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Showing posts from September, 2016

फिल्‍म समीक्षा : एम एस धौनी-द अनटोल्‍ड स्‍टोरी

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छोटे पलों के बड़े फैसले
-अजय ब्रह्मात्‍मज सक्रिय और सफल क्रिकेटर महेन्‍द्र सिंह धौनी के जीवन पर बनी यह बॉयोपिक 2011 के वर्ल्‍ड कप तक आकर समाप्‍त हो जाती है। रांची में पान सिंह धौनी के परिवार में एक लड़का पैदा होता है। बचपन से उसका मन खेल में लगता है। वह पुरानी कहावत को पलट कर बहन को सुनाता है...पढ़ोगे-लिखोगे तो होगे खराब,खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे नवाब। हम देखते हैं कि वह पूरी रुचि से फुटबॉल खेलता है,लेकिन स्‍पोर्ट्स टीचर को लगता है कि वह अच्‍छा विकेट कीपर बन सकता है। वे उसे राजी कर लेते हैं। यहां से धौनी का सफर आरंभ होता है। इसकी पृष्‍ठभूमि में टिपिकल मिडिल क्‍लास परिवार की चिंताएं हैं,जहां करिअर की सुरक्षा सरकारी नौकरियों में मानी जाती है। नीरज पांडेय के लिए चुनौती रही होगी कि वे धौनी के जीवन के किन हिस्‍सों को फिल्‍म का हिस्‍सा बनाएं और क्‍या छोड़ दें। यह फिल्‍म क्रिकेटर धौनी से ज्‍यादा छोटे शहर के युवक धौनी की कहानी है। इसमें क्रिकेट खेलने के दौरान लिए गए सही-गलत या विवादित फैसलों में लेखक-निर्देशक नहीं उलझे हैं। ऐसा लग सकता है कि यह फिल्‍म उनके व्‍यक्तित्‍व के उजले पक्षों से उनके चमकदार…

दरअसल : पिंक फिल्‍म तो पसंद आई...उसकी फिलासफी?

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-अजय ब्रह्मात्‍मज शुजीत सरकार की देखरेख में बनी ‘पिंक’ देश-विदेश के दर्शकों को पसंद आई है। उसके कलेक्‍शन से जाहिर है कि दर्शक सिनेमाघरों में जाकर ‘पिंक’ देख रहे हैं। दूसरे हफ्ते में भी फिल्‍म के प्रति दर्शकों का उत्‍साह बना रहा है। रितेश शाह की लिखी इस फिल्‍म को बांग्‍ला के पुरस्‍कृत निर्देशक अनिरूद्ध राय चौधरी ने निर्देशित किया है। सोशल मीडिया से लेकर घर-दफ्तर तक में इस फिल्‍म की चर्चा हो रही है। ज्‍यादातर लोग इस फिल्‍म के पक्ष में बोल रहे हैं। लेखक-निर्देशक ने बड़ी खूबसूरती से लड़कियों के प्रति बनी धारणाओं को ध्‍वस्‍त किया है। कोट्र में जिरह के दौरान बुजुर्ग वकील दीपक सहगल(अमिताभ बच्‍चन) के तर्कों से असहमत नहीं हुआ जा सकता। उनके तर्कों का कटाक्ष चुभता है। ‘पिंक’ की फिलासफी उस ‘ना’ पर टिकी है,जो किसी लड़की को अपनी तरह से जीने की आजादी दे सकती है। दीपक सहगल कहते हैं,’ ‘ना सिर्फ एक शब्‍द नहीं है,एक पूरा वाक्‍य है अपने आप में...इसे किसी व्‍याख्‍या की जरूरत नहीं है। नो मतलब नो...परिचित,फ्रेंड,गर्लफ्रेंड,सेक्‍स वर्कर या आपकी अपनी बीवी ही क्‍यों न हो...नो मीन्‍स नो।‘ लेकिन हम सभी जाते और दे…

‘पार्च्ड’: ‘सूखी ज़मीन’ पर तिरछी डगर ले चली ‘नदियों’ की कहानी

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लीना यादव की 'पार्च्‍ड' राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि में चार औरतों की कहानी है। खिखलाहट और उम्‍मीद की यह कहानी झकझोरती है। शहरी दर्शकों 'पिंक' को समझ पाते हैं। उनके लिए 'पार्च्‍ड' ओझल सच्‍चाई है। 'पार्च्‍ड' पर विभावरी ने लिखा है। उम्‍मीद है कि और भी लेख मिलेंगे...
-विभावरी यह फिल्म सिर्फ़ उन चार औरतों की कहानी नहीं है जिनके इर्द-गिर्द इसे बुना गया है...यह इस देश, इस दुनिया की उन तमाम औरतों की कहानी है जिन्होंने नहीं जाना कि, घुटन भरी ज़िंदगी की क़ैद के बाहर की हवा कितनी खुशनुमा हो सकती है!! जिन्होंने नहीं जाना कि उनकी उदास चीखों के बाहर भी एक दुनिया बसती है...जहाँ खुशियों की खिलखिलाहट है!! जिन्होंने नहीं जाना कि उनका खुद का शरीर भी एक उत्सव है...प्रेम के चरागों से रौशन उत्सव!! दरअसल फिल्म चार केन्द्रीय स्त्री- चरित्रों के मार्फ़त हमारे समाज की उस मानसिकता से रूबरू कराती है जहाँ औरत महज एक देह है. एक देह जिसे पितृसत्ता जब चाहे खरीद और बेच सकती है...फिर वह शादी जैसी संस्था की आड़ में हो या ‘बाजारू औरत’ होने के तमगे की आड़ में! हाँ, अपने ही इस शरीर पर उस औरत का कोई हक़…

कौन हैं बंदी युद्ध के? ... -निखिल आडवाणी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज युद्ध के बंदी कौन हैं? युद्ध के दौरान मोर्चे पर तैनात सैनिकों को गिरफ्तार कर कैदी बना लिया जाता है। उनके बारे में कोई जानकारी उनके परिवार वालों को नहीं मिल पाती। शहीदों की सूची में उनका नाम न हो परिवार की आस बंधी रहती है कि उनका बेटा,पति और पिता लौट कर आएगा। यह आस भी किसी कैद से कम नहीं है। पूरा परिवार इस उम्‍मीद का बंदी हो जाता है। निखिल आडवाणी ने कारगिल युद्ध की पृष्‍ठभूमि में दो सैनिकों और उनके परिवारों की यही कहानी गढ़ी है। यह टीवी शो इजरायल के मशहूर टीवी शो ‘हातुफिम्‍’ पर अधारित है। निखिल आडवाणी ने मूल थीम के अनुरूप भारतीय परिवेश और संदर्भ की कहानी चुनी है। स्‍टार प्‍लस से निखिल आडवाणी को इस खास शो के निर्माण और निर्देशन का ऑफर मिला तो उन्‍होंन पहले इंकार कर दिया। वजह यह थी कि ओरिजिनल शो का प्रारूप भारत में नहीं दोहराया जा सकता था। अपने देश की सुरक्षा एजेंसियां अलग तरीके से काम करती हैं। सैनिकों और उनके परिवारों का रिश्‍ता भी अलग होता है। बाद में वे राजी हुए तो उन्‍होंने पूरी तरह से उसका भारतीयकरण कर दिया। 1999 में हुए कारगिल युद्ध में 527 सैनिक शहीद हुए थे। 1363 …

फिल्‍म समीक्षा : बैंजो

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मराठी फ्लेवर -अजय ब्रह्मात्‍मज मराठी फिल्‍मों के पुरस्‍कृत और चर्चित निर्देशक रवि जाधव की पहली हिंदी फिल्‍म है ‘बैंजो’। उन्‍होंने मराठी में ‘बाल गंधर्व’,‘नटरंग’ और ‘बालक पालक’ जैसी फिल्‍में निर्देशित की हैं। इनमें से ‘बालक पालक’ के निर्माता रितेश देशमुख थे। प्रोड्यूसर और डायरेक्‍टर की परस्‍पर समझदारी और सराहना ही ‘बैंजो’ की प्रेरणा बनी। इसके साथ ही दोनों मराठी हैं। ‘बैंजो’ के विषय और महत्‍व को दोनों समझते हैं। लेखक-निर्देशक रवि जाधव और एक्‍टर रितेश देशमुख की मध्‍यवर्गीय परवरिश ने बैंजो को फिल्‍म का विषय बनाने में योगदान किया। बैंजो निम्‍न मध्‍यर्गीय वर्ग के युवकों के बीच पॉपुलर सस्‍ता म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट है। महाराष्‍ट्र के साथ यह देश के दूसरे प्रांतों में भी लोकप्रिय है। मुंबई में में इसकी लोकप्रियता के अनेक कारणों में से सार्वजनिक गणेश पूजा और लंबे समय तक मिल मजदूरों की रिहाइश है। निर्देशक रवि जाधव और निर्माता कृषिका लुल्‍ला को बधाई। ’बैंजो’की कहानी कई स्‍तरों पर चलती है। तराट(रितेश देशमुख),ग्रीस(धर्मेश येलांडे),पेपर(आदित्‍य कुमार) और वाजा(राम मेनन) मस्‍ती के लिए बैंजो बजाते हैं। चा…

फिल्‍म समीक्षा : वाह ताज

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-अजय ब्रह्मात्‍मज
अजीतसिन्हा की 'वाह ताज' विशेष आर्थिक क्षेत्र और किसानों की समस्या को लेकरबनाई गई फिल्म है। उन्होंने आगरा के ताजमहल को केंद्र में लेकर कथा बुनीहै। उद्योगपति विरानी अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए किसानों कोउनकी उपजाऊ ज़मीन से बेदखल कर देता है। गांव के किसानों का नेता तुपकारीविरोध करता है तो वह एक राजनीतिक पार्टी के नेता और गुंडों की मदद से उसकीहत्या करवा देता है। यह बात विदेश में पढाई कर रहे उसके छोटे भाई विवेक कोपता चलती है तो वह गांव लौटता है। उसके साथ उसकी गर्लफ्रेंड रिया भी आ जातीहै। दोनों मिलकर एक युक्ति सोचते हैं। 'वह ताज' इसी युक्ति की फिल्म है। इस युक्ति के तहत दोनों होशियारी सेकागजात जमा करते हैं और ताजमहल पर दावा ठोक देते हैं। वे महाराष्ट्र केतुकाराम और सुनंदा बन जाते हैं।अपने साथ एक लड़की को बेटी बना कर ले आतेहैं। विवेक का दावा है कि उसके दादा के परदादा के परदादा की यह ज़मीन है।मुग़ल बादशाह शाहजहांं ने उसे हथिया लिया था। मामला कोर्ट में पहुंचता है।वहां विवेक के जमा किए कागजातों को गलत साबित करना संभव नहीं होता।ताजमहलके दर्शन पर स्टे आ जाता …

फिल्‍म समीक्षा : पार्च्‍ड

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फिल्‍म रिव्‍यू अनगिन औरतों में से तीन पार्च्‍ड -अजय ब्रह्मात्‍मज एक साल से भिन्‍न देशों और फिल्‍म फेस्टिवल में दिखाई जा रही लीना यादव की ‘पार्च्‍ड’ अब भारत में रिलीज हुई है। ‘शब्‍द’ और ‘तीन पत्‍ती’ का निर्देशन कर चुकी लीना यादव की यह तीसरी फिल्‍म है। इस फिल्‍म में बतौर फिल्‍मकार वह अपने सिग्‍नेचर के साथ मौजूद हैं। सृजन के हर क्षेत्र में कते रहते हैं। लीना यादव ने तन,मन और धन से अपनी मर्जी की फिल्‍म निर्देशित की है और यह फिल्‍म खूबसूरत होने के साथ यथार्थ के करीब है। ‘पार्च्‍ड’ के लिए हिंदी शब्‍द सूखा और झुलसा हो सकता है। राजस्‍थान के एक गांव की तीन औरतों की सूखी और झुलसी जिंदगी की यह कहानी उनके आंतरिक भाव के साथ सामाजिक व्‍यवस्‍था का भी चित्रण करती है। 21 वीं सदी में पहुंच चुके देश में कई समाज और गांव आज भी सदियों पीछे जी रहे हैं। उनके हाथों में मोबाइल आ गया है। टीवी और डिश एंटेना आ रहा है,लेकिन पिछड़ी सोच की जकड़न खत्‍म नहीं हो रही है। पुरुषों के कथित पौरुष ने परंपरा और नैतिकता का ऐसा जाल बिछा रखा है कि औरते लहूलुहान हो रही हैं। लीना यादव की ‘पार्च्‍ड’ इसी पृष्‍ठभूमि में रानी,लज्‍जो और ब…

दरअसल : टीवी पर आ रहे फिल्‍म कलाकार

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-अजय ब्रह्मात्‍मज देश-विदेश फिल्‍म कलाकार टीवी पर आ रहे हैं। वे टीवी के रिएलिटी,फिक्‍शन,टॉक और गेम शोज का हिस्‍सा बनते हैं। यह उनकी कमाई और क्रिएटिविटी का कारगर जरिया है। इससे उनकी दृश्‍यता(विजीबिलिटी) बनी रहती है। काम करने के पैसे मिलते हैं सो अलग। भारत में टीवी के पॉपुलर होने और सैटेलाइट चैनलों के आने के बाद टीवी शोज में फिल्‍म कलाकारों को लाने का चलन बढ़ा। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के साथ अमिताभ बच्‍चन का टीवी पर आना सबसे उल्‍लेखनीय रहा। उसके बाद से तो तांता लग गया। सभी टीवी शोज करने लगे। फिर भी फिक्‍शन शोज में उनकी मौजूदगी कम रही। गौर करें तो भारत में फिल्‍म कलाकार अपनी पॉपुलैरिटी के दौरान टीवी का रुख नहीं करते हैं। भारत में हाशिए पर आ चुके फिल्‍म कलाकार ही टीवी के फिक्‍शन शोज में आते हैं। पिछले दशकों में किरण कुमार हों या अभी शबाना आजमी। इन सभी को टीवी पर देखना अच्‍छा लगता है। बात तब गले से नीचे नहीं उतरती,जब वे टीवी पर अपनी मौजूदगी के लिए बेतुके तर्क देने लगते हैं। उन्‍हें अचानक टीवी सशक्‍त माध्‍यम लगने लगता है। उन्‍हें क्रिएटिविटी के लिए यह मीडियम जरूरी जान पड़ता है। सभी के अपने पक्ष…

उम्‍मीद अभी बाकी है - लीना यादव

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-अजय ब्रह्मात्‍मज 2012 में लीना यादव आस्‍ट्रेलिया के ‘एशिया पैसिफिक स्‍क्रीन अवार्ड’ की ज्‍यूरी के लिए चुनी गई थीं। वहां जाने के दो हफ्ते पहले उन्‍हें जानकारी मिली कि अवार्ड की संस्‍था ज्‍यूरी मेंबर रह चुके फिल्‍मकारों को नए प्रोजेक्‍ट के लिए फंड करती है। संयोग ऐसा रहा कि लीना यादव उन्‍हीं दिनों तनिष्‍ठा के साथ किसी फिल्‍म के बारे में सोच रही थीं। तनिष्‍ठा ने उन्‍हें ‘जल’ की शूटिंग के दौरान के कुछ किस्‍से सुनाए। लीना ने महसूस केया कि उन किस्‍सों को लकर फिल्‍म बनाई जा सकती है। खास कर ग्रामीण इलाकों की महिलाओं ने जिस साफगोई और ईमानदारी से सेक्‍स की बातें की थीं,वह शहरी महिलाओं के बीच दुर्लभ है। लीना यादव की फिल्‍म ‘पार्च्‍ड’ की शुरूआत यहीं से हुई। फिल्‍म के पहले ही ड्राफ्ट के समय ही रिसर्च से लीना को लगा कि वह गांव की कहानियों में शहरों की बातें ही लिख रही हैं। उन्‍होंने द्वंद्व महसूस किया,’आखिर क्‍या बात है कि सूचना और शिक्षा के बावजूद शहरी औरतें कुछ बोल नहीं पा रही हैं,जबकि ग्रामीण औरतें निस्‍संकोच बोल रही हैं?’ लीना ने अपनी स्क्रिप्‍ट देश-विदेश के दोस्‍तों को पढ़ने के लिए भेजी तो उन्‍ह…

सीक्‍वेल हों गई जिंदगी - रितेश देशमुख

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-अजय ब्रह्मात्‍मज रितेश अभी कोई शूटिंग नहीं कर रहे हैं। उनकी दाढ़ी बढ़ रही है। खास आकार में बढ़ रही है। पूछने पर वह बताते हैं,’छोड़ दी है। हां,एक शेप दे रहा हूं। मराठी में ‘छत्रपति शिवाजी महाराज’ फिल्‍म करने वाला हूं1 उसका लुक टेस्‍ट चलता रहता है। अभी वह फिल्‍म लिखी जा रही है। उस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट पूरी होगी,तभी शूट पर जा सकते हैं। उसमें वीएफएक्‍स वगैरह भी रहेगा। यह मेरी पहली पीरियड फिल्‍म होगी।‘ रितेश देशमुख की ‘बैंजो’ आ रही है। मराठी फिल्‍मों के निर्देशक रवि जाधव ने इसे निर्देशित किया है। फिल्‍म में लाल रंग मुखर है। रितेश वजह बताते हैं,’ फिल्‍म में पहले पानी का इस्‍तेमाल होना था। महाराष्‍ट्र में सूखे की वजह से उसे हम ने गुलाल में बदल दिया। पोस्‍टर और प्रोमो में गुलाल का वही लाल रंग दिख रहा है। बैंजो एक ऐसा इंस्‍ट्रुमेंट है कि उसकी धुन पर लोग थिरकने लगते हैं। उल्‍लास छा जाता है। त्‍योहारों और खुशी के मौकों पर यह बजाया जाता है। बैंजो बजाने वाले भी रंगीन और खुश मिजाज के होते हैं।‘ निर्देशक रवि जाधव के साथ रितेश देशमुख का पुराना संपर्क रहा है। दोनों मराठी हैं। इसके अलावा रवि जाधव ने रिते…