दरअसल : टीवी में मिलती है ट्रेनिंग


-अजय ब्रह्मात्मज
    इन दिनों सक्रिय अधिकांश फिल्म निर्देशकों के काम को पलट कर देखें तो पाएंगे कि उन्होंने किसी न किसी टीवी शो से शुरुआत की। अभी जो नाम याद आ रहे हैं, उनमें साजिद खान, हंसल मेहता,इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, अनुराग बसु, श्रीराम राघवन, ईशान त्रिवेदी, अनुभव कश्यप, अश्विनी धीर, चंद्रप्रकाश द्विवेदी आदि ने पहले टीवी के लिए शो या धारावाहिक निर्देशित किए। बाद में उन्होंने फिल्मों में हाथ आजमाया और सफल रहे।
    इन सभी ने दूरदर्शन और उसके बाद के दौर में सैटेलाइट टीवी के प्रसार के समय इस क्षेत्र में प्रवेश किया। यह वह दौर था, जब फिल्मों के निर्देशक टीवी शो को अपेक्षाकृत छोटा काम समझते थे। आज भी इस समझ में अधिक बदलाव नहीं आया है। एक बार टीवी की दुनिया से फिल्मों में प्रवेश करने के बाद निर्देशक टीवी की तरफ नहीं लौटते। दोनों अनुराग (बसु और कश्यप) अपवाद हो सकते हैं। इन दोनों ने फिल्मों में कामयाबी हासिल करने के बाद भी टीवी को हेय दृष्टि से नहीं देखा। अनुराग कश्यप का ‘युद्ध’ धारावाहिक जल्द ही प्रसारित होगा।
    21वीं सदी के सिनेमा में आए बदलाव में इन निर्देशकों ने उत्प्रेरक का काम किया है। पिछली सदी के आखिरी दशक में देश के विभिन्न इलाकों से  आई इन प्रतिभाओं ने टीवी में ट्रेनिंग हासिल की। टीवी से इनका जुड़ाव, लेखन, निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में रहा। चूंकि टीवी में निवेश और लाभ का अनुपात सुनिश्चित रहता है और हमेशा नई प्रतिभाओं की जरूरत रहती है, इसलिए इन्हें काम मिला। युवा प्रतिभाओं ने टीवी में मिले अवसरों का भरपूर लाभ उठाया। अपना हाथ साफ किया। ऑडियो विजुअल मीडियम के गुर सीखे। फिर जब फिल्मों में आए तो उनकी कार्यशैली में किफायत,तत्परता और पाबंदी दिखी। फिल्म निर्माण-निर्देशन में प्रचलित आलस्य और फिजूलखर्ची से भिन्न कार्यशैली से इन युवा प्रतिभाओं ने निर्माताओं को लाभ दिया। यही कारण है कि उन्हें टीवी में लगातार काम मिलता रहा। वे भी प्रयोग करते रहे। खुद को भविष्य के लिए तैयार करते रहे।
    इम्तियाज अली की ‘हाईवे’ उनके एक टीवी शो का ही विस्तार है। भविष्य में ऐसी अनेक फिल्में आ सकती हैं। जिनके बीज किसी शो या सोप ऑपेरा में मिल सकते हैं। कहानियों का भरपूर खजाना बन चुका है टीवी। जरूरत है उसे खंगालने और फिल्मों के अनुकूल कहानियां को चुनने की। टीवी पर ऐसे अनेक एपिसोडिक शो आते थे, जिनकी कहानियां एक घंटे में मुकम्मल ढंग से कह दी जाती थीं। ऐसे शो से निर्देशकों को संक्षेप में चुस्त तरीके से विषय की प्रस्तुति आई। स्तंभ के आरंभ में उल्लिखित सभी निर्देशकों की यह भी खूबी रही है कि उन्होंने खुद ही अपने शो की कहानियां लिखीं। पिछले 20 सालों में यह ट्रेंड मजबूत हुआ है। अब निर्देशक ही अपनी फिल्मों के लेखक होते हैं।
    टीवी से जब भी कोई अभिनेता फिल्मों में आता है तो बहुत चर्चा होती है। शाहरुख खान से कपिल शर्मा तक इसके उदाहरण हैं। गौर करें तो ऐसी हलचल निर्देशकों को लेकर नहीं होती। दरअसल सिनेमा और टीवी के माध्यम में ऐतिहासिक तौर पर एक्टर अधिक ख्याति हासिल करते हैं। चूंकि वे दिखते हैं और उनकी फैन फॉलोइंग बनती है,इसलिए प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की खबरें उन्हीं पर केंद्रित होती हैं। लेखकों अैर निर्देशकों के टीवी से फिल्मों में आने की खबरों का संज्ञान नहीं लिया जाता। फिल्मों के छात्र, शिक्षक और इतिहासकार टीवी और फिल्म के इस रिश्ते पर गंभीर शोध कर सकते हैं।
    दरअसल, टीवी अच्छा और किफायती ट्रेनिंग ग्राउंड हो गया है। फिल्मों में करोड़ों का निवेश और जोखिम रहता है। किसी भी नए निर्देशक को फिल्म निर्देशन का स्वतंत्र भार देने के पहले निर्माता हर तरह से आश्वस्त होना चाहते हैं। टीवी का माध्यम अपेक्षाकृत सस्ता है। यहां यह भी सुविधा रहती है कि अगर निर्देशक अयोग्य साबित हो रहा हे तो निर्माता उसे आसानी से बदल देते हैं। फिल्मों में ऐसा करना सहज नहीं होता। मुंबई में बाहर से आ रहे प्रतिभाएं निर्देशक बनने से पहले मौका मिलते ही टीवी की इंटर्नशिप से नहीं हिचकती। उन्हें मालूम हो चुका है कि फिल्मों में घुसने का यह भी जरिया है।

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