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अब चलन दे गन

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-अजय ब्रह्मात्‍मज बतौर एक्शन हीरो अजय देवगन की आखिरी फिल्म कयामत थी। इस बीच अजय देवगन ने लगभग हर विधा की फिल्में कीं, लेकिन एक्शन से बचे रहे। रोहित शेंट्टी की वजह से उनकी कॉमेडी फिल्मों में भी एक्शन की झलक मिलती रही, लेकिन सिंघम अजय की फुल एक्शन फिल्म है। आप की पहचान एक्शन हीरो की रही है। फिर एक्शन फिल्म के चुनाव में इतना लंबा गैप क्यों हुआ? सही स्क्रिप्ट की तलाश में वक्त लगा। मैं नहीं चाहता था कि एक्शन के नाम पर कोई साधारण फिल्म कर लूं। 'सिंघम' पहले तमिल में बन चुकी है। हिंदी में इसे बनाते समय आप लोगों ने कुछ चेंज भी किया है क्या? हम लोगों ने फिल्म की थीम को नहीं छेड़ा है, लेकिन हिंदी दर्शकों का खयाल रखते हुए बहुत कुछ चेंज कर दिया है। साउथ और हिंदी के दर्शकों की पसंद अलग है। हमने हिंदी दर्शकों की फीलिंग और कल्चर के हिसाब से कहानी में कुछ एड किया है। कुछ कैरेक्टर बदल गए और कुछ नए जोड़े गए हैं। फिल्म में इंटरवल के बाद का हिस्सा और क्लाइमेक्स एकदम अलग है। उसे हिंदी दर्शकों के अनुसार कर दिया गया है। एक्शन हीरो की इमेज के बावजूद आप इमोशनल एक्टर माने जाते हैं। एक्शन परफार्मेस कितना

फीका रहा आईफा 2011

-अजय ब्रह्मात्‍मज शाहरुखखान से किसी ने पूछ दिया कि वे सात सालों तक आईफा में क्यों नहीं आए, तो वे बिफर गए और इसे मीडिया का दिमागी फितूर बता दिया कि हमारे न आने को वे लाबिंग से नाहक जोड़ते हैं। शाहरुख के इंकार करने के बावजूद सच्चाई तो यही है कि बच्चन परिवार का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था। सलमान खान और करीना कपूर लंदन में फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। सैफ अली खान आाईफा रॉक्स प्रेजेंट करने वाले थे, लेकिन ऐन मौके पर नदारद हो गए। चगमगाते सितारों में केवल शाहरुख और प्रियंका चोपड़ा ही थे। बाकी तो मुंबई के टिमटिमाते तारे थे, जो सितारों की अनुपस्थिति में चमकने लगे थे। 12वां आईफा अवार्ड समारोह सितारों की मौजूदगी और प्रभाव के लिहाज से फीका रहा। अवार्ड समारोह के दिन प्रियंका के परफॉर्मेस ने ही नाक बचाई। शाहरुख घुटने की चाोट की वजह से मंच पर रंग नहीं जमा सके। उन्होंने जल्दी-जल्दी में जो स्पूफ पेश किया, वह बचकाना और बोरिंग था। रितेश देशमुख और बोमन ईरानी की जोड़ी की प्रस्तुति में जोश और विट कमजोर रहा। अब उन्हें बदलने की जरूरत है। हालांकि टोरंटों में उमड़े भारतवंशी पहुंचे स्टारों को ही देखकर आह्लादित थे

Understanding Mani Kaul and his films

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-devdutt trivedi Kaul gradually acquired a reputation of being cerebral and pretentious to the point of being termed a pseudo. Although there have been many instances of crowds staging group walk outs or dozing through screenings of his masterworks, a few instances claim to have incited mob violence addressed directly at the director while he was present at the screening. I t is with immense difficulty that one comes to terms with the fact that the great Indian film artist of our time, Mani Kaul is no more. Kaul was one of the few film makers functioning outside of the contours of the narrative parallel cinema and was perhaps the most significant amongst directors in India to produce a full-fledged aesthetic discourse around his practice. Born in Jodhpur on Christmas, 1944, Kaul studied filmmaking at the Film and Television Institute of India (FTII) under the tutelage of the illustrious Ritwik Kumar Ghatak. However after a screening of Pickpocket (1959), directed by the high priest of

मणि कौल का साक्षात्कार

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सौजन्‍य-प्रकाश के रे श्री मणि कौल का यह साक्षात्कार यूनेस्को कूरियर के जुलाई-अगस्त 1995 के सिनेमा के सौ साल के अवसर पर विशेषांक में पृष्ठ 36 -37 पर छ्पा था. आप सिनेमा से कैसे जुड़े और यह लगाव किस तरह आगे बढ़ा? सिनेमा से मेरा परिचय होने में कुछ देर लगी क्योंकि बचपन में मैं ठीक से देख नहीं पाता था. तेरह साल की उम्र में डॉक्टरों को मेरी आँखों की बीमारी का ईलाज समझ में आया. वही समय था जब दुनिया को मैंने पाया- जैसे बिजली की तारें, इन्हें मैं पहली दफ़ा देख सकता था. और फिर सिनेमा. जहाँ तक मुझे याद आता है जिस फ़िल्म ने मुझे सबसे पहले प्रभावित किया वह थी अमरीकी कॉस्टयूम ड्रामा - हेलेन ऑव ट्रॉय. शुरू में मेरी इच्छा अभिनेता बनने की थी. स्वाभविक रूप से यह मेरे पिता को पसंद न था. कुछ समय बाद मैंने एक डॉक्यूमेंट्री देखी जिससे मुझे यह ज्ञान हुआ कि फ़िल्में बिना अभिनेताओं के भी बन सकती हैं. इसने मेरी आँखें खोल दी. मुझे अब भी याद है कि वह फ़िल्म कलकत्ता शहर के बारे में थी. सौभाग्य से मेरे एक चाचा बंबई में फ़िल्म निर्देशक हुआ करते थे जो कि काफी जाने-माने थे. उनका नाम महेश कौल था. मैं उनसे मिला और उन

ऑन स्‍क्रीन,ऑफ स्‍क्रीन : एक्टिंग की दीवानी प्रियंका चोपड़ा

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-अजय ब्रह्मात्‍मज साल 2002.. मुंबई का फिल्मालय स्टूडियो.. सेट की तेज रोशनी और हडबडी-गडबडी के बीच चमकते दो नर्वस चेहरे.. मिस व‌र्ल्ड प्रियंका चोपडा और मिस यूनिवर्स लारा दत्ता..। सुनील दर्शन ने सत्र 2000 की सौंदर्य प्रतियोगिताओं की तीन में से दो विनर्स को हीरोइन के तौर पर साइन कर लिया था। उस दोपहर प्रियंका का साहस बढाने के लिए सेट पर मां मधु और पिता अशोक चोपडा थे। मां के सपनों को बेटी साकार कर रही थी। वह फिल्म की हीरोइन थी। मां-पिता के लिए बेटी की उपलब्धि मिस व‌र्ल्ड से भी बडी थी। समझदारी भरे निर्णय मां का सपना और विश्वास ही था कि वह अपना मेडिकल प्रोफेशन छोडकर बेटी के कारण मुंबई आ गई। बेटी ने भी उन्हें निराश नहीं किया। वह छलांगें मारती गई। राष्ट्रीय पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी प्रियंका लोकप्रियता और गंभीरता के बीच संतुलन बना कर चल रही हैं। वह जानती हैं कि समय के हिसाब से चलना जरूरी है। किसी ऐक्टर की अस्वीकृत फिल्मों की जानकारी हो तो उसके करियर का आकलन किया जा सकता है। एक उदाहरण दूं। प्रियंका ने अभिषेक बच्चन के साथ ब्लफ मास्टर की, उमराव जान छोड दी, फिर द्रोण की। मधुर

संग-संग : चंद्रप्रकाश द्विवेदी-मंदिरा द्विवेदी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज दूरदर्शन के धारावाहिक चाणक्य से अपनी खास पहचान बना चुके डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर की भावभूमि पर फिल्म बनाई। उपनिषदों पर धारावाहिक उपनिषद गाथा उनका महत्वपूर्ण कार्य है। अभी वे काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर मोहल्ला अस्सी नाम की फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में व्यस्त हैं। मंदिरा उनकी सहयोगी व पत्नी हैं। 13 साल पहले वे परिणय सूत्र में बंधे। विवाह के प्रति थोडा अलग दृष्टिकोण है इस दंपती का। सहमति-असहमति मंदिरा : मैं चाणक्य में इनकी असिस्टेंट थी। काम के प्रति इनका समर्पण मुझे अच्छा लगा। इतिहास में मेरी रुचि थी, लिहाजा इनकी सहायक बन गई। डॉ. द्विवेदी : मैंने चाणक्य के एडिटर राजीव खंडेलवाल से एक महिला असिस्टेंट खोजने को कहा था और इस तरह मंदिरा यूनिट में शामिल हुई। फिर मेरी जिंदगी में भी..। मंदिरा फिल्मी पृष्ठभूमि से आती हैं। इनके परिवार में लडकियों को आजादी रही है, जबकि मेरा परिवार गंवई माहौल वाला व घोर परंपरावादी है, जहां प्रेम विवाह की कल्पना मुश्किल थी। पहली बार मैंने ही प्रेम विवाह किया, जिसके लिए भाभियां आज भी ताना देती हैं कि मैं

बुड्ढा कहना होगा पाप

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-अजय ब्रह्मात्‍मज 68 की उम्र और हिंदी फिल्मों का नायक!!! किसी फिल्म में मुख्य या शीर्ष भूमिका निभाना और बात होती है, लेकिन हिंदी फिल्म का नायक होने का खास मतलब होता है। इसका अर्थ है मसाला फिल्मों के लिए जरूरी वे सारी हरकतें करना, जिन्हें देखकर आम दर्शक खुश होता है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में किसी उम्रदराज अभिनेता ने ऐसी भूमिका नहीं निभाई होगी। कुछ लोग कह भी सकते हैं कि इस बुढ्डे को क्या हो गया है? श् श् श् श.. 'बुढ्डा होगा तेरा बाप'.. यह तो अमिताभ बच्चन हैं। सचमुच 68 साल के इस बुजुर्ग अभिनेता का नाम और छवि दिमाग में आने पर अभी तक तो किसी बूढ़े व्यक्ति या अभिनेता का एहसास नहीं होता। पर्दे पर अमिताभ बच्चन की छवि चिरयुवा है। उसे उम्र नहीं छू सकती। अमिताभ बच्चन एक अंतराल के बाद एक्शन प्रधान फिल्मों में आ रहे हैं। तेलुगू फिल्मों के डायरेक्टर पुरी जगन्नाथ उनके प्रशंसक हैं। उन्होंने राम गोपाल वर्मा से आग्रह किया था कि अमिताभ बच्चन से मिलवा दें। वे उनके साथ एक फिल्म करना चाहते थे। इस फिल्म में आठवें-नौवें दशक के अमिताभ बच्चन को वे फिर से पर्दे पर लाना चाहते थे। अमिताभ बच्चन और पुरी जग