फ़िल्म समीक्षा:बचना ऐ हसीनों

एक फिल्म में तीन प्रेम कहानियां
बहरहाल, हिंदी लिखने और बोलने में बरती जा रही लापरवाही बचना ऐ हसीनों में भी दिखती है। शीर्षक में ही हसीनो लिखा गया है।
फिल्म में राज और उसकी जिंदगी में आई तीन हसीनाओं की कहानी है। राज दिलफेंक किस्म का नौजवान है। लड़कियों को प्रेमपाश में बांधना और फिर उनके साथ मौज-मस्ती करने को उसने राजगीरी नाम दे रखा है। वह अपनी जिंदगी में आई माही और राधिका को धोखा देता है। उनकी मनोभावनाओं और प्यार की कद्र नहीं करता। फिर उसकी मुलाकात गायत्री से होती है। वह गायत्री से प्रेम करने लगता है। जब गायत्री उसका दिल तोड़ती है और उसके प्रेम को अस्वीकार कर देती है, तब उसकी समझ में आता है कि दिल टूटने पर कैसा लगता है? इस अहसास के बाद वह पुरानी प्रेमिकाओं, माही और राधिका, से माफी मांगने वापस लौटता है। वह उनके सामने स्वीकार करता है कि वह कमीना और गिरा हुआ आदमी है। संभवत: हिंदी फिल्म में पहली बार हीरो ने खुद को कमीना और गिरा हुआ इंसान कहा है। पुरानी प्रेमिकाओं से जबरदस्ती माफी लेने के बाद राज नई प्रेमिका गायत्री के पास लौटता है। इस दरम्यान गायत्री को भी अहसास हो चुका है कि वह राज से प्रेम करने लगी है। दोनों साथ होते हैं और फिल्म खत्म हो जाती है।
बचना ए हसीनों में पुरुषवादी सोच शुरू से ही सक्रिय है। फिल्म का नायक ही तय करता है कि उसे कब बुरा आदमी रहना है और कब अच्छा बन जाना है। आजाद तबीयत की नायिकाएं भी विवश हैं। वे प्रतिक्रिया में कुछ करती भी नहीं..21वीं सदी में भी फिल्म का नायक उन पर हावी रहता है। फिल्म में खुले आम दिखाया गया है कि नायक के संबंध एक से ज्यादा लड़कियों से हैं, फिर भी तीसरी प्रेमिका उसे अंगीकार करती है, जबकि तीनों लड़कियों की जिंदगी में किसी और लड़के को हम नहीं देखते।
नायक के लिए नायिकाओं का अक्षत यौवन आवश्यक है। लड़कियां अमृतसर की हों या फिर मुंबई या सिडनी की.. वे घरेलू हों, माडल सरीखी और महत्वाकांक्षी हों या विदेश में पढ़ रही स्वतंत्र छात्र हों..उनकी जिंदगी किसी पुरुष के सहारे के बिना पूरी नहीं हो सकती। पिछड़े सोच की यह फिल्म सिर्फ दिखने में आधुनिक और 21वीं सदी की है।
कलाकारों की बात करें तो मिनिषा लांबा की सीमाएं नजर आने लगती हैं। मिनिषा विभिन्न भावों को देर तक संभाल नहीं पाती हैं। दीपिका पादुकोण पहली फिल्म में ज्यादा आकर्षक दिखी थीं। शाहरुख खान के साथ होने के कारण तब दीपिका के अभिनय पर अधिक ध्यान नहीं गया था। इस फिल्म में पता चलता है कि दीपिका सीमित क्षमताओं की अभिनेत्री हैं। दीपिका के लिए आवश्यक है कि वह अभिनय कौशल को निखारें। रणबीर कपूर आकर्षक लगे हैं। उन्होंने हीरो के ग्रे, ब्लैक और ह्वाइट तीनों भावनाओं को दृश्यों के अनुकूल निभाया है। पहली फिल्म की तुलना में वे अधिक आत्मविश्वास में दिखे हैं।
निर्देशक ने एक ही फिल्म में तीन प्रेम कहानियों को शामिल कर फिल्म को बोझिल कर दिया है। इसी वजह से फिल्म लंबी लगने लगती है। इस फिल्म में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का उल्लेख बार-बार आया है। रेफरेंस के तौर पर उसका बारंबार इस्तेमाल निर्देशक और निर्माता की सोच-समझ को जाहिर करता है। किरदारों के रेफरेंस अगर फिल्म हो जाएं तो हम समझ सकते हैं कि फिल्म कितनी जीवंत बन सकती है?

Comments

L.Goswami said…
घिसी पिटी फ़िल्म मुझे तो बिल्कुल पसंद नही आई
nukhtachini said…
jub raj ko mahi se flirt hi karna tha to relway line par daod kar aane ki kya zarurat thi .
jub mai film daikh kar nikla to mujhe uakeen hua ki 2008 hai varna
andar mai soach raha tha 1996 chal raha hai.
Unknown said…
कई बार खुद को झिंझोड़ना पड़ता है कि ये उन्हीं यश चोपड़ा की विरासत है, जिन्होंने कभी दीवार, कभी कभी, दिल तो पागल है और वीर ज़ारा जैसी फिल्में बनाईं। यशराज के कर्ता धर्ता लगता है आम ज़िंदगी से बिल्कुल कट गए हैं, उन्हें पता ही नहीं कि मॉल में आने वाले आधे से ज़्यादा लोग तो बस एसी की हवा खाने आते हैं। बंदरगाहों की गोदियों में विजय अब भी हफ्ता वसूली के खिलाफ़ बग़ावत करता है, लेकिन फंतासी की दुनिया में पूरी तरह बह चुके हिंदी सिनेमा को कॉमन मैन से नहीं जैंटलमैन से ही मतलब रह गया है।

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