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फिल्म समीक्षा: 3 इडियट

- अजय ब्रह्मात्मज सिस्टम खास कर एजुकेशन सिस्टम पर सवाल उठाती और उसके अंतर्विरोधों का मखौल उड़ाती राजकुमार हिरानी की 3 इडियट्स शिक्षा और जीवन के प्रति एक नजरिया देती है। राजकुमार हिरानी की हर फिल्म किसी न किसी सामाजिक विसंगति पर केंद्रित होती है। यह फिल्म ऊंचे से ऊंचा मा‌र्क्स पाने की होड़ के दबाव में अपनी जिंदगियों को तबाह करते छात्रों को बताती है कि कामयाबी के पीछे भागने की जरूरत ही नहीं है। अगर हम काबिल हो जाएं तो कामयाबी झख मार कर हमारे पीछे आएगी। 3 इडियट्स अनोखी फिल्म है, जो हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे का विस्तार करती है। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी इस फिल्म में नए कथाशिल्प का प्रयोग करते हैं। राजू रस्तोगी,फरहान कुरैशी और रणछोड़ दास श्यामल दास चांचड़ उर्फ रैंचो इंजीनियरिंग कालेज में आए नए छात्र हैं। संयोग से तीनों रूममेट हैं। रैंचो सामान्य स्टूडेंट नहीं है। सवाल पूछना और सिस्टम को चुनौती देना उसकी आदत है। वह अपनी विशेषताओं की वजह से अपने दोस्तों का आदर्श बन जाता है, लेकिन प्रिंसिपल वीरू सहस्रबुद्धे उसे फूटी आंखों पसंद नहीं करते। यहां तक कि वे फरहान और राजू के घर

फिल्‍म समीक्षा अवतार

कल्पना की तकनीकी उड़ान -अजय ब्रह्मात्‍मज जेम्स कैमरून की फिल्म अवतार 3डी का डिजिटल जादू है। 3डी का स्पेशल चश्मा लगाकर सिनेमाघरों में बैठने के बाद अंधेरा होते ही पर्दे पर मायावी दुनिया आकार लेने लगती है। यहां दैत्याकार रोबोट हैं और सुपर तकनीक से चल रहा मिशन है। दुनिया की अब तक की सबसे महंगी फिल्म अवतार पहले ही फ्रेम से भव्यता का एहसास देती है। इस फिल्म में सिर्फ मनुष्य ही स्वाभाविक और सामान्य कद के हैं। बाकी सब कुछ विशाल है। इस अनोखी प्रेम कहानी में दो ग्रहों के जीवों का प्रेम है। कहानी आज से 145 साल आगे 2154 की है। पृथ्वी पर ऊर्जा की कमी है। ऊर्जा की तलाश में पृथ्वीवासी पंडोरा पहुंचते हैं। उन्हें पंडोरा यूनोबटैनियम चाहिए। इस कार्य के लिए वे मनुष्य के डीएनए से एक हाइब्रिड तैयार करते हैं और उसे पंडोरावासी का रूप देकर पंडोरा भेजते हैं। मरीन से रिटायर जेक सली को मिशन के लिए चुना जाता है। जेक पैराप्लेजिक रोग से ग्रस्त है। वह जिंदगी में कुछ करने की ख्वाहिश से इस मिशन में शामिल होता है। पंडोरा के निवासी प्रकृति के साथ तालमेल बिठा कर जीते हैं। उनके जीवन में मशीन नहीं है। जेक जाता तो है पंडोर

कामयाबी तो झ;ा मार का पीछे आएगी-राज कुमार हिरानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज युवा पीढ़ी के संवेदनशील निर्देशक राज कुमार हिरानी की फिल्म '3 इडियट' 25 दिसंबर को रिलीज हो रही है। उनकी निर्देशन प्रक्रिया पर खास बातचीत- [फिल्मों की योजना कैसे जन्म लेती है? अपनी फिल्म को कैसे आरंभ करते हैं आप?] मेरी फिल्में हमेशा किसी थीम से जन्म लेती हैं। मुन्नाभाई एमबीबीएस के समय विचार आया कि डाक्टरों के अंदर मरीज के प्रति करुणा हो तो बीमारियों का इलाज आसान होगा। लगे रहो मुन्नाभाई के समय मैंने गांधीगिरी की प्रासंगिकता का थीम लिया। 3 इडियट में मैं कहना चाहता हूं कि आप कामयाबी के पीछे न भागें। काबिलियत के पीछे भागें तो कामयाबी के पास कोई चारा नहीं होगा, वह झख मार कर आएगी। [क्या पहले एक्टर के बारे में सोचते हैं और फिर कैरेक्टर डेवलप करते हैं या पहले कैरेक्टर गढ़ते हैं और फिर एक्टर खोजते हैं?] मैं स्क्रिप्ट लिखने के बाद एक्टर के बारे में सोचता हूं। सिर्फ थीम पर फिल्म बनेगी तो बोरिंग हो जाएगी, कैरेक्टर उसे इंटरेस्टिंग बनाते हैं, फिर माहौल और उसके बाद सीन बनते हैं। स्क्रिप्ट लिखने की राह में जो दृश्य सोचे जाते हैं, उनमें से कुछ अंत तक जाते हैं और कुछ मर जाते है

दरअसल : फ्रांस की फिल्म इंडस्‍ट्री

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फ्रांस सरकार द्वारा लता मंगेशकर को वहां के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से विभूषित करने के मौके पर मुंबई में छह फ्रांसीसी फिल्मों का प्रदर्शन भी किया गया। इन फिल्मों के निर्देशक और कलाकार भी पहली बार मुंबई आए थे। उन्होंने सुन रखा था कि मुंबई भारत की सबसे उर्वर फिल्म इंडस्ट्री है। फ्रांस की तीन डायरेक्टरों से मेरी निजी बात-मुलाकात हुई। यहां मैं उनके नजरिए से फ्रांसीसी फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कुछ बताना चाहता हूं। विश्व के दूसरे देशों की तरह ही फ्रांस में भी हॉलीवुड की फिल्में काफी पॉपुलर हैं। अमेरिकी समाज के विश्वव्यापी प्रभुत्व की वजह से यूरोपीय और पश्चिमी देशों के लिए फिल्मों समेत अमेरिकी संस्कृति की तमाम चीजें अनुकरणीय मानी जाती हैं। मीडिया विस्फोट के इस दौर में युवकों को स्थानीय, जातीय और राष्ट्रीय विशेषताओं तक सीमित रखना मुश्किल काम हो गया है। ग्लोबलाइजेशन के चक्कर में हर देश के यूथ अमेरिकी कल्चर की नकल करने में लगे हैं। पढ़े-लिखे और जागरूक युवक अपने देश की फिल्मों से अधिक हॉलीवुड की फिल्मों के बारे में जानते हैं। भारत के शहरी युवकों की तरह फ्रांस के शहरी युवक भी अपने देश की फिल्मों

फिल्‍म समीक्षा : राकेट सिंह

बिजनेस के पाठ पढ़ाती राकेट सिंह.... -अजय ब्रह्मात्‍मज निर्माता आदित्य चोपड़ा फिर से शिमित अमीन और जयदीप साहनी के साथ फिल्म लेकर आ रहे हों तो उम्मीदों का बढ़ना स्वाभाविक है। तीनों ने 'चक दे इंडिया' जैसी फिल्म दी थी, जो आज मुहावरा बन चुकी है। इस बार उनके साथ शाहरुख खान नहीं हैं, लेकिन रणबीर कपूर तो हैं। लगातार दो फिल्मों की कामयाबी से उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ चुकी है। शिमित अमीन की फिल्मों में महिला किरदारों के लिए अधिक गुंजाइश नहीं रहती। वे दिखती तो हैं, लेकिन सपोर्टिव रोल में ही रहती हैं। राकेट सिंह-द सेल्समैन आफ द ईयर बिजनेस की नैतिकता पर फोकस करती है। दिल का साफ और खुद को तेज दिमाग समझने वाला हरप्रीत सिंह पढ़ने-लिखने में होशियार नहीं है। 38 प्रतिशत से बी काम की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह किसी तरह सेल्समैन की नौकरी खोज पाता है। इस नौकरी में उसकी नैतिकता और ईमानदारी आड़े आ जाती है। कंपनी के मालिक उसे जीरो घोषित कर देते हैं और उसकी ईमानदारी की सजा देते हैं। हरप्रीत हार नहीं मानता। वह युक्ति भिड़ाता है और उस कंपनी में रहते हुए अपनी कंपनी खड़ी कर लेता है। चोरी-छिपे चल रहे इस क

अबरार अल्वी ने बदली संवादों की भाषा

- अजय ब्रह्मात्मज पिछले 19 नवम्बर को मुंबई में अबरार अल्वी ने दुनिया से खामोश विदाई ले ली। उनकी अंत्येष्टि की जानकारी लोगों को नहीं मिली इसलिए परिवार के सदस्यों के अलावा और कोई नहीं पहुंच पाया। किसी निजी तो कभी दूसरों की खामोशी की वजह से हिंदी फिल्मों में अबरार अल्वी के योगदान को सही महत्व नहीं मिल पाया। पिछले साल गुरुदत्त के साथ बिताए दस सालों पर उनकी एक किताब जरूर आई, लेकिन घटनाओं को सहेजने में उम्र के कारण उनकी यादें धोखा देती रहीं। उनके भांजे और थिएटर के मशहूर निर्देशक सलीम आरिफ बताते है कि अबरार मामू मीडिया और खबरों से दूर ही रहे। उन्होंने गुरुदत्त से अपनी संगत को सीने से लगाए रखा। नागपुर से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद लंबे-छरहरे अबरार अल्वी एक्टर बनने के इरादे से मुंबई आए थे। गीता बाली के बहनोई जसवंत को वे जानते थे। उनके माध्यम से ही गुरुदत्त से परिचय हुआ। गुरुदत्त की फिल्म 'बाज' का प्रायवेट शो था। उसमें जसवंत ने अबरार अल्वी को बुला लिया था। फिल्म देखने के बाद गुरुदत्त ने अबरार अल्वी से उनकी राय पूछी तो उन्होंने बेलौस जवाब दिया, 'आप बहुत फोटोजेनिक है।' इस जवाब का

दरअसल : भारतीय बाजार में हॉलीवुड की पैठ

-अजय ब्रह्मात्‍मज 13 नवंबर को रिलीज हुई 2012 के व्यापार ने ट्रेड पंडितों को चौंका दिया है। अंग्रेजी के साथ हिंदी, तमिल और तेलुगु में रिलीज इस फिल्म ने पहले हफ्ते में ही 19.15 करोड़ का बिजनेस किया। 2012 के साथ रिलीज हुई तुम मिले को दर्शकों ने नकार दिया। तुम मिले में 26 जुलाई, 2005 का रेफरेंस था, जबकि 2012 में तीन साल के बाद होने वाले हादसे की कल्पना की गई है। निश्चित ही हॉलीवुड की 2012 मेकिंग और प्रोडक्शन के लिहाज से महंगी फिल्म है। इस में वीएफएक्स का भरपूर इस्तेमाल किया गया है और कल्पना को दृश्यों में बदलने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया गया है। तकनीक और विशेष प्रभाव में पैसे खर्च होते हैं। चूंकि हॉलीवुड का विश्वव्यापी बाजार बहुत बड़ा है, इसलिए वहां निवेश में किसी प्रकार की कंजूसी नहीं की जाती। वे आश्वस्त रहते हैं कि उनकी फिल्मों की लागत निकल आएगी। उन्हें मुनाफा भी होता है। 2012 के बिजनेस को ही ध्यान में रखें, तो बहुत अच्छी फिल्म नहीं होने के बावजूद इसके कलेक्शन ने सबको हैरत में डाल दिया है। अगर अपने देश की बात करें तो हॉलीवुड की फिल्मों का कारोबार बढ़ा है। स्पाइडर मैन -3 न

नमक आंखों में होना चाहिए: विद्या बालन

साड़ी में लिपटी विद्या बालन को देखकर उनके आलोचक अक्सर बगलें झांकने लगते हैं। पारंपरिक भारतीय परिधान साड़ी में विद्या जितनी खूबसूरत और सहज दिखती हैं, उतनी शायद ही कोई अन्य अभिनेत्री दिखती हो। नए जमाने की अभिनेत्रियां साड़ी में असहज और बनावटी लगती हैं। उनकी चाल बिगड़ जाती है। विद्या कहती हैं, नमक-मिर्च आंखों में होनी चाहिए, कपड़ों में नहीं। कपड़ों में हया हो तो ज्यादा अच्छा है। साड़ी में हया है, नजाकत है। मुझे नहीं लगता कि साड़ी से ज्यादा सेक्सी कोई ड्रेस है। शबाना जी, रेखा जी, महारानी गायत्री देवी की खूबसूरती में उनकी साडि़यां चार-चांद लगाती हैं।.और हां, स्मिता पाटिल कितनी अच्छी लगती थीं साड़ी में। हल्के बॉर्डर वाली सिंपल साड़ी में कितनी एट्रेक्टिव दिखती थीं वे। एक्चुअली पा में मेरा लुकस्मिता पाटिल के लुक से ही प्रभावित है। पा में विद्या इंडो-वेस्टर्न लुक में भी दर्शकों के सामने होंगी। विद्या बताती हैं, डिफरेंट-सा लुक है। चूंकि,पा में मैं गायकोनॉलिजिस्ट की भूमिका में भी हू, इसलिए मेरे लुक में सिंप्लिसिटी है। लेडी डॉक्टर भड़काऊ कपड़े नहीं पहनतीं। हाई हील वाली चप्पलें नहीं पहनतीं।

पक्का इडियट का इकबालिया बयान

साताक्रूज में स्थित विधु विनोद चोपड़ा के दफ्तर की पहली मंजिल का विशाल कमरा...दरवाजे के करीब तीन कुर्सियों के साथ लगी है छोटी-सी टेबल और उसके ठीक सामने रखा है आधुनिक शैली का सोफा। लाल टीशर्ट,जींस और स्लीपर पहने आमिर कमरे में प्रवेश करते हैं। उनके हाथों में मोटी-सी किताब है। [दिल से चुनता हूं फिल्में] फिल्म साइन करते समय यह नहीं सोचता हूं कि मुझे यूथ से कनेक्ट करना है या कोई मैसेज देना है। फिल्म की कहानी सुनते समय मैं सिर्फ एक आडियंस होता हूं। देखता हूं कि कहानी सुनते समय मुझे कितना मजा आया? मजा अलग-अलग रीजन से आ सकता है। या तो बहुत एंटरटेनिंग कहानी हो या इमोशनल कहानी हो या फिल्म कोई ऐसी चीज कह रही हो, जो सोचने पर मजबूर कर रही हो। मतलब यह है कि कहानी सुनते समय मेरा पूरा ध्यान उसी में घुसा रहे। केवल उसी के लिए हा करता हूं जिसकी कहानी मेरे दिल को छू लेती है। ['सरफरोश' के बाद का सफर] पिछले दस सालों के अपने करिअर का रिव्यू करने पर मैं पाता हूं कि मेरी सारी फिल्में एक्सपेरिमेंटल किस्म की हैं। मेनस्ट्रीम से अलग हैं। अगर सोच-समझ कर फैसला लेता तो मैं ये फिल्में कर ही नहीं पाता। मैं अपने

फिल्‍म समीक्षा : पा

-अजय ब्रह्मात्‍मज आर बाल्की ने निश्चित ही निजी मुलाकातों में अमिताभ बच्चन के अंदर मौजूद बच्चे को महसूस करने के बाद ही पा की कल्पना की होगी। यह एक बुजुर्ग अभिनेता के अंदर जिंदा बच्चे की बानगी है। अमिताभ बच्चन की सुपरिचित छवि को उन्होंने मेकअप से हटा दिया है। फिल्म देखते समय हम वृद्ध शरीर के बच्चे को देखते हैं, जो हर तरह से तेरह साल की उम्र का है। पा हिंदी फिल्मों में इन दिनों चल रहे प्रयोग में सफल कोशिश है। एकदम नयी कहानी है और उसे सभी कलाकारों ने पूरी संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। फिल्म थोड़ी देर के लिए ऑरो की मां की जिंदगी में लौटती है और उतने ही समय के लिए पिता की जिंदगी में भी झांकती है। फिल्म की स्क्रिप्ट केलिए आवश्यक इन प्रसंगों के अलावा कहानी पूरी तरह से ऑरो पर केंद्रित रहती है। ऑरो प्रोजेरिया बीमारी से ग्रस्त बालक है, लेकिन फिल्म में उसके प्रति करुणा या दुख का भाव नहीं रखा गया है। ऑरो अपनी उम्र के किसी सामान्य बच्चे की तरह है। मां, नानी, दोस्त और स्कूल केइर्द-गिर्द सिमटी उसकी जिंदगी में खुशी, खेल और मासूमियत है। स्कूल में आयोजित एक प्रतियोगिता का पुरस्कार लेने