हम फिल्में क्यों देखते हैं?-शशि सिंह

हिन्दी टाकीज-९
जिन खोजा तिन पाइया का मुहावरा शशि सिंह के बारे में सही बयान करता है. झारखण्ड के हजारीबाग जिले में स्थित कोलफील्ड रजरप्पा में पले-बढे शशि सिंह हिन्दी के पुराने ब्लॉगर हैं.सपने देखने-दिखने में यह नौजवान जितना माहिर है,उन्हें पूरा करने को लेकर उतना ही बेचैन भी है.अपनी जड़ों से गहरे जुड़े शशि सिंह ने प्रिंट पत्रकारिता शरुआत की थी.इन दिनों वे न्यू मीडिया (mobile vas) में सक्रीय हैं और वोडाफोन में कार्यरत हैं.शशि सिंह के आग्रह से आप नहीं बच सकते,क्योंकि उसमें एक छिपी चुनौती भी रहती है,जो कुछ नया करने के लिए सामने वाले को उकसाती है।

हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं,इसलिए हम फिल्में देखते हैं। यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते। मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और। खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है,इसलिए हम फिल्में देखते हैं।

फ्लैश बैक
फिल्में देखने की बात चली तो याद आता है वो दिन जब मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी। सिनेमा का वह मंदिर था,रामगढ़ का राजीव पिक्चर पैलेस। इस मंदिर में मैंने पहली पूजा स्कूल से निकलने और कॉलेज में दाखिले के पहिले की थी... वह भी अकेले। नाम तो ठीक-ठीक याद नहीं पर फिल्म में हीरोइन अपने अजय देवगन की श्रीमती (तब कुवांरी) काजोल थीं और शायद उनकी भी यह पहली ही फिल्म थी।

पहली फिल्म देखने में मैंने इतनी देर क्यों की? मुगालते में मत रहिये... शराफत के किस्से आगे हैं। खैर, झारखंड के हजारीबाग जिले में रजरप्पा प्रोजेक्ट कोलफील्ड की हमारी कॉलोनी नजदीकी शहर रामगढ़ से बीस किलोमीटर दूर थी और हम बच्चों की पूरी दुनिया कॉलोनी तक ही सीमित हुआ करती थी। लिहाजा शहर के सिनेमाघर में यह फिल्म देखना मेरे लिए नये अनुभवों से भरा बड़ा ही साहसिक कदम और था... उस दिन तो मानो खुले आसमान में पहली उड़ान-सा अहसास था।

अब चलिए जरा पीछे के कालखंड में चलकर फिल्में देखने के मेरे कारणों की पड़ताल करते हैं। तकरीबन 1500 घरों की हमारी कॉलोनी में पहला टेलिविजन सन 84 के आखिरी महीनों में और हमारे मुहल्ले में उसके कुछ महीने बाद यानी सन 85 में आया। यहीं से शुरू होता है फिल्म दर्शक बनने का मेरा सिलसिला।

नीले गगन के तले
हालांकि इससे पहले कॉलोनी के खुले मैदान में 16 एमएम प्रोजेक्टर से साप्ताहिक तौर पर दिखाई जाने वाली फिल्में देखी थी,पर यादें धुंधली है,इसलिए उस दौरान देखी गई फिल्मों का दोष घर के बुजुर्गों के मत्थे। वैसे ये अनुभव भले ही धुंधले हैं,मगर सिनेमा देखने का यह तरीका मुझे सबसे ज्यादा रोमांचित करता है।

खुले मैदान में साप्ताहिक सिनेमा का चलन इस इलाके के सभी कोलफील्ड के कॉलोनियों में था। रजरप्पा सहित कोल इंडिया की सभी कॉलोनियों में तो इस प्रथा को खत्म हुये सालों हो गये। मगर इसी इलाके के टिस्को यानी टाटा सन्स की कोलियरी वेस्ट बोकारो में यह प्रथा आज भी जिन्दा है। बात दीगर है कि यहां भी यह अब रस्मी दस्तूर भर रह गया है। उपयोगिता की बात करें तो यह वेस्ट बोकारो में रास्ते पर ठेले-खोमचे लगाने वालों को तो सिनेमा से जरूर जोड़े हुये है।

फिल्मों की नर्सरी टेलीविजन का आगमन
जैसा कि मैंने अपने मुहल्ले में टीवी आने का जिक्र किया। स्वाभाविक-सी बात है यह एक ऐतिहासिक घटना (मेरे फिल्मची बनने की जड़ें यहीं हैं) थी... और मुहल्ले के इस इतिहास के रचयिता थे बच्चों के चहेते तिवारी चचा। बाद में मुहल्ले के पहले रंगीन टीवी और पहले वीसीपी के स्वामित्व का सम्मान भी इन्हीं के खाते में आया।

बहरहाल, तिवारी चचा अपने घर टीवी आने के ऐतिहासिक आयोजन में हम बच्चों को शामिल करना नहीं भूले। शायद चचा को मालूम था कि हम बच्चे ही इस इतिहास के जीते-जागते पन्ने हैं,जिनके माध्यम से जमाने में उनकी कृतित्व को पढ़ा जायेगा। हुआ भी यही, आगे महीनों तक हम बच्चे चचा के शौर्य का यशगान करते रहे। इस मुनादी के लिए चचा हममें बिना नागा किये दूरदर्शन के कार्यक्रमों की आरएसएस फीड डालना नहीं भूलते थे।

घर वालों को भी हमारे टीवी देखने पर कुछ खास ऐतराज नहीं होता था। कारण एक तो मुहल्ले का लगभग हर घर तिवारी चचा के शौर्य के प्रभाव में आ चुका था और वह खुद भी दर्शकों में शामिल था, दूजा यह कि घर वालों को कुछ समय के लिए हमारे उधम से छुटकारा मिल जाया करता।

उन दिनों हमारे इतवार खास होने लगे। क्योंकि एक तो इतवार की शाम को टीवी पर फिल्में आती थीं, दूसरे सिर्फ इतवार को ही दिन में भी कार्यक्रम प्रसारित होते थे। हालांकि फिल्मी गीतमाला चित्रहार की वजह से बुधवार और शुक्रवार की भी खासी अहमियत थी।

शुरूआत में हमारे लिए फिल्म और कृषि दर्शन, चित्रहार और समाचार में ज्यादा अंतर नहीं था। हमारे लिए तो टीवी देखना ही एकमेव ध्येय था। शाम को सत्यम, शिवम, सुंदरम के उद्घोष के साथ दूरदर्शन के पट खुलने से लेकर जब तक झपकी न आने लगे तब तक बच्चे चचा के घर डटे रहते थे। अक्सर हमसे से अधिकतर बच्चे टांगकर या बहला फुसलाकर घरों को लाये जाते। कभी-कभी तो हम दूरदर्शन के पट बंद होने तक उस पर टकटकी लगाये रहते थे।

खैर, समय बीतता गया। धीरे-धीरे हमें टीवी के दूसरे कार्यक्रमों और फिल्मों का फर्क समझ में आने लगा। कहने की जरूरत नहीं कि फिल्में हमें ज्यादा आकर्षित कर रही थीं। अब तक मेरे घर सहित मुहल्ले के कई घरों में टीवी के एंटिने दिखने लगे थे। लेकिन हमारे तिवारी चचा के घर की रौनक पर मुहल्ले के दूसरे एंटिना फर्क नहीं डाल सके थे। क्योंकि अब उनके टीवी के स्क्रीन पर तस्वीरें रंगीन दिखने लगी थीं। मुहल्ले के इतिहास के सूत्रधारों यानी हम बच्चों की अब भी चचा का वफादार बने रहना टीवी (ब्लैक एंड ह्वाइट ही सही) वाले घरों के अभिभावकों को खटकने लगा था। पर अक्सर उनकी झिड़कियों पर चचा का रंगीन टीवी भारी पड़ता था(आज फिल्मों में रंग-संयोजन के प्रति अपने संवेदनशीलता की वजह मैं इसे ही मानता हूं)।

वीएचएस क्रांति
अब उस दौर का आगमन होता है,जब फिल्में देखने के लिए उस दूरदर्शन पर निर्भरता कम होती जा रही थी, जिस पर सिर्फ पुरानी फिल्मों की ही चहल थी। वीएचएस क्रांति के इस दौर में हमारे फिल्म दर्शकत्व को एक नया आयाम मिला और हम नई फिल्में देखने में खुद को सक्षम पाने लगे। इस दौर को वीडियो युग कहना सबसे सही होगा। इस दौर में वीसीपी और वीसीआर का स्वामी होना मुहल्ले में किसी सल्तनत के सुल्तान-सी हैसियत दिलाता था। हालांकि मुहल्ले के पहले वीसीपी का मालिक होने का श्रेय भी अपने तिवारी चचा को ही जाता है, मगर तब तक बाज़ार में वीसीपी किराये पर देने का व्यवसाय शुरू हो चुका था। इस व्यवसाय की वजह से चचा की बैठक को किसी और बैठक से कड़ी चुनौती मिलने वाली थी।

यह चुनौती मिली मुहल्ले में एक ऐसे सदस्य के आगमन से,जो पुलिस सेवा में थे। इस परिवार के आने से हमारी वानर सेना की ताकत में तो इजाफा हुआ ही साथ ही मुहल्ले के लोगों की फिल्में देखने की आदत में आमूलचूल परिवर्तन हुआ।

हमारे ये नये पड़ोसी बाजार में उपलब्ध सेवाओं के इस्तेमाल से तो परहेज नहीं करते लेकिन पुलिस में थे इसलिए उसकी कीमत चुकाना अपनी शान के खिलाफ समझते। वीडियो पर फिल्में दिखाने का व्यवसाय करनेवालों पर तो ये मानो अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे।

अब इस तरह के सुविधा से लैस पड़ोसी के मुकाबले अपने तिवारी चचा कहां टिकने वाले थे, लिहाजा अब उन्होंने हथियार डाल दिया। इस मामले में ड्राइविंग सीट तो चचा ने छोड़ दी,लेकिन बस की सवारी नहीं छोड़ी। आखिर थे तो वो बहुत बड़े फिल्मची।

तिवारी चचा के फिल्म प्रेम से प्रेरणा और उनके संरक्षण में हम सब ने अपने पुलिस पड़ोसी के विशेषाधिकारों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। पुलिस पड़ोसी के नाम की धौंसपट्टी में इलाके के सभी वीडियो पार्लर वाले थे। बस जब भी इशारा होता पार्लर वाले वीसीपी और चार-पांच कैसेट तो देते ही देते वीडियो हॉल वाला अपना रंगीन टीवी भी ठेले पर लदवाकर हमारे मुहल्ले में पहुंचा जात थेे।

इस दौर में हमारे मुहल्ले में वीडियो फिल्म प्रदर्शन सार्वजनिक आयोजन का रूप ले चुका था। और जब आयोजन सार्वजनिक हो तो भव्य होना लाजिमी है। पुलिस पड़ोसी के राज में वीडियो प्रदर्शन कमरों से निकलकर बाहर खुले में होने लगे और एक-साथ कम-से-कम तीन-चार फिल्मों का प्रदर्शन अनिवार्य हो गया। इस तरह के आयोजनों की नियमितता लगभग साप्ताहिक होती थी। विशेष मौकों पर कभी-कभी यह आयोजन सप्ताह में एकाधिक बार होते। भव्यता की वजह से वीडियो लोकप्रियता में टीवी को भी पीछे छोड़ चुका था।

वीडियो का जादू उन दिनों इतना सिर चढ़ चुका था कि छोटे कस्बों में सिनेमाघर नहीं थे,वहां वीडियो हॉलों का जाल बिछ गया था। हमारी कॉलोनी के पड़ोस में स्थित ग्रामीण बाजार चित्तरपुर जैसी छोटी जगह में भी तीन-तीन वीडियो हॉल स्थानीय मांग को पूरा करने में असमर्थ थे। इतना ही नहीं लंबी दूरी की रात्रि बसों में वीडियो का न होना लगभग अनिवार्य शत्र्त हो चुकी थी। वीडियो कोचों की शुरुआत पहले रांची-पटना रूट की बसों से हुई, बाद में धीरे-धीरे लोगों के सिनेमा प्रेम और वीडियो की तकनीक के मेल ने लगभग सभी रूट की बसें वीडियो सुविधा से युक्त होने लगे।

यहां तक कि तिवारी चचा के घर वीसीपी आने से काफी पहले मैंने वीडियो पर अपने जीवन की पहली फिल्म बस में ही देखी थी। उस फिल्म का नाम आज भी मुझे याद है... फिल्म थी जीतेन्द्र अभिनीत 'कालभैरवÓ । अमूमन हमारा परिवार गांव जाने के लिए रामगढ़ से छपरा वाली बसों से सफर करता था, मगर तब तक उन बसों में वीडियो नहीं लगे थे। तो पापा ने हम चारों भाई-बहनों (एक बहन, तीन भाई) और मम्मी को वीडियो दिखाने के लिए छपरा के बजाय पटना वाली बस पकड़ी। थैक्यू पापा!!! अब पिता होने की वजह से समझ सकता हूं कि तब पूरे परिवार और सामान के साथ पटना से छपरा के लिए गाड़ी बदलने में कितनी तकलीफ हुई होगी। ये तकलीफ आपने हमें सिर्फ वीडियो दिखाने के लिए सही थी।

सैटेलाइट की छाया
हमारे इलाके में जब तक सैटेलाइट टीवी के केबल खींचे जाते हम स्कूल छोडऩे की दहलीज पर पहुंच चुके थे। अच्छा हां, यहां यह उल्लेख करना तो रह ही गया कि स्कूल के कई दूसरे साथियों की तरह मुझे स्कूल से भागकर वीडियो हॉल में फिल्में देखने का शौक बिल्कुल नहीं था। कारण दो थे, पहला तो हमारा मोहल्ले की फिल्मप्रेमी जनता इतनी सक्षम थी कि जब जी चाहे वीडियो हॉल हमारे मोहल्ले पहुंच जाता। दूसरा, कि मैं क्लास का मॉनिटर हुआ करता था,लिहाजा ऐसा करना न तो मैं अफोर्ड कर सकता था और न ही मुझे ऐसा करना शोभा देता। वैसे मेरी मॉनिटरी भागकर फिल्म देखने वाले कई दोस्तों को हेडमास्टर की मार से बचाने के काम जरूर आई।

हां तो बात सैटेलाइट दौर की... इस दौर में टीवी पर फिल्मों ने कम फिल्म आधारित कार्यक्रमों ने खास प्रभावित किया। विशेष तौर पर जी टीवी पर आने वाले तीन-चार कार्यक्रम मुझे खासतौर पर याद हैं... पहला फिलिप्स टॉप टेन, दूसरा अनु कपूर की अंताक्षरी, तीसरा सारेगमा और चौथा फिल्मी चक्कर। इसमें भी फिल्मी चक्कर मुझे खास पसंद था। सतीश शाह और रत्ना शाह अभिनीत इस कॉमेडी सीरियल में फिल्मों के पीछे दीवाने परिवार की कहानी गुदगुदा जाती थी।

बचपना खत्म हो चुका था। धीरे-धीरे अब हम जवानी की दहलीज पर आ चुके थे। फिल्मों के बारे में अब अपनी एक स्वतंत्र राय बन चुकी थी। फिल्में देखने में चूजी होते जा रहे थे। वैसे भी अब छोटे पर्दे पर फिल्में देखना पहले जितना मजा नहीं दे रहा था।

बड़ा पर्दा
बड़े पर्दे पर फिल्में देखने का सिलसिला कॉलेज के दिनों शुरू हुआ। कॉलेज की पढ़ाई के लिए कॉलोनी छोड़ हजारीबाग रहना होने लगा। बात 1992 दिसम्बर की है,जब मैंने संत कोलम्बस कॉलेज में दाखिला लिया। रहना होता था छात्र बहुल इलाका कोर्रा में और सिनेमा देखने के लिए शहर में चार सिनेमा हॉलों की सुविधा थी।

ये चारों थे लक्ष्मी, विशेश्वर, इंद्रपुरी और मोहन टॉकीज। इनमें लक्ष्मी और विशेश्वर एक ही प्रागंण में थे यानी आज के हिसाब से मल्टीप्लैक्स। बेहद भव्य और शहर की शान इस हॉल में अमूमन नई फिल्में लगती थी। इन्द्रपुरी की भी हालत अच्छी थी। चौथा मोहन टॉकीज कई मामलों में बाकियों से अलग था। आपने अब यही सुना होगा कि थियेटरों में सिर्फ शुक्रवार को ही फिल्में बदलती है, मगर हमारे मोहन टॉकीज के मामले में ऐसी कोई गारंटी नहीं थी। फिल्में किसी भी दिन बदल सकती थी। वैसे मोहन टॉकीज की सीटों में रहने वाले खटमल भी खासे मशहूर थे। शहर के सबसे पुराने और खस्ताहाल मोहन टॉकीज में मैंने पूरे पांच साल के अपने हजारीबाग प्रवास के दौरान सिर्फ डेढ़ फिल्में देखी थी। एक तो सनी देओल वाली 'बॉर्डरÓ और आधी फिल्म थी 'हम सब चोर हैंÓ। हम सब चोर हैं इतनी वाहियात फिल्म थी कि मैं और मेरा दोस्त विवेक इंटरवल से ज्यादा नहीं झेल पाये और निकल भागे।

इंद्रपुरी में उन दिनों नई के साथ-साथ कई बार पुरानी क्लासिक फिल्में दिखाई जाती थी। मार्निंग शो में लगने वाली ए श्रेणी वाली अंग्रेजी फिल्में इंद्रपुरी की शान थी। लेकिन इस हॉल को मैं याद करना चाहूंगा फिल्म 'दोस्तीÓ के लिए। दोस्ती फिल्म मैंने अपने परम मित्र और रूम पार्टनर विवेक के साथ देखी थी। फिल्म देखकर दोनों इतने भावुक हुई कि पूरे रास्ते हम दोनों अपनी दोस्ती की कसमें खाते आयें और तय किया कि हम अपनी दोस्ती ताउम्र कायम रखेंगे। मुझे फख्र है कि हम आज भी अपने वादे पर कायम है। इस घटना के साथ एक और मजेदार बात ये थी कि यह फिल्म हमने अपने बी.ए. पार्ट - टू की परीक्षा के दौरान देखी थी। यानी दो दिन की परीक्षा के बीच में मिले एक दिन के ब्रेक के दौरान। ये इसलिए भी खास है,क्योंकि परीक्षा के दिनों में छंटा से छंटा फिलिमची भी सिनेमा हॉल की तरफ रूख नहीं करता था।

लक्ष्मी और विशेश्वर हॉल तो हजारीबाग की शान और हम सब की पहली पसंद हुआ करता था। इसकी भव्यता और इसका विशाल प्रांगण इसे आसपास की इलाकों में एक दर्शनीय स्थान बनाता था। फिल्म 'खलनायकÓ को देखने उमड़ी भीड़ की टक्कर की भीड़ मैंने सिर्फ मुम्बई की लोकल ट्रेन या दिल्ली की बसों में देखी है। हजारीबाग जैसे छोटे से शहर में 1000 से ज्यादा सीटों वाले सिनेमा हॉल में फिल्म 'हम आपके हैं कौनÓ 17-18 हफ्ते तक चली थी। हालत ये थी... शहर में उन दिनों इस फिल्म के बाद ही शायद किसी बात की चर्चा होती थी। माधुरी प्रशंसक एक दोस्त ने तो यह फिल्म 36 बार देखी थी।

दौर बीत चुका
अब तो यह दौर भी बीत चुका है। अब सितारों की दुनिया भी करीब से देखता हूं... साथ में उठना-बैठाना और गपियाना भी होता है,मगर वो मजा नहीं आता जो तिवारी चचा की टीवी देखने में आता था। अभी पिछले दिनों ही गया था चचा से मिलने। 23 साल पुरानी वो रंगीन टीवी आज भी उनके बैठक की शोभा है और बिल्कुल ठीक-ठाक हालत में है। उस वक्त टीवी पर कार्यक्रम पता नहीं कौन-सा आ रहा था मगर मैं उसके स्क्रीन पर अपने बचपन को लाइव देख रहा था।

Comments

कृपया सुधार लें..


शशि सिंह हिन्दी के पुराने ब्लॉगर हैं नहीं थे.
chavannichap said…
aapka ranj dikh raha hai.abhi blog band nahin kiya hai ti kaise the likhen.chavanni par unki maujoodgi bhi unka hona jahir karti hai.sanjay bhai ...aap kyon nahin is series ke liye likhte.chavanni khush hoga.
chavannichap@gmail.com
SHASHI SINGH said…
संजय भाई,

सुधार चवन्नी को नहीं मुझे करनी है... आपकी शिकायत बस दूर होने को है।

आपकी नाराजगी में छूपा प्यार प्रभावित करता है। :)
Udan Tashtari said…
शशी को खोज लाये आप-आपका बहुत आभार..हमारा खोया हुआ भाई है-हिन्दी फिल्मों स्टाईल. यानि मालूम है कि कहाँ है, फिर भी खोया है. अब आप जो भी पढाओगे-पढेंगे. :)
Unknown said…
udan tashtari wale sameer bhai,
agar aap is series ke liye likhen to chavanni aur baki pathak kritagya honge.hamen ek naya pahloo aur kai rochak jaankariyan milengi.likh dalen...
chavannichap@gmail.com

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