दरअसल : माहौल बने बच्चों की फिल्मों का


-अजय ब्रह्मात्मज
    हर साल जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिवस के मौके पर घोषित बाल दिवस के समय हमें बच्चों की याद आती है। यह भी याद आता है कि बच्चों के लिए हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं में फिल्में नहीं बनतीं। हालांकि देश में बच्चों की फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए बाल चित्र समिति बनी हुई है। जवाहर लाल नेहरू बच्चों से बहुत प्यार करते थे। उन्होंने बच्चों की फिल्मों पर विशेष ध्यान देने के लिए बाल चित्र समिति के गठन पर जोर दिया था। सन् 1955 में ही बाल चित्र समिति की स्थापना हो गई थी। तब से अनेक गणमान्य फिल्मकार और कलाकार इसके अध्यक्ष रहे हैं। बाल चित्र समिति ने अभी तक 10 भाषाओं में 250 से अधिक फिल्मों का निर्माण किया है। चिल्ड्रेन फिल्म फेस्टिवल में इन फिल्मों को प्रदर्शित किया जाता है। इस मौके पर विदेशों की फिल्में भी भारतीय बच्चे देख पाते हैं। पिछले साल हैदराबाद में चिल्ड्रेन फिल्म फेस्टिवल का सफल आयोजन हुआ था। यह फेस्टिवल अपनी फिल्मों से अधिक इस वजह से सुर्खियों में रहा कि अनेक फिल्मकारों के बच्चों की फिल्में यहां प्रदर्शित की गईं। उनका हौसला बढ़ाने उनके मां-बाप वहां पहुंच गए थे।
    बाल चित्र समिति की फिल्मों के अलावा यदा-कदा मुख्यधारा में कुछ फिल्में आ जाती हैं। इन्हें कभी मशहूर निर्देशक बनाते हैं तो कभी कोई युवा फिल्मकार पहली कोशिश में सीमित बजट में ऐसे प्रयास करता है। चूंकि बच्चों की फिल्मों का निश्चित बाजार नहीं है,इसलिए हिंदी समेत अन्य भाषाओं की फिल्म इंडस्ट्री में इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। कभी-कभार शेख कपूर,महेश भट्ट,विशाल भारद्वाज या आमिर खान की फिल्में बच्चों पर केंद्रित रहती हैं। मजेदार तथ्य है कि ये फिल्में चलती भी हैं,लेकिन उन फिल्मकारों की दोबारा कोशिश नहीं दिखती। इधर अमोल गुप्ते निजी प्रयास से बच्चों की फिल्में लेकर आ रहे हैं। वे आमिर खान की तारे जमीन पर के भी क्रिएटिव डायरेक्टर थे। उनकी स्टेनली का डब्बा और हवा हवाई को भी दर्शकों की सराहना मिली। वे कुछ समय तक बाल चित्र समिति के निदेशक भी रहे,लेकिन सरकार और नौकरशाही के चंगुल में फंसी समिति में वे कुछ उल्लेखनीय परिवत्र्तन नहीं ला सके।
    हिंदी फिल्मों की सामान्य स्थिति देख लें। यहां तो बड़ों के लिए भी कायदे की फिल्में नहीं आ रही हैं। सारे चोर,उचक्के और गुंडे फिल्म के हीरो बने हुए हैं। अफसोसनाक स्थिति है कि हम बच्चों के साथ इन फिल्मों को देखने जाते हैं। अगर साथ नहीं ले गए तो बच्चे थोड़ी काट-छांट के साथ टीवी पर इन फिल्मों को देख रहे हैं। एक्शन,गाने और कॉमेडी के नाम पर फूहड़ फिल्मों का बाजार गर्म है। सारे लोकप्रिय स्टार दूसरों से आगे निकलने या बराबरी करने में अपनी क्षमताओं और लोकप्रियता का दुरुपयोग कर रहे हैं। कभी अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता भुनाने के लिए फूहड़ और लचर फिल्मों की तादाद बढ़ी थी। अब एक नहीं अनेक अमिताभ बच्चन सरीखे लोकप्रिय अभिनेता हैं। वे सभी मिल कर हिंदी सिनेमा को मनोरंजन की चकाचौंध में ले जा रहे हैं,जिसका हासिल सिर्फ मुनाफा है। पहले संवेदना और लोकरुचि का खयाल रखा जाता था। अभी सारा जोर मुनाफे और कमाई पर है। सभी यही बताना चाहते हैं कि उनकी फिल्म ने कितने कम समय में कितनी अधिक कमाई कर ली।
    जरूरत है कि हम बच्चों की जरूरत और मनोरंजन के लिए फिल्में बनाएं। जब तक पर्याप्त संख्या में देश में फिल्में नहीं बन जातीं,तब तक विदेशी फिल्में भी देखें। पहली जरूरत है कि फिल्मों के प्रदर्शन की समुचित व्यवस्था हो। बच्चों को उनकी मानसिकता और समझ की फिल्में मिलें। बच्चों की फिल्में कम लागत में बनें तो उनके टिकट दर भी कम रखे जाएं। स्कूल के हाल में हर हफ्ते एक फिल्म का प्रदर्शन किया जा सकता है। अब प्रोजेक्शन के लिए ताम-झाम की जरूरत नहीं है। स्कूल या स्कूल के चेन मिल कर भी ऐसी फिल्मों का प्रोडक्शन कर सकते हैं। बाल चित्र समिति जैसी संस्थाएं हर राज्य में होनी चाहिए। हमें बच्चों पर ध्यान देना चाहिए। उनकी पढ़ाई के समान मनोरंजन भी हमें गौर करना होगा।

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