बदला जमाने के साथ : अदनान सामी


-अजय ब्रह्मात्मज
लंबे समय के बाद अदनान सामी की आवाज ‘किल दिल’ के गाने में सुनाई पड़ी। ‘साथिया’ के बाद शाद अली, गुलजार और अदनान की तिकड़ी का जादू जगा। अदनान इन दिनों गायकी के फ्रंट पर कम एक्टिव हैं। जिंदगी की मुश्किलों और रिश्तों में आए बदलाव से वे बेअसर नहीं रहे। हालांकि इस दरम्यान उन्होंने कोर्ट से निकल कर स्टूडियो में रिकॉर्डिंग भी की। एक तरफ मुकदमे की सुनवाई चलती रही और दूसरी तरफ उनकी गायकी, जो अब सुनाई पड़ी। अदनान का नाम जेहन में आते ही जो छवि कौंधती है, उससे वे काफी अलग हो गए हैं। उनका वजन कम हो गया है। अब वे अधिक स्फूर्ति महसूस करते हैं। उन्होंने घर को नए तरीके से सजाया है और फिर से एक नई दुनिया रच रहे हैं, जिसमें गीत-संगीत और म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट हैं। साथ नए जमाने के 
नए जमाने के साथ कदम मिलाकर चल रहे अदनान सामी को नए गैजेट और तरीकों से कोई दिक्कत नहीं होती, अगर कोई संगीतकार उन्हें ह्वाट्स ऐप पर धुन भेजता है तो वे उसे सुनकर अपनी गायकी का रियाज कर लेते हैं। कई बार मोबाइल या फेसबुक के मैसेज के जरिए गीतों के बोल आ जाते हैं। अदनान मानते हैं कि इन तकनीकी सुविधाओं से हमारी जिंदगी आसान हो रही है। बस एक ही खतरा है कि हम कहीं इन मशीनों के आश्रित न हो जाएं। तकनीकी सुविधाओं से एकरूपता पैदा होती है और किसी भी प्रकार की एकरूपता कला माध्यमों की सृजनात्मकता कम करती है। यों अदनान सामी खुद को टेकसेवी मानते हैं। वे कहते हैं कि मैं इन तकनीकों का इस्तेमाल दशकों से कर रहा हूं।
 तकनीक से छुपती कमियां
इन दिनों प्रचलित ऑटो ट्यून से अदनान को कोई दिक्कत नहीं होती। वे स्वीकार करते हैं कि ट्रैडिशनल म्यूजिशियन अभी के दौर में एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे कला खत्म हो रही है। सच कहूं तो यह खुद को बदलने और नई तकनीक के इस्तेमाल करने की सहूलियत पर निर्भर करता है। एक जमाने में सभी गाडिय़ां गियर वाली होती थीं। जब बिना गियर या ऑटो गियर की गाडिय़ां आईं तो ढेर सारे लोगों को गाड़ी चलाने में दिक्कत हुई। दोनों के अलग मजे हैं। किसी जमाने में पूरा ऑर्केस्ट्रा साथ बैठता था और एक शॉट में रिकॉर्डिंग होती थी। सब कुछ लाइव होता था। वैसी रिकॉर्डिंग की अपनी चुनौतियां थीं। एक हल्की सी भी गलती रह गई तो पूरी रिकॉर्डिंग फिर से करनी पड़ती थी। कहना नहीं चाहिए, लेकिन बहुत से पुराने गानों में संगीतकारों ने ऐसी छोटी-मोटी चूकों को जाने दिया है। अगर वे गाने आज रिकॉर्ड किए जाएं तो हम उन्हें बेहतर बना सकते हैं। कुछ समय के मल्टीट्रैक रिकॉर्डिंग में यह सुविधा आ गई थी कि आप किसी एक ट्रैक को फिर से ठीक कर लें। मैं उन लोगों के साथ कतई नहीं हूं, जो हमेशा बीते दिनों और गुजरे जमाने की आहें भरते हैं। मेरी नजर में अभी ज्यादा परफेक्ट काम हो रहा है। यह कहते हुए मैं इस बात का भी ध्यान रख रहा हूं कि इधर कुछ जबरदस्त गड़बडिय़ां शामिल हो गई हैं। शौकिया फनकारों ने तकनीकी सहूलियत से खुद को उस्ताद मानने का भ्रम पाल लिया है। अब तो वह जमाना आ गया है कि गायकी के लिए रूह के तड़पने की जरूरत नहीं रह गई है। कुछ भी तड़प रहा हो तो आप गायक बन जाइए। कहने का मकसद यह है कि तकनीकी सुविधाओं ने संगीत की गुणवत्ता बढ़ा दी। कई बार ऐसा होता है कि गाते समय एक्सप्रेशन एकदम सही आता है, लेकिन सुर में कहीं लचक आ जाती है। कुछ पौना-बीस हो जाता है। तकनीक से आप इसे सुधार सकते हैं। रूहानी एक्सप्रेशन को दोहराया नहीं जा सकता। आज भी बड़े सिंगर गाते समय खुद को दोहरा नहीं पाते। आम श्रोताओं को यह फर्क समझ लेना चाहिए कि तकनीक से सिर्फ टेक्निकल चीजें ही सुधर सकती हैं। असल गायकी तो लंबे अभ्यास और प्रयास से आती है। तकनीक से एक्सप्रेशन नहीं आ सकता। की-बोर्ड और कंप्यूटर से बज रहे गिटार और सामने बैठकर किसी के बजते गिटार का असर अलग होता है। तकनीक का इस्तेमाल कमियां छिपाने और खूबियां बढ़ाने का काम आ सकता है।
हो गई थी कोफ्त 
    अपने वजन को लेकर चिंतित रहे अदनान बताते हैं कि जब वजन घटाने का काम शुरू किया तो अलग-अलग कमेंट सुनाई पड़े। कुछ ने कहा किसी नई माशूका को खुश करने के लिए अदनान ऐसा कर रहा है। किसी के जेहन में बात आई कि मुझे कोई फिल्म मिल गई होगी। सच्चाई यह थी कि मैं अपने वजन से ही घबरा गया था। बिस्तर से उठने या कहीं भी आने जाने में मुझे दो लोगों की जरूरत पड़ती थी। खुद पर कोफ्त होती थी। वजन कम हुआ तो मेरे साथ मेरे दोस्त, शुभचिंतक और प्रशंसक सभी खुश हुए। केवल एक बेला सहगल नाराज हुईं। मेरे मोटे शरीर को लेकर उन्होंने एक किरदार की कल्पना की थी। उस फिल्म की तैयारी चल रही थी। वजन कम होने से मैं उनके किरदार से बाहर आ गया। उन्होंने मुझे खूब सुनाया। मैंने सलाह दी कि प्रोस्थेटिक मेकअप से करते हैं। बेला और उनके निर्माता उस महंगे खर्च के लिए तैयार नहीं हुए।
जवाब नहीं गुलजार का 
    गुलजार के प्रशंसक अदनान सामी उनके गीतों से विस्मित हैं। वे कहते हैं कि ‘किल दिल’ में गाए मेरे गीत में आए रूहआफजा शब्द को ही ले लें आप। क्या कोई कल्पना कर सकता था कि महबूबा की तारीफ में इस शब्द का ऐसा इस्तेमाल हो सकता है। ठंडक, तरावट और मिठास एक साथ पाने का एहसास रूहआफजा में है। हंसी-मजाक में ही वे खूबसूरत मिसाल दे जाते हैं। हो सकता है कि डिफरेंट वरायटी के सॉफ्ट ड्रिंक के इस दौर में किसी को रूहआफजा का मर्म नहीं समझ में आए। इसे वह अच्छी तरह समझ सकता है, जो भारतीय तहजीब में पला-बढ़ा है, जिसने एक बार भी गलती या पसंद से रूहआफजा चख लिया है।

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आपकी खुशबूदार पोस्ट के लिए आभार।उनकी म्हणत प्रेरणादायी है यहाँ एक किलो भार कम नहीं हो रहा।
आपकी खुशबूदार पोस्ट के लिए आभार।उनकी म्हणत प्रेरणादायी है यहाँ एक किलो भार कम नहीं हो रहा।

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