अनसुलझी पहेली है हिट फिल्‍म का फार्मूला : अक्षय कुमार


अपने दम पर इंडस्ट्री में स्टार कद हासिल करने वाले अक्षय कुमार अब ‘एंटरटेनमेंट’ लेकर आए हैं। फिल्म आउट एन आउट कॉमेडी है। इससे पहले उनकी ‘हॉलीडे’ सफल रही थी। अक्षय का फलसफा यह रहा है कि वे जो भी फिल्म हाथ में लेते हैं, उसे पूरा होने तक पूरा साथ देते हैं। बीच मझदार में नहीं छोड़ते।
-अजय ब्रह्मात्मज
‘एंटरटेनमेंट’ पूरी तरह एंटरटेनिंग फि ल्म है। इसकी कहानी मेरे दिल के काफ ी करीब है। ऐसा लगता है, जैसे अभी कुछ दिनों पहले की ही मैंने इसकी कहानी सुनी है। मुझे याद है इस फि ल्म के निर्देशक फरहाद-साजिद मुझे ध्यान में रखकर कई कहानियां सुनाने के इरादे से मेरे पास आए थे। उन्होंने उस पिटारे में से सबसे अच्छी कहानी बाहर निकाल ‘एंटरटेनमेंट’ की कहानी सुनाई। यह अच्छी कॉमेडी फिल्म है।
    मुझे एक चीज हमेशा से परेशान करती रही है कि हमारे यहां कॉमेडी फिल्मों को दोयम दर्जे का क्यों माना जाता है? आज भी जब अवार्ड नाइट होते हैं तो कहा जाता है बेस्ट हीरो इन कॉमेडी रोल। यह क्या बात हुई भई। यही बात जब रोमांटिक फि ल्मों से किसी हीरो को बेस्ट एक्टर का अवार्ड दिया जाता है तो क्यों नहीं कहा जाता कि बेस्ट हीरो इन रोमांटिक फि ल्म।
    अब तक तो यह ट्रैक रिकॉर्ड भी रहा है कि नेशनल अवार्ड तो दबे, कुचले किरदारों को निभाने के लिए कलाकारों को मिलते रहे हैं। पहली बार जब ‘हम तुम’ के लिए सैफ को अवार्ड मिला तो बहुत बवाल हुआ था कि क्या उस फिल्म में निभाए गए किस्म के किरदारों को नेशनल अवार्ड दिया जाना चाहिए।
    बहरहाल, ‘एंटरटेनमेंट’ का वन लाइनर साउथ के बहुत बड़े राइटर-डायरेक्टर के. सुभाष ने फरहाद-साजिद को दिया था। तब से वह स्टोरी आइडिया लेकर फरहाद और साजिद घूम रहे थे। दोनों ने तय कर लिया था कि उस स्टोरी को बेचना नहीं है। उसे खुद ही बनाना है। वे फिर स्क्रीनप्ले वगैरह तैयार करने लगे। हम सब की टाइमिंग भी बड़ी प्यारी रही। उसी दरम्यान मेरी मुलाकात दोनों भाइयों से हुई। मुझे कहानी अच्छी लगी और हम सब ने इस पर काम करने का इरादा बना लिया।
    इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि यह साफ-सुथरी कॉमेडी है। किसी भी किस्म के डबल मीनिंग संवाद नहीं हैं। पूरा परिवार साथ बैठकर फिल्म देख सकता है। मुझे कॉमेडी करने में मजा भी आता है। मैं सेट पर उसमें इम्प्रोवाइज भी करता रहता हूं। उससे निर्देशक को भी काफी मदद मिलती है। सीन विशेष निखर कर आता है। मैं एक चीज और किया करता हूं। अपने संग काम करने वाले को-स्टार को कंफर्टेबल कर देता हूं। उससे उनका स्वाभाविक काम बाहर निकल कर आता है।
    आज की तारीख में बाउंड स्क्रिप्ट काफी जरूरी चीज हो गई है। फरहाद-साजिद के संग काम करने का यही मजा रहा कि उनके पास बाउंड स्क्रिप्ट होती है। मुझे नहीं लगता कि मौजूदा समय में कोई स्टार बिना बाउंड स्क्रिप्ट के काम करता हो। पहले का जमाना कुछ और था। मुझे याद है एक डायरेक्टर थे, जो बड़े रिलैक्स मूड में काम करते थे। उनके पास कोई बाउंड स्क्रिप्ट नहीं हुआ करती थी। मैं सेट पर उनसे पूछा करता कि ‘सर, सीन की कॉपी है!’ वे कहते, ‘अरे बरखुरदार सीन तो ऊपरवाला लिखता है।’ मैं अचंभे में पड़ जाता तो वे मुझे फिल्म की हीरोइन के साथ बिठाते। वे बोलते कि आप को पता है कि सीन की स्थिति क्या है? मैं कहता, ‘हां जी पता है कि मुझे हीरोइन के बाप से हीरोइन का हाथ मांगना है।’ इतना कहते ही कि वे एक कागज-कलम मुझे थमा देते। चलो अब अपने डॉयलॉग लिखो। मैं लिखता चला गया और यकीन मानिए मैंने सीन लिख डाली। सीन पूरा लिखने पर उस डायरेक्टर ने कहा, ‘देखा। मैं न कहता था कि सीन तो ऊपरवाला लिखता है।’ तो पहले इस तरह भी काम होता था, मगर अब शूटिंग और बाकी चीजों के तौर-तरीके काफी बदल गए हैं।
    मैं एक बड़ी कमाल की बात साझा करना चाहूंगा कि पब्लिक की नब्ज पकडऩा मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। हम लोग जिन फिल्मों को दिन-रात एक कर बनाते रहते हैं। जिनसे ढेर सारी उम्मीदें रहती हैं, वे फ्लॉप हो जाती हैं। जिनसे कोई उम्मीद नहीं रहती, वे हिट हो जाती हैं। तो हिट फिल्में बनाने का फॉर्मूला अब तक कोई नहीं निकाल पाया है। न कभी निकल सकता है। वैसा हो गया तो समझिए सब की फिल्में चलने ही लगेंगी। कोई फ्लॉप नहीं होगा। मुझे भी फिल्म जगत में दो दशक हो चुके हैं। मैं फिल्म दर फिल्म सोचता हूं कि चलो अब यह नहीं करूंगा। वह करूंगा। वह नहीं करूंगा, यह करूंगा। उसके बावजूद जिनसे उम्मीद लगाए बैठा रहता हूं, वह नहीं चलती।
    इतना जरूर हुआ कि ऑडिएंस के नजरिए में बीते दो-तीन सालों में काफी तब्दीली आई है। अब माइंडलेस फिल्मों की सफलता का दौर बीत चुका है। अब माने-मतलब वाली फिल्मों की डिमांड काफी बढ़ी है। सतही कहानियों का कुछ नहीं होने वाला।   
   
   



   

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