फ़िल्म समीक्षा:मुंबई मेरी जान

मुंबई के जिंदादिल चरित्र
ऐसी फिल्मों में कथानक नहीं रहता। चरित्र होते हैं और उनके चित्रण से ही कथा बुनी जाती है। हालांकि फिल्म के पोस्टर पर पांच ही चरित्र दिखाए गए हैं, लेकिन यह छह चरित्रों की कहानी है। छठे चरित्र सुनील कदम को निभाने वाला कलाकार अपेक्षाकृत कम जाना जाता है, इसलिए निर्माता ने उसे पोस्टर पर नहीं रखा। फिल्म के निर्देशक निशिकांत कामत हैं और वे सबसे पहले इस उपक्रम के लिए बधाई के पात्र हैं कि आज के माहौल में वे ऐसी भावनात्मक और जरूरी फिल्म लेकर आए हैं।
11 जुलाई 2006 को मुंबई के लोकल ट्रेनों में सीरियल बम विस्फोट हुए थे। एक बारगी शहर दहल गया था और इसका असर देश के दूसरे हिस्सों में भी महसूस किया गया था। बाकी देश में चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं, लेकिन अगले दिन फिर मुंबई अपनी रफ्तार में थी। लोग काम पर जा रहे थे और लोकल ट्रेन का ही इस्तेमाल कर रहे थे। मुंबई के इस जोश और विस्फोट के प्रभाव को निशिकांत कामत ने विभिन्न चरित्रों के माध्यम से व्यक्त किया है। उनके सभी चरित्र मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवेश के हैं। न जाने क्यों उन्होंने शहर के संपन्न और सुरक्षित तबके के चरित्रों को छुआ ही नहीं।
बम विस्फोट से सीधे प्रभावित होने वालों में रूपाली जोशी (सोहा अली खान) और निखिल अग्रवाल (आर माधवन) हैं। टीवी रिपोर्टर रूपाली का मंगेतर इस विस्फोट में लापता हो जाता है। विस्फोट की रिपोर्ट कर रही रूपाली खुद उसका शिकार होती है और चैनल उसकी व्यथा का प्रसारण करता है। इस प्रक्रिया में समाचार संग्रह के दबाव की अनिवार्यता और उसमें निहित अमानवीयता भी नजर आती है। निखिल को हम एक जिम्मेदार और देश के प्रति वफादार नागरिक के रूप में देखते हैं। हादसे का स्वयं शिकार होने के बाद उसे संभलने में वक्त लगता है, लेकिन वह मुंबई की जिंदगी की निरंतरता के रूप में हमें फिर लोकल ट्रेन में दिखाई देता है।
थामस (इरफान खान) रात में काफी बेचकर गुजारा करता है। विस्फोट का असर उसके धंधे पर पड़ता है। महानगरों की माल संस्कृति की चपेट में आया थामस एक बार अपमानित होने पर अजीब तरीके से बदला लेता है। सुरेश (के के) के रूप में हम ऐसे हिंदू नौजवान को देखते हैं, जो हर मुसलमान को शक की निगाह से देखता है, लेकिन सच से सामना होने पर उनकी आंखें खुलती हैं। मुंबई पुलिस के तुकाराम पाटिल (परेश रावल) और सुनील कदम (विजय मौर्या) फिल्म के स्थायी भाव अवसाद को व्यक्त करते हैं। रिटायर होने जा रहे तुकाराम का एहसास और सुनील की निराशा झिंझोड़ती है।
मुंबई मेरी जान चरित्रों के अनुरूप अभिनेताओं के चयन से खास बन गई है। परेश रावल का किरदार और उनका अभिनय अनजाना नहीं है, लेकिन विजय मौर्या ने सुनील कदम की निराशा को पूरे आवेग से निभाया है। थामस के किरदार में इरफान ने अस्पष्ट संवादों के बावजूद निम्नमध्यवर्गीय आक्रोश को बखूबी व्यक्त किया है। अपनी गलती का एहसास होने पर बेचैनी और उद्विग्नता से से वे पश्चाताप करते हैं और फिर राहत मिलने पर सिर्फ भंगिमाओं से खुशी जाहिर करते हैं। इस फिल्म में उनका मौन मुखर है। उन्होंने यादगार चरित्र निभाया है।
मुख्य कलाकार : परेश रावल, सोहा अली खान, इरफान खान, आर माधवन, के.के. मेनन और विजय मौर्या आदि।
निर्देशक : निशिकांत कामत
तकनीकी टीम : निर्माता- रोनी स्क्रूवाला, संगीत- समीर फाटपरेकर, कथा-संवाद-गीत- योगेश विनायक जोशी

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