दस साल का हुआ मामी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल

-अजय ब्रह्मात्मज
हर साल मुंबई में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है। इस साल 7 से 13 मार्च के बीच आयोजित फेस्टिवल में 125 से अधिक फिल्में दिखाई गई। सात दिनों के इस फेस्टिवल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कई नामी हस्तियों ने हिस्सा भी लिया। सबसे सुखद बात यह रही कि कई सक्रिय फिल्मकारों ने दर्शकों, फिल्म प्रेमियों और फिल्मों में आने के इच्छुक व्यक्तियों से आमने-सामने बातें भी कीं। उन्होंने उनके साथ फिल्म निर्माण से संबंधित मुद्दों पर बातें कीं और उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया और उसके बाद अपनी विशेषज्ञता शेयर की। मुंबई का मामी फिल्म फेस्टिवल इस मायने में विशेष है कि इसके आयोजन में फिल्म इंडस्ट्री के सदस्यों की भागीदारी रहती है। हालांकि महाराष्ट्र की सरकार आर्थिक मदद करती है, लेकिन फेस्टिवल से संबंधित किसी भी फैसले में कोई सरकारी दबाव और हस्तक्षेप नहीं रहता।
इस फेस्टिवल की कई उपलब्धियां हैं। मशहूर निर्देशक नागेश कुकनूर को पहली बार इसी फेस्टिवल से पहचान मिली। कोंकणा सेन शर्मा इसी फेस्टिवल के जरिए हिंदी निर्माता-निर्देशकों से परिचित हुई थीं। देश-विदेश की कई विख्यात फिल्में पहली बार यहां प्रदर्शित होने के बाद राष्ट्रीय चर्चा में आई। अभी तक यह जानकारी नहीं मिली है और न ही किसी ने उल्लेख किया है कि इस फेस्टिवल से प्रेरित होकर वह फिल्मकार बन गया। फिर भी मुंबई के कई युवा फिल्मकार ऐसे फेस्टिवल को अत्यंत आवश्यक मानते हैं। उनकी राय में मामी जैसे फेस्टिवल में देश-विदेश की उत्कृष्ट फिल्में देखकर फिल्मों की समझदारी बढ़ती है। मुंबई में फिल्मकार बनने के इच्छुक युवकों का अच्छा जमावड़ा है। उन्हें अच्छी फिल्मों के लिए किसी और शहर में प्रवास नहीं करना पड़ता।
इस बार की बात करें, तो मशहूर स्पेनिश डायरेक्टर कार्लोस साउरा को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया और उनकी फिल्म फादोस का प्रदर्शन भी किया गया। इस फिल्म में फादो संगीत की पुर्तगाली परंपरा का दृश्यात्मक चित्रण किया गया था। फेस्टिवल में धर्मेद्र को भी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया। इस अवसर पर ऋषि कपूर, गुलजार और हितेन्द्र घोष को भी सम्मानित किया गया। ठीक है कि मीडिया इस फेस्टिवल को उचित कवरेज नहीं देता, क्योंकि यहां मंत्रियों और स्टारों से ज्यादा फिल्मों पर ध्यान दिया जाता है और सिर्फ फिल्मों की बात चलती है, तो दर्शकों से पहले रिपोर्टर भाग खड़े होते हैं। इस साल भी न्यूज चैनलों के कैमरे पहले और आखिरी दिन ही दिखाई पड़े। वजह साफ है, मीडिया और फिल्म पत्रकारिता इन दिनों मुख्य तौर पर ग्लैमर और गॉसिप तक ही सीमित रह गई है।
बहरहाल, दसवें मामी फिल्म फेस्टिवल में कॉन, वेनिस और बर्लिन में पुरस्कृत और प्रशंसित फिल्में लाई गई थीं। पिछले साल कॉन फिल्म फेस्टिवल की साठवीं वर्षगांठ के अवसर पर दुनिया भर के 35 नामी निर्देशकों से पांच-पांच मिनट की फिल्म बनाने का आग्रह किया गया था। उन छोटी फिल्मों को देखना सुखद अनुभव रहा।
इस साल जया बच्चन की पहल पर यंग डायरेक्टर के लिए अनोखी प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। मुंबई डायमेंशन नाम की इस प्रतियोगिता में मुंबई से संबंधित छोटी फिल्में बनानी थीं। अच्छी बात यह रही कि श्रेष्ठ प्रविष्टियों को पुरस्कृत भी किया गया। अब जरूरत है कि इन अच्छी फिल्मों को आम दर्शकों तक कैसे पहुंचाया जाए और यह किसी अभियान के तहत ही संभव हो सकता है। फिल्मों के डिजिटल होने के बाद फिल्मों का प्रदर्शन सस्ता और सुविधाजनक हो गया है। हां, कोई पहल करे और इन फिल्मों को महानगरों के विभिन्न मोहल्लों के साथ छोटे शहरों में ले जाए, तो निश्चित ही एक समझदार सिने संस्कृति विकसित हो सकती है!

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