सिखाने में आता है आनंद -आनंद मिश्रा


-अजय ब्रह्मात्मज

    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में देश-विदेश से रोजाना हजारों युवक-युवती पर्दे पर आने की ललक से मुंबई पहुंचते हैं। यों तो मान लिया गया है कि आज की इंडस्ट्री में अभिनेता या अभिनेत्री बनने के लिए हिंदी-उर्दू की जानकारी अनिवार्य नहीं रह गई है। उदाहरण में कट्रीना कैफ समेत अनेक नाम गिना दिए जाते हैं। आनंद मिश्र सालों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश कर रही प्रतिभाओं को हिंदी पढ़ाने का काम कर रहे हैं। उनकी राय में,‘दुनिया भर से प्रतिभाएं आ रही हैं यहां। इधर अभिनेत्रियों की संख्या बढ़ गई है। वे सभी हिंदी सीखना चाहती हैं। पढऩा और बोलना चाहती हैं। उनमें हिंदी के प्रति आकर्षण है। मेरा अनुभव रहा है कि विदेशों से आई बालाएं हिंदी सीखने में अधिक मेहनत करती हैं। भारत की अभिनेत्रियों को गलतफहमी है कि उन्हें हिंदी आती ही है।’
    यह धारणा गलत नहीं है कि हिंदी फिल्मों से हिंदी गायब होती जा रही है। आनंद मिश्र अपने अनुभव से बतााते हैं,‘इधर शायद ही कोई स्क्रिप्ट मुझे हिंदी में मिली हो। कंप्यूटर और स्क्रिप्ट के सॉफ्टवेयर की वजह से अंग्रेजी का चलन बढ़ा है। रोमन में नुख्ता,ंिबंदी और लहजे को सही ढंग से नहीं लिखा जा सकता। स्क्रिप्ट और संवाद  हिंदी में रहें तो दर्शकों को सही भाषा सुनाई पड़ेगी। मैं 12 सालों से हिंदी सिखा रहा हूं। सबसे पहले रुमी जाफरी ने मुझे वासु भगनानी के पास भेजा था कि मैं उनके बैटे जैकी को हिंदी का उच्चारण सिखाऊं।’
     आनंद मिश्र जबलपुर के हैं। मुंबई आने से पहले वे थिएटर में सक्रिय थे। हरिशंकर परसाई और बीवी कारंथ की संगत कर चुके आनंद मिश्र को पढ़ाने में आनंद आता है। वे कहते हैं,‘हिंदी प्रदेशों से आए लोगों को भी सही हिंदी नहीं आती। उच्चारण दोष और अंग्रेजी के प्रभाव से ‘हैं’ बोलना छूटता जा रहा है। आनुनासिक अक्षरों और शब्दों के उच्चारण में ‘अं’ की जगह ‘न’ लगा देते हैं। ‘जाएंगे’ को ‘जाएन्गे’ बोलने में उन्हें दोष नहीं दिखता। ‘आंख’ को ‘आन्ख’ बोलने का चलन बढ़ रहा है। महाराष्ट्र में पले-बढ़े ‘द’ और ‘ध’,‘ब’ और ‘भ’ में उच्चारण भेद नहीं रख पाते।’पर्व’ को ‘परव’ और ‘प्रकार’ को ‘परकार’ बोलना आम हो गया है।’ आनंद मिश्र ने जैकी भगनानी,सेलिना जेटली,कट्रीना कैफ,रिया सेन,नीतू चंद्रा,श्रेया शरण,जीनिलिया डिसूजा,वरुण धवन,सोहम शाह,विपिन्नो आदि को हिंदी पढ़ाई है। अभी भी कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियां उनसे हिंदी सीख रही हैं।
    आनंद मिश्र तीन से चार महीने की कोचिंग करते हैं। हिंदी सिखाने में वे वर्णमाला और बारहखड़ी की सही उच्चारण सिखाते हैं। उनके अनुसार उच्चारण पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रिया है। अक्षरों के उच्चारण में जीभ के सही प्रयोग की जरूरत पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि हिंदी फिलमों के कलाकारों को हिंदी सिखनी चाहिए। आनंद मिश्र की राय में सिर्फ अभिनेताओं ही नहीं,उन सभी को उच्चारण पर ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक तौर पर बोलते हैं। नेता,टीवी एंकर और रेडियो जॉकी को तो सही उच्चारण का अतिरिक्त अभ्यास करना चाहिए। पत्रकारों को भी भाषा की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए। भाषा के जानकार दर्शक और श्रोता गलत हिंदी सुनते ही चौंकते और बिदकते हैं।

Comments

Anonymous said…
कई कारणों से भारत में उच्चारण दोष आते हैं| परन्तु, हम उन पर ध्यान नहीं देते हैं| मैंने खुद बहुत प्रयास करकर कई उच्चारण सुधारे हैं परन्तु कई बार गलती हो जाती है, विशेषकर जब सामने वाला वही गलत उच्चारण करे जो मैं पहले करता था|

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