फीका रहा आईफा 2011

-अजय ब्रह्मात्‍मज

शाहरुखखान से किसी ने पूछ दिया कि वे सात सालों तक आईफा में क्यों नहीं आए, तो वे बिफर गए और इसे मीडिया का दिमागी फितूर बता दिया कि हमारे न आने को वे लाबिंग से नाहक जोड़ते हैं। शाहरुख के इंकार करने के बावजूद सच्चाई तो यही है कि बच्चन परिवार का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था। सलमान खान और करीना कपूर लंदन में फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। सैफ अली खान आाईफा रॉक्स प्रेजेंट करने वाले थे, लेकिन ऐन मौके पर नदारद हो गए। चगमगाते सितारों में केवल शाहरुख और प्रियंका चोपड़ा ही थे। बाकी तो मुंबई के टिमटिमाते तारे थे, जो सितारों की अनुपस्थिति में चमकने लगे थे। 12वां आईफा अवार्ड समारोह सितारों की मौजूदगी और प्रभाव के लिहाज से फीका रहा। अवार्ड समारोह के दिन प्रियंका के परफॉर्मेस ने ही नाक बचाई। शाहरुख घुटने की चाोट की वजह से मंच पर रंग नहीं जमा सके। उन्होंने जल्दी-जल्दी में जो स्पूफ पेश किया, वह बचकाना और बोरिंग था। रितेश देशमुख और बोमन ईरानी की जोड़ी की प्रस्तुति में जोश और विट कमजोर रहा। अब उन्हें बदलने की जरूरत है।

हालांकि टोरंटों में उमड़े भारतवंशी पहुंचे स्टारों को ही देखकर आह्लादित थे और आशीष चौधरी और अयूब खान को पाकर खुश हो रहे थे, लेकिन पिछले सालों की तुलना में टोरंटो आईफा हर स्तर पर कमजोर ही रहा। डबल धमाल के प्रीमियर से यह फायदा हुआ कि पांच मझोले स्टार आ गए अन्यथा मल्लिका सहरावत और कंगना रनौत के बिना समारोह और फीका हो जाता। यह अलग बात है कि डबल धमाल देखने के बाद विदेशी दर्शक हिंदी सिनेमा के स्तर से हैरान थे। अमेरिका से आए एक पत्रकार का सवाल था कि क्या इस फिल्म को किसी ने पहले नहीं देखा था? अब उसे कौन बताता कि किस मजबूरी में डबल धमाल का चुनाव हुआ होगा। भारतीय परंपरा में सारे इवेंट और शो निश्चित समय से कम से कम एक घंटा देर से आरंभ हुए। हमने टोरंटो में भी इंडियन स्टैंडर्ड टाइम मेंटेन किया। कोई हंसे तो हंसे। हम अपनी खासियतों के साथ वहां मौजूद थे। लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? शायद इसी वजह से करण जौहर ने रणवीर सिंह को रणबीर कपूर, शाहरुख खान ने निखिल द्विवेदी को निखिल त्रिवेदी और लिसा रे ने अनुष्का शर्मा को अनुष्का शंकर नाम से संबोधित किया।

आईफा रॉक्स की शाम जर्मेन जैक्सन के साथ लाइव गाने के बाद सोनू निगम ने जैसे ही बोलने के लिए मुंह खोला, उनका माइक चुप हो गया। पता चला कि वे रिकॉर्डेड म्यूजिक पर ही होंठ हिलाकर लाइव का भ्रम पैदा कर रहे थे। जर्मेन ने तुरंत उन्हें अपना माइक देकर इज्जत बचाने की कोशिश की। गफलतें और भी हुई। आाईफा जिस बारीकी और परफेक्शन के लिए मशहूर हुआ करता था, उसकी कमी दिखी। आईफा के भूतपूर्व ब्रैंड एम्बैसडर आाईफा वीकएंड को फिल्म इंडस्ट्री को गेट-टुगेदर समारोह कहा करते थे। इस बार वह टुगेदरनेस नहीं दिखा।

फिर भी इतने बड़े आयोजन की संकल्पना के लिए आाईफा को बधाई देनी होगी। विदेश की धरती पर हिंदी फिल्मों का यह जश्न बताता है कि हिंदी सिनेमा किस स्तर पर भारतवंशियों को प्रभावित करने के साथ अपने देश से जोड़ता है। जरूरत है कि इस साल उभरी दरारों को जल्दी से पाटा जाए और अगले साल एक बेहतरीन शो की तैयारी की जाए, जिसमें सितारों की मौजूदगी दुनिया को चकाचौंध करे। साथ ही भारतीय सिनेमा का ढंग से प्रतिनिधित्व हो। दक्षिण भारत की प्रतिभाओं और फिल्मों का भी उपयोग किया जाना चाहिए। आाईफा को यह प्रयास करना होगा कि वह भारतीय सिनेमा को सही परिप्रेक्ष्य में पेश कर सके।

Comments

Abhishek Anand said…
आपके ब्लॉग का लगभग नया ही पाठक| पिछले दिनों ओल्डर पोस्ट में अमिताभ बच्चन से बातचीत पढ़ा था| अभी इस आलोचनात्मक लेख को पढ़ कर अच्छा लगा, कि आप अच्छी अच्छी चीजों के अलावा भी लिखते हैं| लेकिन आखिर में संकल्पना के लिए बधाई और आगे के लिए बेहतर सलाह भी दे दिया| बढ़िया|
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अभिषेक आनंद, पटना से|

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