फिल्‍म समीक्षा : हैदर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
1990 में कश्मीर में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के लागू होने के बाद सेना के दमन और नियंत्रण से वहां सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बेकाबू हो गई थी। कहते हैं कि कश्मीर के तत्कालीन हालात इतने बदतर थे कि हवाओं में नफरत तैरती रहती थी। पड़ोसी देश के घुसपैठिए मजहब और भारत विरोध केनाम पर आहत कश्मीरियों को गुमराह करने में सफल हो रहे थे। आतंक और अविश्वास के उस साये में पीर परिवार परस्पर संबंधों के द्वंद्व से गुजर रहा था। उसमें शामिल गजाला, हैदर, खुर्रम, हिलाल और अर्शिया की जिंदगी लहुलूहान हो रही थी और सफेद बर्फ पर बिखरे लाल छीटों की चीख गूंज रही थी।
विशाल भारद्वाज की 'हैदर' इसी बदहवास दौर में 1995 की घटनाओं का जाल बुनती है। 'मकबूल' और 'ओमकारा' के बाद एक बार फिर विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के कंधे पर अपनी बंदूक रखी है। उन्होंने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा कि प्रकाश झा ने अपनी फिल्मों में नक्सलवाद को हथिया लिया वर्ना उनकी 'हैदर' नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में होती। जाहिर है विशाल भारद्वाज को 'हैदर' की पृष्ठभूमि के लिए राजनीतिक उथल-पुथल की दरकार रही होगी। अन्यथा प्रेम, घृणा, प्रतिशोध और प्रेम की कहानी 'हैदर' मुंबई के कारपोरेट और दिल्ली के पॉलिटिकल बैकड्रॉप में से रोचक तरीके से कही जा सकती है। शेक्सपियर का नाटक 'हैमलेट' होने और न होने के प्रश्न को स्थायी प्रासंगिकता देती है। दुनिया भर के फिल्मकार और रंगकर्मी इसे अपने संदर्भ और परिवेश में पेश करते हैं। विशाल भारद्वाज ने कश्मीर चुना है।
विशाल भारद्वाज निस्संदेह अपनी पीढ़ी के समर्थ और संवेदनशील फिल्मकार हैं। बाजार और फैशन के दवाब से परे जाकर वे क्रिएटिव कट्टरता के साथ फिल्में बनाते हैं। अपनी फिल्मों के क्रिटिकल अप्रिसिएशन से संतुष्ट विशाल भारद्वाज को आम दर्शकों की कभी परवाह नहीं रही। इस मामले में वे आत्मनिष्ठ और आत्ममुग्ध फिल्मकार हैं। उनकी फिल्मों में भावना और संवेदना का घनत्व ज्यादा रहता है। कथ्य की इस सघनता से उनका शिल्प भी गाढ़ा और जटिल होता है। अच्छी बात है कि उनकी फिल्मों की अनेक व्याख्याएं हो सकती हैं। विशाल भारद्वाज 'हैदर' में भी सरल नहीं हैं। उन्होंने शेक्सपियर के 'हैमलेट' से प्रेरित 'हैदर' को और परतदार एवं जटिल बना दिया है।
'हैदर' नायक हैदर के प्रतिशोध से ज्यादा गजाला की ग्लानि और दुविधा को लेकर चलती है। अंदर की आंच कम करने की सलाह देते पिता के कथन का मर्म गजाला की आत्मकथन में भी व्यक्त होता है, जब वह बेटे हैदर के सामने अपनी व्यथा जाहिर करती है। जाने-अनजाने फिल्म की मुख्य घटनाओं की वजह बनती गजाला अनायास हैदर से फिल्म की केंद्रीयता छीन लेती है। विशाल भारद्वाज ने 'हैमलेट' की अपनी प्रस्तुति में कुछ किरदार जोड़े हैं। उन्होंने नाटक की नाटकीयता के फिल्म के शिल्प में बखूबी ढाला है। रूहदार दिखता तो अलग किरदार है, लेकिन वह हैदर के पिता की रूह ही है। वही हैदर को इंतकाम केलिए प्रेरित करता है। खुर्रम की वासना और लालसा हैदर की मां पर फरेब डालती है। उसकी आंखों में गोली मार कर इंतकाम लेने के पिता के संदेश से सक्रिय हैदर प्रतिशोध की आग में कवि से हत्यारा बन जाता है।
'हैदर' में सभी कलाकार अपने किरदारों को प्रभावशाली तरीके से जीने की मेहनत करते हैं। इनमें गजाला बनी तब्बू और खुर्रम बने केके मेनन अपने प्रयासों में सफल रहते हैं। हालांकि दोनों अपनी मुग्धकारी प्रतिभाएं अनेक फिल्मों में साबित कर चुके हैं, लेकिन इस फिल्म में विशाल के निर्देशन में उन्हें फिर से निखरते देखना अच्छा लगता है। शाहिद कपूर ने हैदर के बाहरी रूप को अच्छी तरह अंगीकार किया है। वे किरदार के आंतरिक द्वेष और प्रतिशोध को सही अनुपात में आत्मसात नहीं कर सके हैं। श्रद्धा कपूर अदायगी और संवाद अदायगी दोनों में विफल रही हैं। उनका खूबसूरत चेहरा भावों के अनुरूप नहीं बदलता। ललित परिमू, आशीष विद्यार्थी जैसे सहयोगी किरदारों की वेशभूषा पर ध्यान नहीं दिया गया है। इरफान सिद्धहस्त अभिनेता हैं। उनकी मौजूदगी ही काफी लगती है। यहां वे रूहदार को तरजीह देते नहीं दिखाई पड़ते। 'हैदर' की खोज है नरेंद्र झा। हैदर के पिता के रूप में उन्होंने शानदार परफारमेंस दी है।
'हैदर' है तो 1995 के कश्मीर की पृष्ठभूमि पर, लेकिन फिल्म में उस साल की राजनीतिक घटनाओं का कोई रेफरेंस नहीं है। उस साल कश्मीर में विदेशी पर्यटकों की हत्या से लेकर चरार-ए-शरीफ की आगजनी जैसी बड़ी घटनाएं हुई थीं। 'हैदर' में कहीं भी उनका हवाला नहीं मिलता। फिल्म में 'अफ्सपा(आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट) का चुत्जपा भर किया गया है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में लतीफे और मजाकिया किरदार भी रहते हैं। इस फिल्म में अभिनेता सलमान खान के प्रतिरूप बने दोनों सलमान और लतीफों पर हंसी तो आती है, मगर यह हंसी फिल्म के अभिप्राय को कमजोर करती है।
अवधि-161 मिनट 
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार 

Comments

sanjeev5 said…
आपकी समीक्षा का ही इंतज़ार कर रहा था. अब फिल्म देखूँगा. फिल्म का इंतज़ार तो हो ही रहा था. अपने फिल्म के संगीत पक्ष पर प्रकाश नहीं डाला है. विशाल को अपने संगीत निर्देशन पर काफी उत्साह रहता है लेकिन आपका संगीत के बारे में कोई भी ज़िक्र न करना मुझे निरोत्साहित कर रहा है. उनका एक गीत जिसको बनाने में उन्हें कई माह लगे हैं ठीक है. ये गीत सुखविंदर ने गाया है. फिल्म सफल रहेगी तो और फ़िल्में बनाने का उत्साह और मौका मिलता रहेगा.

धन्यवाद.....संजीव

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