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Thursday, November 28, 2013

दरअसल : फिल्म लेखक बनना है तो...


-अजय ब्रह्मात्मज
    आए दिन कभी कोई साहित्यकार मित्र या फेसबुक के जरिए बने युवा दोस्त जानना चाहते हैं कि फिल्मों का स्टोरी रायटर कैसे बना जा सकता है? हर किसी के पास एक कहानी है, जिसे वह जल्दी से जल्दी फिल्म में बदलना चाहता है। साहित्यकारों को लगता है कि उन्होंने आधा काम कर लिया है। अब उन्हें अपनी कहानी या उपन्यास को केवल पटकथा में बदलना है। गैरसाहित्यिक व्यक्तियों को भी लगता है कि अपने अनुभवों के कुएं में जब भी बाल्टी डालेंगे कहानी निकल आएगी। मुंबई में फिल्म पत्रकारिता करते हुए अनेक लेखकों से मिलना-जुलना हुआ है। उनसे हुई बातचीत और उनकी कार्यप्रणाली को नजदीक से परखने के बाद कुछ सामान्य बातें की जा सकती हैं। यों हर लेखक का संघर्ष अलग होता है और सफलता तो बिल्कुल अलग होती है।
    सबसे पहले तो यह जान और समझ लें कि इन दिनों अधिकांश निर्देशक खुद ही कहानी लिखते हैं। यह चलन पहले भी था, लेकिन अब यह प्रचलन बन चुका है। निर्देशक अपने संघर्ष के दौरान बेकारी के दिनों में लेखक मित्रों के साथ बैठ कर कहानियां रचते हैं और मौका मिलते ही धड़ाधड़ फिल्मों की घोषणाएं करने लगते हैं। कामयाबी मिल चुकी है तो ठंडे बस्ते में पड़ी उनकी कहानियों को भी हॉट स्टार मिलने लगते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के साथ हर कोई जुडऩा चाहता है। अगर किसी निर्देशक से जान-पहचान गांठ सकें तो लेखक बनने की संभावना ठोस हो जाती है। यह निश्चित तौर पर जान लें कि आरंभिक फिल्मों में शोषण हो सकता है। कभी क्रेडिट गायब हो सकता है तो कभी पैसे ़ ़ ़फिर भी फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बढ़ती जाती है। आपका दायरा बढ़ता है। पैसे और क्रेडिट से वंचित होने पर भी आप के काम की चर्चा होने लगती है। आरंभिक ठोकरों से आपका निजी आत्मविश्वास बढ़ता है। आप तरकीबें सीख लेते हैं। इंडस्ट्री की भाषा में कहीं तो खुद को बेचना आ जाता है।
    फिल्मों की कहानी लिखने के लिए जरूरी नहीं है कि आप मुंबई में ही रहें। अगर आप साहित्यकार हैं तो यकीन करें कि कोई न कोई आप को पढ़ रहा है। वह स्वयं आपकी उपयोगी रचना का इस्तेमाल कर सकता है या किसी को प्रेरित कर सकता है। विजयदान देथा तो जिंदगी भर अपने गांव में रहे, लेकिन उनकी कहानियों पर फिल्में बनीं। फिल्मकारों ने उनके गांव जाकर कहानियों के अधिकार लिए। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। यों यह सच है कि हर लेखक विजयदान देथा नहीं होता। कुछ साहित्यकारों को देखा कि वे अपनी कहानी के अधिकार देने तक ही सीमित नहीं रहते। वे पटकथा और संवाद भी लिखना चाहते हैं। आप उम्दा साहित्यिक रचनाकार हो सकते हैं, लेकिन यह कतई जरूरी नहीं है कि आप पटकथा के शिल्प और संवाद के कौशल से परिचित हों। ‘शोले’ के मशहूर संवाद  - कितने आदमी थे?- को याद करें। यह सलीम-जावेद ही गब्बर सिंह के लिए लिख सकते थे।
    मन नहीं माना और उत्साह में आप मुंबई आ ही गए हैं तो पहले बैंक बैलेंस मजबूत कर लें। या फिर मां, पिता, बहन, भाई,पत्नी या कोई दोस्त आप के सपनों का जबरदस्त समर्थक हो। मुंबई बहुत ही महंगा शहर है। यहां आजीविका और स्वयं के भरण-पोषण के लिए समझौते करने पर उद्देश्य से भटक सकते हैं। इसी माहौल में ऐसे भी लेखक मिलते हैं, जिन्होंने आजीविका के लिए तात्कालिक तौर पर भले ही कोई काम क लिया हो, लेकिन अपने लक्ष्य से नहीं भटके। आखिरकार वे सफल रहे। मुंबई में संघर्ष लंबा हो सकता है, लेकिन प्रतिभाओं को पहचान मिलती है। एक बार पहचान बन जाए तो फिर अवसर दरवाजे पर खड़े मिलते हैं। मोबाइल फोन के नंबर सभी को मिल जाते हैं।
    फिल्में देखना न बंद करें। हिंदी फिल्में तो बचपन से देखते रहे हैं। अपने देश की अन्य भाषाओं और विदेशों की फिल्में भी मनोरंजन से अधिक प्रशिक्षण के लिए देखें। एक पर्सनल नोटबुक रखें, जिसमें फिल्म की बारीकियों को दर्ज करते रहें। विश्वास करें ये सारे नोट्स एक न एक दिन काम आएंगे। फिल्मों के साथ पढऩा भी जारी रखें। पढऩे से आशय टाइमपास नहीं है। पढ़ें कि आप की जानकारी बढ़े। नए विषयों के बारे में पता चले। ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलें। सामाजिक व्यक्तित्व विकसित करें। हंसमुख हों और पॉजीटिव बातों में रुचि लें। न तो किसी की निंदा करें और न सुनें।
    लिखने के लिए खंडाला, लोनावाला, गोवा या किसी विदेशी शहर जाने की जरूरत नहीं है। सफल होने पर निर्माता, निर्देशक और फिल्म स्टार खुद ही अपने खर्चे पर आप को भेजने-बुलाने लगेंगे। जरूरी है कि आप भाव और कथ्य से लबरेज हों। आवश्यकता होने पर तो रात भर में कहानी लिख सकें। ज्यादातर लेखकों को आरंभिक सफलता जल्दबाजी के लेखन से मिली है। कई बार पूरी योजना के साथ तैयारी कर लिखी कहानियां सालों कंप्यूटर में ही पड़ी रह जाती हैं। लिखने के लिए तत्पर रहने की जरूरत है।
    मुंबई आ ही गए हैं और फिल्में नहीं मिल रही हैं, तो भी निराश न हों। इन दिनों टीवी, ट्रांसलेशन, वॉयसओवर और ऐड में संभावनाएं हैं। इन से आप की जरूरतें पूरी हो जाएंगी। याद रखें कि आप टीवी या ऐड लिखने नहीं आए थे। वे सिर्फ माध्यम हैं। आप के घर से एयरपोर्ट पहुंचने की सवारी हैं। आप को तो फ्लाइट लेनी है। लेखक बनना है।
    और हां, हर शुरुआत छोटी होती है। मंसूबे के साथ पहले ही काम को बड़ा काम साबित करने की गलतफहमी में न पड़ें। अब सोचना क्या? इरादा है तो लिखना आरंभ कर दें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री आप का इंतजार कर रही है। अंत में फिम रायटर्स एसोशएसन की सदस्यता अवश्य ले लें। अपने अधिकारों की रक्षा और चोरी से बचने के लिए यह कारगर है।


3 comments:

Anonymous said...

Ajay ji u r great motivator. Please keep on writing on career in film industry. We really need someone like u.

sujit sinha said...

आप एक गाइड की तरह प्रेरित करते हैं और साथ ही कभी भी सच्चाई से मुहं नहीं मोड़ते | अक्सर केवल इतना ही सिखाया जाता है कि कुछ भी असंभव नहीं है | आप इससे आगे बढकर आने वाली बाधाओं और उससे निपटने के उपाय भी बताते जाते हैं| इस तरह की रचनाएँ पढकर सुकून मिलता है |

manshes said...

सर, जो डायरेक्टर बनना चाहते हैं उनके लिए भी कोई मददगार,उपयोगी,प्रेरणास्रोत लेख लिखिए...