फ़िल्म समीक्षा:९९


-अजय ब्रह्मात्मज

कहते हैं देश का हर आदमी 99 के फेर में पड़ा है। बस, एक और मिल जाए, हो जाए या पा जाए तो सभी की सेंचुरी लग जाए। आम जीवन के इसी थीम को निर्देशकद्वय राज और डीके ने अपनी फिल्म का विषय बनाया है। उन्होंने मशहूर कामिक किरदार लारेल और हार्डी की तर्ज पर एक मोटा और एक दुबला-पतला किरदार चुना है। यहां सायरस भरूचा और कुणाल खेमू इन भूमिकाओं में हैं।
मुंबई के दो छोटे जालसाज डुप्लीकेट सिम के धंधे में पकड़े जाने से बचने के लिए भागते हैं तो अपराध के दूसरे कुचक्र में शामिल हो जाते हैं। वे बुकी एजीएम का काम करने लगते हैं। उसी के पैसों की वसूली के लिए वे दिल्ली पहुंचते हैं। दिल्ली में उनका सामना विचित्र किरदारों से होता है। 99 नए किस्म की कामेडी है। पिछले कुछ समय से दर्शक एक ही किस्म की कामेडी देख कर ऊब चुके हैं, वैसे में 99 राहत की तरह है।
निर्देशकद्वय ब्लैक कामेडी और ह्यूमर के बीच में अपने किरदारों को रख पाए हैं। इस फिल्म में मजेदार ब्लैक कामेडी की संभावना थी। फिल्म बीच में स्लो हो जाती है। कामेडी फिल्मों में घटनाएं तेजी से नहीं घटे तो कोफ्त होने लगती है। मुख्य किरदार सचिन [कुणाल खेमू] और जरामुड़ [सायरस भरूचा] के बीच अच्छी केमिस्ट्री है, लेकिन लेखक और निर्देश्क ने जरामुड़ पर विशेष काम नहीं किया है। सायरस नेचुरल किस्म के एक्टर हैं, उन्हें कुछ और दृश्य एवं संवाद मिले होते तो फिल्म की रोचकता बढ़ती। कुणाल निराश तो नहीं करते, लेकिन उन्हें और अभ्यास की जरूरत है।
यह फिल्म बोमन ईरानी और राज मिस्त्री के लिए देखी जा सकती है। राज मिस्त्री के रूप में हिंदी फिल्मों को एक नया एक्टर मिला है। उनकी कामिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति फिल्म के दृश्यों के लिए सटीक है। बोमन ऐसी फिल्मों में लाजवाब होते हैं। उनकी पत्नी के रूप में सिमोन सिंह ने किरदार के भाव को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है।
भोजपुरी फिल्म के माहौल को लेकर किए गए कटाक्ष भोजपुरीभाषी दर्शकों को चुभ सकते हैं। लेखकों को ऐसे मजाक से बचना चाहिए, जो किसी भाषा विशेष को निशाना बना कर हंसाने की कोशिश करता हो। फिल्म के संवाद चुटीले और प्रासंगिक हैं। छोटे ओर सहयोगी किरदारों को गढ़ने में निर्देशक ने मेहनत की है। उनकी मौजूदगी से स्क्रिप्ट में आई फांक भरती है। पहली फिल्म के संदर्भ में निर्देशकद्वय राज निदिमोरू और कृष्णा डीके उम्मीद जगाते हैं।

Comments

Unknown said…
यानी देखने लायक है फिल्‍म
chalo bahut jald dekhte hain ise
miHir said…
शुक्रिया अजय जी एक अच्छी समीक्षा के लिए. आपने सही कहा, अमित मिस्त्री हिन्दी सिनेमा के लिए नई उम्मीद हैं. दूरदर्शन पर ’टी टाइम मनोरँजन’ में उनकी दिलफ़रेब कॉमेडी फिर से याद हो आई. उनके साथ आये किरदार ’डिम्पल’ ने फ़िल्म में नया रंग भरा है और फ़िल्म को उसके सबसे मज़ेदार हिस्से दिये है! क्या किरदार गढ़ा है ’कोमल ह्रदय हैंचमैन’ का, वाह!

बस एक बात, यह निर्देशक द्वय की पहली फ़िल्म नहीं है. वे इससे पहले हिन्दुस्तानी कलाकारों के साथ ’डायस्पोरा सिनेमा’ में गिनी जाने वाली ’फ़्लेवर्स’ नाम की फ़िल्म बना चुके हैं.

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