समाज को चाहिए कुछ विद्रोही-महेश भट्ट

दावानल खबरों में है। कैलिफोर्निया के जंगल की आग तबाह कर रही है। इन पंक्तियों को लिखते समय मैं टीवी पर आग की लपटें देख रहा हूं। कम ही लोग महसूस कर पाते हैं कि आग पर्यावरण का जरूरी हिस्सा है, क्योंकि यह पुराने को जला देती है और नए विकास के लिए जगह बनाती है। इसी प्रकार विद्रोही भी जरूरी होते हैं। संस्कृति के पर्यावरण को सुव्यवस्थित और विकसित करने के लिए उनकी जरूरत पडती है। जंगल की आग की तरह वे भी पुराने को जला देते हैं। विद्रोही संस्कृति की मोर्चेबंदी को तोडते हैं और जिंदगी के नए अवतार के लिए जगह बनाते हैं।
विद्रोह के परिणाम
तुम वही क्यों नहीं करते, जो तुम्हें कहा जाता है? स्कूल के दिनों में मुझे अपने शिक्षक से अकसर यह डांट मिलती थी। पर आप जो समझाते और कहते हैं, उस तरह से आप खुद जीवन बसर नहीं करते। आप मुझे ईमानदार होने के लिए कहते हैं और मैं पाता हूं कि मेरे आसपास हर आदमी अपने दावे के विपरीत काम कर रहा है। मेरे पूर्वज उन भिक्षुओं की तरह थे, जो आदर्श की माला जपते रहे, लेकिन जीवन में उन्हें नहीं उतार सके। जो शिक्षक मुझे शिवाजी के साहस के बारे में बता रहे थे, वे स्कूल के बाहर खडी उत्तेजित भीड को पत्थर चलाते देख क्लास से सबसे पहले भागे। मेरे मां-बाप ईमानदार जिंदगी का सबक देते रहे और खुद बेईमान जिंदगी जीते रहे, मैंने प्रिंसिपल से गुस्से में ये बातें कही थीं। वे पादरी भी थे। मेरे प्रति करुणा व समझदारी दिखाने के बजाय स्कूल से मेरी छुट्टी कर दी गई। उन्होंने कहा, तुम व्रिदोही हो, हमें अनुशासित छात्र चाहिए। ऐसे छात्र नहीं, जो केवल सवाल करते हैं। सवाल पूछने की मेरी इच्छा और चीजों को समझने की जिद को कतर दिया गया।
आईकन बन जाते हैं विद्रोही
मैं तो उस घटना का एहसानमंद हूं कि उस अनुभव ने मेरी सोच और एहसास को हमेशा के लिए बदल दिया। आज मैं 59 साल का हूं और वैसा ही महसूस करता हूं। कई दफा लगता है, दुनिया और आसपास के विचारों पर ज्यादा उग्रता से विरोध करता हूं। मेरे अंदर का विद्रोही स्वभाव मुझे छोड नहीं रहा है। कला जगत का परिदृश्य देखें तो पाएंगे कि यह विद्रोहियों से भरा है। उन्हें अपने समय में स्वीकृति नहीं मिली, लेकिन समय बीतने के साथ वे आईकॅन बन गए। संस्कृति में सबसे पहले उन्हें स्वीकृति और सराहना मिलती है, जो समय के साथ चलते हैं और प्रचलित परंपराओं को दोहराते हैं। विद्रोही आता है, परंपराओं को तहस-नहस करता है। निस्संदेह मौजूद मॉडल और आदर्श के अनुरूप काम कर रहे लोग नए विद्रोहियों को दबाने की कोशिश करते हैं, ताकि वे पुरानी जिंदगी और सोच को तबाह न कर सकें। लेकिन जिस तरह हर रात की सुबह होती है, उसी प्रकार विद्रोही की सोच कामयाब होती है। वही जिंदगी और प्रगति का प्रतीक होता है और आखिर में उसी की जीत होती है।
फिल्म जगत के विद्रोही
भारतीय सिनेमा को विश्व के मानचित्र पर सम्मानित जगह दिलाने वाले सत्यजित राय विद्रोही थे। उनका सिनेमा विशेष और पृथक था, वह बदलते बंगाल की संस्कृति का द्योतक था। वह स्वयं बंगाल के थे। सच्चा विद्रोही अनुगामियों की चिंता नहीं करता। वह जो सोचता है, वही करता है। वह अपनी राह का अकेला यात्री होता है। समय की रेत में बाद की पीढियां उसके कदमों के निशान खोजती हैं और उस जोश को समझने की कोशिश करती हैं कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? कभी उन्हें सफलता मिलती है तो कभी शुष्क जीवनी लिखी जाती है, जिसमें सिर्फ घटनाओं का उल्लेख होता है। विद्रोही की सोच और जीवन ऊर्जा को समझने की कोशिश नहीं की जाती।
राज कपूर को अपने समय में विद्रोही कहा जाता था। उन्होंने फिल्मों में स्त्री-पुरुष संबंधों को जैसे चित्रित किया, उसकी कल्पना भी उनके पूर्वजों ने नहीं की थी। उनके प्रेम दृश्य रूखे एवं हिंसक होते थे। तब की ज्यादातर फिल्मों में प्रेम दृश्य अशारीरिक और कोमल होते थे। आर.के. के प्रतीक चिह्न में एक पुरुष ने स्त्री को अपनी बांहों में ले रखा है और प्रेम के वशीभूत वह उसकी तरफ झुका हुआ है। राज कपूर की निजी जिंदगी भी खुली थी। वे दूसरों की तरह दरवाजे बंद करके प्रेम नहीं करते थे। राज कपूर-नरगिस की प्रेम कहानी शुद्धतावादी समाज में अवैध प्रेम का नमूना थी। उसी प्रेम कहानी के दम पर स्वर्णयुग की एक-एक फिल्म का निर्माण हुआ। जब शम्मी कपूर जंगली में बर्फीली ढलान से याहू चिल्लाते हुए लुढके तो उन्होंने हिंदी फिल्मों के हीरो का अंदाज बदल दिया। उनके पहले प्रेम की अभिव्यक्ति में भी हीरो खिचे-खिचे रहते थे। जंगली किशोरावस्था की मेरी पहली फिल्म है। उसकी सफलता का राज है कि शम्मी ने ब्यूटी क्वीन सायरा बानो से प्रेम का खुला इजहार किया। जवान हो रहे सभी दोस्त प्रेम की वैसी ही भावना महसूस करते थे। शम्मी कपूर को तब रिबेल स्टार कहा गया था।
समानांतर सिनेमा में विद्रोह
आठवें और नौवें दशक में जब हिंदी सिनेमा की आग ठंडी पड गई थी और निर्माताओं के लिए फिल्म सिर्फ मुनाफे का धंधा बन चुकी थी, उन्हीं दिनों समानांतर सिनेमा का जन्म हुआ। इसके फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा के पॉपुलर फैशन के खिलाफ विद्रोह किया था। पॉपुलर फिल्मों में केवल नाच-गाने और पलायनवादी मेलोड्रामा होता था। ऐसे समय में दादा साहेब फालके पुरस्कार से इस साल सम्मानित हुए श्याम बेनेगल ने फिल्मों में प्रवेश किया था। उनकी पहली फिल्म अंकुर में गांव की किसान महिला ने सामंती जमींदार के यौन शोषण के खिलाफ विद्रोह किया था। संयोग से वह हिंदी फिल्मों की महान अभिनेत्री शबाना आजमी की भी पहली फिल्म थी।
बगावत की तारीफ
यह वही मुश्किल दौर था। जब मैंने चार फ्लॉप फिल्मों के बाद आत्मकथात्मक फिल्म अर्थ बनाई थी। इसे प्रिव्यू में तारीफें मिली थीं, लेकिन प्रचलित फॉर्मूले से सर्वथा अलग होने के कारण लगभग एक साल तक कोई खरीदार नहीं मिला था। सीधी सी वजह थी। फिल्म इंडस्ट्री पर राज कर रहे लोगों को यह स्वीकार नहीं था कि हीरोइन सदियों से चले आ रहे पुरुष वर्चस्व को चुनौती दे और उससे बगावत करे। दशकों बाद भी मेरी फिल्म प्रासंगिक है और नए दौर की फिल्मों के विषय से आगे है। इसकी नायिका अपने पति व प्रेमी दोनों की जिंदगी से निकल जाती है और अपनी शर्तो पर स्वतंत्र जिंदगी चुनती है। फिल्म इंडस्ट्री ने भविष्यवाणी की थी कि अपने अंत की वजह से फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। लेकिन सच यही है कि बगावत भरे अंत के कारण ही फिल्म सफल हुई। सफलता का कारण यह भी था कि इसने शहरी औरतों को पहली बार धोखेबाज पतियों को पलटकर जवाब देने की दबी भावना को स्वर दिया, साबित किया कि दुनिया विद्रोहियों को इसलिए पंसद करती है कि अधिकतर लोग इस तरह बगावत नहीं कर पाते।
सच्चाई का रास्ता एकाकी
अपनी पहली फिल्म सारांश में अनुपम खेर ने बी. वी. प्रधान का जो किरदार निभाया था, वह मेरा अभी तक का सबसे शानदार किरदार है। इस साहसी फिल्म का मेरा नायक सदियों पुरानी पुनर्जन्म की अवधारणा के खिलाफ लडता है। इसे बनाना आसान नहीं रहा। तब मैं 33 साल का था। मुझे राजश्री प्रोडक्शन के मुखिया सेठ ताराचंद बडजात्या से लडना पडा था। वे श्री अरविंदों के भक्त थे। उन्होंने सीधे पूछा, कैसे कह सकते हो कि पुनर्जन्म नहीं होता? क्या तुम संतों से ज्यादा जानते हो? संतों ने कहा है कि आत्मा अमर है। उन्होंने फिल्म के क्लाइमेक्स की शूटिंग से पहले यह सवाल रखा था। मेरा जवाब था, हम अमर नहीं हैं, सर। हम मर जाते हैं, लेकिन जिंदगी अमर रहती है। उसका अंत नहीं है। सारांश में मेरा यही संदेश है। फिल्म में यही बात कही जाएगी या फिल्म नहीं बनेगी। उनके विचारों को मैंने चुनौती दे दी थी। वह कुछ समय बहस करते रहे, समझाते रहे, लेकिन तो भी मैं अपनी राय से टस से मस नहीं हुआ तो उन्होंने जिद छोड दी। उसके बाद तो सारांश ने इतिहास रचा। वह क्लासिक फिल्म बन गई। ऐसा इसलिए हुआ कि मैं किसी विद्रोही की तरह उस विश्व दृष्टि से चिपका रहा, जिसके लिए मैं लड रहा था। इस आलेख का सार यही है कि सच्चे कलाकार का सफर अकेला होता है। अधिकतर कलाकार महसूस करते हैं कि विद्रोह करते ही आप अकेले हो जाते हैं, लेकिन तभी सच्ची कला का जन्म भी होता है। पलटकर देखता हूं कि जब भी मैंने स्थापित मूल्यों के खिलाफ विद्रोह किया, तब-तब लोगों को मैंने प्रभावित किया। अपने विश्वास के लिए मर-मिटने की इच्छा ने ही मुझे जिंदगी दी। जीवन का विपरीत शब्द मृत्यु नहीं, बल्कि एकरूपता है। विद्रोही एकरूपता छोडते हैं और जीवन पाते हैं अपनी मृत्यु के बाद।

Comments

admin said…
महेश जी ने सच कहा है जब तक आप बनी बनाई लीक को तोडने का साहस नहीं जुटाते, आपकी पहचान नहीं बन सकती।
इस विचारोत्तेजक सामग्री को पढवाने के लिए आभार।
आनंद said…
बढ़ि‍या। प्रेरणादायक लेख।
- आनंद

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