में खौफ पैदा किया है। उन्‍हें लेख-निर्देशक का भरपूर सपोर्ट मिला है। पर्दे पर हो तो या नहीं हो तो भी उनसे खौफजदा बीवी-बेटी की वेदना सब कुछ कह देती है। उम्‍मीद है फिल्‍म इंडस्‍ट्री उनकी प्रतिभा पर गौर करेगी।
अवधि- 150 मिनट
**** चार स्‍टार

Saturday, September 19, 2015

किरण को मेरा असली रूप याद नहीं-आमिर खान



-अजय ब्रह्मात्‍मज


    आमिर खान अपनी नई फिल्‍म दंगल की शूटिंग के लिए लुधियाना पहुंच चुके हैं। 22 सितंबर से नीतेश तिवारी की इस फिल्‍म की शूटिंग आरंभ हो जाएगी। आईनेक्‍स्‍ट के लिए आमिर खान ने व्‍यस्‍त रुटीन से समय निकाला और लुधियाना से फोन पर उन्‍होंने अजय ब्रह्मात्‍मज से खास बातचीत की :-

- अभी कितना वजन है आप का ?

0 आज मेरा वजन 95 किलोग्राम है।

-आप का वजन राष्‍ट्रीय मुद्दा बन गया है ?

0 (लंबी हंसी) हा...हा... अपनी फिल्‍मों के लिए मेरी यही कोशिश रहती है कि फिजिकली किरदार में दिखूं। मैं अपने शरीर के साथ ऐसा प्रयोग करता हूं। लोगों को यह खिलवाड़ लगता है। एक्‍टर का शरीर उसका टूल होता है। अपने काम के लिए उस टूल का सही इस्‍तेमाल होना चाहिए।

- इसकी जरूरत क्‍यों महसूस हुई और क्‍या करना पड़ा ?

0 फिल्‍म में मेरी उम्र 55 बताई जा रही है। मैं एक्‍स रेसलर हूं। मेरा वजन बढ़ चुका है। फिल्‍म देखने पर आप समझेंगे कि वजन बढ़ाना क्‍यों जरूरी था। फिल्‍म के शुरुआत में मैं फिट और यंग हूं। सुशील कुमार की तरह। हमलोग उस हिस्‍से की शूटिंग अंत में करेंगे। पांच महीनों में मुझे अपना वजन कम करना होगा। उसे 95 से 60 किलोग्राम पर लाना होगा। शरीर को झटका तो लगता है। मेरी सांसें बदल गई है। अभी छलांगते हुए सीढि़यां नहीं चढ़ पाता।

- आप के बच्‍चे खास कर आजाद की क्‍या प्रतिक्रिया रही ? वे तो अभी नहीं जानते कि आप एक्‍टर हैं और यह जरूरी है आप के लिए ?

- बच्‍चों से अधिक किरण की प्रतिक्रिया बताऊं। वह बता रही थीं कि मैं आप का ओरिजिनल रूप भूल चुकी हूं। हर साल नई फिल्‍म के साथ आप का दूसरा रूप होता है। लगान के समश्‍ आप का अलग रूप था। मंगल पांडे के समय आप की मूंछें थीं और लंबे बाल थे। दर्शकों की प्रतिक्रिया तो फिल्‍म की रिलीज के बाद मालूम होगी। आजाद तो बहुत छोटे हैं। वे मेरे पेट पर बैठ कर वे खूब कूदते हैं। मेरा पेट  उनका अखाड़ा हो गया है। एक दिन वे मेरे साथ रेस्लिंग के लिए आए। अलग दिन से वे रेस्लिंग  करने लगे। स्‍कूल से आकर एक कमरे में रखे गद्दे पर उनकी रेस्लिंग चलती है।

-अपने किरदार महावीर फोगाट के बारे में बताएं ?

0 मेरे लिए महावीर फोगाट हीरोइक कैरेक्‍टर हैं। इस फिल्‍म की कहानी वे अपनी जिंदगी में जी चुके हैं। यह उनकी ही कहानी है। एक ऐसे समाज में वे रहे,जो पैट्रियाकल सोसयटी है। छोटे से गांव में रह कर भी बेटियों को रेस्‍लर बनाने का बड़ा कदम उबना बहुत उल्‍लेखनीय प्रयास है। उन्‍होंने अपनी बेटियों को सपोर्ट दिया। उन्‍हें इंडपेंडेंट होने दिया। उन्‍हें हर हिसाब से ताकतवर और काबिल बनाया। हम सब उनसे सीख सकते हैं। हमें सीखना भी चाहिए। मेरे लिए वे प्रेरक चरित्र हैं।

-फिल्‍म कहां फोकस करती है ?

0 फिल्‍म देखते समय दर्शक इसे अलग-अलग तरीके से समझेंगे। अगर फिल्‍म के दिल के बारे में बताऊं तो  वह वीमेन एंपावरमेंट है। एक बाप ने अपनी बेटियों को ऐसी ट्रेनिंग दी कि वे उसका सपना पूरा कर सकें। यह बहुत ही मूविंग और इमोशनल स्‍टोरी है। नीतेश तिवारी ने इसकी मजेदार स्क्रिप्‍ट लिखी है। इसका टॉप लेयर ह्यूमर है। उनकी स्क्रिप्‍ट में राजकुमार हिरानी की खूबियां मिलेंगी। अहम और जरूरी बातें भी ह्यूमर के जरिए की गई हें। एंटरटेनिंग तरीके से हम अपनी बात रखेंगे।

- मध्‍यवर्गीय परिवारों में लड़कियों को पढ़ने या अपनी पसंद के करिअर चुनने देना भी एक संघर्ष और साहस का काम होता है ?

0 बिल्‍कुल... मैं समझ सकता हूं। शुरू में मैं इन पर ध्‍यान नहीं देता था। मेरी अपनी जिंदगी सुरक्षित और सुविधाओं में रही। हमारे परिवारों की लड़कियों का ऐसी दिक्‍कतों का सामना नहीं करना पड़ा। फिर भी मेरी अम्‍मी बनारस की हैं। अब्‍बा जान का रिश्‍ता लखनऊ और भोपाल से रहा। देश से मेरा एक कनेक्‍शन तो रहात्र उसे सत्‍यमेव जयते के अनुभव ने और बढ़ा दिया। मुझे देश की ऑन ग्राउंड रियलिटी की सही जानकारी मिली। मुझे कड़वे और प्रेरक अनुभव मिले। लोगों की हिम्‍मत ने मुझे दंग किया। वे विपरीत स्थितियों से जूझते और विजयी होते हैं। मुझे लगता है कि मैं काफी बदल गया हूं।

-आप में यह बदलाव कैसे आया ?

0 मुझ पर सबसे बड़ा असर मेरी अम्‍मी का है। अम्‍मी सेंसिटिव इंसान हैं। दूसरों के बारे में ज्‍यादा सोचती हैं। बचपन में अैनिस खेलता था। जीत कर आता था तो मां पीठ थपथपाती थीं,लेकिन फिर किसी बहाने से बताती थीं कि जो लड़का हारा है,वह भी अभी घर पहुंचा होगा। उसकी अममी ने भी पूछा होगा कि जरते या हारे ? उसने बोला होगा कि हारा तो उसकी अम्‍मी को बुरा लग र‍हा होगा। तब मेरी उम्र 11 साल थी। अममी के नेचर का असर है। दूसरा सत्‍यजित भटकल का बहुत प्रीााव रहा है। वे मेरे बचपन के मित्र और सत्‍यमेव जयते के डायरेक्‍टर हैं। वे आरंभ्‍ से ही सोशल मुद्दों के साथ जुड़ रहे हें। वे मेरे करीबी दोस्‍त हैं।