जरूरी है चिटगांव विद्रोह के सूर्य सेन को जानना: आशुतोष गोवारीकर

जरूरी है चिटगांव विद्रोह के सूर्य सेन को जानना: आशुतोष गोवारीकरआशुतोष गोवारीकर की हर नई फिल्म के प्रति दर्शकों और समीक्षकों की जिज्ञासाएं और आशंकाएं कुछ ज्यादा रहती हैं। इसकी एक बड़ी वजह है कि लगान के बाद वे एक जिम्मेदार निर्देशकके रूप में सामने आए हैं। उनकी फिल्में हिंदी फिल्मों के पारंपरिक ढांचे में होते हुए भी चालू और मसालेदार किस्म की नहीं होतीं। उनकी हर फिल्म एक नए अनुभव के साथ सीख भी देती है। खेलें हम जी जान से मानिनी चटर्जी की पुस्तक डू एंड डाय पर आधारित चिटगांव विद्रोह पर केंद्रित क्रांतिकारी सूर्य सेन और उनकेसाथियों की कहानी है..

स्वदेस से लेकर खेलें हम जी जान सेतक की बात करूं तो आप की फिल्में रिलीज के पहले अलग किस्म की जिज्ञासाएं बढ़ाती हैं। कुछ शंकाएं भी जाहिर होती हैं। आप इन जिज्ञासाओं और शंकाओं को किस रूप में लेते हैं।

इसे मैं दर्शकों और समीक्षकों की रुचि और चिंता के रूप में लेता हूं। हम सभी प्रचलित धारणाओं से ही अपनी राय बनाते हैं। जब जोधा अकबर में मैंने रितिक रोशन को चुना तो पहली प्रतिक्रिया यही मिली कि रितिक अकबर का रोल कैसे कर सकते हैं? यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। ह्वाट्स योर राशि? के समय मेरी दूसरी फिल्मों के आलोचक ही कहने लगे कि रोमांटिक कामेडी की क्या जरूरत है? आशुतोष को तो अपनी किस्म की सोशल फिल्में करनी चाहिए। कैसी बनेगी यह फिल्म? पीरियड फिल्म की घोषणा करता हूं तो प्रतिक्रिया आती है कि कुछ और क्यों नहीं करते? फिर से पीरियड बना रहे हैं। अब आदत हो गई है कि कुछ भी करूं लोग अनुमान, आशंका और जिज्ञासा आरंभ कर देते हैं।

आदत होना अलग बात है, लेकिन आहत भी तो होते होंगे?

ना ना.. तारीफ तो ठीक है, लेकिन मैं शंका और आलोचना पर पूरा गौर करता हूं। उन बिंदुओं को उठा लेता हूं। उन्हें सकारात्मक और संरचनात्मक तरीके से लेता हूं। फिल्म बनाते समय उन बिंदुओं को ध्यान में रखता हूं। मैं खुले दिल से तारीफऔर आलोचना सुनता और पढ़ता हूं। उनसे सीखता हूं।

एक प्रचलित सोच और धारणा है कि आशुतोष गोवारीकर खुद को बहुत गंभीर फिल्ममेकर मानते हैं। इस दबाव में वे गंभीर फिल्में बनाते हैं। दर्शकों को सिखाने-समझाने का दायित्व ओढ़ लिया है आपने?

हमारी रोजमर्रा जिंदगी में कुछ थीम और विषय ऐसे हैं, जिन से रोजाना हम दो-चार होते हैं, लेकिन हमें उनकी गंभीरता का एहसास नहीं होता। कभी दोस्तों के साथ बातें करते,अखबार पढ़ते या टीवी देखते समय अचानक एहसास होता है। वैसे ही फिल्म भी एक जरिया है एहसास दिलाने का। मेरी पहली कोशिश रहती है कि दर्शकों का मनोरंजन हो, लेकिन उसके साथ एक सीख भी मिले, जो घर जाने के बाद भी याद रहे। फिल्म देखना मेला घूमने से अलग होना चाहिए। इसका आनंद सिर्फ देखते समय तक न रहे। स्वदेस और जोधा अकबर में संदेश है। ह्वाट्स योर राशि? नारी सशक्तिकरण की फिल्म थी। मैंने जिम्मेदारी ओढ़ी नहीं है। मैं अंदर से ऐसा महसूस करता हूं। खेलें हम जी जान से के सूर्य सेन के बारे में पढ़ने के बाद लगा कि उन पर फिल्म आनी चाहिए ताकि सभी लोग उनके बारे में जान सकें। मैं अपना एहसास दर्शकों के साथ शेयर करना चाहता हूं। फिल्म बनाने का मेरा उद्देश्य सीख देना नहीं है। मैं कहानी, कहानी में निहित भावना और उस भावना के प्रभाव पर ध्यान देता हूं। स्वदेस में एक राष्ट्रवादी अप्रोच है। हमलोग ज्यादातर निजी समस्याओं में उलझे रहते हैं। थोड़ा ठहर कर समुदाय और समाज के बारे में सोचें तो हर व्यक्ति परिवर्तन ला सकता है और हर परिवर्तन हमारे ही हित में है।

आपकी हर फिल्म में कुछ लोग एकत्रित होते हैं और फिर एक सामूहिक अभियान पर निकलते हैं। स्वदेस में भी व्यक्ति के समूह से जुड़ने या समूह को जागृत करने की बात है। इस कॉमन थीम के बारे में क्या कहेंगे?

एक अकेला आदमी बदलाव नहीं ला सकता, लेकिन वह बदलाव की भावना फैला सकता है। बदलाव सही में लाना है तो वह सामूहिक प्रयास से ही आ सकता है। अगर युवाओं को जागृत कर दिया जाए तो बदलाव लाया जा सकता है। हर पुरानी पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी को सब कुछ सौंपती है। क्या हम पिछली पीढ़ी से मिली समस्याओं को सुलझा पाए या हम ने उसे ज्यों के त्यों आगे बढ़ा दिया। आम तौर पर हमें सामूहिक समस्याएं किसी और की जिम्मेदारी लगती हैं और हम लापरवाह हो जाते हैं। मैं युवाओं की जागृति और सामूहिक प्रयास में यकीन करता हूं। झगड़ने से कुछ नहीं होता है। समस्या सुलझानी है तो साथ में आना होगा। लगान में तो कितनी समस्याएं थीं। ज्यादा न बताऊं तो भी खेलें हम जी जान से में 64 लोगों का एक साथ आना बड़ी क्रांतिकारी सोच है। मुझे अचंभा लगता है कि कैसे अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक साथ आए होंगे। ऐसा क्या हुआ.. किस मोटिवेशन से वे सभी एकत्रित हुए और अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो गए। देश की आजादी का वह जज्बा आज नहीं है। आज हमें किसी के खिलाफ नहीं लड़ना है। आज हमें अपने सामाजिक दानवों से लड़ना है। अगर सामूहिकता या बदलाव की सोच की यह चिंगारी मेरी फिल्म से मिल सके तो मैं बहुत खुश होऊंगा।

इतिहास हमेशा विजेता लिखते हैं, लेकिन पराजितों का संघर्ष भी एक सच्चाई होती है। हमेशा सत्ता वर्ग तय करता है कि हमें इतिहास में क्या पढ़ाया जाए? इतिहास की पुस्तकों से सूर्य सेन गायब रहे। उन्हें प्रकाशित करने की आप की यह कोशिश हिंदी फिल्मों में चल रहे हंसी और हिंसा के इस दौर में कितनी सफल होगी?

लोग पूछते हैं कि क्या इस जमाने में ऐसी फिल्मों की जरूरत है? मेरी राय है कि ऐसी फिल्मों की आज ज्यादा जरूरत है। एहसास जगाना जरूरी है। ठीक है कि फुल एंटरटेनमेंट का दौर है, लेकिन क्या सभी माइंडलेस एंटरटेनमेंट में लग जाएं। एंटरटेनमेंट हो, लेकिन यह भी बताया और एहसास दिलाया जाए कि देश में ऐसे क्रांतिकारी रहे हैं। चिटगांव विद्रोह में तो ज्यादातर किशोर और युवक थे। हमें उनकी भूमिका समझनी चाहिए। समाज का विकास या आंदोलन एक रिले रेस की तरह है, जिसमें अंतिम रेखा छूने वाले की जय-जय होती है। उस रेस के पूर्व धावकों पर ध्यान नहीं जाता। हमें उन पर भी ध्यान देना चाहिए। स्वतंत्रता आंदोलन में इतनी धाराएं थीं। हमें उन धाराओं के बारे में जानना चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि सूर्य सेन इतिहास की किताबों में क्यों नहीं हैं? हो सकता है कि विभाजन के बाद हम ने उन्हें पूर्व पाकिस्तान या बांग्लादेश के इतिहास का हिस्सा मान बैठे हों। बंगाल में भी आज के किशोर सूर्य सेन से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं।

क्या कंज्यूमर सोसायटी में देशभक्ति या राष्ट्रवाद की सामूहिक भावना दर्शकों को प्रभावित कर पाएगी?

मेरे दिल में उम्मीदें जिंदा हैं। मुझे लगता है कि ऐसी फिल्मों की जरूरत है और यह फिल्म चलेगी। देशभक्ति की भावना तो जन्मजात होती है, लेकिन राष्ट्रवाद की भावना जगाना जरूरी है। अपने देश के लिए जान दे देना देशभक्ति है, लेकिन देश की तरक्की के लिए जान देना राष्ट्रवाद है। आज हमें इसकी जरूरत है। फिल्म में यह भावना अपनी क्षमता के साथ व्यक्त करने पर मुझे आंतरिक शांति मिलती है। मुझे सुकून मिलता है।

इस फिल्म के दरम्यान सूर्य सेन की जिंदगी और विचार को आपने करीब से समझा होगा। उनका क्या योगदान है?

मेरी कोशिश बस इतनी है कि सबसे पहले हम उनके बारे में जानें। हम चाफेकर बंधु, भगत सिंह, सावरकर, खुदीराम बोस समेत सभी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के बारे में जानते हैं, लेकिन सूर्य सेन के बारे में कुछ नहीं जानते। सूर्य सेन ने एक बड़े समूह के साथ नियोजित कोशिश की। यह बहुत बड़ा मोटिवेशन है। 13-14 साल के बच्चे उस विद्रोह में शामिल थे। हमारे लिए जानना जरूरी है कि अस्सी साल पहले सूर्य सेन ने कैसे यह संभव किया? उन्होंने देश के लिए निस्वार्थ कार्य किया। स्कूल टीचर थे, इसलिए किशोरों के साथ उनका अधिक जुड़ाव था। उनमें एक बौखलाहट थी कि कुछ करना है। कुछ ऐसा करना है, जिसका असर पूरे देश में हो और ब्रिटिश सरकार विद्रोह की भावना के प्रभाव को समझे। उनकी पैशन फॉर कंट्री गजब की है।

सूर्य सेन के चिटगांव विद्रोह का संदर्भ क्या है?

1929 में गांधी जी ने कहा था कि कोई हिंसा के मार्ग पर नहीं चलेगा। हमें एक साल का मौका दो। हम आजादी लाएंगे। 1930 की जनवरी में सूर्य सेन ने कहा कि एक साल बीत चुका है। आजादी हमें नहीं मिली है। अब मेरा एक प्लान है, जो मैं करना चाहता हूं। हिंसा या अहिंसा..आजादी के उद्देश्य से हर मार्ग सच्चा है। चिटगांव विद्रोह से भगत सिंह भी प्रभावित हुए। सूर्य सेन के पहले खुदीराम बोस और जतिन दास हरी थे। सूर्य सेन के योगदान को सलाम नहीं किया गया।

इस फिल्म की शूटिंग सावंतवाड़ी में करने के पीछे जमीनी सुविधाएं भर थीं या कोई और वजह थी?

हम चिटगांव गए। वहा जाकर तो देखा तो रियल लोकेशन उजड़ चुके हैं। घटनाओं के मुख्य पांच स्थानों पर निशान नहीं बचे हैं। हमने बंगाल में कोलकाता के आसपास और शांति निकेतन भी देखा.. वे शूटिंग के लिए सही नहीं लगे। 1930 की फिल्म बनाते समय खास खयाल रखना था। महाराष्ट्र में मुझे सावंतवाड़ी में वैसा ही परिवेश मिला। यहां का लैंडस्कोप मिलता-जुलता है। चिटगांव बंगाल की खाड़ी के समीप है और सावंतवाड़ी अरब सागर के निकट है। यहां का माहौल शूटिंग के लिए सही था।

अभिषेक बच्चन और दीपिका पादुकोण के चुनाव के बारे में क्या कहेंगे?

किताब पढ़ते समय सूर्य सेन के लिए पहला चेहरा अभिषेक बच्चन का ही ध्यान में आया। उनके साथ काफी समय से काम करने की इच्छा थी। पहले मेरे पास स्क्रिप्ट नहीं थी कोई। मैं स्टार के बाद स्क्रिप्ट के बारे में नहीं सोचता। जो सोचते और करते हैं, वे गलत नहीं है। उसके लिए अलग प्रतिभा चाहिए। चलो स्टार आ गया है, अब स्क्रिप्ट तैयार करो। अभिषेक बच्चन को भी स्क्रिप्ट पसंद आई। कल्पना दत्ता का चेहरा दीपिका से काफी मिलता है। किताब की लेखिका मानिनी चटर्जी का भी यही मानना है।

क्रांतिकारी फिल्म में गानों की कल्पना करना और उसे पिरोना तो चुनौती रही होगी। क्या जरूरी थे गाने? अब तो इंटरवल फार्मेट भी खत्म करने की बात चल रही है।

मैं बगैर गानों के फिल्म नहीं बना सकता। गाने मेरे लिए जरूरी हैं। कभी-कभी गाने फिल्म के दृश्यों के प्रभाव को बढ़ा देते हैं। गीत में जिस प्रभाव के साथ कथ्य को रखा जा सकता है, वह संवादों में संभव नहीं है। देशभक्ति और दोस्ती की भावना जाहिर करने के लिए मुझे संगीत की जरूरत थी। इंटरवल वाली फिल्मों के साथ मैं बड़ा हुआ हूं। मेरी फिल्मों में तो रहेगा इंटरवल। जब तक मेरा मोहभंग न हो जाए, तब तक इंटरवल चलता रहेगा।


Comments

amitesh said…
हमारे पास आसुतोष जैसा एक फ्रिल्म्कार तो है जो इतिहास में झांकता है, यह चुनौतीपूर्ण है और वे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.
L.Goswami said…
इस उम्मीद को सलाम ..इस जज्बे को सेल्यूट ...
Unknown said…
आपने अच्छे सवाल किए और आशुतोष ने उससे भी अच्छे जवाब दिए। आशुतोष के अंदर वह आग है जिसके बारे दुष्यंत ने लिखा था, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। आशुतोष को अपनी बात गली कूंचे के सिंगल स्क्रीन थिएटरों में फिल्म देखने वालों तक पहुंचाने के लिए और समय निकालना चाहिए।

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