इरफान की अनौपचारिक बातें


-अजय ब्रह्मात्मज

मंजिल अभी बाकी है 
     सीखते-सीखते यहां तक तो आ गया। मैंने जो प्रोफेशन चुना है,वह मेरे मकसद और लक्ष्य के करीब पहुंचने के लिए है। बाकी शोहरत,पैसा,नाम ... य़ह सब बायप्रोडक्ट है। यह सब तो मिलना ही था। इनके बारे में सोच कर नहीं चला था। जयपुर से निकलते समय कहां पता था कि कहां पहुंचेंगे? अभी पहुंचे भी कहां हैं। सफर जारी है। मुझे याद आता है एक बार बेखयाली में मैंने मां से कुछ कह दिया था। थिएटर करता था तो मां ने परेशान होकर डांटा था ...य़ह सब काम आएगा क्या? मैंने अपनी सादगी में कह दिया था कि आप देखना कि इस काम के जरिए मैं क्या करूंगा? मेरे मुंह से निकल गया था और वह सन्न होकर मेरी बात सुनती रह गई थीं। उन्हें यकीन नहीं हुआ था। तब यह मेरा इरादा था। पता नहीं था कि कैसे होगा ...क्या होगा? हर मां तो ऐसे ही परेशान रहती है। उन्हें लगता है कि हम वक्त बर्बाद कर रहे हैं। उन्होंने जो दुनिया नहीं देखी है,उसमें जाने की बात से ही कांप जाती हैं। अपने देश में हर मां-बाप की चिंता रहती है कि बच्चे कैसे और कब कमाने लगेंगे?
बदल गया है सिनेमा 
    अभी सिनेमा बदल गया है। करने लायक कुछ फिल्में मिल जाती हैं। अगर पिछली सदी के अंतिम दशक जैसा ही चलता रहता तो माहौल डरावना हो जाता। हमें कुछ और सोचना पड़ता। सिनेमा संक्रमण के दौर में है। निर्देशकों की नई पौध आ गई है। वे ताजा मनोरंजन ला रहे हैं। दर्शक भी उन्हें स्वीकार कर रहे हैं। उनसे हमारी दुकान चल रही है। अगर यह बदलाव नहीं होता तो हम अभी भी कैरेक्टर एक्टर कर रहे होते। प्रतिदिन के हिसाब से यानी दिहाड़ी पर काम कर रहे होते। हमारा मुख्य उद्देश्य एंटरटेन करना है। उसके साथ आप कितनी चीजें लेयर में डाल दो। विदेशों में देखें क्रिस्टोफर नोलन एंटरटेनिंग फिल्में बनाते हैं,लेकिन उसके अंदर कैसा फलसफा डालते हैं। आप समझ सकते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है? दुनिया से उस फिल्म का कनेक्शन क्या है? सारी चीजें मिल रही होती हैं। उस तरह का एंटरटेनमेंट हमारे यहां नहीं है। मुझे उम्मीद है कि हो जाएगा। हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं। अभी पूरी दुनिया का समागम तेजी से हो रहा है। लंचबॉक्स तो इसी समागम का उदाहरण है।    आप देखिएगा अभी कितने एक्टर आएंगे। लोग मेरा नाम लेते रहते हैं,लेकिन जल्दी ही तादाद बढ़ेगी। हमारे एक्टर हालीवुड में भी काम करेंगे। मेनस्ट्रीम हालीवुड की फिल्मों में भी हमारी मांग बढ़ेगी। अफसोस है कि हिंदी का कमर्शियल सिनेमा अभी तक इन प्रतिभाओं को जगह नहीं दे पा रहा है। उनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। हिंदी सिनेमा एकपरतीय,लाउड और मेलोड्रामैटिक बना हुआ है। अच्छी बात है कि कम ही सही लेकिन दूसरी तरह का सिनेमा भी बन रहा है। उन्हें दर्शक पसंद कर रहे हैं।
   
    जुरासिक का माहौल 
कुछ महीने पहले जुरासिक पार्क की शूटिंग करके लौटा हूं। मुझे पता चला कि स्टीवन स्पीलबर्ग मेरे साथ काम करना चाहते हैं। महीने, दो महीने के बाद पता चला कि वे खुद इस फिल्म को डायरेक्ट नहीं कर रहे हैं। वे निर्माता बन गए। स्पीलबर्ग ने नए डायरेक्टर के ऊपर छोड़ दिया कि वह चाहे तो मुझे ले या हटा दे। बहुत मजा आया, क्योंकि बहुत ही मजेदार और खिलंदड़ा किरदार है मेरा। पहली बार ऐसी यूनिट दिखाई पड़ी, जो दो-ढ़ाई महीने साथ काम करने के बाद भी एक-दूसरे को देखकर खुश होती थी। दोस्ताना माहौल था। यहां पर अनुराग कश्यप और निशिकांत कामत के सेट पर ऐसा माहौल रहता है। अब देखें फिल्म पूरी होने के बाद मेरा रोल कितना रह जाता है। जुरासिक पार्क में मैं पार्क ओनर का रोल कर रहा हूं। मेरा किरदार थोड़ा दिखावटी और शो-ऑफ करने वाला है। हमेशा जोश में रहता है। मिशनरी है। कुछ करना चाहता है, लेकिन उसकी सोच में गहराई नहीं है।
    दर्शकों का रखना है खयाल 
यहां की बात करूं तो पूरा साल स्पेशल एपीयरेंस में ही चला गया। पहले गुंडे किया और फिर हैदर। अभी पीकू कर रहा हूं। मुझे यह पता है कि दर्शक मुझे पसंद कर रहे हैं।वह मुझ से उम्मीद कर रही है।मैं यही कोशिश कर रहा हूं कि वे निराश न हों। मैं कुछ सस्पेंस लेकर आ सकूं। आर्ट फिल्म करने में मेरा यकीन नहीं है,जिसमें डायरेक्टर की तीव्र संलग्नता रहती है। आर्ट हो है,पर वैसी फिल्म कोई करे। ना ही मैं घोर कमर्शियल फिल्म करना चाहता हूं। सिनेमा के बदलते स्वरूप में अपनी तरफ से कुछ योगदान करता रहूंगा। पीकू के बाद तिग्मांशु के साथ एक फिल्म करूंगा। और भी कहानियां सुन रहा हूं। सुजॉय घोष के साथ कुछ करना है। संजय गुप्ता के साथ भी बात चल रही है। वह ऐश्वर्या के साथ है। अभी उस पर काम चल रहा है। मैंने हां कह दिया है, लेकिन अभी देखें कहानी क्या रूप लेती है? निश्चित होने के बाद बात करने में मजा आता है। अभी लगता है कि फिल्म का प्री-प्रोडक्शन ठोस होना चाहिए। हिंदी फिल्मों में दर्शक मुझसे कुछ अतिरिक्त चाहते हैं। मैं चालू किस्म की फिल्में नहीं कर सकता। मुझे अपने रोल में कुछ अतिरिक्त दिखना चाहिए। हां अगर डायरेक्टर पर भरोसा हो तो हां कर सकता हूं। वेलकम टु कराची का अनुभव के बाद ज्‍यादा सावधान हो गया हूं। मूल फिल्म किसी और दिशा में घूम गई थी। चीजें बदलती हैं तो समझ में आ जाती हैं। वेलकम टु कराची में क्लब सौंग डाल दिया था। क्लब सौंग तो अक्षय कुमार गा सकते हैं, उसमें मैं क्या करूंगा? जो मेरा पिच नहीं है, वहां क्यों खेलने के लिए भेज रहे हो? कमर्शियल पिल्मों में मैं आप को मजा दे सकता हूं, लेकिन मुझे अपना मैदान तो दो। मेरा मैदान, मेरा बल्ला दो, देखो मैं छक्का मारता हूं।
  विज्ञापन में हो कैरेक्‍टर 
  विज्ञापनों में मेरी अलग पहचान बनी है। उसके लिए मैंने काफी लंबा इंतजार किया। वोडाफोन करने के बाद मेरे पास सारे ऐड एक ही प्रकार के आ रहे थे। सब उसी के एक्सटेंशन थे। एक-दो करने के बाद लगा कि ये तो निचोड़ लेंगे। फिर मैंने मना कर दिया। पैसों से ही संतोष नहीं होता। काम से भी संतोष होना चाहिए। मैंने उन लरोगरें को समझाया कि आप मुझे दोहराएंगे तो आप के प्रोडक्ट को कौन नोटिस करेगा? सीएट के साथ मेरी छह महीने तक बैठकें होती रहीं। मैंने उनसे कहा कि ऐड में कैरेक्टर डालो। ऐड में इतना जरूर ख्याल रखता हूं कि तंबाकू और नशे वगैरह के ऐड न करूं।
     काम में हो ईमानदारी   
नए एक्टर मेरी तरह बनना चाहते हैं। मुझे लगता है अपने काम और व्यवहार से मैं कोई सिग्नल दे रहा हूं। जिस नए एक्टर का एंटेना चालू होगा, वह मुझे ग्रहण कर लेगा और फिर मुझसे आगे निकल जाएगा। मैंने खुद ऐसे ही दूसरों के सिग्नल पकड़े थे। चलते-चलते यहां तक आ गया। मेरे लिए एक्टिंग सिर्फ पैसा कमाने और सुरक्षा का साधन नहीं है। पैसे और सुरक्षा तो हैं, लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, वह हमारे काम का बाय प्रॉडक्ट है। अभी कुछ दिनों पहले किसी ने कहा कि आप की पान सिंह तोमर देखने के बाद मुझे जीने का मकसद मिल गया। उसने हाथ भी नहीं मिलाया। कहा और निकल गया। मुझे लगा इससे ज्यादा पवित्र तारीफ नहीं हो सकती। अपने जीवन के लिए इसे महत्वपूर्ण मानता हूं। आप गौर करेंगे कि अपनी फिल्मों से मैं खुद के लिए जाल नहीं बुन रहा हूं। अपने काम से मुझे आजादी मिलती है। मैं यहां फिल्म करता हूं। किसी और देश के किसी शहर में कोई हिल जाता है। वह मेरे किरदार से कुछ सीख लेता है। उस सीख को मैं वैल्यू देता हूं। वह अनमोल है।
      लोगों का काम है कहना
  मेरा सोशल सर्कल नहीं है। कुछ लोग मुझे अहंकारी समझते हैं। मैं इसकी परवाह नहीं करता। किसी कमरे में आप केवल चुपचाप बैठ जाएं तो देख लें बाकी नौ आप के बारे में क्या-क्या बातें करने लगते हैं। सभी के अपने निर्णय और दृष्टिकोण होंगे। किसी को लगेगा कि यह मारने वाला है। कोई कहेगा अहंकारी है। किसी को मैं प्यारा लगूंगा। तीसरा कहेगा या चौथा कहेगा कि कोई स्कीम कर रहा है। नौ लोग होंगे तो नब्बे कहानियां बनेंगी। मुझे इस पचड़े में रहना ही नहीं है। अगर मुझे चुप रहना अच्छा लग रहा है तो मैं चुप रहूंगा। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।
        मेरा प्रोडक्‍शन 
प्रोडक्शन में अभी हमने मदारी फिल्म पूरी कर ली है। उसके निर्माता शैलेष सिंह हैं। उसके निर्माताओं में सुतपा,  शैलेष और शैलेष की पत्नी हैं। तीसरी फिल्म भी तैयारी में है, जिसमें मीरा नायर का नेफ्यू काम कर रहा है। उसमें मैं नहीं हूं। हिंदी फिल्मों की जमीन अभी बहुत ऊपजाऊ हो गई है। आप किसी भी कहानी का पुष्ट बीज डालें तो अच्छी फसल मिलेगी। देखना यह है कि फिल्म नियंत्रित बजट में बने और मुनाफा कमाए। लंचबॉक्स ने अगर ज्यादा बिजनेस कर लिया है तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि मैं मोटी रकम मांगने लगूं। निर्माता फायदे में रहें।

Comments

Manwendra said…
I love u Irfan saheb.... thanks ajay sir for this slice...
Azhar Hussain said…
awsome soch lagi irrfaan saab ki

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