बुड्ढा कहना होगा पाप

-अजय ब्रह्मात्‍मज

68 की उम्र और हिंदी फिल्मों का नायक!!! किसी फिल्म में मुख्य या शीर्ष भूमिका निभाना और बात होती है, लेकिन हिंदी फिल्म का नायक होने का खास मतलब होता है। इसका अर्थ है मसाला फिल्मों के लिए जरूरी वे सारी हरकतें करना, जिन्हें देखकर आम दर्शक खुश होता है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में किसी उम्रदराज अभिनेता ने ऐसी भूमिका नहीं निभाई होगी। कुछ लोग कह भी सकते हैं कि इस बुढ्डे को क्या हो गया है? श् श् श् श.. 'बुढ्डा होगा तेरा बाप'.. यह तो अमिताभ बच्चन हैं। सचमुच 68 साल के इस बुजुर्ग अभिनेता का नाम और छवि दिमाग में आने पर अभी तक तो किसी बूढ़े व्यक्ति या अभिनेता का एहसास नहीं होता।

पर्दे पर अमिताभ बच्चन की छवि चिरयुवा है। उसे उम्र नहीं छू सकती। अमिताभ बच्चन एक अंतराल के बाद एक्शन प्रधान फिल्मों में आ रहे हैं। तेलुगू फिल्मों के डायरेक्टर पुरी जगन्नाथ उनके प्रशंसक हैं। उन्होंने राम गोपाल वर्मा से आग्रह किया था कि अमिताभ बच्चन से मिलवा दें। वे उनके साथ एक फिल्म करना चाहते थे। इस फिल्म में आठवें-नौवें दशक के अमिताभ बच्चन को वे फिर से पर्दे पर लाना चाहते थे। अमिताभ बच्चन और पुरी जगन्नाथ की मुलाकात बुढ्डा होगा तेरा बाप के नतीजे के तौर पर सामने आई। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन का रंग-ढंग, स्टाइल और स्माइल, एक्शन और कनेक्शन किसी युवा अभिनेता से कम नहीं है।

पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इस साल आ रही सभी फिल्मों के प्रोमो में सबसे ज्यादा पापुलर 'बुढ्डा होगा तेरा बाप' का प्रोमो है.. क्या खूब जादू किया है आपने? बुढ्डे में है दम..

हा हा हा.. क्या पता? अब यह तो दर्शक ही बताएंगे। फिल्म उनके सामने है।

क्या आइडिया था और कैसे फिल्म की योजना बनी?

राम गोपाल वर्मा ने पुरी जगन्नाथ से परिचय करवाया। वे प्रख्यात निर्देशक हैं। इनकी कई फिल्में मशहूर हुई हैं। मैंने इनकी पोखिरी देखी हुई थी, जिसकी रीमेक वांटेड है। उसमें सलमान ने काम किया था। उनके काम से तो मैं पहले से अवगत था। उन्होंने यह कहानी सुनाई। मुझे अच्छा लगा और फिल्म आ गई। इसमें मेरी ही उम्र का एक इंसान है। उसे एक शहर में बुलाया गया है। एक मिशन दिया गया है। उसके साथ क्या बीतती है? वही फिल्म है।

आपके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। फिर भी इस फिल्म के साथ कैसी चुनौतियां थीं?

ऐसा कहना ठीक नहीं है। हर फिल्म के साथ नई चुनौतियां होती हैं। एक तो उम्र की वजह से शारीरिक काम में बाधा आती है। एक्शन करने की मेरी उम्र नहीं है, लेकिन एक बार कमिटमेंट दे दिया था तो उसे निभाना पड़ा। इस किरदार की खूबी या खासियत यह है कि वह खुद को बुढ्डा नहीं मानता है। अगर कोई कहे तो उसे बुरा भी लगता है। वह ऐसे काम भी करता है, जिसे उसकी उम्र के साथ अमूमन नहीं जोड़ा जा सकता। इस लिहाज से वह सक्षम है। फिल्म में जब उसकी एंट्री होती है तो लगता है कि सौंपे गए काम के लिए वह सही आदमी है। उसकी सक्षमता आगे जाकर कहानी से जुड़ जाती है। इससे ज्यादा मैं बता दूंगा तो पाठकों का मजा खराब हो जाएगा। उसमें थोड़ा सा दिखावा है। बातें करने, चलने और वेशभूषा से महसूस होगा कि 'ओवर द टॉप' है, लेकिन किरदार के हिसाब से वह लाजिमी है।

फिल्म में आपका लहजा वही है, जो खुश और मजाक के मूड में होने पर आपका होता है.. खास कर किसी की खिंचाई करते वक्त..

बिल्कुल, क्योंकि वह गंभीर किरदार नहीं है। वह मस्ती और खिंचाई के मूड में रहता है। उसकी वजह भी है। मैंने उसे हंसमुख और हल्का रखा है, लेकिन यह एक बंधी हुई कहानी है। सिर्फ हंसी-मजाक नहीं है।

मसाला एक्शन फिल्मों का दौर सा दिख रहा है। क्या इसी दबाव में 'बुढ्डा होगा तेरा बाप' आई है?

मेरे ऊपर कभी ऐसा दबाव नहीं रहा। न मैंने कभी ऐसी फिल्म बनाई है कि आजकल ऐसा दौर चल रहा है तो चलो कर लें। मेरे सामने जो कहानियां आती हैं, उनमें से कोई एक कर लेता हूं। मुझे मालूम नहीं कि इसकी वजह क्या होती है कि अचानक एक जैसी फिल्में आने लगती हैं। यह अपने देश में ही नहीं होता। विदेशों में भी होता है। मेरा खयाल है कि देश की आम जनता भी उन फिल्मों से खुद को दूर नहीं कर पाई हैं, जिसे हम कमर्शियल एस्केपिस्ट सिनेमा कहते हैं। कहीं न कहीं उन्हें लगता है कि दिल बदल जाना चाहिए। एंटरटेनमेंट होना चाहिए। कुछ गाने हों, कुछ संगीत हो। कुछ चीजों से अपने आप को हम दूर नहीं कर पाए हैं। जो लोग इस तरह की फिल्में बना रहे हैं। उनके लिए तो अच्छा है ही, लेकिन अलग-अलग तरह की फिल्में बन रही हैं। नए निर्देशक सामने आ रहे हैं। वे जवान हैं। 22-23-24 की उम्र में फिल्में बना रहे हैं। यह तो अद्भुत है। अच्छी फिल्में बन रही हैं। इसकी सराहना होनी चाहिए। मुझे तो बहुत खुशी होती है। कई बार मुझे लगता है कि इस स्थल पर मुझे नहीं होना चाहिए। जब मैं सेट पर जाता हूं तो अजीब लगता है। मैं 70 के करीब हूं और सेट पर औसत उम्र 25 की होती है। कृपा रही है सभी की, इसलिए काम मिल रहा है।

उम्र बढ़ने पर कई मामलों में परिवार में भी हम कह देते हैं कि बाबूजी अब आपका समय नहीं चल रहा है.. या संकेत में लोग कह देते हैं कि आप बूढ़े हो गए हैं.. क्या कभी आपके कानों ने ऐसा कुछ सुना?

परिवार के लोगों ने अभी तक नहीं कहा है। बाहर भी अभी तक लोगों ने नहीं कहा है। पीठ पीछे मालूम नहीं क्या चलता है? अभी तक ऐसा कुछ सुनाई नहीं पड़ा, लेकिन जो आप बता रहे हैं.. वो दिन ज्यादा दूर नहीं है।

क्या बूढ़ा होना या बुढ्डा कहलाना शर्मिदगी या लानत की बात है कि 'बुढ्डा होगा तेरा बाप' जैसा टायटिल चुना..

बूढ़े होने में क्या शर्मिदगी होगी। सभी होते हैं। फिल्म की कहानी के संदर्भ में यह टायटल रखा गया है। उत्तर भारत में ऐसा लोग बोलते हैं। इस मुहावरे का खूब चलन है। कोई बुढ्डा कहे तो लोग पलट कर कहते हैं अबे, बुढ्डा होगा तेरा बाप..

तो यह एक किस्म का पलटवार है..

जी, पलटवार ही है। यह पलटवार हमारी फिल्म की कहानी में अच्छा बैठ गया है।

पहले 'पा' आई, अभी 'बाप' आ रही है.. आगे क्या 'बाबूजी' आएगी?

हा हा हा. अरे, ऐसा तो हमने सोचा ही नहीं था।

आपकी फिल्म 'अग्निपथ' की रीमेक बन रही है, कुछ कहना चाहेंगे?

उस फिल्म के अधिकार धर्मा प्रोडक्शन के पास हैं। यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है। हम कौन होते हैं रोकने वाले। अगर वे सोचते हैं कि वे इसे दोबारा बना सकते हैं तो खुशी से बनाएं। फर्क सिर्फ इतना है कि ओरिजनल तो ओरिजनल ही रहेगा। हमारे जमाने के लोग तो आज भी के एल सहगल और दिलीप साहब के देवदास को याद रखेंगे। आज की जनरेशन के लिए देवदास शाहरुख खान हैं। यह अपना-अपना लगाव है!

फिल्‍म बुड्ढा होगा तरा बाप का रिव्‍यू...http://chavannichap.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

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