मुहब्बत न होती तो कुछ भी न होता-महेश भट्ट

यह दुनिया प्रेम के विभिन्न प्रकारों से बनी है। मां का अपने शिशु से और शिशु का मां से प्रेम, पुरुष का स्त्री से प्रेम, कुत्ते का अपने मालिक से प्रेम, शिष्य का अपने गुरु या उस्ताद से प्रेम, व्यक्ति का अपने देश और लोगों से प्रेम और इंसान का ईश्वर से प्रेम आदि। प्रेम का रहस्य वास्तव में मृत्यु के रहस्य से गहरा होता है।
मानव जीवन के इस महत्वपूर्ण तत्व और मानवीय व्यापार एवं व्यवहार में इसके महत्व के बारे में कुछ बढाकर कहने की जरूरत नहीं है। हम लोगों में से अधिकतर या तो प्रेम जाहिर करते हैं या फिर किसी की प्रेमाभिव्यक्ति पाते हैं। लेकिन यह प्रेम है क्या जो हम सभी को इतनी खुशी और गम देता है?
एक आलेख में प्रेम के संबंध में इन सभी के विचार और दृष्टिकोण को समेट पाना मुश्किल है। मैं हिंदी फिल्मों की अपनी यादों के प्रतिबिंबों के सहारे प्रेम के रूपों को रेखांकित करने की कोशिश करूंगा। माता-पिता, कवि, पैगंबर, उपदेशक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अपनी-अपनी तरह से प्रेम को समझते हैं। हिंदी फिल्मकारों की भी अपनी समझ है।
मदर इंडिया का प्रेम
समय की धुंध हटाने के साथ मैं खुद को एक सिनेमाघर में पाता हूं। एक श्वेत-श्याम फिल्म चल रही है। पूरे हॉल में खामोशी है और भावनाओं में डूबे गीत के शब्द धुनों के साथ गूंज रहे हैं। चलो चलें हम, सपनों के गांव में, कांटों से दूर कहीं, फूलों की छांव में
एक बच्चा मौत के करीब है। उसने अपनी मां की उंगलियां पकड रखी हैं। मां उसे अंतिम घडियों में दिलासा दे रही है। मेरा गला रुंध गया था। आंखें भर आई और मैं अपने बगल में बैठी खुशबूदार औरत को थामे सिसक रहा हूं वह मेरी मां है। जब तक िजंदा रही, मां ही मेरी दुनिया रही। आरंभिक वर्षो में हिंदी सिनेमा ने मां-शिशु संबंध को सूख जाने तक निचोडा। मां-बेटे के संबंधों पर बनी महानतम फिल्म मदर इंडिया है। राष्ट्रीय भावनाओं की यह फिल्म एक देसी भारतीय महबूब खान के दिल से निकली थी। महबूब खान गुजरात के बनसारी गांव से आए थे। मदर इंडिया पहली भारतीय फिल्म थी, जो ऑस्कर में नामांकन सूची तक पहुंची थी। इस फिल्म का हर दृश्य मुझे याद है। निरक्षर फिल्म निर्देशक महबूब खान ने मां-शिशु संबंध के हर पहलू और कोणों को चित्रित किया था। वैसी फिल्म दोबारा नहीं बन सकी। मदर इंडिया वास्तव में त्रिकोणीय प्रेम कहानी है, जिसमें एक मां बेटे और समाज के प्रेम के बीच फंसी है। समाज की प्रतिष्ठा बढाने के लिए वह बेटे की जान ले लेती है। गोली लगने के बाद बिरजू मां के पास आता है और हृदय विदारक दृश्य में मां को सोने के कंगन देता है। ये वही कंगन हैं जो मां ने पेट पालने के लिए गिरवी रखे थे। बिरजू साहूकार से छीन कर कंगन ले आया था। इन पंक्तियों को लिखते समय भी उन दृश्यों की यादों से आंखों में नमी आ गई है।
अलग-अलग रूपों में प्रेम
हिंदी फिल्मों में बहन-भाई और भाई-भाई के संबंधों का भी खूब इस्तेमाल किया गया। बहन-भाई के संबंध राखी के बहाने निर्देशकों ने दिखाए। दक्षिण भारत के मशहूर एक्टर शिवाजी गणेशन ने तो राखी नाम की फिल्म बनाई थी। हिंदी फिल्म का खजाना भाई-भाई के संबंधों की फिल्मों से भरा है, लेकिन उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ है और सच कहें तो बाद की सभी फिल्मों में कहीं न कहीं उसकी नकल ही होती रही। वह फिल्म है दिलीप कुमार की गंगा जमुना। यह भी मदर इंडिया की तरह त्रिकोणीय प्रेम कहानी थी, जिसमें भाई और भाई के बीच के प्रेम एवं भाई एवं पुलिस अधिकारी के रूप में कर्तव्य के बीच द्वंद्व था। इस फिल्म का अंत भी दुखद था। यश चोपडा ने इसी फिल्म को नए अंदाज में सलीम-जावेद की लिखी फिल्म दीवार में पेश किया। मैंने भी दो भाइयों को लेकर एक फिल्म बनाई थी, लेकिन मेरी फिल्म में दोनों सौतेले भाई थे। नाम फिल्म में संजय दत्त और कुमार गौरव को लेकर मैंने भाई-भाई के बीच के प्रेम के विषय को छुआ था। नाम मेरी पहली हिट फिल्म रही।
और फिर प्रेम के दूसरे प्रकार भी हैं दोस्तों के बीच का प्रेम। दोस्ती पर बनी तमाम फिल्मों में से राजश्री प्रोडक्शन की दोस्ती की याद से मेरी आंखें आज भी भर आती हैं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस फिल्म में कर्णप्रिय संगीत दिया था। राज खोसला की दोस्ताना में अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा की दोस्ती की कहानी थी। उनकी दोस्ती बिगडती है तो एक-दूसरे का कट्टर दुश्मन बना देती है। राकेश रोशन ने इसी विषय पर खुदगर्ज बनाकर डायरेक्टर के तौर पर अपनी शुरुआत की थी। उसमें जीतेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा थे।
देशप्रेम की भावना
हिंदी सिनेमा में देश-प्रेम की कहानी चेतन आनंद की फिल्म हकीकत के पहले स्पष्ट रूप में नहीं आई थी। 1962 के भारत-चीन युद्घ के बाद बनी इस फिल्म ने युद्ध में हुई हार की मन:स्थिति से निकलने में देश की मदद की थी। देश ने देखा कि किस तरह हमारे जवानों ने बर्फीली चोटियों पर ताकतवर चीनियों का मुकाबला किया था। इस फिल्म ने दर्शकों के दिलों में देश प्रेम की भावना का अद्भुत संचार किया था और उन्हें देश के लिए मर-मिटने का संदेश दिया था। बाद में कई निर्देशकों ने देश-प्रेम की भावना को भुनाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी चेतन आनंद की ऊंचाई नहीं हासिल कर सका। हां, मनोज कुमार ने देश प्रेम को एक अलग रंग दिया।
विचित्र बात है कि सहेली के अलावा मुझे कोई दूसरी फिल्म याद नहीं आ रही है, जिसमें दो औरतों के बीच के प्रेम को दर्शाया गया हो। दो औरतों के संबंधों को बाद में फायर फिल्म में लेस्बियन पहलू से दिखाया गया। इस फिल्म को लेकर शुद्धतावादियों ने देश में हंगामा खडा कर दिया था। इसकी वजह यही हो सकती है कि हिंदी सिनेमा आज भी पुरुषों की जागीर है। औरतें रसोई तक सीमित हैं और उनकी आवाज नहीं सुनी जाती। इस एकआयामी दृष्टिकोण से जीवन को देखने के कारण हमारी फिल्में निर्धन हुई हैं। अच्छा हुआ कि पिछले दस सालों में नारी सशक्तीकरण के प्रभाव से कई महिला डायरेक्टर सामने आई हैं।
बॉलीवुड की प्रेम पर निर्भरता
बहरहाल, पूरी दुनिया में मनोरंजन उद्योग जिस प्रेम पर मुख्य रूप से आश्रित है और फलता-फूलता है वह प्रेम स्त्री और पुरुष के बीच का रोमांटिक प्रेम है। हॉलीवुड और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अलिखित नियम है कि अगर फिल्म में प्रेम कहानी नहीं होगी तो फिल्म नहीं चलेगी या कम चलेगी। आश्चर्य नहीं कि इसी कारण दुनिया भर के फिल्मकारों ने अलग-अलग तरीकों से फिल्म की विभिन्न विधाओं में प्रेम कहानियों की हर संभावित छवि को उकेरा। मुगलेआजम हमें मुगलों की भव्यता और शान-ओ-शौकत की दुनिया में ले जाती है। उस फिल्म में अगर सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी की गहराइयां नहीं होतीं तो हम पर उस भव्यता का असर थोडा कम होता। इस फिल्म को मैंने पहली बार दस साल की उम्र में देखा था। मुझे आज भी याद है कि कैसे प्यार किया तो डरना क्या देश का लोकप्रिय गीत बन गया था।
राजकपूर को भारतीय सिनेमा का शोमैन कहा जाता है और उन्हें दादा साहेब फालके एवार्ड भी मिला। उन्होंने अपनी हर फिल्म में प्रेम की भावना और उससे जुडी कामुकता को उभारा। बरसात, श्री 420, आवारा, संगम, बॉबी, राम तेरी गंगा मैली जैसी फिल्मों में हम राजकपूर की शैली की प्रेम कहानियां देख सकते हैं।
देश की एक लोकप्रिय म्यूजिकल फिल्म आशिकी का निर्देशन मैंने किया था। इस शहरी प्रेम कहानी के बगैर मेरा फिल्मी करियर इतना समृद्ध नहीं होता। इस फिल्म के प्रेमगीत सदाबहार हैं और इसी फिल्म से नदीम-श्रवण की जोडी फिल्मों में आई थी।
गहरा होता है प्रभाव प्रेम का
जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसे बेशकीमती उपहार देते हैं। यह उपहार आप स्वयं हैं, आपका समय है और एनर्जी। अगर वही प्रेम, समय और एनर्जी मिले तो रोमांस पैदा होता है। लेकिन प्रेमी-प्रेमिका से समान प्रेम न मिले तो निगेटिव भावनाएं जन्म लेती हैं-तिरस्कार, क्रोध और निराशा घेरती है। इसके अच्छे परिणाम भी हैं, जब तिरस्कृत प्रेमी महान कला का सृजन करते हैं। दुष्परिणाम यह है कि कुछ लोग निराशा, पागलपन और आत्महत्या की हद तक पहुंच जाते हैं। अधूरे प्रेम के भाव को व्यक्त करने वाले अनगिनत फिल्मी गीत हैं। निस्संदेह हिंदी फिल्मकारों ने प्रेम के सभी पहलुओं को छुआ है। प्रेम निकाल दें तो मनोरंजन उद्योग चरमरा कर गिर जाएगी। इस प्रेम के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें।

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