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Showing posts from May, 2019

संडे नवजीवन : कमाई और कामयाबी है बायोपिक में

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संडे नवजीवन
कमाई और कामयाबी है बायोपिक में -अजय ब्रह्मात्मज हर हफ्ते नहीं तो हर महीने कम से कम दो बायोपिक की घोषणा हो रही है.उनमें से एक में कोई लोकप्रिय स्टार होता है.बायोपिक निर्माताओं में फिल्म इंडस्ट्री के बड़े बैनर होते हैं.दरअसल,बायोपिक का निर्माण निवेशित धन की वापसी और कमाई का सुरक्षित जरिया बन चुका है.पिछले कुछ सालों में आई बायोपिक में से कुछ की कामयाबी ने निर्माताओं का विश्वास और उत्साह भी बढ़ा दिया है.वे बायोपिक की तलाश में रहते हैं.लेखक किताबें छान रहे हैं.स्टार कान लगाये बैठे हैं.और निर्माता तो दुकान खोले बैठा है.अभी कम से कम 40 बायोपिक फ़िल्में निर्माण की किसी न किसी अवस्था में हैं.हाल ही में गणितज्ञ शकुंतला देवी पर बायोपिक की घोषणा हुई है,जिसका निर्देशन अनु मेनन करेंगी.विद्या बालन परदे पर शकुंतला देवी के रूप में नज़र आएंगी.कुछ बायोपिक फिल्मे इस साल के आखिर तक रिलीज होंगीं,जिनमें ‘उधम सिंह’ और ‘तानाजी’ पर सभी की नज़र है. हिंदी फिल्मों के अतीत में झांक कर देखें तो शुरुआत से ही चरित कथाएं बनती रही है. मिथक और इतिहास के प्रेरक चुनिंदा चरित्रों को फिल्मों का विषय बनाया जाता रहा है.…

सिनेमालोक : मातृभाषा में संवाद

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सिनेमालोक मातृभाषा में संवाद अजय ब्रह्मात्मज पिछले दिनों कलाकार क्लब द्वारा आयोजित ‘शॉर्ट फिल्म प्रतियोगिता’ की जूरी में बैठने का संयोग बना. जूरी में मेरे अलावा निर्देशक डॉ, चंद्रप्रकाश द्विवेदी और एडिटर अरुणाभ भट्टाचार्य थे. इस प्रतियोगिता में अनेक भाषाओँ की फ़िल्में थीं. कई घंटो तक एक-एक कर फ़िल्में देखते हुए एक अलग एहसास घना होता गया. कलाकारों की भाषा...उनकी संवाद अदायगी और उससे प्रभावित अभिनय.हिंदी फिल्मों में हिंदी की बिगड़ती और भ्रष्ट हो रही हालत पर मैं लगातार लिखता रहता हूँ. नियमित फ़िल्में देखते समय भी दिमाग का एक अन्टेना यह पकड़ रहा होता है की संवादों में किस प्रकार का भाषादोष हो रहा है. हिंदीभाषी और हिंदी साहित्य का छात्र होने की वजह से भी कान चौकन्ने रहते हैं.यूँ भी कह सकते हैं कि खामियां जल्दी सुनाई पड़ती हैं. मैं अपनी समीक्षा और लेखों में आगाह और रेखांकित भी करता रहता हूँ. कुछ हफ्ते पहले मैंने इसी कॉलम में उल्लेख किया था कि इन दिनों के अधिकांश अभिनेता स्पष्ट उच्चारण के साथ हिंदी संवाद नहीं बोल पते हैं.पहले के अभिनेता हिंदी में समर्थ नहीं होने पर अभ्यास करते थे. अभी भी भाषा और उसक…

सिनेमालोक : प्रौढ़ नायक का प्रेम

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सिनेमालोक प्रौढ़ नायक का प्रेम अजय ब्रह्मात्मज हिंदी फिल्मों में एक्टर की वास्तविक उम्र हमेशा अपने कैरेक्टर से ज्यादा होती हैं. फिल्मों की यह परिपाटी है कि कोई एक्टर नायक की भूमिका में लोकप्रिय और स्वीकृत हो गया तो वह अंत-अंत तक नायक की भूमिका निभाता रहता है...वह भी जवान नायक की भूमिका. दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद के जमाने से ऐसा चला आ रहा है. इनमें से दिलीप कुमार और राज कपूर तो एक उम्र के बाद ठहर गए,लेकिन देवानंद अंतिम सांस तक हीरो ही बने रहे. उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया कि सभी की तरह उनकी उम्र बड़ी है. वह भी उम्रदराज हो गए हैं. आज के पॉपुलर नायकों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान. अभी तक बतौर हीरो ही पर्दे पर नजर आ रहे हैं. उनके ज्यादातर करैक्टर उनकी वास्तविक उम्र से कम होते हैं. आमिर खान ने ‘दंगल’ में खुद से बड़ी उम्र की भूमिका जरूर निभाई, लेकिन विज्ञापन से लेकर फिल्मों तक में भेष और उम्र बदलने का प्रयोग कर वे वास्तविक उम्र को धोखा देते रहते हैं. शाह रुख खान ने ऐसे ही ‘वीर जारा’ में प्रोढ़ छवि पेश की थी. ‘डियर ज़िंदगी’ में वह आलिया भट्ट के साथ अपनी उम्र के किरदार में नजर आए…

सिनेमालोक : कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण

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सिनेमालोक  कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण -अजय ब्रह्मात्मज यह समस्या इधर बढ़ी है.हमारे युवा फिल्म कलाकार भाषा खास कर अपनी फिल्मों की भाषा - हिंदी पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. लगता है घडी की सुई घूम कर फिर से चौथे दशक में पहुँच गयी है, हिंदी फिल्मों के टाकी होने के साथ फिल्मों में आये कलाकार ढंग से हिंदी नहीं बोल पाते थे.पारसी और कैथोलिक समुदाय से आये इन कलाकारों के परिवेश और परिवार की भाषा पारसी और अंग्रेजी रहती थी,इसलिए उन्हें हिंदी बोलने में दिक्कत होती थी.तब उनके लिए भाषा के शिक्षक रखे जाते थे,उनका उच्चारण ठीक किया जाता था.सेट पर शूटिंग के समय और तैयारी के लिए हिंदी-उर्दू के प्रशिक्षक रखे जाते थे.पूरा ख्याल रखा जाता था.फिर भी चूक हो जाती थी तो फिल्म समीक्षक उनकी हिंदी पर अलग से टिपण्णी करते थे.80 सालों के बाद हम फिर से वैसे ही हालात में पहुंच रहे हैं. ताज़ा उदहारण है ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2’. इस फिल्म में टाइगर श्रॉफ मुख्य भूमिका में हैं.उनके साथ तारा सुतारिया और अनन्या पांडे दो नयी हीरोइनें हैं. यह दोनों की लौन्चिंग फिल्म है.इस फिल्म को देखते हुए गहरा एहसास हुआ कि उनकी बोली गयी हिंदी दोषपूर्ण …

अवेंजर्स की अद्भुत कामयाबी

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अवेंजर्स की अद्भुत कामयाबी अजय ब्रह्मात्मज इस समय देश में दो चर्चाएं आम हैं. एक तो हर कोने-नुक्कड़ में चुनाव की चर्चा चल रही है. और दूसरी चर्चा है ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की. रिलीज के वीकेंड में फिल्प्रेमियों इसे देख लिया है. दर्शकों की रुचि और उत्साह को देखते हुए देश भर के सिनेमाघरों ने इसके अधिकाधिक शो रखे हैं. अहर्निश(दिन-रात) के शो चल रहे हैं. रात के शो भी हाउसफुल हैं. आलसी दर्शकों को टिकट नहीं मिल प् रहे हैं. अगर आप सोच रहे हैं कि शो के टाइम पर आप बॉक्स ऑफिस से टिकट ले लेंगे तो आप को घोर निराशा हो सकती है. रिलीज के पहले एडवांस से ही संकेत मिलने लगे थे कि दर्शकों कि बाढ़ से सिनेमाघर आप्लावित होंगे.यही हुआ भी. पहले ही 10 लाख टिकटों की बिक्री से अनुमान पुख्ता हो गया कि ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की जबरदस्त ओपनिंग लगेगी. पहले ही दिन इस फिल्म को 53,10 करोड़ का कलेक्शन मिला और दूसरे दिन के 51.40 के कलेक्शन से ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ ने सफलता का जादुई 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया. यह एक नया रिकॉर्ड है,जिसे तोड़ पाना किसी भारतीय फिल्म के लिए बड़ी चुनौती होगी. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ सिर्फ 2865 स्क्रीन में चल रह…

सिनेमालोक : रणवीर सबसे आगे

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सिनेमालोक रणवीर सबसे आगे  -अजय ब्रह्मात्मज रात का समय था.करीब 11 बज चुके होंगे. यशराज स्टूडियो में दिन की चहल-पहल समाप्त हो चुकी थी. वहां मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. एक फ़िल्म के हीरो की व्यस्तता की वजह से इंटरव्यू के लिए मुझे यही समय मिला था. हीरो की फिल्म रिलीज पर थी. शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्म के हीरो का इंटरव्यू रविवार को छप जाए तो पाठक और संपादक दोनों खुश होते हैं. इसी खुशी के लिए दिन भर की थकान के बावजूद उस हीरो के इंटरव्यू के लिए हां कहना ही पड़ा. बातचीत शुरू हुई . और ना जाने कब बेख्याली में मुझ से भूल हुई. इंटरव्यू दे रहे रणवीर सिंह ने मुस्कुराते हुए मुझे टोका,' सर जी,आप मुझे दो बार रणबीर बुला चुके हैं. मैं रणबीर हूं. कहीं आप मुझ से रणबीर के सवाल तो नहीं पूछ रहे हैं.' झेंपते हुए सॉरी कहने के बाद मैंने इंटरव्यू जारी रखा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी गलती हो सकती है. सामने बैठे एक्टर को मैं उसके प्रतिद्वंद्वी के नाम से बुला सकता हूँ. घर लौटने के बाद रिकॉर्डिंग सुनते ही एहसास हुआ कि यह तो भारी गलती है. फिर मैंने सोचा कि रणवीर को गुस्सा क्यों नहीं आया? वे च…

सिनेमालोक : राजनीति के फ़िल्मी मोहरे

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सिनेमालोक राजनीति के फ़िल्मी मोहरे -अजय ब्रह्मात्मज हिंदी सिनेमा और राजनीति का रिश्ता बहुत मीठा और उल्लेखनीय नहीं रहा है.उत्तर भारत की राजनीति में उनका इस्तेमाल ही होता रहा है.वे सजावट और भीड़ जुटाने के काम आते रहे हैं.उत्तर भारत की राजनीति में हिंदी फिल्मों से ही फ़िल्मी हस्तियां आती-जाती रही हैं. पहले केवल राज्य सभा के लिए उन्हें चुन लिया जाता था.वे संसद की शोभा बढ़ाते थे और कभी-कभार फिल्म इंडस्ट्री या किसी सामाजिक मुद्दे पर कुछ सवाल या बहस करते नज़र आ जाते थे. उनका महत्व और प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही होता था. इधर 21वी सदी में अब उनका उपयोग मोहरे की तरह होने लगा है. खास कर इस चुनाव में जिस तरह चुनाव की घोषणा के बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर टिकट दिए गए हैं,उससे यही संकेत मिलता है कि किसी राजनीतिक समझदारी से अधिक यह उनकी लोकप्रियता भुनाने का कदम है. अब सनी देओल का ही मामला लें. ठीक है कि स्वयं धर्मेन्द्र(सनी के पिता) ने कभी बीकानेर से सांसद का चुनाव लड़ा था. उनकी सौतेली मां हेमा मालिनी राजनीति में निरंतर सक्रिय हैं.लेकिन सनी या बॉबी देओल ने कभी राजनीतिक झुकाव नहीं दिखाया. जिस दिन अमित शाह के स…