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Showing posts from January, 2020

सिनेमालोक : अब फैसलों का इंतजार

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सिनेमालोक अब फैसलों का इंतजार  -अजय ब्रह्मात्मज 21वी सदी का तीसरा दशक आरंभ हो चुका है. दो दशक बीत गए. इन दो दशकों में हिंदी फिल्मों ने कुछ नए संकेत दिए. साथ में यह भी जाहिर किया कि दिख रहे बदलावों के स्थाई होने में वक्त लगेगा. मसलन ऐसा लगता रहा कि अब लोकप्रिय खानत्रयी(आमिर, सलमान और शाह रुख) का दबदबा खत्म हुआ. नए सितारे उभरे और चमके लेकिन दो दशकों के इस कयास के बावजूद हम देख रहे हैं कि लोकप्रियता का उनका रुतबा कायम है. उनकी फ्लॉप फिल्में भी 100 करोड़ से अधिक का कारोबार करती हैं. पिछले साल को ही नजर में रखें तो आमिर खान और शाह रुख खान की कोई फिल्म नहीं आई. सलमान खान की दो फिल्में आईं, लेकिन उन फिल्मों का कारोबार अपेक्षा के मुताबिक नहीं हुआ. उनकी आखिरी फिल्म ‘दबंग 3’ का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. बावजूद इसके तीनों खान खबरों में छाए रहते हैं. उनकी फिल्मों का इंतजार रहता है और निर्माता और प्रोडक्शन हाउस उनकी फिल्मों में निवेश करने के लिए तैयार रहते हैं, हां, वे खुद संभल और ठहर गए हैं. उनका संभलना और ठहरना ही संकेत दे रहा है कि कुछ नया हो सकता है. गौर करें तो इसमें नएपन के प्रभाव में आमिर खान ने…

संडे नवजीवन : हिंदी फिल्मों का ‘नया हिंदुस्तान’

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संडे नवजीवन हिंदी फिल्मों का ‘नया हिंदुस्तान’ -अजय ब्रह्मात्मज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘न्यू इंडिया’ शब्द बार-बार दोहराते हैं. हिंदी फिल्मों में इसे ‘नया हिंदुस्तान’ कहा जाता है. इन दिनों हिंदी फिल्मों के संवादों में इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. गणतंत्र दिवस के मौके पर हिंदी फिल्मों में चित्रित इस नए हिंदुस्तान की झलक,भावना, आकांक्षा और समस्याओं को देखना रोचक होगा. यहां हम सिर्फ 2019 के जनवरी से अभी तक प्रदर्शित हिंदी फिल्मों के संदर्भ में इसकी चर्चा करेंगे. सभी जानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. सिनेमा के अविष्कार के बाद हम देख रहे हैं कि सिनेमा भी समाज का दर्पण हो गया है. साहित्य और सिनेमा में एक फर्क आ गया है कि तकनीकी सुविधाओं के बाद इस दर्पण में समाज का प्रतिबिंब वास्तविक से छोटा-बड़ा, आड़ा-टेढ़ा और कई बार धुंधला भी होता है. बारीक नजर से ठहराव के साथ देखें तो हम सभी प्रतिबिंबित आकृतियों में मूल तक पहुंच सकते हैं. पिछले साल के अनेक लेखों में मैंने ‘राष्ट्रवाद के नवाचार’ की बात की थी. फिल्मों की समीक्षा और प्रवृत्ति के संदर्भ में इस ‘नवाचार’ की व्याख्या भी की …

सिनेमालोक : पोस्टर पर नहीं होती हिंदी

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सिनेमालोक पोस्टर पर नहीं होती हिंदी -अजय ब्रह्मात्मज आजकल किसी भी फिल्म की घोषणा के साथ उसका फर्स्ट लुक आता है. फिल्म के निर्माता प्रोडक्शन हाउस और कलाकार फिल्म का फर्स्ट लुक सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं. मीडिया(अखबार) में विज्ञापन छपते हैं.आपने शायद गौर नहीं किया होगा कि हिंदी फिल्मों के अधिकांश फर्स्ट लुक के पोस्टर पर फिल्मों के नाम रोमन में लिखे होते हैं. यह एक किस्म की लापरवाही है, जो दशकों से चली आ रही है. हिंदी समाज और हिंदी दर्शक भी बेपरवाह रहते हैं. उन्हें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. याद करें या इंटरनेट सर्च करें तो पुरानी फिल्मों के पोस्टर पर फिल्मों के नाम हिंदी में मिल जाएंगे. हिंदी फिल्मों की शुरुआत से लेकर आजादी के बाद के कुछ दशकों तक यह सिलसिला चलता रहा. तब पोस्टर पर हिंदी फिल्मों के नाम हिंदी, उर्दू और रोमन में लिखे जाते थे. हिंदी का फोंट सबसे बड़ा होता था. साथ में छोटे फोंट में रोमन और उर्दू में भी नाम लिखे रहते थे. फिल्म में शीर्षक, कलाकार और तकनीशियनों की सूची भी हिंदी में लिखी जाती थी. धीरे धीरे अंग्रेजी के प्रमुखता बड़ी और फिर हिंदी लगभग गायब हो गई. कैसी विडंबना है कि हिंद…

सिनेमालोक : छपाक बनाम तान्हाजी

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सिनेमालोक छपाक बनाम तान्हाजी -अजय ब्रह्मात्मज एक ही दिन रिलीज हुई फिल्मों की तुलना पहले भी होती रही है. खासकर पहले उनकी टकराहट के असर की चर्चा होती है और उसके बाद बताया जाता है कि किसे कितना नुकसान हुआ? उनके कलेक्शन के आधार पर ये चर्चाएं और तुलनाएं होती है. देश में सिनेमाघरों और स्क्रीन की सीमित संख्या की वजह से साल के अनेक शुक्रवारों को ऐसी हलचल और टकराहट हो जाती है. पिछले हफ्ते 10 जनवरी को रिलीज हुई ‘छपाक’ और ‘तान्हाजी’ को लेकर भी तुलना चल रही है. अनेक स्वयंभू विश्लेषक,पंडित और टीकाकार निकल आए हैं. वे अपने हिसाब से समझा रहे हैं. व्याख्या कर रहे हैं. इस बार की तुलना में सिर्फ कलेक्शन के प्रमुख मुद्दा नहीं है. कुछ और भी बातें हो रही है. दो धड़े बन गए हैं. एक धड़ा ‘छपाक’ के विरोध में सक्रिय है और दूसरा धड़ा ‘तान्हाजी’ के समर्थन में है. विरोध का धड़ा नए किस्म का है. इस धड़े ने तय कर लिया है कि उन्हें न सिर्फ ‘छपाक’ का बहिष्कार करना है, बल्कि तमाम तर्क जुटा कर उसे फ्लॉप भी साबित करना है. यह धड़ा वास्तव में दीपिका पादुकोण को सबक सिखाना चाहता है और इसी बहाने तमाम फिल्म कलाकारों को संदेश भी द…

सिनेमालोक : भाए न रंग सांवला

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सिनेमालोक भाए न रंग सांवला -अजय ब्रह्मात्मज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सांवले रंग के प्रति गहरी अरुचि और एलर्जी है .शुरू से ही फिल्म के हीरो-हीरोइन और अन्य चरित्रों के लिए गौर वर्ण के कलाकारों की मांग रही है. हिंदी सिनेमा के विकास के साथ राजा रवि वर्मा द्वारा चित्रित आकृतियां और रूपाकार ही फिल्मों के किरदारों के आदर्श बने. राजा रवि वर्मा ने जब देवी-देवताओं के काल्पनिक पोर्ट्रेट तैयार तो उनके रंग, कद, काठी और एपीयरेंस पर खास ध्यान दिया. गौर वर्ण, सुतवां नाक,उन्नत ललाट,नीली-भूरी आंखें, घनी-टेढ़ी भौहें में और सीधे लहराते बाल... बाद में फिल्मों में भी उन्हें अपनाया गया. धीरे-धीरे अघोषित रुढ़ि बन गयी. खास कर हीरो-हीरोइन के लिए गौर वर्ण अनिवार्य हो गया. हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय कलाकारों में शायद ही कोई श्याम वर्ण का मिले. दो-चारअपवाद हो सकते हैं. मनोरंजन की दुनिया में गौर वर्ण के दबाव का सबसे बड़ा उदाहरण माइकल जैक्सन हैं. लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्हें गोरे होने की धुन चढ़ी. अमेरिका में ‘अश्वेत’ होने का खास राजनीतिक निहितार्थ है/ तमाम मुश्किलों और अवरोधों को पार कर माइकल जैकसन ने श…