यूं लिखी गई पान सिंह तोमर की पटकथा-संजय चौहान

रिकार्डधारी एथलीट से बागी और फिर डाकू बने पान सिंह तोमर की कहानी जानने के लिए करीब डेढ़ साल तक मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड, मुरैना सहित कई शहरों की खाक छाननी पड़ी थी हमें

तिग्मांशु धूलिया जब मिले तो उनके पास सिर्फ संडे मैग्जीन में छपी एक रिपोर्ट थी, जिसमें पान सिंह तोमर के धावक और बागी होने का एक लेख था। हमारे पास एक और सूचना थी कि उनके गांव का नाम भिड़ौसा है। ग्वालियर के नजदीक के इस गांव के अलावा और कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी। गूगल भी मदद में बेकार था और दौड़ के धावकों के नाम तक किसी खेल एसोसिएशन से नहीं मिल रहे थे।

सबसे पहले हमलोग उनके गांव गए। परिवार के बारे में पता चला, लेकिन कहां है, ये नहीं मालूम हो पा रहा था। चंबल में पुश्तों तक दुश्मनी चलने की बात सच लगी। कोई बताने को तैयार नहीं था। क्या पता दुश्मन के लोग पता करना चाह रहे हों?

पूर्व बागी मोहर सिंह से एक सरकारी गेस्ट हाउस में बात करते समय वहां के चौकीदार ने उस गांव का नाम बताया, जहां पान सिंह तोमर और उनके गैंग का एनकाउंटर हुआ था। उस गांव के लोगों से थोड़ी सूचना मिली। पुलिस वालों, पूर्व बागियों से मिलने का सिलसिला महीनों चलता रहा। मुंबई से दिल्ली, दिल्ली से रोड के जरिए ग्वालियर, मुरैना, भिंड, धौलपुर के सफर ऐसे होते थे, जैसे हम मुंबई में एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले को निकल रहे हों। बंगाल रेजीमेंट, रूड़की और स्पो‌र्ट्स एकेडमी, पटियाला के चक्कर अलग लगाने पड़े। धीरे-धीरे सूचनाएं मिलने लगीं और एक कहानी नजर आने लगी, लेकिन परिवार वालों से अभी तक मुलाकात नहीं हो पाई थी। तीन महीनों की जद्दोजहद के बाद पान सिंह तोमर के बेटे से मुलाकात हुई। फिर जानकारियां पुख्ता होती गई।

इस पूरे शोध में डेढ़ साल लग गए, लेकिन उसका फायदा यह हुआ कि पटकथा लिखने में समय नहीं लगा। चूंकि मैं भोपाल से हूं और बुंदेलखंड की बोली से अच्छी तरह वाकिफ हूं, इसलिए संवाद लिखने में भी दिक्कत नहीं हुई। हां, मैंने इस बात का ख्याल रखा कि ऐसे देशज शब्दों का ज्यादा उपयोग न हो, जिसे दूसरी बोली-भाषा वाले न समझ सकें।

इरफान और विपिन शर्मा के अलावा ज्यादातर कलाकार मंच के हैं, इसलिए संवाद अदायगी में दिक्कतें नहीं आई। हां, माही गिल चूंकि पंजाब से हैं, इसलिए संवाद समझने में उनकी थोड़ी मदद करनी पड़ी। वह भी तेजी से मिट्टंी के रंग में रंग गई।

चंबल के बीहड़ों में शूटिंग आसान नहीं थी। न मेकअप वैन वहां जा सकती थी और न आराम के साज-ओ-सामान, लेकिन सबको नशा था एक अच्छी फिल्म बनाने का, सो सबने दिल लगाकर काम किया। इतनी अच्छी फिल्म से जुड़ना मेरे लिए गर्व की बात है।

[संजय चौहान ने 'पान सिंह तोमर' का लेखन किया है। उन्हें 'आई एम कलाम' की कहानी के लिए 2011 के फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया है।]

Comments

रोचक कहानी लग रही है, देखेंगे..
Vijay said…
Good Work by Sanjayji. Looking forward to see the movie. As usual Irfan must be good ..
bahut dini se intazar tha is film ka..lekhan ko lekar kai jankarea mili..rochak hai..
अब तो फिल्म जरुर देखेगे......थोड़े ही दिन पहले आई एम् कलाम देखी हैं....बहुत बेहतरीन फिल्म हैं
Seema Singh said…
सारा कुछ, ज्यूँ का त्यूँ कुछ भी तो फ़िल्मी ड्रामाई जैसा नहीं -यही फिल्म- पानसिंह तोमर -की खूबी और आकर्षण है , यह भी अंदाजे -बयाँ खूब है ।दाद देनी होगी- फिल्म निर्माण से जुड़े संभागीय स्रोतों की हिम्मत को ,जो उन्होंने फिल्म के टोटकों को फिल्म की नामावली से भी दूर रखा ।अभिनय में कलाकार इरफ़ान खान तो हैं ही बेजोड़ ,लाजबाब अभिनेत्री माही गिल ने भीअपने अभिनय की शसक्त व प्रभावी छाप -छोडी, उन्हें अभिनय करते -स्वर्गीय स्मिता पाटिल की याद दिला दी ,उनमें दम है यदि उचित अवसर ......।फिल्मांकन -कथावस्तु के वातावरण को जीवंत बनाये रखने के लिए चम्बल के बीहड़ों में जाकर ....,फिल्म- दर्शक में उकताहट पैदा नहीं होने देती है ।यादगार एक द्रश्य एथलीट -पान सिहं तोमर, जापान दौड़ प्रतियोगिता में करते हुए दौड़ने के लिए प्रशिक्षक पान सिंह को नुकीले -जुटे पहनने को देते हैं ,उन्हें पहनने से इंकार करते हुए एथलीट तोमर आपति और तर्क पात्र की सादगी और जमीनी सच्चाई की जड़ों को दिखा देती है ।फिल्म में और भी तमाम पहलू यादगारहैं जिनपर बहुत कुछ ....।संजय चौहान जी मेहनत का रंग चोखा होता है, बहुत बधाई ..।

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