दरअसल : प्रसंग दीपिका पादुकोण का


-अजय ब्रह्मात्मज
    प्रसंग कुछ हफ्ते पुराना हो गया,लेकिन उसकी प्रासंगिकता आगे भी बनी रहेगी। पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार ने दीपिका पादुकोण की एक तस्वीर छापी और लिखा ‘ओ माय गॉड : दीपिका पादुकोण’स क्लीवेज शो’। थोड़ी ही देर में पहले दीपिका पादुकोण ने स्वयं इस पर टिप्पणी की। उन्होंने उस अखबार के समाचार चयन पर सवाल उठाया। बात आगे बढ़ी तो दीपिका ने बोल्ड टिप्पणी की। ‘हां,मैं औरत हूं? मेरे स्तन और क्लीवेज हैं। आप को समस्या है??’ दीपिका की इस टिप्पणी और स्टैंड के बाद ट्विटर और सोशल मीडिया समेत रेगुलर मीडिया में दीपिका के समर्थन में लिखते हुए फिल्मी हस्तियों और अन्य व्यक्तियों ने उक्त मीडिया की निंदा की। गौर करें तो फिल्म कलाकारों के प्रति मीडिया का यह रवैया नया नहीं है। आए दिन अखबारों,पत्रिकाओं,वेब साइट और अन्य माध्यमों में फिल्म कलाकारों पर भद्दी टिप्पणियों के साथ उनकी अश्लील तस्वीरें छापी जाती हैं। शुद्धतावादियों का तर्क है कि फिल्म कलाकार ऐसे कपड़े पहनते हैं तो कवरेज में क्लीवेज दिखेगा ही। क्या आप को इस तर्क में यह नहीं सुनाई पड़ रहा है कि लड़कियां तंग कपड़े पहनती हैं तो उत्तेजित पुरुष बलात्कार करता है?
    दीपिका पादुकोण आज की अभिनेत्री हैं। पहले की अभिनेत्रियां लाज और लिहाज की वजह से खुल कर कुछ नहीं बोलती थीं। कवरेज में गॉसिप और अश्लीलता नई बात नहीं है। अगर फिल्म पत्रकारिता के इस पहलू पर गंभीरता से विचार करें तो मूल्यों और नैतिकता के इस द्वंद्व को समझा जा सकता है। वास्तव में यह दो आय समूहों की सोच और समझ में मौजूद फर्क का नतीजा है। फिल्म पत्रकारिता में गॉसिप लेखन में सक्रिय अधिकांश पत्रकार छोटे शहरों के मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं। सेक्स,प्रेम,अफेयर,रिश्ता,शरीर और अन्य  संबंधित मामलों में उनकी सोच,धारणा और अपेक्षा सामाजिक परिवेश,परवरिश और एक्सपोजर से मिली समझ पर आधारित होती है। जिस समाज में लडक़े-लड़कियों का हाथ पकड़ कर चलना और आलिंगन-चुंबन करना भी किसी न किसी प्रकार के अंतरंग संबंध का द्योतक माना जाता हो,उस समाज से आए पत्रकारों का सामना हिंदी फिल्मों के कलाकारों से होता है तो वे अपने मूल्यों और नैतिकता की तराजू पर उन्हें तौलने लगते हैं। उन्हें बहुत कुछ अश्लील और अनैतिक दिखने लगता है। वे चाशनी और चटखारे के साथ अपनी समझ किसी प्रसंग,घटना और व्यवहार में थोपते हैं। चूंकि उनके पाठकों का बड़ा हिस्सा इसी निम्न और मध्य वर्ग से आता है तो वह उन खबरों में छिपी आपत्तियों से सहमत होता है। इस तरह मनोरंजन के कवरेज का कारोबार चलता रहता है। मैंने पाया है कि ऐसे लेखन में शामिल अधिकांश फिल्म पत्रकार निजी जिंदगी में भावनात्मक तौर पर अकेले,निराश,हताश और दुखी हैं। वे ऐसी खबरों में अपनी भड़ास निकालते हैं।
    दीपिका पादुकोण के प्रसंग में सभी का साथ आना महत्वपूर्ण है। सभी ने उक्त अखबार की निंदा की,लेकिन यह भी देखा और समझा गया है कि अगली जरूरत में सबसे पहले फिल्म कलाकार उसी मीडिया घराने की शरण लेते हैं। अगर दीपिका को स्टैंड लेना है तो वह यह भी तय करें कि भविष्य में वह उस मीडिया घराने से बात नहीं करेंगी या कम से कम कुछ अवधि के लिए परहेज करेंगी। ऐसा नहीं हो पाएगा। इस हमाम में सभी नंगे हैं। कभी किसी पर उंगली उठ जाती है तो हमें अपना नंगापन नहीं दिखता। सामाजिक स्तर पर इस ग्लोबल दौर में हम संक्रांति से गुजर रहे हैं। हमें बाहरी दुनिया आकर्षित कर रही है और अपनी दुनिया छूट नहीं रही है। इस दुविधा में हम दोनों दुनिया की रूढिय़ां अपने कंधों पर उठा लेते हैं। फिल्म पत्रकारिता में इन दिनों फिल्मों के अलावा सभी अवांतर और अनावश्यक मुद्दों पर बातें होती हैं। पत्र-पत्रिकाएं पाठकों का तर्क देकर ऐसी गलीज और पीत पत्रकारिता में गर्त हो रही हैं। ऑन लाइन मीडिया को पाठकों के हिट चाहिए। कहा जाता है कि गॉसिप और अश्लील तस्वीरों से हिट बढ़ता है। यह महज नैतिकता का प्रश्न नहीं है। हमें गंभीरता से सोचना होगा कि हम क्या परोसें और उसकी मर्यादा क्या हो?
   


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