दरअसल:एक निर्देशक के बहाने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

काशी का अस्सी के स्क्रिप्ट लेखन में जुटे डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से पिछले दिनों काफी लंबी बातचीत हुई। हिंदी के वर्तमान सिनेमा की स्थिति से खिन्न डॉ. द्विवेदी अपनी कोशिशों में लगे हैं। टीवी सीरियल चाणक्य और फिर फीचर फिल्म पिंजर के निर्माण के बाद उनकी कोई नई कृति दर्शकों के सामने नहीं आ पाई है। उन्होंने बताया कि इस अंतराल में वे रुके नहीं हैं। लगातार काम कर रहे हैं।

उन्होंने उपनिषदों के आधार पर 52 एपिसोड में उपनिषद गंगा का लेखन और निर्देशन किया है। अपने इस कार्य से वे पूरी तरह संतुष्ट हैं और उन्हें विश्वास है कि चाणक्य की तरह ही दर्शक इसे भी सराहेंगे। संस्कृति और इतिहास में विशेष रुचि रखने की वजह से डॉ. द्विवेदी ने हमेशा सृजन के लिए ऐसे विषयों को चुना, जो सारगर्भित और स्थायी प्रभाव के हों। वे हिंदी फिल्मों के फैशन में कभी नहीं आ सके। यही कारण है कि श्रेष्ठ योग्यता के बावजूद उनकी कम कृतियां ही सामने आ पाई हैं।

पिंजर के बाद उन्होंने पृथ्वीराज चौहान पर एक फिल्म की अवधारणा विकसित की, उसमें सनी देओल मुख्य भूमिका निभाने वाले थे। तभी राज कुमार संतोषी ने अजय देवगन के साथ पृथ्वीराज पर ही एक फिल्म की घोषणा कर दी। डॉ. द्विवेदी की फिल्म अटक गई और संतोषी की फिल्म भी नहीं बन सकी। ऐसी घटनाओं से आहत होने के बावजूद डॉ. द्विवेदी शिकायत नहीं करते। वे दूसरे कार्य में लग जाते हैं। उन्होंने सम्राट अशोक के बेटे कुणाल के जीवन के प्रेरक प्रसंग को लेकर कुणाल की कल्पना की। इसमें अमिताभ बच्चन, तब्बू, अर्जुन रामपाल और अमृता राव का नाम फाइनल हो चुका था। रिलायंस का बिग सिनेमा इसे प्रोड्यूस कर रहा था। तभी मंदी की मार पड़ी और रिलायंस की यह योजना खटाई में पड़ गई। इस झटके के बावजूद डॉ. द्विवेदी को उम्मीद है कि कुणाल फिल्म बनेगी। भले ही उसमें थोड़ी देर हो। हां, अमिताभ बच्चन चाहें, तो फिल्म को पटरी पर लाने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। वैसे जया बच्चन भी चाहती हैं कि कुणाल बने, क्योंकि सम्राट अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन को इंटरनेशनल ख्याति मिलेगी।

कम लोगों को मालूम है कि जी टीवी के सुभाष चंद्रा से लेकर बी के मोदी तक ने डॉ. द्विवेदी के साथ बुद्ध के निर्माण की बात सोची, लेकिन विभिन्न कारणों से बुद्ध की योजना में डॉ. द्विवेदी नहीं रह सके। इस बीच स्टार प्लस के लिए बॉबी बेदी ने महाभारत सीरियल के निर्माण की घोषणा की। उसके निर्देशक डॉ. द्विवेदी ही थे। कुछ महीनों की तैयारी के बाद विवादों और मतभेदों की वजह से डॉ. द्विवेदी महाभारत की टीम से अलग हो गए। उनके बगैर यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

इन दिनों डॉ. द्विवेदी काशीनाथ सिंह की कृति काशी का अस्सी की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। उन्होंने तय किया है कि फिलहाल इतिहास और संस्कृति की दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान समाज को फिल्म में उकेरा जाए। उन्हें काशीनाथ सिंह की पुस्तक बेहद पसंद आई है। वे इसकी छविभाषा गढ़ने में लगे हैं। उनकी कोशिश है कि सीमित बजट में उम्दा कलाकारों के साथ यह फिल्म बनाई जाए।

मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में स्टार की ताकत बढ़ने की प्रवृत्ति को वे सिनेमा के विकास के लिए उचित नहीं मानते। उनकी राय में निर्माता और निवेशक कंटेंट से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि आप किस सुपरस्टार को लेकर आ रहे हैं। अब हर फिल्म किसी न किसी सुपरस्टार के साथ तो नहीं बनाई जा सकती। निर्माण से पहले ही मुनाफा सुनिश्चित करने की कॉरपोरेट सोच से भी फिल्मों का स्वतंत्र निर्माण बाधित हो रहा है। नतीजे में एक ही तरह की फिल्में आ रही हैं। आशा की किरण के तौर पर छमाही में किसी छोटी फिल्म की कामयाबी भरोसा दे जाती है, लेकिन डॉ. द्विवेदी मानते हैं कि हिंदी सिनेमा निश्चित रूप से संकट के दौर से गुजर रहा है।


Comments

Unknown said…
hollywood ki tarj par hindi cinema jagat main bhi star system aur bajarwaad ka ganda saya pada hua hai, zarurat hai ki swantantra filmkaar saath aayein aur kam bajat ki filmo k nirmaan ko protsahit karein ismain multiplex dharako ko bhi saath dena hoga...

bharat main achhe filmkaro ki kami nahin hai magar is nakartamak bajaarwad k chalte achhe film karo ne ya to filmo se apna nata hi tod liya hai ya fir wo adhyapan main lag gaye hain jo ki nishchit roop se palayanwad hai...
संकट की जड़ तो टी.वी. है भाई!

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