दरअसल : फिल्म फेस्टिवल की प्रासंगिकता

-अजय ब्रह्मात्‍मज
    देश में फिल्म फेस्टिवल की संख्या बढ़ गई है। लगभग हर बड़े शहर में फिल्म फेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं। दैनिक जागरण का जागरण फिल्म फेस्टिवल इस लिहाज से अनोखा और उल्लेखनीय है कि यह देश का अकेला घुमंतू फेस्टिवल है। दिल्ली से आरंभ होने के बाद यह दैनिक जागरण के प्रसार क्षेत्र के 15 शहरों का भ्रमण करने के बाद अंत में मुंबई पहुंचता है। हाल ही में 5 वां जागरण फिल्म समारोह मुंबई में संपन्न हुआ। फेस्टिवल में देश-विदेश की अनेक भाषाओं की फिल्में एक साथ देखने को मिल जाती हैं। आकार और स्वरूप में मझोले किस्म के इस फेस्टिवल की अपनी पहचान बन चुकी है। मुंबई के दर्शक दो सालों की आदत के बाद अभी से तीसरी बार इसके मुंबई आने का इंतजार कर रहे हैं।
    मुंबई के दर्शकों को मुंबई फिल्म फेस्टिवल(मामी) का भी इंतजार रहता है। 16 वें साल में प्रवेश करते समय फेस्टिवल के मुख्य स्पांसर ने अपने हाथ खींच लिए तो एकबारगी लगा कि अब मुंबई फिल्म फेस्टिवल नहीं होगा। तभी फिल्म बिरादरी के कुछ सदस्य आगे आए। उन्होंने आर्थिक सहयोग देने के साथ फिल्म फेस्टिवल की गतिविधियों में अपनी उपस्थिति दर्ज करने का आश्वासन दिया। 16 वें मुंबई फिल्म फेस्टिवल में हिंदी सिनेमा के पॉपुलर एक्टर उद्घाटन और समापन समारोह में दिखाई पड़े। फेस्टिवल के दौरान परिचर्चा, विमर्श और मास्टर क्लास में भी डायरेक्टर आते-जाते रहे। निश्चित ही पॉपुलर सितारों की वजह से मुंबई फिल्म फेस्टिवल की गरिमा बढ़ी। कवरेज और प्रचार का असर पड़ा। फिल्म बिरादरी ने कहा भी कि यह उनका फेस्टिवल है।
    गौर करें तो पॉपुलर सितारों की मौजूदगी कॉस्मेटिक ही रही। उन्होंने उद्घाटन और समापन समारोह में शिरकत कर मीडिया को बात करने और दिखने लायक कुछ इमेजेज दे दीं। अगर ये पॉपुलर सितारे फेस्टिवल की दैनंदिन गतिविधियों का हिस्सा बनते तो उनका सहयोग ज्यादा असरकारी होता। इस बार उन्होंने आश्वासन तो दिया है कि वे अब लगातार फिल्म फेस्टिवल के लिए समय निकालेंगे, लेकिन स्टारों की बात का क्या भरोसा?
    देश में सरकारी स्तर पर आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल पांच दशकों का सफर तय कर चुका है। अब इसे गोवा में स्थापित कर दिया गया है। दिक्कतों और देखरेख के अभाव में यह फेस्टिवल कोई मुकाम नहीं हासिल कर सका। इधर छोटे-बड़े स्तर पर अन्य शहरों में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन से भी इसके दर्शक कम हुए हैं। पहले देश भर से फिल्मप्रेमी,पत्रकार और समीक्षक इसमें हिस्सा लेने आते थे। उधर इंटरनेट की सुविधा बढऩे से विदेशी फिल्मों को देखने के लिए फेस्टिवल की निर्भरता भी कम हो गई है। अब तो घर बैठे दुनिया भर की फिल्में देखी जा सकती हैं। फिल्म फेस्टिवल आयोजकों की बड़ी चुनौती है कि बदले हुए दौर में वे फेस्टिवल की प्रासंगिकता कैसे बनाए रखें? एक दुविधा और नजर आती है कि सहयोग और स्पांसर के दवाब में वे बड़े शहरों तक ही सीमित रहते हैं। इस संदर्भ में जागरण फिल्म फेस्टिवल की उपयोगिता बढ़ जाती है,क्योंकि यह देश के सुदूर कोने में जाता है।
    इन दिनों छोटे स्तर पर विभिन्न समूहों और व्यक्तियों के प्रयास से भी फिल्म फेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं। मुझे लगता है कि उत्तर भारत में व्यवस्थित और व्यापक फिल्म फेस्टिवल के आयोजन की जरूरत है। उत्तर भारत के छोटे शहरों की प्रतिभाएं एक्सपोजर के लिए कुलबुला रही हैं। अगर उन्हें फेस्टिवल के जरिए सही मार्गदर्शन मिले तो अगले पांच सालों में अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशकों का नया समूह आ सकता है। वे हिदी फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा योगदान करेंगे।

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