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Wednesday, March 5, 2014

कहानी की खोज सबसे बड़ी चुनौती होगी : कमलेश पांडे

कमलेश पांडे का यह लेख अनुप्रिया वर्मा के ब्‍लॉग अनुख्‍यान से लिया गया है। 
मैं सीधे तौर पर मानता हूं कि आनेवाले सालों में बल्कि यूं कहें आने वाले कई सालों में हिंदी सिनेमा व टेलीविजन दोनों ही जगत में कहानी की खोज ही एक बड़ी चुनौती होगी. मेरा मानना है और मेरी समझ है कि हां, हमने अपने तकनीक में सिनेमा को हॉलीवुड के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है. हमारी फिल्मों की एडिटिंग अच्छी हो गयी है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी हो गयी है. हम तकनीक रूप से काफी आगे बढ़ चुके हैं. लेकिन हमने कहानी को फिल्म की आखिरी जरूरत बना दी है. आज फिल्मों में खूबसूरत चेहरा है. खूबसूरत आवाज है. चमक है. धमक है. कुछ नहीं है तो बस कहानी नहीं है. जो हमारी पहली जरूरत होती थी. अब आखिरी हो चुकी है. फिल्मों का शरीर खूबसूरत हो गया है लेकिन आत्मा खो चुकी है. आपने बाजारों में देखा होगा जिस तरह दुकानों में औरतों और मर्दों के पुतले खड़े होते हैं. खूबसूरत से कपड़े पहन कर और उन डम्मी क ो देख कर आप किसी दुकान में प्रवेश करते हैं. लेकिन उनमें जान नहीं होती. फिल्मों की भी यही स्थिति हो गयी है. अभी हाल ही में मैं बंगलुरु में था. फिक्की के कार्यक्रम के लिए. स्क्रिीप्टिंग का वर्कशॉप कर रहा था. वहां जितने बच्चे थे मैंने उनसे कहा कि 2003 से लेकर अब तक 2013 में 10 सालों में कम से कम आठ हजार फिल्में बनी हंै. तो कोई दो फिल्मों का नाम बताओं जो आपको आज भी याद है. किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन हमारा सिनेमा यह तो नहीं था. हम आज भी शोले, मुगलएआजम, श्री 420, आवारा और कई फिल्में देखना पसंद करते हैं. आज भी इन फिल्मों का हैंगओवर हम पर  से उतरा नहीं है. आज भी ये फिल्में प्रासंगिक लगती हैं और हम पर उतना ही असर छोड़ती हैं. जबकि कितनी पुरानी हो चुकी हैं. लेकिन पिछले कई सालों में जो फिल्में बनी हैं और जिन फिल्मों ने 100 करोड़, 200 करोड़ क्लब में शामिल होने का दावा ठोखा है,. क्या वे फिल्में 10 साल बाद भी याद की जायेगी. शायद नहीं. तो मेरी समझ से फिल्मों ने अपनी आत्मा को खोया है और कहानी ही उसकी आत्मा है. मुझे तो लगता है कि अब फिल्म और टेलीविजन में उन लोगों की भी कमी हो गयी है जो अच्छी कहानियों की पहचान कर सकें. हां, मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा और टेलीविजन ने जो मार्केटिंग स्ट्रेजी तैयार की है वह अब विशेषता बन चुकी है. जिस तरह से यहां फिल्मों की मार्केटिंग की जाती है कि बुरी से बुुरी फिल्में भी रिलीज होती हैं और दर्शक जाते ही देखने. चूंकि दर्शकों को तो फिल्म चाहिए हर वीकएंड. फिर वह बुरी हो या अच्छी तो उस लिहाज से आनेवाले सालों में भी मार्केटिंग की वजह से फिल्में चलेंगी. लेकिन मैं मानता हूं कि आप इसे कामयाबी न समझें. हिम्मत हैं तो वैसी फिल्में बनायें जो 10 साल के बाद भी प्रासंगिक हो. टीवी की बात करें तो वाकई बड़े परदे से वह किसी भी तरह कम नहीं हैं. लेकिन चूंकि वहां भी  कहानियों की कमी है तो लोगों ने वहां रियलिटी शोज से काम चलाना शुरू कर दिया है तो आनेवाले साल में यह चुनौती फिर से रहेगी कि हम कहानियों की खोज करें. मैं पूछता हूं कि क्या है सैटेलाइट चैनल्स के पास तो इतने पैसे हैं तो क्यों नहीं वह नये तरह के शोज और कहानियों को लेकर आता है. 80 के दशक में जो टीवी ने गोल्डन एरा देखा है वह फिर से क्रियेट क्यों नहीं कर पाता. इसकी सीधी वजह यह है कि सैटेलाइट चैनल के पास पैसे हैं. लेकिन सोच नहीं है. हिम्मत नहीं है. साहस नहीं है. साहस है तो जायें ऐसे जगहों पर जहां कहानियां हैं और ढूंढ कर निकालें. हर चैनल पर आपको रियलिटी शोज ही नजर आते हैं और एक से होते हंै.तो मेरा मानना है कि फिल्मों और धारावाहिक छोटे परदे का इम्तिहान यही है कि वह कब तक लोगों के जेहन में जिंदा हैं. मुख्य मकसद यही है कि वह कब तक लोगों के साथ चल पाती है. लोगों को लग रहा है कि अरे 100 करोड़ 200 करोड़. तो मैं कहना चाहूंगा कि जनाब यह सब कामयाबी का सबूत नहीं है. बल्कि यह चमत्कार मार्केटिंग है. मार्केटिंग को आपने विशेषता बना ली है और फिल्म मेकिंग और टेलीविजन मेकिंग को कहीं पीछे छोड़ दिया है. और जो लोग ये सारी बातें करते हैं. उन्हें आप कहने लगते हो कि जमाने के साथ आप नहीं चल रहे. जबकि हकीकत यही है कि जो लंबे समय तक आपके साथ रहे वही असली कहानी है. वही अच्छी सिनेमा है. वही अच्छी टीवी है. टिकट के दाम बढ़ा कर, हजारों स्क्रीन पर फिल्में रिलीज करके तीन दिनों में पैसा कमा कर आप सोच रहे हैं कि आप कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं तो यह आपकी गलत सोच है. हालांकि भाग मिल्खा भाग और रांझणा जैसी फिल्में अपवाद रही हैं. बात वही है कि बबूल के पेड़ को भी लोग पड़ समझने लगते हैं तो कुछ फिल्में हैं जो अंधों में काना राजा बन जाती हैं. लेकिन इसका मतलब आप यह समझ लें कि बहुत अच्छे काम हो रहे तो मैं नहीं मानता. चुनौतियां यही हैं कि फिल्मों में नये लोगों को जो मौके मिल रहे हैं, वे मिलते रहें. प्रतिभाओं की खोज हो, अच्छी कहानियों की खोज हो, छोटे परदे पर रियलिटी शोज कम हो. अच्छी कहानियों वाले शोज आये और जितना आगे बढ़ें अपने इतिहास की धरोहर को सहेंजे. वह गोल्डन ऐरा वापस लाने की कोशिश करें
लेखक फिल्म व टेलीविजन लेखक हैं. रंग दे बसंती जैसी फिल्मों का लेखन किया है।

Thursday, November 28, 2013

दरअसल : फिल्म लेखक बनना है तो...


-अजय ब्रह्मात्मज
    आए दिन कभी कोई साहित्यकार मित्र या फेसबुक के जरिए बने युवा दोस्त जानना चाहते हैं कि फिल्मों का स्टोरी रायटर कैसे बना जा सकता है? हर किसी के पास एक कहानी है, जिसे वह जल्दी से जल्दी फिल्म में बदलना चाहता है। साहित्यकारों को लगता है कि उन्होंने आधा काम कर लिया है। अब उन्हें अपनी कहानी या उपन्यास को केवल पटकथा में बदलना है। गैरसाहित्यिक व्यक्तियों को भी लगता है कि अपने अनुभवों के कुएं में जब भी बाल्टी डालेंगे कहानी निकल आएगी। मुंबई में फिल्म पत्रकारिता करते हुए अनेक लेखकों से मिलना-जुलना हुआ है। उनसे हुई बातचीत और उनकी कार्यप्रणाली को नजदीक से परखने के बाद कुछ सामान्य बातें की जा सकती हैं। यों हर लेखक का संघर्ष अलग होता है और सफलता तो बिल्कुल अलग होती है।
    सबसे पहले तो यह जान और समझ लें कि इन दिनों अधिकांश निर्देशक खुद ही कहानी लिखते हैं। यह चलन पहले भी था, लेकिन अब यह प्रचलन बन चुका है। निर्देशक अपने संघर्ष के दौरान बेकारी के दिनों में लेखक मित्रों के साथ बैठ कर कहानियां रचते हैं और मौका मिलते ही धड़ाधड़ फिल्मों की घोषणाएं करने लगते हैं। कामयाबी मिल चुकी है तो ठंडे बस्ते में पड़ी उनकी कहानियों को भी हॉट स्टार मिलने लगते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के साथ हर कोई जुडऩा चाहता है। अगर किसी निर्देशक से जान-पहचान गांठ सकें तो लेखक बनने की संभावना ठोस हो जाती है। यह निश्चित तौर पर जान लें कि आरंभिक फिल्मों में शोषण हो सकता है। कभी क्रेडिट गायब हो सकता है तो कभी पैसे ़ ़ ़फिर भी फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बढ़ती जाती है। आपका दायरा बढ़ता है। पैसे और क्रेडिट से वंचित होने पर भी आप के काम की चर्चा होने लगती है। आरंभिक ठोकरों से आपका निजी आत्मविश्वास बढ़ता है। आप तरकीबें सीख लेते हैं। इंडस्ट्री की भाषा में कहीं तो खुद को बेचना आ जाता है।
    फिल्मों की कहानी लिखने के लिए जरूरी नहीं है कि आप मुंबई में ही रहें। अगर आप साहित्यकार हैं तो यकीन करें कि कोई न कोई आप को पढ़ रहा है। वह स्वयं आपकी उपयोगी रचना का इस्तेमाल कर सकता है या किसी को प्रेरित कर सकता है। विजयदान देथा तो जिंदगी भर अपने गांव में रहे, लेकिन उनकी कहानियों पर फिल्में बनीं। फिल्मकारों ने उनके गांव जाकर कहानियों के अधिकार लिए। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। यों यह सच है कि हर लेखक विजयदान देथा नहीं होता। कुछ साहित्यकारों को देखा कि वे अपनी कहानी के अधिकार देने तक ही सीमित नहीं रहते। वे पटकथा और संवाद भी लिखना चाहते हैं। आप उम्दा साहित्यिक रचनाकार हो सकते हैं, लेकिन यह कतई जरूरी नहीं है कि आप पटकथा के शिल्प और संवाद के कौशल से परिचित हों। ‘शोले’ के मशहूर संवाद  - कितने आदमी थे?- को याद करें। यह सलीम-जावेद ही गब्बर सिंह के लिए लिख सकते थे।
    मन नहीं माना और उत्साह में आप मुंबई आ ही गए हैं तो पहले बैंक बैलेंस मजबूत कर लें। या फिर मां, पिता, बहन, भाई,पत्नी या कोई दोस्त आप के सपनों का जबरदस्त समर्थक हो। मुंबई बहुत ही महंगा शहर है। यहां आजीविका और स्वयं के भरण-पोषण के लिए समझौते करने पर उद्देश्य से भटक सकते हैं। इसी माहौल में ऐसे भी लेखक मिलते हैं, जिन्होंने आजीविका के लिए तात्कालिक तौर पर भले ही कोई काम क लिया हो, लेकिन अपने लक्ष्य से नहीं भटके। आखिरकार वे सफल रहे। मुंबई में संघर्ष लंबा हो सकता है, लेकिन प्रतिभाओं को पहचान मिलती है। एक बार पहचान बन जाए तो फिर अवसर दरवाजे पर खड़े मिलते हैं। मोबाइल फोन के नंबर सभी को मिल जाते हैं।
    फिल्में देखना न बंद करें। हिंदी फिल्में तो बचपन से देखते रहे हैं। अपने देश की अन्य भाषाओं और विदेशों की फिल्में भी मनोरंजन से अधिक प्रशिक्षण के लिए देखें। एक पर्सनल नोटबुक रखें, जिसमें फिल्म की बारीकियों को दर्ज करते रहें। विश्वास करें ये सारे नोट्स एक न एक दिन काम आएंगे। फिल्मों के साथ पढऩा भी जारी रखें। पढऩे से आशय टाइमपास नहीं है। पढ़ें कि आप की जानकारी बढ़े। नए विषयों के बारे में पता चले। ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलें। सामाजिक व्यक्तित्व विकसित करें। हंसमुख हों और पॉजीटिव बातों में रुचि लें। न तो किसी की निंदा करें और न सुनें।
    लिखने के लिए खंडाला, लोनावाला, गोवा या किसी विदेशी शहर जाने की जरूरत नहीं है। सफल होने पर निर्माता, निर्देशक और फिल्म स्टार खुद ही अपने खर्चे पर आप को भेजने-बुलाने लगेंगे। जरूरी है कि आप भाव और कथ्य से लबरेज हों। आवश्यकता होने पर तो रात भर में कहानी लिख सकें। ज्यादातर लेखकों को आरंभिक सफलता जल्दबाजी के लेखन से मिली है। कई बार पूरी योजना के साथ तैयारी कर लिखी कहानियां सालों कंप्यूटर में ही पड़ी रह जाती हैं। लिखने के लिए तत्पर रहने की जरूरत है।
    मुंबई आ ही गए हैं और फिल्में नहीं मिल रही हैं, तो भी निराश न हों। इन दिनों टीवी, ट्रांसलेशन, वॉयसओवर और ऐड में संभावनाएं हैं। इन से आप की जरूरतें पूरी हो जाएंगी। याद रखें कि आप टीवी या ऐड लिखने नहीं आए थे। वे सिर्फ माध्यम हैं। आप के घर से एयरपोर्ट पहुंचने की सवारी हैं। आप को तो फ्लाइट लेनी है। लेखक बनना है।
    और हां, हर शुरुआत छोटी होती है। मंसूबे के साथ पहले ही काम को बड़ा काम साबित करने की गलतफहमी में न पड़ें। अब सोचना क्या? इरादा है तो लिखना आरंभ कर दें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री आप का इंतजार कर रही है। अंत में फिम रायटर्स एसोशएसन की सदस्यता अवश्य ले लें। अपने अधिकारों की रक्षा और चोरी से बचने के लिए यह कारगर है।


Friday, April 22, 2011

भौमिक होने का मतलब

अच्छी फिल्मों के लेखक सचिन भौमिक-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले मंगलवार को अचानक एक पत्रकार मित्र का फोन आया कि सचिन भौमिक नहीं रहे। इस खबर ने मुझे चौंका दिया, क्योंकि मैंने सोच रखा था कि स्क्रिप्ट राइटिंग पर उनसे लंबी बातचीत करनी है। पता चला कि वे बाथरूम में गिर गए थे। वे अस्पताल में थे। वहां से लौटे तो फिर तबियत बिगड़ी और वे दोबारा काम पर नहीं लौट सके। उनके सभी जानकार बताते हैं कि वे लेखन संबंधी किसी भी असाइनमेंट के लिए तत्पर रहते थे। उनकी यह तत्परता दूसरों की मदद में भी दिखती थी।

सचिन भौमिक ने प्रचुर लेखन किया। पिछले पचास सालों में उन्होंने लगभग 135 फिल्में लिखीं। इनके अलावा अनगिनत फिल्मों के लेखन में उनका सहयोग रहा है। हर युवा लेखक की स्क्रिप्ट वे ध्यान से सुनते थे और जरूरी सलाह देते थे। एक जानकार बताते हैं कि उन्होंने दर्जनों स्क्रिप्ट दूसरों के नाम से लिखी या अपनी स्क्रिप्ट औने-पौने दाम में बेच दी। सचिन भौमिक की यह विशेषता थी कि वे किसी भी फिल्म के लेखन में ज्यादा समय नहीं लगाते थे। उनका ध्येय रहता था कि हाथ में ली गई फिल्म जल्दी से पूरी हो जाए तो अगली फिल्म का लेखन आरंभ करें। वे चंद ऐसे लेखकों में शुमार थे, जिनके पास विषय और विचार की कमी नहीं। लेखन की इस अकुलाहट से उनकी फिल्मों में अधिक गहराई और मौलिकता नहीं दिखती। एक लेखक मित्र मजाक में उनके सामने कहा करते थे कि या तो आप भौमिक हो सकते हैं या मौलिक हो सकते हैं। दोनों एक साथ होना मुश्किल है। उनकी मौत के बाद श्रद्धांजलि लिखते समय सभी के सामने उनकी बॉयोग्राफी नहीं मिलने की दिक्कत आ रही थी। गूगल या दूसरे इंटरनेट सर्च में उनका नाम टाइप करने पर केवल उनकी फिल्मों की फेहरिस्त नजर आ रही थी। साथ में काम कर चुके निर्देशकों और लेखकों के पास बताने के लिए इतना ही था कि वे बहुत अच्छे लेखक और व्यक्ति थे। यह कोई नहीं जान सका कि आखिर किन खासियतों की वजह से वे इतनी फिल्में लिख पाए?

गौर करें, तो उन्होंने हमेशा पॉपुलर स्टारों और पॉपुलर किस्म के फिल्मकारों के लिए ही लेखन किया। आरंभिक दशक में उनके लेखन में गंभीरता दिखती है, जिस पर बांग्ला साहित्य के रोमांटिसिज्म का गहरा असर है। उल्लेखनीय है कि वे बंगाल के ही प्रगतिशील लेखन से दूर रहे। वे अपने लेखन में लोकप्रिय भाव और धारणाओं पर ध्यान देते थे। उनके चरित्र सामान्य स्थितियों में सामान्य प्रतिक्रियाएं ही करते थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा के स्क्रिप्ट लेखन को प्रचलित और स्वीकृत सांचों में बांधा और उसे मजबूत किया। हिंदी फिल्मों की यह विशेषता है कि हर सिचुएशन में किरदारों की हरकतों का अनुमान दर्शकों को हो जाता है। दर्शक इसका आनंद भी उठाते हैं। सचिन भौमिक ने अपनी फिल्मों में दर्शकों की इस सरल समझ और संवेदना पर अधिक जोर दिया। उनकी अधिकांश फिल्मों में कोई गूढ़ता नहीं है।

सचिन भौमिक की याददाश्त जबरदस्त थी। अंग्रेजी, बांग्ला और अन्य भाषाओं का साहित्य उन्होंने पढ़ रखा था। देखी हुई फिल्मों के सीन उन्हें भलीभांति याद रहते थे। जब भी किसी सीन या कैरेक्टर में उलझाव दिखता, वे किसी न किसी पुरानी कृति के रेफरेंस से उसे सुलझा लेते थे। अपने लेखन के प्रति वे अधिक सम्मोहित नहीं रहते थे। उनके एक मित्र लेखक ने बताया कि अगर उन्हें पता चलता था कि कोई और भी समान विषय पर लिख रहा है, तो वे राय-मशविरा कर दोहराव से बचने के लिए अपनी स्क्रिप्ट रोक देते थे या दूसरे की सहमति के बाद ही अपनी स्क्रिप्ट पूरी करते थे। उनके फिल्मी लेखन की खूबी और सीमा है कि वे कभी मौलिकता के आग्रही नहीं रहे। उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना था। इस मनोरंजन की प्रेरणा कहीं से भी ली जा सकती थी।