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Tuesday, October 29, 2019

सिनेमालोक : बड़े सितारों की चूक


सिनेमालोक
बड़े सितारों की चूक
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते आई साजिद नाडियाडवाला की  फिल्म 'हाउसफुल 4' ने दर्शकों और समीक्षकों को निराश किया. इसकी वजह से फिल्म का कारोबार अपेक्षा से बहुत कम रहा. निर्माता को उम्मीद थी की दिवाली के मौके पर रिलीज हो रही यह फिल्म पहले 3 दिनों में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी. ट्रेड पंडितों का अनुमान था कि पहले दिन ही फिल्म का कारोबार 25 से 35 करोड़ के बीच होगा. अक्षय कुमार  समेत तीन अभिनेताओं और कृति ससैनन समेत तीन अभिनेत्रियों की यह फिल्म रिलीज के पहले से तहलका मचा रही थी.  एक गीत 'बाला बाला बाला शैतान का साला' विचित्र नृत्य मुद्राओं की वजह से लोकप्रिय हो गया था.बाला चैलेंज के तहत फिल्म बिरादरी के सदस्य और आम प्रशंसक हास्यास्पद वीडियो सोशल मीडिया पर डाल रहे थे. उन्हें निर्माता रिट्वीट कर रहे थे. यूँ लग रहा था कि फ़िल्म को इस श्रेणी की पुरानी फिल्मों की तरह भारी कामयाबी मिलेगी.
ऐसा नहीं हो सका. अक्षय कुमार की लोकप्रियता से पहले दिन थोड़े दर्शक आये,लेकिन अगले दिन दर्शक ससससससZकम हो गए. कामयाब फिल्मों का एक ट्रेंड है कि शनि और रविवार को उनके कलेक्शन में 20 से 30 प्रतिशत का इजाफा होता है. इस फ़िल्म का कलेक्शन अगले दिन घट गयाससस्वस्स्ज़ज़्ज़और अब बढ़ने की उम्मीद भी नहीं है. बेहतरीन फिल्में तारीफ से दर्शक बटोरती हैं तो बुरी फिल्में निंदा से दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पातीं. यही 'हाउसफुल 4' के साथ हुआ. आम दर्शकों के साथ बैठ करफ़िल्में देखने से उनकी प्रतिजरियासमझ में आ जाती हैं. निर्माताओं ने तो सोचा था कि दिवाली का वी ।केंड उनके लिए फायदेमंद होगा.
'हाउसफुल 4' का निर्देशन पहले साजिद खान कर रहे थे। उनके 'मी टू' विवाद में फंसने के बाद फ़िल्म की शूटिंग रोक दी गई थी. कलाकारों में भी फेरबदल हुई थी. बाद में फरहाद - शामजी को ज़िम्मेदारी दी गई. फूहड़ और मज़ाकिया संवादों के लिए मशहूर निर्देशक द्वय को निर्देशन की कागज़ी ज़िम्मेदारी दी गई. यह नहीं बताया गया कि साजिद खान ने कितनी गिलम शूट कर ली थी? और फरहाद - शामजी ने कितना किया? यूँ दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा था कि निर्देशन की कमान तो साजिद नाडियाडवाला के हाथों में ही थी. खानापूर्ति के लिए फरहाद-शामजी का नाम दिया गया. इस फ़िल्म की कहानी साजिद नाडियाडवाला की ही है. उन्हें पुनर्जन्म की यह अजीबोगरीब कहानी सूझी,जिसे शूट करने में भारी खर्च भी किया गया. यह बात फैलाई गई कि फ़िल्म की लागत 80 करोड़ ही है. और कलेक्शन पर भी विवाद हुआ कि उसे बढ़ा- चढ़ा कर बताया जा रहा है.
स्थिति जो भी हो,इस तथ्य से इनकार नहीं जिया जा सकता कि अक्षय कुमार औरसजिद नाडियाडवाला सेभरी चूक हुई. जिस मसालेदार युक्ति पर उन्हें विश्वास और भरोसा था,वह काम नहीं आया. पुनर्जन्म जैसी धारणा को इस तरीके से पेश करना दर्शकों के पल्ले नही पड़ा. बाकी कलाकारों की छवि में तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,लेकिन अक्षय कुमार की लोकप्रियता को बट्टा लाह. उनकी पिछली कुछ फिल्में कंटेंट और राष्ट्रवाद के नारों की वजह से चलीं. अभी के दौर में वे भरोसेमंद स्टार माने जाते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि छोटी सी चूक के भी परिणाम बड़े होते हैं. उनके पास कुछ बेहतरी  फिल्में हैं. सचमुच उन्हें ऐसी फूहड़ फिल्मों से किनारा कर लेना चाहिए.


Tuesday, October 22, 2019

सिनेमालोक : गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में

सिनेमालोक
गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों आमिर खान, शाह रुख खान,राजकुमार हिरानी और एकता कपूर समेत फ़िल्म बिरादरी के 45-50 सदस्य प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. छन्नू लाल मिश्र और एक-दो शास्त्रीय गायक भी इस मुलाकात में शामिल थे. सेल्फी सक्रिय फ़िल्म बिरादरी ने मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर प्रधान मंत्री के पहल और सुझाव की तारीफ की झड़ी लगा दी. प्रधानमंत्री ने उनके ट्वीट के जवाब दिए और उनके प्रयासों की सराहना की. सभी ने अलग-अलग शब्दों और बयानों में मोदी जी की बात दोहराई और जुछ ने महात्मा गांधी की प्रासंगिकता की भी बात कही। इस साल 2 अक्टूबर से गांधी की 150वीं जयंती की शुरुआत हो चुकी है. सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने गंफ़ही जयंती पर कोई खास सक्रियता नहीं डिझायी है. खबर तो यह थी कि दो साल पहले ही एक समिति बनी थी,जिसे 150 वीं जयंती की रणनीति तय करनी थी। क्या रणनीति बनी?
बहरहाल, प्रधान मंत्री से फ़िल्म बिरादरी के सदस्यों की मुलाक़ात और विशेष बैठक उल्लेखनीय है. इसका महत्व तब और बढ़ जाता है,जब हम देखते हैं कि कुछ सालों पहले भक्तों के निशाने पर आएआमिर खान और शाह रुख खान इस बैठक में मौजूद रहे. उन्होंने मोदी जी के साथ सेल्फ़ी निकाली. उस सेल्फी में मोदी जी मुस्कुरा रहे थे. शायद भक्तों तक यह संदेश गया हो कि नाम से खान दोनों लोकप्रिय कलाकार गद्दार और देशद्रोही नहीं हैं. खान के अलावा फिल्म बिरादरी के महिला सदस्यों(कलाकार और निर्माता) ने अलग से प्रधान मंत्री के साथ तस्वीरें और सेल्फी लीं. एकता कपूर ने महिला सशक्तिकरण की पहचान की बात की,जिसे बाद में स्वयं प्रधान मंत्री ने रिट्वीट कर दोहराया. याद होगा कि फ़िल्म बिरादरी और प्रधान मंत्री की मुलाकातें लगातार खबरें बन रही हैं.हालांकि यह पता नहीं चल पा रहा है कि उनके प्रभाव और प्रेरणा से क्या नई गतिविधियां आरम्भ हुई हैं?
इस बार की मुलाक़ात से भगवा भक्तों और खान द्वय के प्रशंसकों को आश्चर्य भी हुआ. कहीँ कोई और कारण या दबाव तो काम नहीं कर रहा? यह भी हो सकता है कि भाजपा के दूसरी बार सत्ता में आने से विरोधी और आलोचनात्मक आवाज़ों को लग रहा हो कि सरकार और प्रधान मंत्री के साथ रहने में ही भलाई है. यह भी हो सकता है कि भाजपा की तरफसे ऐसी कोशिशें हो रही हों. गौर कर सकते हैं कि इस बार की मुलाक़ात में कोई घोर समर्थक कलाकार नहीं दिखा. एक कंगना रनोट ही थीं,जो पूरी तरह से समर्थन में बोलती नज़र आती है. किसी भी आशंका या स्किम से परे हम तो यही उम्मीद करेंगे कि फ़िल्म बिरादरी गांधीवाद की फिल्मी अभिव्यक्ति को लेकर मुखर हो.
पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक सत्ता और फ़िल्म बिरादरी की नज़दीकियों को ध्यान से देखा जा सकता है. फिल्मों में नेहरू युग का व्यापक प्रभाव रहा है. खास कर राज कपूर की लोकप्रिय गिल्मों में...उस दौर के बाकी फिल्मकारों ने भी देश के नव निर्माण की कहानियां दिखाईं. सामंती सामजिक सोच और सरंचना को प्रेम के बहाने तोड़ा. आज़ादी के बाद के रूढ़ियों में जकड़े समाज में प्रेम बाद प्रतिरोध था. शास्त्री जी के आह्वान पर मनोज कुमार ने 'जय जवान,जय किसान' की थीम पर फ़िल्म बनाई और भारत कुमार के नाम से मशहूर हुए.
गांधीवाद पर फिल्में बनाने बेहतर है. विश्व शांति और भाईचारे के लिए यह ज़रूरी है. अभी तो 'राष्ट्रवाद के नवाचार' के फैशन में जबरदस्ती फिल्मों में नारेबाजी चल रही है. संकीर्णता और असहिष्णुता के प्रकोप में गांधीवाद से प्रेरित फ़िल्में विकल्प बन सकती है. दो-चार भी बन जाएं तो काफी है. राजकुमार हिरानी ने नामाकन पेश किया,जिसमें गांधी के विचारों के बीज शब्दों की बात की. पर्दे पर उन्हें लोकप्रिय सितारों ने पेश किया।

Tuesday, October 15, 2019

सिनेमालोक : मामी फिल्म फेस्टिवल


सिनेमालोक
मामी फिल्म फेस्टिवल
-अजय ब्रह्मात्मज  
मामी (मुंबई एकेडमी ऑफ मूवी इमेजेज) के नाम से मशहूर मुंबई का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल पिछले 20 सालों में फिल्मों के चयन, प्रदर्शन और विमर्श से ऐसे मुकाम पर आ गया है कि देश भर के सिनेप्रेमी सात दिनों के लिए मुंबई पहुंचते हैं. देश में और भी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हैं. छोटे शहरों और कस्बों से लेकर मीडिया घरानों तक के अपने-अपने फेस्टिवल चल रहे हैं और कमाल है कि सभी इंटरनेशनल हैं. इनके आयोजन और लोकप्रियता से बढ़ती फिल्मों की समझदारी के बावजूद देश में ‘वॉर’ और ‘कबीर सिंह’ जैसी हिंदी फिल्में अपार कामयाबी हासिल कर लेती हैं.
पिछले सालों में देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में देखने का सिलसिला बढ़ा है. लेकिन हम या तो विदेशियों को सिखा-बता रहे हैं या उनसे ही सीख-समझ रहे हैं. देश की भाषाओँ में बनी फिल्मों की हमें खास जानकारी नहीं रहती. मुझे लगता है कि फिलहाल देश में एक राष्ट्रीय यानि कि नेशनल फेस्टिवल की जरूरत है. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय और एनएफडीसी पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की मदद से पहल कर सकते हैं. हाल ही में चीन के फिंगयाओ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भारत के ‘नया सिनेमा’ पर केन्द्रित आयोजन हुआ. यहां दिखाई गई फिल्मों के साथ बड़े पैमाने पर भारतीय फिल्मों के फेस्टिवल आयोजित किए जा सकते हैं. सिनेमा की लोकप्रियता और स्वीकृति को देखते हुए जरूरी हो गया है.
मामी ने पिछले कुछ सालों में रूप और स्वरूप बदला है. अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के आने के बाद पिछले पांच सालों में मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के  लोकप्रिय चेहरे इससे जुड़े. इनके जुड़ाव से आम युवा दर्शक फिल्म फेस्टिवल के प्रति आकर्षित हुआ है. इस पर बहस हो सकती है कि वर्तमान प्रबंधन समिति की कार्यशैली फेस्टिवल की प्रकृति के अनुकूल है या नहीं? मामी मेला और मास्टर क्लास में हिंदी और मुख्य भारतीय भाषाओं के परिचित चेहरों को बुलाने से उन्हें देखने-सुनने के लिए भीड़ उमड़ती है. उनमें से कुछ बेहतरीन फिल्मों के देखने के के साथ सुधि और सिद्ध दर्शकों में बदलते हैं. दर्शकों को जुटाने और उन्हें कलात्मक बेहतरीन फिल्मों के प्रति संवेदनशील बनाने का यह तरीका सही है.
पिछले रविवार को मुंबई के बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित मूवीमेला एक आकर्षक आयोजन था. इस मेले के चार सेशन में दीपिका पादुकोण, राधिका मदान, मृणाल ठाकुर, अनन्या पांडे, जान्हवी कपूर, अविनाश तिवारी, श्रीराम राघवन, कोंकणा सेन शर्मा, अमर कौशिक, सिद्धार्थ आनंद, अमित शर्मा, मेघना गुलजार, आलिया भट्ट, करीना कपूर खान और करण जौहर शामिल हुए. आलिया भट्ट और करीना कपूर खान से करण जौहर ने सवाल किए. बाकी सभी सेशन अनुपमा चोपड़ा और राजीव मसंद ने संचालित किए. यह आयोजन दर्शकों को शहद चटाने की तरह था. मीठे आयोजन के बाद के सात दिनों के फेस्टिवल में हर विधा और रस की कलात्मक फिल्में दिखाई जाएंगी. पिछले 20 सालों में मैंने देखा है कि यह फेस्टिवल व्यवस्थित होने के साथ ही दर्शकों के अनुकूल हुआ है.
मामी समेत हमारे देश के अधिकांश फेस्टिवल सितंबर के बाद होते हैं. तब तक सनडांस, लोकार्नो, कान,बर्लिन.वेनिस,टोरंटो,बुशान,पेइचिंग आदि शहरों में फेस्टिवल हो चुके होते हैं. नतीजा यह होता है कि इन फेस्टिवल में दिखाई और चर्चित हो चुके फिल्में ही आ पाती हैं. हां, कभी-कभी कोई नई फिल्म वर्ल्ड प्रीमियर के लिए मिल जाती है, लेकिन अधिकांश फिल्में किसी और फेस्टिवल से होकर यहां पहुंचती हैं. फिर भी दर्शकों के लिए राहत और खुशी की बात होती है कि उन्हें चर्चित फिल्में मुंबई में देखने को मिल जाती हैं. मामी में भारत में बनी फिल्मों को भी प्रतिनिधित्व और पुँरास्कर मिलने लगा है. उत्सुकता और भागीदारी बढ़ी है. भारतीय कलाकारों और फिल्मकारों की निगाहें भी मामी पर टिकी रहती हैं.
लेकिन...मामी समेत तमाम भारतीय फिल्म फेस्टिवल में पिछले सालों में अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ा है. सब कुछ अंग्रेजी में ही दिखाया-बताया जाता है. विडंबना यह है कि हिंदी फिल्मों में सक्रिय कलाकारों और फिल्मकारों की भी पहली भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. भारत में आयोजित फिल्म फेस्टिवल भारत के गैरअंग्रेजी भाषी दर्शकों की बिल्कुल परवाह नहीं करते. हिंदीभाषी इलाकों में महत्वाकांक्षी कलाकारों और फिल्मकारों को लंबा संघर्ष करना पड़ता है. मालूम नहीं, कोलकाता और तिरुअनंतपुरम के फेस्टिवल में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता है या नहीं? मुंबई में तो सब कुछ अंग्रेजी में ही चल रहा है.
बहरहाल, मामी में इस साल 53 देशों की 49 भाषाओं में 190 फिल्में प्रदर्शित होंगी.


Tuesday, October 8, 2019

सिनेमालोक : अपने-अपने अमिताभ


सिनेमालोक
अपने-अपने अमिताभ 
पिछले 50 सालों में अमिताभ बच्चन ने ‘सात हिंदुस्तानी’(1969) से लेकर ‘बदला’(2019) तक के फिल्मी सफर में हर रंग,भाव,विधा और शैली की फिल्मों में काम किया है. ‘जंजीर’ से मिली एंग्री यंग मैन की छवि उनके साथ ऐसी चिपकी की उसने उनकी एक्टिंग के अन्य आयामों को धूमिल कर दिया. ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि की फिल्मों को जबरदस्त लोकप्रियता मिली. उन्हें बार-बार देखा गया,उन लिखा गया. देश की सामाजिक और राजनीती हलचलों से जोड़ कर उन पर विमर्श हुआ. हिंदी फिल्मों के इतिहास का यह महत्वपूर्ण अध्याय है और उसके अमिताभ बच्चन नायक हैं. आने वाले सालों में भी उनकी चर्चा चलती रहेगी.
पिछले 50 वर्षों में अमिताभ बच्चन ने अनेक पीढ़ियों का मनोरंजन किया है. उन्हें प्रभावित किया है और अपना मुरीद बना दिया है. मंचों और टीवी शो में सबसे ज्यादा उनकी नकल की जाती है. आवाज को भारी कर उनके मशहूर संवाद बोलते ही हर प्रशंसक खुद में अमिताभ बच्चन को महसूस करता है...हें. वास्तव में यह एक महान अभिनेता के अभिनय की सरलता है कि कोई भी उसके नकल कर लेता है. अमिताभ बच्चन प्रशिक्षित अभिनेता नहीं है. उन्होंने स्कूल के दिनों में जितना थिएटर किया था, उतना अनगिनत लोग करते हैं. उल्लेखनीय है कि फिल्मों में आने का इरादा करने के बाद उन्होंने खुद को कैसे संवारा. आरंभिक नकार के बाद भी डटे रहे और फिर कुछ ऐसा संयोग बना कि वे सभी के चहेते बन गए. उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि पिछली सदी में उन्हें ‘वन मैन इंडस्ट्री’ और ‘मिलेनियम स्टार’ के खिताब दिए गए.
हर प्रशंसक और दर्शक के अपने अमिताभ हैं. उन्हें उनकी कुछ फिल्में ज्यादा पसंद हैं.देश के हर फिल्म प्रेमी दर्शक की पसंदीदा फिल्मों की फेहरिस्त दूसरों से अलग होगी. उनमें 8-10 फिल्मों की समानता मिल सकती है, लेकिन सुधि दर्शकों के फेहरिस्त अलहदा मिलती है. उनकी बातें करो तो वे अपने पसंद की फिल्मों की वजह बताने के साथ तारीफ करने लगते हैं. मेरे एक मित्र को अमिताभ बच्चन की ‘नमक हलाल’ सबसे ज्यादा पसंद है. कारण है फिल्म में एक के बाद एक हंसोड़ प्रसंगों का होना. अमिताभ बच्चन ने हरियाणवी अंदाज़ पकड़ते हुए ठेठ देसी मुहावरों का बेहद प्रभावशाली इस्तेमाल किया है. सहर आये एक गंवाई की नैतिकता उसे ऊंचा स्थान दे जाती है. अमिताभ बच्चन कॉमिकल फिल्मों में अपने खिलंदड़े अंदाज से खूब गुदगुदी लगाते हैं. वास्तव में हिंदी पर उनकी पकड़ से यह संभव हुआ है. वह लहजे की लोच,ठहराव और बारीकियों को समझते हैं और हर शब्द को उसके अर्थ के साथ ध्वनित करते हैं.
अगली छुट्टियों में मौका निकाल कर आप हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में आए उनकी फिल्मों को किसी भी क्रम में देख लें. उन फिल्मों में एक अलग अमिताभ बच्चन मिलते हैं. ‘आनंद’, ‘नमक हराम’,’मिली’,’अभिमान’,’चुपके चुपके’,’बेमिसाल’ और ‘जुर्माना’ में उनके अभिनय के विविध आयामों को देखा और समझा जा सकता है. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की तरह हृषिकेश मुखर्जी ने उनकी छवि को बार-बार नहीं भुनाया. वे अपनी हर फिल्म में उन्हें एक अलग अंदाज में पेश करते रहे. कुछ पाठक चौंक सकते हैं कि अमिताभ बच्चन ने सबसे ज्यादा फिल्में हृषिकेश मुखर्जी के साथ की हैं. हम इस धारणा में रहते हैं कि यह श्रेय प्रकाश महरा और मनमोहन देसी को जाता है.
उम्र के इस पड़ाव पर भी वे सक्रिय हैं और सचेत तरीके से फिल्मों का चुनाव कर रहे हैं. पिछले डेढ़ दशकों में उन्होंने ज्यादातर युवा और नए निर्देशकों के साथ ही काम किया है. उनकी सक्रियता और स्वीकृति का ही नतीजा है कि उनकी उम्र और शैली के अनुसार भूमिकाएं लिखी जा रही हैं. वे हर फिल्म में एक नया जादू बिखेर देते हैं. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में उनके ओजस्विता,विनम्रता और मृदुलता देखते ही बनती है. उनके आलोचक इसे उनकी एक्टिंग कहते हैं, लेकिन यह सहजता अभिनय में आसानी से नहीं आती. उनके करीबी बताते हैं बताते हैं कि वे अनुशासित तरीके से हर नए प्रोजेक्ट में संलग्न होते हैं. आज के युवा कलाकार को उनकी लगन और तत्परता देख कर चकित रहते हैं.



Thursday, October 3, 2019

सिनेमालोक : कुछ फिल्में गांधी की


सिनेमालोक 
कुछ फिल्में गांधी की 
-अजय ब्रह्मात्मज 
भक्त विदुर (1921) - निर्देशक कांजीलाल राठौड़ ने कोहिनूर फिल्म कंपनी के लिए 'भक्त विदुर' का निर्देशन किया था. फिल्म के निर्माता द्वारकादास संपत और माणिक लाल पटेल थे. दोनों ने फिल्म में क्रमशः विदुर और कृष्ण की भूमिकाएं निभाई थीं. इस फिल्म में विदुर ने गांधी टोपी और खद्दर धारण किया था. यह मूक फ़िल्म दर्शकों को भा गई थी. इतनी भीड़ उमड़ी थी कि पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा. इस फिल्म को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. आदेश में लिखा था, 'हमें पता है कि आप क्या कर रहे हैं? यह विदुर नहीं है, यह गांधी है और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे.' 'भक्त विदुर' भारत की पहली प्रतिबंधित फ़िल्म थी.
महात्मा गांधी टॉक्स(1931) – अमेरिका की फॉक्स मूवीटोन कंपनी ने गांधी जी से बातचीत रिकॉर्ड की थी. इसके लिए वे बोरसाद गांव गए थे. गांधी जी की आधुनिक तकनीकी चीजों में कम रूचि थी, फिर भी उन्होंने इसे रिकॉर्ड की अनुमति दी. वैसे उन्होंने कहा भी कि ‘मैं ऐसी चीजें पसंद नहीं करता, लेकिन मैंने खुद को समझा लिया है.
महात्मा गांधी 20 वीं सदी का मसीहा(1937) - एक के चेट्टियार ने गांधी जी पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया था. इस डॉक्यूमेंट्री में तमिलनाडु के तिरुपुर में सूत कातती 200 महिलाएं नजर आती हैं. पीछे से कर्नाटक के गायक डीके पटेल की आवाज में आडू राति(चरखे को चलने दो) गीत सुनाई पड़ता है. तमिल में बनी इस फिल्म को बाद में तेलुगू और हिंदी में भी डब किया गया. कुल 50000 फीट के फुटेज को एडिट कर 12000 फीट की फिल्म बनी थी.
महात्मा/धर्मात्मा(1935) - वी शांताराम निर्देशित यह फिर मराठी और हिंदी में प्रदर्शित हुई थी. इसमें बालगंधर्व ने अभिनय किया था. संत तुकाराम के जीवन पर आधारित इस फिल्म का शीर्षक अधिकारियों को गांधीजी के संबोधन से मिलता-जुलता लगा था.इसलिए विशेष आदेश देकर फिल्म का शीर्षक बदला गया. वी. शांताराम ने फिर ‘धर्मात्मा’ शीर्षक से इसे रिलीज किया.
गांधी(1982) - रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ महात्मा गांधी के जीवन पर सर्वाधिक चर्चित और देखि गयी फिल्म है. भारत सरकार के सहयोग से निर्मित इस फिल्म को देश-विदेश में प्रशंसा मिली. महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रयोगों को समेटती यह फिल्म  स्वतात्न्त्रता आन्दोलन की भी झलक देती है. शीर्षक चरित्र महात्मा गांधी इस आंदोलन के प्रभावी नेता के रूप में दिखते हैं. गांधी के व्यक्तित्व-कृतित्व को समझने के लिए यह बेहतरीन फिल्म है. इसमें गांधी की भूमिका गुजराती मूल के बेन किंग्सले ने निभाई थी. इसे ऑस्कर के कई पुरस्कार मिले थे.
द मेकिंग ऑफ महात्मा(1996) - निर्देशक श्याम बेनेगल की ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ गांधी के महात्मा बनने की कहानी है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के 20 वर्षों के प्रवास और अनुभवों को समेटती यह फिल्म बताती है कि कैसे एक महत्वाकांक्षी बैरिस्टर ने ज़ुल्म और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और महसूस किया कि उन्हें भारत में आकर देश के आजादी के लिए काम करना चाहिए. दक्षिण अफ्रीका में ही गांधीवादी मूल्यों और सिद्धांतों के बीज पड़े थे. युवा गांधी की भूमिका राजित कपूर ने निभाई थी.
गांधी माय फादर(2017) - फिरोज फिरोज खान निर्देशित ‘गांधी माय फादर’ गांधी और उनके बेटे हरिलाल के तनावपूर्ण संबंध की कहानी है. इस फिल्म में हम देखते हैं कि देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व कर रहा शखस  अपने सिद्धांतों और मूल्यों की वजह से गलतफहमी का शिकार होता है. ऐसा लगता है कि गांधी हरिलाल के लिए आदर्श पिता नहीं थे..  पारिवारिक द्वंद्व में फंसे गांधी का मानवीय पहलू नज़र आता है. जहाँ वे एक कमज़ोर,विवश और लाचार पिता के रूप में दिखते हैं.
इन सभी फिल्मों के अलावा कुछ ऐसी भी फिल्में हैं, जिनमें फोकस गांधी पर नहीं है, वे इन फिल्मों में सहयोगी और खास चरित्र के रूप में दिखते हैं. ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘डॉ बाबासाहेब आंबेडकर’, ‘सरदार’, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस – द फॉरगोटन हीरो’ और वीर सावरकर जैसी फिल्मों में हम उन्हें एक अलग छवि में देखते हैं. इन फिल्मों के लेखको और निर्देशकों ने गांधी से संबंधित पॉपुलर शिकायतों का इस्तेमाल किया है. ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘रोड टू संगम’ और ‘गांधी टू हिटलर’ में गांधी के आदर्शों और प्रयोगों का प्रासंगिक उपयोग हुआ है.
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर आप इन फिल्मों को खोज कर देख सके तो फिल्मों के माध्यम से उन्हें अच्छी तरह समझ सकेंगे.